आयुक्तों की एसआईआर आपत्तियों की रिपोर्ट पर विपक्ष ने ईसीआई से सवाल किए

इंडियन एक्सप्रेस की जांच में सामने आया कि तीन चुनाव आयुक्तों में से दो, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर चिंता जताई थी, जिसके बाद विपक्षी नेताओं ने बुधवार को निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। रिपोर्ट के अनुसार उनकी जानकारी के बिना आयोग के नाम पर लिए गए फैसलों पर उन्होंने 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज कराई। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा कि आयोग को 'अदृश्य हाथ' चला रहा है।

स्रोत

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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Election commissioners Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi objected on record at least 14 times over 10 months to decisions taken in the ECI's name without their knowledge. — Attributed in source to an Indian Express investigation; not confirmed by the ECI, which did not respond to queries before publication.
  • Congress leader Manish Tewari said an 'invisible hand' appears to be running the ECI and called it a fit case for impeachment consideration. — Attributed to Tewari's post on X as reported in the source; conditional on the report's facts being correct.
  • In April, the ECI announced deletion of nearly nine million names from the West Bengal electoral roll, about 2.7 million under 'logical discrepancy'. — Figures appear in the source and are attributed to the ECI announcement; no independent verification possible here.
  • BJP won 207 of 294 seats in West Bengal and rejects the TMC's claim that SIR deletions helped it win. — Figure and denial appear in the source; positions attributed to the respective parties.
  • In April, the Rajya Sabha Chairman and Lok Sabha Speaker rejected the Opposition notice seeking CEC Gyanesh Kumar's removal. — Stated in source without direct documentary citation; internally consistent with the rest of the account.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

अब तक एसआईआर पर आपत्ति विपक्ष की बाहरी शिकायत थी; इंडियन एक्सप्रेस की जांच, जिसमें तीन में से दो चुनाव आयुक्तों द्वारा रिकॉर्ड पर आपत्तियां दर्ज कराने की बात कही गई है, विवाद का स्वरूप बदल देती है। राजनीतिक रूप से यह विपक्ष के लिए सबसे अनुकूल मोड़ है — कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी), आप और टीएमसी अलग-अलग शिकायतों के बजाय 'संस्थागत विश्वसनीयता' के एक मंच पर आ सकते हैं। सत्तापक्ष के पास बचाव यह है कि इसे राजनीतिक हस्तक्षेप न मानकर आंतरिक प्रक्रियागत मतभेद बताया जाए; भाजपा पहले ही नाम हटाने और बंगाल जीत के बीच किसी संबंध को खारिज कर चुकी है।

  • सबसे बड़ा बदलाव आरोप के स्रोत का है: आयोग के भीतर से दर्ज आपत्तियों को 'राजनीति से प्रेरित' कहकर खारिज करना सत्तापक्ष के लिए कठिन होगा।
  • मनीष तिवारी का 'अदृश्य हाथ' वाला कथन और महाभियोग का उल्लेख बताता है कि विपक्ष की रणनीति व्यक्तियों से आगे बढ़कर प्रक्रिया की वैधता पर केंद्रित है।
  • अप्रैल में राज्यसभा सभापति और लोकसभा अध्यक्ष द्वारा सीईसी हटाने का नोटिस अस्वीकार किए जाने के बाद, संख्याबल को देखते हुए संसदीय रास्ता व्यवहार में सीमित है।
  • पश्चिम बंगाल का पहलू राजनीतिक रूप से सबसे विस्फोटक है: रिपोर्ट के अनुसार हटाए गए नामों की संख्या भाजपा-टीएमसी वोट अंतर के बराबर थी, लेकिन इस कारण-संबंध को भाजपा नकारती है और रिपोर्ट इसे साबित नहीं करती।
  • आप का इसे 2025 दिल्ली चुनाव के पुराने आरोपों से जोड़ना और शिवसेना (यूबीटी) का 'भीतर से उठे सवाल' कहना दिखाता है कि मतदाता सूची को स्थायी चुनावी मुद्दा बनाया जाएगा।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि आयोग या दोनों आयुक्त सार्वजनिक रूप से जवाब देते हैं या नहीं, कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्रों पर कोई कार्रवाई होती है या नहीं, और विपक्ष इसे संसद में साझा मांग में बदल पाता है या नहीं।

यह एक अखबार की जांच पर आधारित है, जो खुद कहती है कि आयोग और दोनों आयुक्तों ने जवाब नहीं दिया, और यह स्थापित नहीं करती कि नाम हटाने से किसी चुनाव का नतीजा बदला।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 5 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के भीतर मतभेद सामने आए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की जांच के मुताबिक तीन सदस्यीय आयोग के दो चुनाव आयुक्तों — सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — ने आयोग के नाम पर उनकी जानकारी के बिना लिए गए फैसलों पर 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज कराई, जिनमें से चार एक ही दिन थीं। एसआईआर बोगस, दोहरे और अपात्र मतदाताओं को हटाने का अभियान है, जो पिछले साल जून में बिहार से शुरू हुआ। विपक्ष इसे सत्तारूढ़ भाजपा को लाभ पहुंचाने वाली रणनीतिक सफाई बताता रहा है।

मुख्य तथ्य

  • इंडियन एक्सप्रेस की जांच: तीन में से दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने एसआईआर से जुड़े मुद्दों पर चिंता जताई।
  • दोनों आयुक्तों ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्तियां रिकॉर्ड पर दर्ज कराईं, इनमें से चार एक ही दिन में।
  • विवाद का एक मुद्दा फॉर्म 6 में बदलाव था, जिसमें नए मतदाता को बताना था कि वह, उसके माता-पिता या दादा-दादी 'अंतिम एसआईआर' सूची में थे या नहीं; आयुक्तों ने इसे अनधिकृत और पहली बार के मतदाताओं का उत्पीड़न कहा।
  • एसआईआर पिछले साल जून में बिहार से शुरू हुआ, उद्देश्य बोगस, दोहरे व अपात्र मतदाता, मृत व्यक्ति तथा 'अवैध प्रवासी' हटाना।
  • अन्य विवादित मुद्दे: ERONet पहुंच का केंद्रीकरण, पश्चिम बंगाल में नाम हटाने की अपीलों का विवादित अधिकार, और गोवा में सॉफ्टवेयर की वजह से 97 सत्यापित मतदाता जोड़े न जा सकना।
  • अप्रैल में ईसीआई ने पश्चिम बंगाल में लगभग 90 लाख नाम हटाने की घोषणा की, जिनमें करीब 27 लाख 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' श्रेणी में थे।
  • भाजपा ने पश्चिम बंगाल में पहली बार सत्ता हासिल की, 294 में से 207 सीटें जीतीं; भाजपा और टीएमसी के वोटों का अंतर कुल एसआईआर विलोपन के बराबर बताया गया।
  • संधू और जोशी ने अलग-अलग कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर ये चिंताएं उठाईं; प्रकाशन से पहले ईसीआई और दोनों आयुक्तों को भेजे गए सवालों का जवाब नहीं मिला।

समयरेखा

  1. पिछले वर्ष जूनमतदाता सूची सफाई अभियान एसआईआर की शुरुआत बिहार से।
  2. 2025 दिल्ली विधानसभा चुनावआम आदमी पार्टी ने असली मतदाताओं के नाम हटाने और फर्जी मतदाता जोड़ने के आरोप लगाए।
  3. अप्रैलराज्यसभा सभापति सी पी राधाकृष्णन और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने की विपक्ष की नोटिस खारिज की।
  4. अप्रैलईसीआई ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से करीब 90 लाख नाम हटाने की घोषणा की।
  5. बुधवार (इंडियन एक्सप्रेस जांच के बाद)विपक्षी नेताओं ने ईसीआई की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।

किसका दाँव

  • भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) — संस्थागत विश्वसनीयता और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया पर सवाल; प्रकाशन से पहले सवालों का जवाब नहीं दिया।
  • चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — उनकी जानकारी के बिना आयोग के नाम पर लिए गए फैसलों पर 14 बार आपत्ति; कैबिनेट सचिव को पत्र लिखे।
  • मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार — विपक्ष ने 'पक्षपाती और भेदभावपूर्ण' आचरण के आरोपों के साथ हटाने की नोटिस दी थी, जो अप्रैल में खारिज हुई।
  • कांग्रेस (मनीष तिवारी) — आरोप कि ईसीआई को 'अदृश्य हाथ' चला रहा है; फैसलों को मनमाना बताया और महाभियोग प्रक्रिया पर विचार की बात कही।
  • शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत व आप के सौरभ भारद्वाज — राउत ने बहुमत को अंधेरे में रखकर फैसले लेने का मुद्दा उठाया; भारद्वाज ने 2025 दिल्ली चुनाव के आरोपों से जोड़ा।
  • भाजपा और तृणमूल कांग्रेस — टीएमसी का दावा कि विलोपन से भाजपा को पश्चिम बंगाल जीतने में मदद मिली; भाजपा इस संबंध को खारिज करती है।
  • मतदाता, विशेषकर पहली बार के मतदाता व प्रवासी — फॉर्म 6 की नई शर्त, नाम हटाने और सॉफ्टवेयर की बाधाओं से मताधिकार पर असर।

क्यों अहम है

निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है और यदि उसके नाम पर फैसले बहुमत या सर्वसम्मति के बिना लिए जा रहे हैं, तो चुनावी प्रक्रिया की वैधता और निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। एसआईआर के तहत पश्चिम बंगाल में करीब 90 लाख नाम हटाए जाने और चुनावी नतीजों से उसकी तुलना ने मताधिकार व संस्थागत भरोसे को केंद्रीय राजनीतिक मुद्दा बना दिया है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण): मतदाता सूची सफाई अभियान, पिछले वर्ष जून में बिहार से शुरू।
  • निर्वाचन आयोग तीन सदस्यीय — मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा आयुक्त सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी।
  • फॉर्म 6: नए मतदाता के पंजीकरण का आवेदन; विवादित बदलाव में 'अंतिम एसआईआर' सूची में स्वयं/माता-पिता/दादा-दादी के नाम की घोषणा जोड़ी गई।
  • ERONet: दोहरी प्रविष्टियां और प्रवासी मतदाताओं की प्रविष्टियां हटाने में सहायक प्रणाली; इसके केंद्रीकरण पर आयुक्तों ने आपत्ति जताई।
  • अप्रैल में राज्यसभा सभापति सी पी राधाकृष्णन और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सीईसी को हटाने की विपक्षी नोटिस खारिज की।
  • पश्चिम बंगाल: करीब 90 लाख नाम हटाए गए, इनमें ~27 लाख 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' श्रेणी में; भाजपा ने 294 में 207 सीटें जीतीं।

मेन्स दृष्टिकोण

यह प्रकरण बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय के भीतर निर्णय-प्रक्रिया की पारदर्शिता का प्रश्न उठाता है। स्रोत के अनुसार दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज कराई कि आयोग के नाम पर उनकी जानकारी के बिना फैसले लिए गए — जिनमें फॉर्म 6 में 'अंतिम एसआईआर' से जुड़ी घोषणा जोड़ना (जिसे उन्होंने अनधिकृत और पहली बार के मतदाताओं का उत्पीड़न कहा), ERONet पहुंच का केंद्रीकरण, पश्चिम बंगाल में नाम हटाने की अपीलों का अस्पष्ट अधिकार और गोवा में 97 सत्यापित मतदाताओं का सॉफ्टवेयर के कारण न जुड़ पाना शामिल हैं। इसके निहितार्थ दो स्तरों पर हैं: प्रक्रियात्मक — यदि निर्णय सर्वसम्मत या बहुमत से नहीं हुए तो उनकी वैधता संदिग्ध होती है, जैसा मनीष तिवारी ने कहा; और परिणामात्मक — पश्चिम बंगाल में करीब 90 लाख विलोपन और चुनावी अंतर की तुलना ने मताधिकार पर असर की बहस खड़ी की, जिसे भाजपा खारिज करती है। आगे का रास्ता स्रोत में नीतिगत रूप से नहीं बताया गया; उपलब्ध संकेत हैं — आयोग द्वारा उठाए गए सवालों का उत्तर देना, निर्णयों का रिकॉर्ड व सामूहिक प्रक्रिया स्पष्ट करना, और संसदीय जवाबदेही के माध्यमों पर विचार, जिनमें विपक्ष की हटाने की नोटिस अप्रैल में खारिज हो चुकी है।

मुख्य शब्द

एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण)
मतदाता सूची सफाई अभियान, जिसका उद्देश्य बोगस, दोहरे, अपात्र, मृत मतदाता और 'अवैध प्रवासी' हटाना है।
फॉर्म 6
नए मतदाता के पंजीकरण से जुड़ा फॉर्म; विवादित संशोधन में 'अंतिम एसआईआर' सूची से संबंध की घोषणा मांगी गई।
ERONet
निर्वाचन प्रणाली, जो दोहरी प्रविष्टियां और प्रवासी मतदाताओं की प्रविष्टियां हटाने में मदद करती है।
'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी'
पश्चिम बंगाल में हटाए गए नामों की एक श्रेणी, जिसके तहत करीब 27 लाख विलोपन हुए।
'अदृश्य हाथ'
कांग्रेस नेता मनीष तिवारी का प्रयोग, यह संकेत देने के लिए कि ईसीआई को बाहर से कोई चला रहा है।
सीईसी हटाने की नोटिस
विपक्ष का प्रस्ताव, जिसमें 'पक्षपाती आचरण' और 'व्यापक मताधिकार-हरण' के आरोप थे; अप्रैल में खारिज।

अभ्यास प्रश्न

  1. बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग में निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाने की अपेक्षा क्यों की जाती है? इंडियन एक्सप्रेस की जांच में उठे मुद्दों के आलोक में परीक्षण करें।
  2. विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के उद्देश्य और उस पर उठी आपत्तियों का मूल्यांकन कीजिए, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में हुए विलोपनों के संदर्भ में।
  3. चुनावी प्रशासन में प्रौद्योगिकी (जैसे ERONet और सॉफ्टवेयर आधारित अद्यतन) की भूमिका और उससे जुड़े जोखिमों पर चर्चा कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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