स्थानीय उरुळी कांचन

पुणे में खेत की मिट्टी से बनीं गणेश मूर्तियां, बनतीं तुलसी के पौधे

पुणे की संस्था 'वृक्ष गजानन' के संस्थापक डॉ अक्षय कौथले जिले के बोर क्षेत्र की खेत की मिट्टी से गणेश मूर्तियां बनाते हैं। घर पर पानी के टब में यह मूर्तियां 30 से 45 मिनट में घुल जाती हैं, जिसके बाद मिट्टी और पानी को गमले में डालकर साथ दिए गए कृष्ण तुलसी के बीज से पौधा उगाया जा सकता है। 2018 में शुरू हुई यह इकाई उरुळी कांचन में सालाना 75,000 से एक लाख मूर्तियां बनाती है, जहां करीब 200 महिलाएं काम करती हैं। संस्था के अनुसार अब तक 1.5 लाख से अधिक तुलसी के पौधे लगाए गए हैं।

स्रोत

Indian Express — Cities · मूल ख़बर पढ़ें ↗

#ganesh chaturthi#eco-friendly idols#tulsi#pune#seed conservation

डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Idols made from farm soil from Pune district's Bor region dissolve in 30-45 minutes in a tub of water — Figure appears in source, attributed to the initiative Vruskh Gajanan; no independent testing cited.
  • Initiative produces 75,000 to 1 lakh idols annually at Uruli Kanchan with about 200 women workers — Production and workforce figures appear in source, sourced to the founder.
  • More than 1.5 lakh authentic Tulsi saplings planted in past few years — Figure stated in source without independent verification or documentation.
  • Krishna Tulsi seeds sourced via association with Padma Shri recipient Rahibai Soma Popere's seed-conservation work — Attributed to the initiative; Popere's own confirmation is not included in the source.
  • Idols delivered to Rashtrapati Bhavan, Union Minister Nitin Gadkari and Governors, and exported to the US, Canada, Australia, Spain and UAE — Direct quote from founder Kauthale; no confirmation from recipients in source.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

ऊपर से यह पर्यावरण की खबर है, लेकिन राजनीतिक नजर से यह वह दुर्लभ मुद्दा है जहां आस्था और पर्यावरण एक ही दिशा में जाते हैं। गणेश विसर्जन से होने वाले जल प्रदूषण पर पाबंदी लगाना हमेशा संवेदनशील रहा है — यहां रोक की जगह विकल्प है, और यही इसकी असली राजनीतिक ताकत है। संस्थापक का यह कहना कि मूर्तियां राष्ट्रपति भवन, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और राज्यपालों तक पहुंची हैं, बताता है कि ऐसे उत्पादों को कितनी प्रतीकात्मक स्वीकृति मिल सकती है।

  • "प्रतिबंध नहीं, विकल्प" का मॉडल प्रशासन को कर्मकांड पर रोक लगाने की तुलना में बहुत कम राजनीतिक कीमत पर पर्यावरण लक्ष्य साधने देता है।
  • लगभग 200 महिलाओं को रोजगार और स्थानीय खेत की मिट्टी का उपयोग स्थानीय अर्थव्यवस्था और स्वरोजगार की कथा में सहजता से फिट बैठता है।
  • राष्ट्रपति भवन, केंद्रीय मंत्री और राज्यपालों तक आपूर्ति का संस्थापक का दावा प्रतीकात्मक समर्थन जैसा दिखता है, पर खबर किसी नीतिगत समर्थन की पुष्टि नहीं करती।
  • पद्मश्री राहीबाई सोमा पोपेरे के बीज संरक्षण कार्य से जुड़ाव देशी बीजों के संरक्षण को मिल रही जनस्वीकृति को दर्शाता है।
  • सालाना 75,000 से एक लाख मूर्तियां विशाल त्योहारी बाजार का छोटा हिस्सा हैं, इसलिए नीतिगत असर के लिए विस्तार ही असली सवाल है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि आने वाले त्योहारी मौसमों में नगर निकाय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण संस्थाएं ऐसे घर पर विसर्जन वाले मॉडल को प्रोत्साहन या जागरूकता अभियानों के जरिए बढ़ाती हैं या नहीं।

यह खबर किसी दल के रुख, सरकारी नीति या आधिकारिक समर्थन की पुष्टि नहीं करती, और उत्पादन तथा पौधों के आंकड़े संस्थापक के कथन पर आधारित हैं, स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 3 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

गणेशोत्सव के बाद मूर्ति विसर्जन परंपरागत रूप से नदियों, तालाबों और अन्य जलस्रोतों में किया जाता है, जिससे जल प्रदूषण की समस्या पैदा होती है। इसी के विकल्प के रूप में पुणे की संस्था 'वृक्ष गजानन' ने खेत की मिट्टी से बनी गणेश मूर्तियां तैयार की हैं, जो घर पर ही पानी के टब में घुल जाती हैं। मूर्ति के साथ कृष्ण तुलसी के बीज दिए जाते हैं, जिससे घुली मिट्टी को गमले में डालकर पौधा उगाया जा सकता है। संस्था के संस्थापक डॉ अक्षय कौथले इसे एक व्यापक "हरित आंदोलन" का हिस्सा बताते हैं।

मुख्य तथ्य

  • 'वृक्ष गजानन' की शुरुआत 2018 में हुई, ताकि जल प्रदूषण फैलाने वाली परंपरागत मूर्तियों का विकल्प दिया जा सके।
  • मूर्तियां पुणे जिले के बोर क्षेत्र की खेत की मिट्टी से हाथ से बनाई जाती हैं और घर पर पानी के टब में 30 से 45 मिनट में घुल जाती हैं।
  • हडपसर से लगभग 20 किमी दूर उरुळी कांचन स्थित इकाई में सालाना करीब 75,000 से एक लाख मूर्तियां बनती हैं।
  • इकाई में लगभग 200 महिलाओं का कार्यबल काम करता है।
  • मूर्तियों के साथ कृष्ण तुलसी के बीज दिए जाते हैं; अब तक 1.5 लाख से अधिक असली तुलसी के पौधे लगाए गए हैं।
  • बीज पद्मश्री सम्मानित रahibai सोमा पोपेरे के बीज-संरक्षण कार्य से जुड़े दीर्घकालिक सहयोग से प्राप्त होते हैं।
  • संस्था ने लगभग 20 से 25 कॉपीराइट प्राप्त मूर्ति डिजाइन विकसित किए हैं; 2018 से एक भी मूर्ति अनबिकी नहीं रही।
  • मूर्तियां राष्ट्रपति भवन, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी व राज्यपालों तक पहुंचीं तथा अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन और यूएई भी भेजी जाती हैं।

समयरेखा

  1. 2018जल प्रदूषण करने वाली परंपरागत मूर्तियों के विकल्प के रूप में 'वृक्ष गजानन' पहल शुरू हुई।
  2. 2018 के बाद के वर्ष1.5 लाख से अधिक असली तुलसी पौधे लगाए गए; उरुळी कांचन इकाई में सालाना 75,000–1 लाख मूर्तियों का उत्पादन।
  3. शुक्रवार (स्रोत में तारीख नहीं दी गई)गणेश मूर्ति विसर्जन समारोह, जिसके संदर्भ में यह पर्यावरण-अनुकूल विकल्प सामने रखा गया।

किसका दाँव

  • डॉ अक्षय कौथले, संस्थापक, वृक्ष गजानन — वर्षों के शोध के बाद खेत की मिट्टी की मूर्तियां विकसित कीं; 'हरित आंदोलन' के जरिये आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन का लक्ष्य।
  • डॉ वी कौथले (कृषि वैज्ञानिक) और केदार कुंभार — पिता डॉ वी कौथले शोध व विकास में शामिल; केदार कुंभार कारखाने का संचालन देखते हैं।
  • उरुळी कांचन इकाई की करीब 200 महिलाएं — मूर्ति निर्माण से रोजगार और स्थानीय आजीविका।
  • श्रद्धालु/भक्त — घर पर विसर्जन का विकल्प, साथ में तुलसी का पौधा उगाने की सुविधा।
  • पद्मश्री रहिबाई सोमा पोपेरे का बीज-संरक्षण कार्य — कृष्ण तुलसी जैसे देशी बीजों की आपूर्ति और दुर्लभ होते बीजों का संरक्षण।
  • जलस्रोत एवं पर्यावरण — परंपरागत विसर्जन से होने वाले जल प्रदूषण में कमी की संभावना।

क्यों अहम है

गणेशोत्सव जैसे बड़े सार्वजनिक उत्सवों में मूर्ति विसर्जन जल प्रदूषण का बड़ा कारण बनता है; घर पर घुलने वाली खेत-मिट्टी की मूर्तियां इस दबाव को कम करने का व्यावहारिक विकल्प दिखाती हैं। यह मॉडल पर्यावरण संरक्षण को देशी बीज संरक्षण और ग्रामीण महिलाओं के रोजगार से जोड़ता है। इससे यह भी पता चलता है कि आस्था और सततता परस्पर विरोधी नहीं हैं।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • 'वृक्ष गजानन' — पुणे स्थित पहल, 2018 में शुरू; खेत की मिट्टी से गणेश मूर्तियां बनाती है।
  • मूर्तियों की मिट्टी पुणे जिले के बोर क्षेत्र से; उत्पादन इकाई उरुळी कांचन (हडपसर से ~20 किमी) में।
  • मूर्ति पानी के टब में 30–45 मिनट में घुलती है; साथ में कृष्ण तुलसी के बीज दिए जाते हैं।
  • कृष्ण तुलसी — घने जंगलों में पाई जाने वाली देशी प्रजाति, संकर किस्मों से भिन्न।
  • रहिबाई सोमा पोपेरे — पद्मश्री सम्मानित, बीज संरक्षण के कार्य के लिए जानी जाती हैं।
  • संस्था के पास 20–25 कॉपीराइट डिजाइन; निर्यात अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, यूएई तक।

मेन्स दृष्टिकोण

परंपरागत मूर्ति विसर्जन से जलस्रोतों पर पड़ने वाले दबाव के बीच पुणे की 'वृक्ष गजानन' पहल एक व्यवहार-परिवर्तन आधारित समाधान प्रस्तुत करती है: बोर क्षेत्र की खेत की मिट्टी से बनी मूर्तियां घर पर 30–45 मिनट में घुल जाती हैं और उसी मिट्टी-पानी में कृष्ण तुलसी का बीज बोकर पौधा उगाया जाता है। इसके कारण स्पष्ट हैं — जल प्रदूषण की चिंता, देशी बीजों का दुर्लभ होना, तथा उपभोक्ता स्तर पर सुलभ विकल्प का अभाव। इसके निहितार्थ बहुआयामी हैं: पर्यावरणीय (जलस्रोतों पर भार घटना), जैवविविधता (पद्मश्री रहिबाई पोपेरे के बीज-संरक्षण कार्य से जुड़कर 1.5 लाख से अधिक असली तुलसी पौधे), और आर्थिक-सामाजिक (उरुळी कांचन इकाई में करीब 200 महिलाओं को रोजगार, 2018 से हर मूर्ति की बिक्री)। आगे का रास्ता यही संकेत देता है कि धार्मिक परंपरा का विकल्प थोपने की बजाय आस्था के भीतर ही सतत विकल्प गढ़े जाएं — शोध-आधारित उत्पाद डिजाइन, स्थानीय कच्चा माल, महिला कार्यबल और वितरण नेटवर्क (डीलर, आउटलेट, ऑनलाइन) के जरिये पहुंच बढ़ाना, जैसा कौथले के अनुसार "भक्ति पर्यावरण की कीमत पर न हो" वाले हरित आंदोलन में दिखता है।

मुख्य शब्द

वृक्ष गजानन
पुणे स्थित पहल, 2018 में शुरू, जो खेत की मिट्टी से घुलनशील गणेश मूर्तियां बनाती है।
कृष्ण तुलसी
घने जंगलों में पाई जाने वाली देशी तुलसी प्रजाति, जो आज आम संकर किस्मों से भिन्न और प्रामाणिक मानी जाती है।
रहिबाई सोमा पोपेरे
पद्मश्री सम्मानित, जिनके बीज-संरक्षण कार्य से संस्था को कृष्ण तुलसी के बीज मिलते हैं।
उरुळी कांचन
पुणे के हडपसर से लगभग 20 किमी दूर स्थित स्थान, जहां मूर्ति निर्माण इकाई है।
बोर क्षेत्र
पुणे जिले का वह क्षेत्र जहां से मूर्तियों के लिए खेत की मिट्टी ली जाती है।
हरित आंदोलन
कौथले द्वारा वर्णित व्यापक प्रयास, जिसमें भक्त विसर्जन के बाद मूर्ति के भविष्य पर पुनर्विचार करें।

अभ्यास प्रश्न

  1. परंपरागत मूर्ति विसर्जन से उत्पन्न जल प्रदूषण की समस्या के समाधान में 'वृक्ष गजानन' जैसी स्थानीय पहलें कितनी कारगर हो सकती हैं? उदाहरण सहित चर्चा करें।
  2. देशी बीजों के संरक्षण को धार्मिक उत्सवों से जोड़ने के सामाजिक-पारिस्थितिक लाभ क्या हैं? कृष्ण तुलसी के उदाहरण से समझाइए।
  3. ग्रामीण महिलाओं के रोजगार और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन को जोड़ने वाले उद्यम सतत विकास लक्ष्यों में कैसे योगदान देते हैं?

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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