एसआईआर समेत सभी फैसले सर्वसम्मत थे: ईसी सूत्र
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) सहित निर्वाचन आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और तीनों सदस्यों की मंजूरी मिली, आयोग के सूत्रों ने बुधवार को कहा। यह स्पष्टीकरण इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के बाद आया जिसमें कहा गया कि आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कराईं। सूत्रों के अनुसार विचार-विमर्श में मतभेद हो सकते हैं, पर अंतिम फैसला 2023 अधिनियम की धारा 18 के तहत सर्वसम्मति या बहुमत से होता है।
स्रोत
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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- All EC decisions, including on the Special Intensive Revision of electoral rolls, were unanimous and approved by all three members. — Attributed in source to unnamed 'EC sources'; no document cited.
- Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi objected on record at least 14 times over the past 10 months. — Attributed in source to an Indian Express report; figure appears in source but is not independently confirmed.
- Objections covered Form 6 changes, electoral-roll database access, West Bengal appeals and software issues in Goa. — Attributed to the same Indian Express report as reproduced in the source.
- Section 18(2) of the 2023 CEC and other ECs Act says business shall as far as possible be transacted unanimously, with differences decided by majority. — Statutory text quoted directly in the source; internally consistent.
- Akhilesh Yadav called the development 'very serious' and urged the Supreme Court to take suo motu cognisance; Manish Tewari alleged an 'invisible hand' running the poll panel. — Quotes attributed to named opposition leaders in the source.
विश्लेषकों की राय राय
ऊपर से यह प्रक्रियागत विवाद लगता है, लेकिन राजनीतिक रूप से दांव पर चुनाव आयोग की विश्वसनीयता है। ईसी सूत्रों का यह कहना कि एसआईआर सहित सभी फ़ैसले तीनों सदस्यों की मंज़ूरी से सर्वसम्मत थे, कानूनी रूप से मज़बूत बचाव है; मगर साथ में यह स्वीकारोक्ति कि 'आंतरिक विचार-विमर्श में मतभेद हो सकते हैं', विपक्ष को ठीक वही गुंजाइश देती है जिसकी उसे ज़रूरत थी। जिन दलों ने एसआईआर को पहले ही राजनीतिक मुद्दा बना लिया है, उनके लिए कथानक 'प्रक्रिया में खामी' से 'संस्था के भीतर असहमति' की ओर मुड़ जाता है।
- आयोग का खंडन रिपोर्ट के तथ्यों को सीधे नकारने के बजाय बहस को विचार-विमर्श और अंतिम निर्णय के कानूनी अंतर पर ले जाता है — यह सोच-समझकर चुना गया संस्थागत बचाव है।
- विपक्ष का फ़ायदा मुख्यतः प्रचार के स्तर पर है: अखिलेश यादव की सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान की मांग और मनीष तिवारी का 'अदृश्य हाथ' वाला आरोप, दोनों एसआईआर पर संदेह बनाए रखने का काम करते हैं।
- स्वाभाविक जवाबी तर्क यह है कि 2023 के कानून की धारा 18 स्वयं मतभेद और बहुमत से निर्णय की व्यवस्था करती है, इसलिए दर्ज आपत्तियाँ प्रक्रिया के चलने का संकेत हैं, विफलता का नहीं।
- रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल और गोवा से जुड़े मुद्दों का ज़िक्र होने से यह विवाद राष्ट्रीय संस्थागत बहस से राज्यों की चुनावी राजनीति तक पहुँच सकता है।
- मध्यम अवधि का जोखिम किसी एक दल तक सीमित नहीं — मतदाता सूची प्रक्रिया पर भरोसा घटना हर पक्ष के लिए नुकसानदेह है।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि आयोग अनाम 'सूत्रों' से आगे बढ़कर औपचारिक बयान देता है या नहीं, आयुक्त स्वयं प्रतिक्रिया देते हैं या नहीं, और मामला अदालत या संसद तक पहुँचता है या नहीं।
यह खबर यह स्थापित नहीं करती कि आपत्तियाँ वास्तव में दर्ज हुईं या उनका स्वरूप क्या था; न ईसी सूत्रों का दावा और न अख़बार की रिपोर्ट यहाँ स्वतंत्र रूप से पुष्ट है, और किसी फ़ैसले को अवैध भी सिद्ध नहीं किया गया है।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 3 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
निर्वाचन आयोग (ईसी) द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में कहा गया कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के विभिन्न फैसलों और आदेशों पर रिकॉर्ड में आपत्ति दर्ज कराई। इसके बाद आयोग के सूत्रों ने बुधवार को स्पष्ट किया कि एसआईआर सहित सभी फैसले सर्वसम्मत थे और तीनों सदस्यों—मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा दोनों आयुक्तों—की मंजूरी से लिए गए। सूत्रों ने 2023 के अधिनियम की धारा 18 का हवाला देते हुए कहा कि विचार-विमर्श में मतभेद और अंतिम निर्णय में अंतर होता है।
मुख्य तथ्य
- ईसी सूत्रों ने बुधवार को कहा कि एसआईआर सहित आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मत थे और तीनों सदस्यों की मंजूरी से लिए गए।
- इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट के अनुसार आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड में आपत्ति दर्ज कराई।
- धारा 18(2) कहती है कि आयोग का सारा कामकाज 'यथासंभव सर्वसम्मति से' होगा; मतभेद की स्थिति में मामला बहुमत की राय से तय होगा।
- धारा 18(1) के तहत आयोग सर्वसम्मत निर्णय द्वारा अपने कामकाज की प्रक्रिया और सीईसी व आयुक्तों के बीच कार्य-आवंटन को नियमित कर सकता है।
- रिपोर्ट में बताई गई आपत्तियों के विषय: फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाता सूची डेटाबेस तक पहुंच, पश्चिम बंगाल से जुड़ी अपीलें और गोवा में सॉफ्टवेयर संबंधी समस्याएं।
- फॉर्म 6 (मतदाता बनने के लिए वैधानिक फॉर्म) में पिछले एसआईआर से जुड़ी एक नई घोषणा जोड़ी गई, जिस पर जोशी और संधू दोनों ने आपत्ति जताई।
- गोवा में सॉफ्टवेयर संबंधी दिक्कतों से निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) के कुछ फैसलों का रिकॉर्ड प्रभावित हुआ।
- सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे 'बहुत गंभीर' बताकर सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने का आग्रह किया; कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने 'अदृश्य हाथ' का आरोप लगाया।
समयरेखा
- पिछले 10 महीने (रिपोर्ट के अनुसार)दोनों निर्वाचन आयुक्तों द्वारा विभिन्न फैसलों व आदेशों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड में आपत्तियां दर्ज।
- स्पष्टीकरण से पहलेइंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में फॉर्म 6, डेटाबेस पहुंच, पश्चिम बंगाल अपीलें, गोवा सॉफ्टवेयर व आईटी कार्य-आवंटन से जुड़ी आपत्तियों का ब्योरा प्रकाशित।
- बुधवार (समाचार 23 सितंबर, 2026 को प्रकाशित)ईसी सूत्रों ने कहा कि एसआईआर सहित सभी फैसले सर्वसम्मत थे; विपक्ष ने सवाल उठाए।
किसका दाँव
- भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) — संस्थागत विश्वसनीयता और आंतरिक निर्णय-प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल; सूत्रों के जरिये स्पष्टीकरण जारी।
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार — आयोग के नेतृत्व और सर्वसम्मत निर्णय-प्रक्रिया के दावे की जवाबदेही।
- निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — रिपोर्ट के अनुसार उनकी दर्ज आपत्तियां; कॉलेजियम-प्रकृति के आयोग में असहमति व्यक्त करने की गुंजाइश।
- मतदाता (पश्चिम बंगाल, गोवा सहित) — एसआईआर के दौरान फॉर्म 6 में बदलाव, अपीलों और ईआरओ फैसलों के रिकॉर्ड से नाम शामिल होने/हटने का असर।
- विपक्षी दल (सपा के अखिलेश यादव, कांग्रेस के मनीष तिवारी) — आयोग की स्वतंत्रता व फैसलों की वैधता पर सवाल; न्यायिक संज्ञान की मांग।
- सुप्रीम कोर्ट — अखिलेश यादव द्वारा स्वतः संज्ञान लेने का आग्रह; निर्णय-प्रक्रिया की वैधानिकता का प्रश्न।
क्यों अहम है
निर्वाचन आयोग की साख उसकी सामूहिक, सर्वसम्मत निर्णय-प्रक्रिया पर टिकी है, और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण जैसा कदम सीधे मताधिकार से जुड़ा है। यदि आयुक्तों की आपत्तियों को दर्ज कर भी अनसुना किया गया, तो 2023 अधिनियम की धारा 18 की प्रक्रिया के पालन और फैसलों की वैधता पर प्रश्न उठते हैं। विपक्ष की प्रतिक्रिया दिखाती है कि यह मुद्दा चुनावी निष्पक्षता और लोकतांत्रिक विश्वास से जुड़ गया है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 18 आयोग के कामकाज की प्रक्रिया तय करती है।
- धारा 18(2): आयोग का कामकाज यथासंभव सर्वसम्मति से; मतभेद होने पर बहुमत की राय से निर्णय।
- धारा 18(1): आयोग सर्वसम्मत निर्णय से अपनी कार्य-प्रक्रिया व सीईसी और आयुक्तों में कार्य-आवंटन नियमित कर सकता है।
- फॉर्म 6: मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए आवेदन का वैधानिक फॉर्म; इसमें पिछले एसआईआर से जुड़ी नई घोषणा जोड़ी गई।
- वर्तमान संरचना: मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा निर्वाचन आयुक्त एस एस संधू और विवेक जोशी।
- एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की प्रक्रिया है; ईआरओ (निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी) इसमें फैसले दर्ज करते हैं।
मेन्स दृष्टिकोण
भारत निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है जिसकी वैधता उसके सामूहिक और पारदर्शी निर्णय-तंत्र से आती है; 2023 अधिनियम की धारा 18 इसी कारण 'यथासंभव सर्वसम्मति' और मतभेद पर 'बहुमत' की प्रक्रिया निर्धारित करती है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार दो निर्वाचन आयुक्तों ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्तियां रिकॉर्ड पर दर्ज कराईं—फॉर्म 6 में एसआईआर से जुड़ी नई घोषणा, मतदाता सूची डेटाबेस तक पहुंच, पश्चिम बंगाल में एसआईआर संबंधी अपीलें, गोवा में ईआरओ फैसलों को प्रभावित करने वाली सॉफ्टवेयर दिक्कतें और आईटी कार्य-आवंटन में बदलाव। आयोग के सूत्रों का तर्क है कि विचार-विमर्श में भिन्न राय और अंतिम निर्णय में अंतर होता है, और एसआईआर सहित सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मत रहे। दूसरी ओर विपक्ष (अखिलेश यादव, मनीष तिवारी) इसे स्वतंत्र संस्था की स्वायत्तता और फैसलों की कानूनी वैधता का प्रश्न बताकर न्यायिक संज्ञान की मांग कर रहा है। आगे का रास्ता स्रोत में नीतिगत रूप से नहीं बताया गया; पर बहस का केंद्र यही है कि असहमति के अभिलेखन, निर्णय-प्रक्रिया के प्रकटीकरण और सूत्रों के बजाय औपचारिक संस्थागत संवाद से ही आयोग की विश्वसनीयता बनी रह सकती है।
मुख्य शब्द
- एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण)
- मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया, जिससे जुड़े आयोग के फैसले विवाद के केंद्र में हैं।
- धारा 18, सीईसी एवं अन्य ईसी अधिनियम, 2023
- आयोग के कामकाज की प्रक्रिया—यथासंभव सर्वसम्मति, मतभेद पर बहुमत—निर्धारित करने वाला प्रावधान।
- फॉर्म 6
- मतदाता बनने के आवेदन का वैधानिक फॉर्म; इसमें पिछले एसआईआर से संबंधित नई घोषणा जोड़ी गई।
- ईआरओ (निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी)
- मतदाता सूची में नाम जोड़ने/हटाने संबंधी फैसले करने वाला अधिकारी; गोवा में सॉफ्टवेयर दिक्कत से उसके फैसलों का रिकॉर्ड प्रभावित।
- स्वतः संज्ञान (suo motu)
- अदालत द्वारा किसी याचिका के बिना स्वयं मामले का संज्ञान लेना; अखिलेश यादव ने सुप्रीम कोर्ट से यही मांग की।
अभ्यास प्रश्न
- बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग में असहमति के अभिलेखन और सर्वसम्मत निर्णय की वैधानिक अपेक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए? 2023 अधिनियम की धारा 18 के संदर्भ में परीक्षण करें।
- मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़ी प्रक्रियागत चिंताएं—फॉर्म 6 में बदलाव, डेटाबेस पहुंच, अपील व्यवस्था—मताधिकार को कैसे प्रभावित कर सकती हैं?
- 'चुनाव आयोग की विश्वसनीयता उसकी आंतरिक पारदर्शिता पर निर्भर है।' हाल के विवाद के आलोक में इस कथन का मूल्यांकन करें।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
