एसआईआर समेत सभी फैसले सर्वसम्मत: चुनाव आयोग सूत्र

विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) सहित चुनाव आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मत थे और उन्हें दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मंजूरी मिली थी, आयोग के सूत्रों ने बुधवार को हिंदुस्तान टाइम्स को बताया। यह स्पष्टीकरण इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के बाद आया जिसमें कहा गया कि आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कराईं। इनमें फॉर्म 6 में बदलाव, ईआरओनेट का केंद्रीकरण, बंगाल में मतदाता हटाने की अपीलें और गोवा में 97 पात्र मतदाताओं को न जोड़ना शामिल था। विपक्ष ने आयोग पर सवाल उठाए।

स्रोत

Hindustan Times — India · मूल ख़बर पढ़ें ↗

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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • All EC decisions, including SIR, were unanimous and approved by both Election Commissioners and CEC Gyanesh Kumar. — Attributed to unnamed EC sources in a statement given to Hindustan Times; quoted verbatim in source.
  • Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi recorded objections at least 14 times over 10 months, four on the same day. — Attributed to an Indian Express report; figures appear in source but are not independently confirmed.
  • Joshi objected in May to the Form 6 change; the SIR-related question remained on the form until September 21. — Attributed to the Indian Express report; dates appear in source.
  • In Goa, 97 voters found eligible by Electoral Registration Officers could not be added to the final roll due to software limits. — Figure appears in source, attributed to the Indian Express report.
  • Sandhu and Joshi separately wrote to Cabinet Secretary T V Somanathan over changes in the EC's IT work. — Attributed to the report; source frames it with a question mark in its own subheading.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

चुनाव आयोग के भीतर मतभेद हैं या नहीं, यह सवाल अब प्रशासनिक नहीं रहा — यह चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर चल रही राजनीतिक लड़ाई का केंद्र बन गया है। "एसआईआर सहित सभी फैसले सर्वसम्मत थे" वाला स्पष्टीकरण संस्थागत एकता बचाने की कोशिश है, लेकिन यह इस दावे का सीधा खंडन नहीं करता कि 14 बार आपत्तियां दर्ज हुईं। इसी अंतर में विपक्ष अपनी राजनीतिक पूंजी लगा रहा है, यह कहते हुए कि एसआईआर पर उसकी पुरानी शिकायतें अब भीतर से भी गूंजती दिख रही हैं।

  • आयोग का बयान अंतिम फैसलों की सर्वसम्मति की बात करता है, यह नहीं कहता कि रास्ते में असहमति दर्ज नहीं हुई — यही बारीक फर्क मुद्दे को जिंदा रखे हुए है।
  • डीएमके, आप, शिवसेना (यूबीटी) और सीपीआई(एम) नेताओं की लगभग एक साथ आई प्रतिक्रिया बताती है कि विपक्ष एसआईआर को साझा राष्ट्रीय मुद्दा बनाना चाहता है।
  • फॉर्म 6 में बदलाव और ईआरओनेट के केंद्रीकरण जैसे तकनीकी मामले अब "मतदाता सूची पर नियंत्रण किसका" जैसे आसान चुनावी सवाल में बदल रहे हैं।
  • पश्चिम बंगाल में नाम हटाने से जुड़ी अपीलों का जिक्र होने से यह विवाद चुनावी राज्यों में क्षेत्रीय रंग ले सकता है।
  • खबर में सत्ता पक्ष की कोई प्रतिक्रिया नहीं है, और खुद आयोग को सफाई देनी पड़े — यह उस संस्था के लिए राजनीतिक रूप से असहज स्थिति है जिसकी ताकत तटस्थ दिखने में है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि आयोग सूत्रों के हवाले से आगे बढ़कर औपचारिक, विस्तृत बयान देता है या नहीं, दोनों आयुक्त खुद कुछ कहते हैं या नहीं, और एसआईआर पर न्यायिक परीक्षण तथा संसदीय दबाव किस दिशा में जाता है।

यह खबर स्वतंत्र रूप से यह स्थापित नहीं करती कि आपत्तियां दर्ज हुईं, उनका संदर्भ क्या था, या आंतरिक मतभेद कितना गहरा है — यह एक प्रकाशित रिपोर्ट और अनाम आयोग सूत्रों की प्रतिक्रिया का आमना-सामना है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 6 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) एक बहु-सदस्यीय संस्था है जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और दो चुनाव आयुक्त — सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी — शामिल हैं। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर आयोग के भीतर मतभेद की खबर इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट से सामने आई, जिसमें दावा किया गया कि दोनों आयुक्तों ने दस महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं। इसके जवाब में आयोग के सूत्रों ने हिंदुस्तान टाइम्स से कहा कि एसआईआर सहित सभी फैसले सर्वसम्मत थे और तीनों आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए। रिपोर्ट के बाद विपक्षी दलों ने आयोग की स्वायत्तता और पारदर्शिता पर सवाल उठाए।

मुख्य तथ्य

  • चुनाव आयोग के सूत्रों ने बुधवार को हिंदुस्तान टाइम्स को बताया कि एसआईआर सहित आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मत थे और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा सीईसी ज्ञानेश कुमार की मंजूरी से लिए गए।
  • इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट के अनुसार आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कराईं; इनमें से चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज हुईं।
  • रिपोर्ट ने नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच दर्ज लिखित आपत्तियों की जांच का दावा किया।
  • नए मतदाताओं के फॉर्म 6 में जुलाई में एसआईआर से जुड़े प्रश्न जोड़े गए; आवेदक से पूछा गया कि उसका या माता-पिता/दादा-दादी का नाम पिछले एसआईआर की मतदाता सूची में था या नहीं।
  • जोशी ने मई में आपत्ति जताई कि फॉर्म 6 निर्वाचन नियमों के तहत निर्धारित है और नियम संशोधन के बिना नहीं बदला जा सकता; संधू ने इसे 'अनधिकृत और अवैध' कहा। यह प्रश्न 21 सितंबर तक फॉर्म पर बना रहा।
  • गोवा में 97 मतदाताओं को निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों ने पात्र पाया, लेकिन सॉफ्टवेयर में निर्णय दर्ज करने की सुविधा न होने से वे अंतिम सूची में नहीं जुड़ सके।
  • पश्चिम बंगाल में संधू ने पूछा कि न्यायिक जांच के बाद बरकरार रखे गए मतदाताओं के नाम हटाने की अपीलें किसके अधिकार से दायर हुईं।
  • संधू और जोशी ने आयोग की आईटी व्यवस्था में बदलाव पर कैबिनेट सचिव टी वी सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे; बाद में वह आदेश निरस्त कर पुरानी व्यवस्था बहाल की गई।

समयरेखा

  1. नवंबर 2025 से अगस्त 2026इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार इस अवधि में दोनों चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियां दर्ज हुईं (कम से कम 14 बार)।
  2. मईविवेक जोशी ने फॉर्म 6 में प्रस्तावित बदलाव पर आपत्ति जताई कि नियम संशोधन के बिना यह संभव नहीं; संधू ने बाद में समर्थन किया।
  3. जुलाईफॉर्म 6 में एसआईआर से जुड़े प्रश्न जोड़े गए, जिनका उत्तर देना आवेदन जमा करने के लिए अनिवार्य था।
  4. अगस्तसंधू ने कहा कि कुछ राज्य निर्वाचन अधिकारियों को ईआरओनेट तक 'उचित और पूर्ण पहुंच' नहीं है।
  5. 21 सितंबररिपोर्ट के अनुसार एसआईआर से जुड़ा प्रश्न इस तारीख तक फॉर्म 6 पर बना रहा।
  6. बुधवारआयोग के सूत्रों ने हिंदुस्तान टाइम्स से कहा कि एसआईआर सहित सभी फैसले सर्वसम्मत थे।

किसका दाँव

  • भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) — बहु-सदस्यीय संस्था के रूप में उसकी सामूहिक निर्णय प्रक्रिया, विश्वसनीयता और पारदर्शिता सवालों के घेरे में।
  • मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार — रिपोर्ट के अनुसार आपत्तियों की प्रतियां उन्हें भी भेजी गईं; आयोग के फैसलों की जवाबदेही उन पर।
  • चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — उनका दावा कि कुछ फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए गए; आयोग में उनकी भूमिका और सहमति का प्रश्न।
  • मतदाता (पश्चिम बंगाल, गोवा) — बंगाल में नाम हटाने की अपीलें और गोवा में 97 पात्र मतदाताओं का सूची में न जुड़ना — मताधिकार सीधे प्रभावित।
  • विपक्षी दल (डीएमके के टीकेएस इलंगोवन, आप के सौरभ भारद्वाज, शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत, सीपीआई(एम) के जॉन ब्रिटास) — रिपोर्ट के आधार पर आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाकर राजनीतिक जवाबदेही की मांग।
  • कैबिनेट सचिव टी वी सोमनाथन — दोनों आयुक्तों ने आयोग की आईटी व्यवस्था में बदलाव को लेकर उन्हें पत्र लिखा।

क्यों अहम है

मतदाता सूची का शुद्ध होना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की बुनियाद है, और एसआईआर जैसी व्यापक कवायद सीधे नाम जोड़ने-हटाने से जुड़ी है। यदि आयोग के भीतर फॉर्म 6 में बदलाव, ईआरओनेट के केंद्रीकरण और मतदाता डेटा तक पहुंच पर मतभेद रहे, तो यह बहु-सदस्यीय आयोग की सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया और संस्थागत पारदर्शिता का प्रश्न बनता है। आयोग के इस स्पष्टीकरण के बाद बहस अब जनविश्वास और चुनावी डेटाबेस की निगरानी पर केंद्रित है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) — मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण की कवायद, जिस पर आयोग के भीतर आपत्तियों की रिपोर्ट आई।
  • वर्तमान संरचना: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी।
  • फॉर्म 6 — नया मतदाता बनने के लिए आवेदन पत्र; निर्वाचन नियमों के तहत निर्धारित, जिसमें जुलाई में एसआईआर संबंधी प्रश्न जोड़ा गया।
  • ईआरओनेट — मतदाता सूची कार्य के लिए डिजिटल प्रणाली; ईसीआईनेट — कई चुनाव सेवाओं को जोड़ने वाला नया मंच।
  • गोवा में 97 पात्र पाए गए मतदाता सॉफ्टवेयर की सीमा के कारण अंतिम सूची में नहीं जुड़ सके।
  • दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव टी वी सोमनाथन को आयोग की आईटी व्यवस्था में बदलाव पर पत्र लिखा।

मेन्स दृष्टिकोण

यह प्रकरण बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग में सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया और संस्थागत पारदर्शिता के प्रश्न को केंद्र में लाता है। रिपोर्ट के अनुसार कारण तीन स्तरों पर दिखते हैं — प्रक्रियात्मक (फॉर्म 6 निर्वाचन नियमों के तहत निर्धारित होने के बावजूद नियम संशोधन के बिना बदला गया, जिसे एक आयुक्त ने 'अनधिकृत और अवैध' कहा), तकनीकी (ईआरओनेट/ईसीआईनेट जैसे डेटाबेस पर नियंत्रण के 'क्रमिक केंद्रीकरण' और राज्य अधिकारियों की अपूर्ण पहुंच की शिकायत) तथा परिचालनात्मक (गोवा में 97 पात्र मतदाताओं का सॉफ्टवेयर सीमा के कारण न जुड़ना, बंगाल में न्यायिक जांच के बाद बरकरार नामों को हटाने की अपीलें)। इसके निहितार्थ गंभीर हैं: यदि आयुक्तों की जानकारी के बिना आदेश जारी होते हैं तो निर्णयों की वैधता और मतदाता सूची की विश्वसनीयता, दोनों पर प्रश्न उठते हैं, और विपक्ष द्वारा उठाए सवाल चुनावी प्रक्रिया में जनविश्वास को प्रभावित करते हैं। आगे का रास्ता स्रोत में सुझाए बिंदुओं तक सीमित रखा जा सकता है — मतदाता रिकॉर्ड में बदलाव केवल सांविधिक प्राधिकारियों द्वारा सुनिश्चित करने के लिए ऑडिट (जैसा जोशी ने प्रस्तावित किया), फॉर्म बदलने से पहले नियम संशोधन की प्रक्रिया का पालन, और आईटी व्यवस्था में बदलाव पर आयोग की आम सहमति — जैसा कि कैबिनेट सचिव को पत्र के बाद पुरानी व्यवस्था बहाल करके किया गया।

मुख्य शब्द

एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण)
मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण की कवायद, जिससे जुड़े प्रश्न फॉर्म 6 में भी जोड़े गए।
फॉर्म 6
नया मतदाता बनने के लिए भरा जाने वाला आवेदन पत्र, जो निर्वाचन नियमों के तहत निर्धारित है।
ईआरओनेट
मतदाता सूची संबंधी कार्यों के लिए उपयोग होने वाली आयोग की डिजिटल प्रणाली।
ईसीआईनेट
आयोग का नया मंच जो कई चुनाव-संबंधी सेवाओं को एक जगह लाता है।
निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ)
मतदाता सूची में नाम जोड़ने/हटाने पर निर्णय लेने वाला अधिकारी; गोवा में इन्होंने 97 मतदाताओं को पात्र पाया।
मुख्य चुनाव आयुक्त एवं चुनाव आयुक्त
आयोग के तीन सदस्य — सीईसी ज्ञानेश कुमार तथा आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी।

अभ्यास प्रश्न

  1. बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग में सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया की अहमियत क्या है? एसआईआर से जुड़े हालिया विवाद के आलोक में परीक्षण करें।
  2. मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस (ईआरओनेट, ईसीआईनेट) पर नियंत्रण के केंद्रीकरण से जुड़ी चिंताएं क्या हैं और ऑडिट जैसे उपाय कैसे सहायक हो सकते हैं?
  3. फॉर्म 6 में बदलाव को लेकर उठी आपत्ति यह क्यों दर्शाती है कि चुनावी प्रक्रिया में नियम-आधारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है? चर्चा करें।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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