निठारी कांड में बरी सुरेंद्र कोली हरिद्वार में मृत मिले
वर्ष 2006 के निठारी हत्याकांड के मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली हरिद्वार में लाल माता मंदिर के बाहर अपनी चाय की दुकान में फंदे से लटके मिले, पुलिस ने बताया। 13 मामलों में मौत की सजा पाए कोली को अक्टूबर 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 मामलों में बरी कर दिया था। 11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी मामले में उन्हें बरी करते हुए जांच को त्रुटिपूर्ण बताया। 19 साल बाद 13 नवंबर को वे जेल से बाहर आए।
स्रोत
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- Koli was found hanging at his tea stall outside Lal Mata temple in Haridwar on Friday, September 18. — Attributed to police; the September 18 date conflicts with the source's statement that he was freed on November 13, 2025, and died less than a year later — an internal inconsistency an editor must resolve.
- The Supreme Court acquitted Koli in the 13th and last case on November 11, 2025, and he left Kasna Jail on November 13, 2025. — Dates and bench details (then CJI B R Gavai, Justices Surya Kant and Vikram Nath) appear in the source.
- The Supreme Court called the investigation 'botched' and a 'manifest miscarriage of justice'. — Quoted from the court order as reported in the source.
- Remains of 19 bodies were recovered from a drain behind house D-5 in Noida's Sector 31 in December 2006. — Figure appears in the source; no investigating agency cited for the count.
- Koli spent 19 years in prison, was sentenced to death in 13 cases, and was acquitted in 12 by the Allahabad High Court in October 2023. — Figures and dates appear in the source, consistent with the reported legal timeline.
विश्लेषकों की राय राय
सुरेंद्र कोली की मौत केवल एक निजी त्रासदी नहीं है — यह जांच की गुणवत्ता, पुलिस जवाबदेही और मृत्युदंड पर राजनीतिक बहस को फिर खोल देती है। जब सुप्रीम कोर्ट ने खुद जांच को "बिगड़ी हुई" और "न्याय की स्पष्ट विफलता" कहा, तो सरकारों के सामने असहज सवाल यही है कि 19 साल जेल काटने वाले व्यक्ति को बरी होने के बाद मुआवजा या पुनर्वास क्या मिला। बचाव पक्ष का तर्क रहा है कि मामला केवल इसलिए टिका क्योंकि वह गरीब, अशिक्षित दलित घरेलू कामगार था — इसलिए यह मुद्दा सामाजिक न्याय की राजनीति से भी जुड़ सकता है।
- लगभग दो दशक बाद भी निठारी के पीड़ित परिवारों के लिए कोई दोषी सामने नहीं है — यह किसी भी सरकार के लिए जवाब देना कठिन तथ्य है।
- सुप्रीम कोर्ट ने खुद दोषपूर्ण जांच और मीडिया ट्रायल के असर को रेखांकित किया है, जिससे विपक्ष को पुलिस जवाबदेही और आपराधिक न्याय सुधार पर तैयार तर्क मिल जाता है।
- कोली की गरीब, अशिक्षित दलित मजदूर की पहचान इस मामले को इस बड़ी बहस का उदाहरण बना सकती है कि व्यवस्था का बोझ सबसे कमजोर पर ही क्यों पड़ता है।
- यह मौत लंबे समय तक गलत तरीके से जेल में रहे लोगों के लिए मुआवजा, सुरक्षा और आजीविका की कोई व्यवस्थित नीति न होने को उजागर करती है।
- मृत्युदंड के विरोधियों के लिए यह मामला एक मजबूत संदर्भ बन सकता है, क्योंकि फांसी हो जाने पर सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बचती थी।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि राजनीतिक दल तीन मुद्दों — जांच की खामियों पर जवाबदेही, गलत तरीके से जेल में रहे लोगों के लिए मुआवजा नीति, और मृत्युदंड की बहस — को कितना उठाते हैं।
यह खबर मौत की परिस्थितियों पर किसी जांच का निष्कर्ष स्थापित नहीं करती, न ही इसमें किसी दल या सरकारी पक्ष की राजनीतिक प्रतिक्रिया दर्ज है।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 10 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
दिसंबर 2006 में नोएडा के सेक्टर 31 स्थित मकान डी-5 (कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर का घर) के पीछे नाले से बच्चों के कंकाल मिलने से 'निठारी कांड' सामने आया; कुल 19 शवों के अवशेष बरामद हुए। पंढेर के घरेलू नौकर सुरेंद्र कोली को मुख्य आरोपी बनाया गया और नरभक्षण जैसे आरोपों के बीच उसे 13 मामलों में मौत की सजा मिली। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 16 अक्टूबर 2023 को 12 मामलों में और सुप्रीम कोर्ट ने 11 नवंबर 2025 को आखिरी मामले में उसे बरी कर दिया, जांच को "botched" यानी त्रुटिपूर्ण बताते हुए। 19 साल जेल में बिताने के बाद रिहा हुए कोली शुक्रवार (18 सितंबर) को हरिद्वार में लाल माता मंदिर के बाहर अपनी चाय की दुकान में फंदे से लटके मिले।
मुख्य तथ्य
- दिसंबर 2006 में नोएडा सेक्टर 31 के मकान डी-5 के पीछे नाले से खुदाई में कुल 19 शवों के अवशेष बरामद हुए; मृतक ज्यादातर निठारी गांव के गरीब बच्चे थे।
- 29 दिसंबर 2006 को मोनिंदर सिंह पंढेर और उनके घरेलू नौकर सुरेंद्र कोली को गिरफ्तार किया गया; कोली जुलाई 2004 से पंढेर के यहां काम कर रहे थे।
- 2009 में कोली को पहले मामले ('विक्टिम XYZ', 14 वर्षीय लड़की) में मौत की सजा; 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए उन्हें 'सीरियल किलर' और मामले को 'rarest of rare' कहा।
- 8 सितंबर 2014 को सुबह 5.30 बजे तय फांसी से चार घंटे पहले, रात 1 बजे सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की पीठ ने फांसी पर अस्थायी रोक लगाई।
- जनवरी 2015 में तत्कालीन चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली इलाहाबाद हाईकोर्ट पीठ ने दया याचिकाओं के निपटारे में 2.6 वर्ष की अस्पष्ट देरी और अनुच्छेद 21 के उल्लंघन के आधार पर मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदला।
- 16 अक्टूबर 2023 को इलाहाबाद हाईकोर्ट (जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा व एसएएच रिजवी) ने कोली को 12 मामलों में बरी किया; सीबीआई की अपीलें जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दीं।
- इकबालिया बयान लगभग 60 दिन की लगातार पुलिस हिरासत के बाद दर्ज हुआ, जबकि CrPC के तहत अधिकतम पुलिस हिरासत 15 दिन है; हाईकोर्ट ने इसे अस्वैच्छिक व अग्राह्य माना।
- 11 नवंबर 2025 को तत्कालीन CJI बी आर गवई तथा जस्टिस सूर्य कांत व विक्रम नाथ की पीठ ने क्यूरेटिव याचिका पर 2011 के अपने फैसले को पलटा; 13 नवंबर 2025 को शाम 7.30 बजे कोली कसना जेल, ग्रेटर नोएडा से रिहा हुए।
समयरेखा
- जुलाई 2004सुरेंद्र कोली ने नोएडा में मोनिंदर सिंह पंढेर के घर काम शुरू किया।
- दिसंबर 2006मकान डी-5 के पीछे नाले से बच्चों के कंकाल मिलने लगे; कुल 19 शवों के अवशेष बरामद।
- 29 दिसंबर 2006पंढेर और कोली की गिरफ्तारी।
- जनवरी 2007अदालत में पहली पेशी के दौरान कोली को उसके नियुक्त वकील सहित कुछ वकीलों ने पीटा।
- 2007केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की समिति की रिपोर्ट में अंग व्यापार के पहलू की जांच की सिफारिश।
- 2009कोली को पहले मामले में मौत की सजा; तब से एकांत कारावास में रखा गया।
- 2010-2021निठारी के 12 अन्य मामलों में भी कोली को मौत की सजा सुनाई गई।
- 2011सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज की, कोली को 'सीरियल किलर' कहा।
- 2013 और 2014यूपी के राज्यपाल और फिर राष्ट्रपति ने दया याचिकाएं खारिज कीं; पुनर्विचार याचिका भी 2014 में खारिज।
- 2 सितंबर 2014गाजियाबाद कोर्ट ने मृत्यु वारंट जारी किया; कोली को मेरठ जेल भेजा गया।
किसका दाँव
- सुरेंद्र कोली — अल्मोड़ा के मंगरू खाल गांव का दलित, अशिक्षित घरेलू नौकर; 19 साल जेल, 13 मौत की सजाएं, एकांत कारावास और अंत में बरी होने के बाद मृत मिले।
- कोली का परिवार — भाइयों को 'नरभक्षी के भाई' कहा गया, नौकरियां गईं, नाम बदलने पड़े; मां की मृत्यु, पत्नी ने दूसरी शादी की, बेटे से कोली कभी नहीं मिले।
- निठारी के पीड़ित बच्चों के परिजन — 19 शवों के अवशेष मिलने के बावजूद सभी आरोपी बरी; असली अपराधी और अंग व्यापार का पहलू अनजांचा रह गया।
- मोनिंदर सिंह पंढेर — सह-आरोपी; 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सभी मामलों में बरी किया।
- सीबीआई व यूपी पुलिस — जांच को 'botched' बताया गया; अवैध हिरासत, यातना के आरोप, फोरेंसिक चूक और अंग व्यापार लीड की अनदेखी पर सवाल।
- न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट/इलाहाबाद हाईकोर्ट) — 2011 के अपने ही फैसले को पलटना; मीडिया ट्रायल और मृत्युदंड प्रक्रिया की विश्वसनीयता का प्रश्न।
- बचाव पक्ष की टीम (युग चौधरी, पयोशी रॉय, सिद्धार्थ, सिस्टर शीबा जोस, इंदिरा जयसिंह) — 2014 से मुफ्त/विशेषज्ञ पैरवी, मृत्युदंड के खिलाफ लड़ाई और अंतिम रिहाई सुनिश्चित करना।
क्यों अहम है
यह मामला दिखाता है कि मीडिया ट्रायल, अवैध लंबी पुलिस हिरासत, यातना से लिया गया इकबालिया बयान और कमजोर फोरेंसिक जांच के आधार पर एक गरीब, दलित, अशिक्षित घरेलू नौकर को 13 बार मौत की सजा तक पहुंचाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट को अपना 2011 का फैसला पलटकर 'न्याय का स्पष्ट विफलन' स्वीकारना पड़ा, जो मृत्युदंड की अपरिवर्तनीयता और आपराधिक न्याय प्रणाली की खामियों पर गंभीर सवाल उठाता है। साथ ही 19 शवों के इस जघन्य अपराध में कोई दोषी नहीं ठहरा और अंग व्यापार का सुझाया गया पहलू कभी जांचा नहीं गया।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- निठारी कांड: दिसंबर 2006, नोएडा सेक्टर 31 का मकान डी-5; 19 शवों के अवशेष बरामद।
- CrPC के तहत अधिकतम पुलिस हिरासत 15 दिन; कोली का इकबालिया बयान करीब 60 दिन की हिरासत के बाद दर्ज।
- 2015 का इलाहाबाद हाईकोर्ट फैसला: दया याचिका निपटारे में 2.6 वर्ष की देरी अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन, सजा आजीवन कारावास में तब्दील।
- 2 सितंबर 2014 का सुप्रीम कोर्ट फैसला: मृत्युदंड मामलों में पुनर्विचार याचिकाएं तीन जजों की पीठ द्वारा खुली अदालत में सुनी जाएं।
- 11 नवंबर 2025: CJI बी आर गवई, जस्टिस सूर्य कांत व विक्रम नाथ की पीठ ने क्यूरेटिव याचिका पर 2011 का फैसला पलटा।
- 2007 में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की समिति ने अंग व्यापार के पहलू की जांच की सिफारिश की थी, जो नहीं हुई।
मेन्स दृष्टिकोण
निठारी मामले का पतन भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की संरचनात्मक कमजोरियों का दस्तावेज है। अभियोजन के दो स्तंभ—इकबालिया बयान और शवों की बरामदगी—दोनों दूषित पाए गए: बयान करीब 60 दिन की लगातार पुलिस हिरासत (CrPC में सीमा 15 दिन) में, वकील व परिजन से मिलने की अनुमति के बिना और यातना के आरोपों के बीच दर्ज हुआ, जबकि बरामदगी स्थल कोली के 'अनन्य नियंत्रण' में नहीं था, जो भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत ग्राह्यता की अनिवार्य शर्त है। नरभक्षण की कथा फोरेंसिक रूप से कभी सिद्ध नहीं हुई—घर में रक्त या मानव अवशेष नहीं मिले, कुल्हाड़ी के दावे के विपरीत शव 'सर्जिकल परिशुद्धता' से कटे थे, सभी धड़ गायब थे और 2007 की मंत्रालयी समिति द्वारा सुझाए अंग व्यापार व किडनी घोटाले में गिरफ्तार पड़ोसी डॉक्टर के सूत्र की जांच ही नहीं हुई। सामाजिक-आर्थिक असमानता ने इसे बढ़ाया: एक अशिक्षित दलित घरेलू नौकर पर 'विशाल अपराध' मढ़ा गया, विधिक सहायता विफल रही, उसे असंवैधानिक एकांत कारावास में रखा गया और मीडिया ने बयान लीक होते ही दोष तय कर दिया—सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं ट्रायल कोर्ट आदेशों को 'मीडिया ट्रायल' आधारित कहा। शीर्ष अदालत द्वारा 2011 में 'सीरियल किलर' कहने ने शेष 12 मुकदमों की निष्पक्षता को भी पूर्वग्रहित कर दिया। आगे की राह में हिरासत व इकबालिया बयान की प्रक्रिया पर कठोर निगरानी, प्रभावी विधिक सहायता, फोरेंसिक क्षमता व स्वतंत्र जांच पर्यवेक्षण, एकांत कारावास व दया याचिका में देरी पर अनुच्छेद 21 अनुरूप मानक, तथा मृत्युदंड की अपरिवर्तनीयता पर पुनर्विचार शामिल हैं; साथ ही 19 बच्चों की मौत के असली कारणों की जवाबदेह जांच अब भी अपेक्षित है।
मुख्य शब्द
- क्यूरेटिव याचिका (Curative Petition)
- पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में अंतिम उपाय; इसी के जरिए 11 नवंबर 2025 को 2011 का फैसला पलटा गया।
- 'rarest of rare' सिद्धांत
- मृत्युदंड देने का मानक; 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने कोली के मामले को इसी श्रेणी में रखा था।
- अनुच्छेद 21
- जीवन व दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार; दया याचिका में 2.6 वर्ष की देरी और एकांत कारावास को इसका उल्लंघन माना गया।
- एकांत कारावास (Solitary Confinement)
- अलग-थलग कैद; वकील पयोशी रॉय के अनुसार यह न्यायिक आदेश या फांसी के अत्यंत निकट होने पर ही वैध है।
- अनन्य नियंत्रण (Exclusive Control)
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत बरामदगी को साक्ष्य मानने की शर्त; निठारी का खुला भूखंड कोली के नियंत्रण में नहीं था।
- मीडिया ट्रायल
- अदालत के बाहर मीडिया द्वारा दोष तय करना; सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेशों को इसी पर आधारित बताया।
अभ्यास प्रश्न
- निठारी मामले के आलोक में परीक्षण कीजिए कि पुलिस हिरासत में लिए गए इकबालिया बयान और 'बरामदगी' साक्ष्य पर अत्यधिक निर्भरता भारत में निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को कैसे कमजोर करती है।
- क्या मृत्युदंड की अपरिवर्तनीयता, दया याचिकाओं में देरी और एकांत कारावास जैसी प्रक्रियागत खामियों को देखते हुए भारत में मृत्युदंड पर पुनर्विचार आवश्यक है? तर्कसहित उत्तर दें।
- 'मीडिया ट्रायल' आपराधिक न्याय प्रशासन को कैसे प्रभावित करता है? निठारी मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
