राष्ट्रीय बेंगलुरु

पति की प्रेमिका पर बीएनएस में क्रूरता का केस नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि विवाहित पुरुष की प्रेमिका पर भारतीय न्याय संहिता के तहत पत्नी के साथ क्रूरता और धमकाने का आरोप नहीं लगाया जा सकता। न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना ने महिला के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी और सुप्रीम कोर्ट के देचम्मा आईएम फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि विवाहित पुरुष की प्रेमिका उसकी रिश्तेदार नहीं है। बीएनएस की धारा 85 में पति या रिश्तेदार द्वारा क्रूरता पर तीन साल तक कैद और जुर्माने का प्रावधान है। ट्रायल कोर्ट के संज्ञान लेने के बाद वह हाईकोर्ट पहुंची थीं।

स्रोत

Hindustan Times — India · मूल ख़बर पढ़ें ↗

#karnataka high court#bns#cruelty case#judiciary#dowry law

डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Karnataka High Court held a husband's girlfriend cannot be accused of cruelty to the wife under the BNS. — Attributed to the court's order as reported by Bar and Bench; no order number or date given in source.
  • Justice M Nagaprasanna relied on the Supreme Court ruling in Dechamma IM @ Dechamma Koushik v State of Karnataka. — Named judge and cited precedent appear in source; ruling quoted directly.
  • Section 85 of BNS, 2023 penalises a husband or his relative for cruelty, with up to three years' imprisonment and fine. — Statutory detail stated in source; consistent internally.
  • The complaint also alleged assault, criminal intimidation, intentional insult and an offence under the Dowry Prohibition Act, 1961. — Listed in source as allegations in the complaint, not proven findings.
  • Advocates Gagandeep E and Ajit PB appeared for the petitioner; Advocate PM Gopi for the wife. — Attributed to Bar and Bench reporting.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

यह अदालती फैसला है, लेकिन इसकी राजनीतिक गूंज मामूली नहीं है। भारतीय न्याय संहिता लागू होने के बाद आया यह आदेश दिखाता है कि अदालतें धारा 85 की परिधि को संकुचित रूप में पढ़ रही हैं — इससे पारिवारिक कानूनों के दुरुपयोग का मुद्दा उठाने वालों और महिला अधिकार संगठनों, दोनों को तर्क मिलते हैं। किसी सरकार के लिए यह तात्कालिक संकट नहीं है, पर नए आपराधिक कानूनों के व्यवहार पर चल रही राजनीतिक बहस में यह एक अहम नज़ीर बन जाता है।

  • फैसला यह सवाल फिर खड़ा करता है कि नई बीएनएस पुराने आईपीसी की सीमाओं को ही आगे ले आई है या नहीं — जो केंद्र के आपराधिक कानून सुधारों पर बहस से सीधे जुड़ता है।
  • "रिश्तेदार" की सुप्रीम कोर्ट की संकुचित व्याख्या को अपनाकर हाईकोर्ट ने बदलाव चाहने वालों को अदालत से हटाकर संसद की ओर धकेल दिया है।
  • धारा 498ए/धारा 85 के दुरुपयोग की बात लंबे समय से कहने वाले पुरुष अधिकार मंच इसे अपने तर्क का मजबूत उदाहरण बनाएंगे।
  • दूसरी ओर, महिला संगठन कह सकते हैं कि प्रताड़ित पत्नियों के लिए राहत के रास्ते सिकुड़ रहे हैं — यह राजनीतिक रूप से संवेदनशील ज़मीन है।
  • यह एकल न्यायाधीश का आदेश है, इसलिए नीतिगत दिशा बनने के लिए इसे अपीलीय मंजूरी या विधायी हस्तक्षेप की ज़रूरत होगी।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि आदेश के खिलाफ अपील होती है या नहीं, और धारा 85 में "रिश्तेदार" की परिभाषा बढ़ाने की मांग राजनीतिक मंचों पर उठती है या नहीं।

यह खबर आरोपों की सत्यता, शेष धाराओं या दहेज निषेध अधिनियम के आरोप की स्थिति तय नहीं करती, और किसी दल या सरकार की प्रतिक्रिया दर्ज नहीं करती।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक विवाहित पुरुष की प्रेमिका के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए कहा कि उसे भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत पत्नी के साथ क्रूरता और आपराधिक धमकी का आरोपी नहीं बनाया जा सकता। पत्नी की शिकायत पर ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लिया था, जिसके बाद प्रेमिका हाईकोर्ट पहुंची। अदालत ने माना कि प्रेमिका या पति से संबंध रखने वाली कोई भी महिला पति की 'रिश्तेदार' नहीं मानी जा सकती, इसलिए बीएनएस की धारा 85 का आधार कमजोर पड़ जाता है। बीएनएस की धारा 85 पति या उसके रिश्तेदार द्वारा महिला के साथ क्रूरता को दंडनीय बनाती है।

मुख्य तथ्य

  • कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि पति की प्रेमिका पर भारतीय न्याय संहिता के तहत पत्नी के साथ क्रूरता और धमकाने का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
  • बीएनएस, 2023 की धारा 85 पति या उसके रिश्तेदार द्वारा महिला को क्रूरता का शिकार बनाने पर अधिकतम तीन साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान करती है।
  • फैसला न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना ने सुनाया, जिन्होंने प्रेमिका के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
  • अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के देचम्मा आईएम उर्फ देचम्मा कौशिक बनाम कर्नाटक राज्य फैसले पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया कि विवाहित पुरुष की प्रेमिका उसकी रिश्तेदार नहीं मानी जा सकती।
  • पत्नी की शिकायत में क्रूरता, मारपीट या आपराधिक बल का प्रयोग, आपराधिक धमकी और जानबूझकर अपमान जैसे बीएनएस के अपराध शामिल थे।
  • शिकायत में दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के तहत दहेज लेने का आरोप भी लगाया गया था।
  • अदालत ने कहा कि आईपीसी की धारा 498ए के तहत मामला बनाने के लिए भी रिकॉर्ड पर यह सामग्री होनी चाहिए कि दुर्व्यवहार पति या रिश्तेदार ने दहेज की मांग पूरी न होने से जुड़े कारण से किया।
  • अदालत ने पाया कि एफआईआर या चार्जशीट की पूरी सामग्री में ऐसा कोई कथन नहीं है जो दिखाए कि अपीलकर्ता दहेज की मांग पूरी न होने के कारण उत्पीड़न से जुड़ी थी।

समयरेखा

  1. तिथि स्रोत में नहींपत्नी ने प्रेमिका के खिलाफ क्रूरता, आपराधिक धमकी, अपमान और दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज करवाई।
  2. तिथि स्रोत में नहींट्रायल कोर्ट ने प्रेमिका के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले में संज्ञान लिया।
  3. तिथि स्रोत में नहींसंज्ञान के बाद प्रेमिका ने कार्यवाही रद्द कराने के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया।
  4. हाल ही में (तारीख स्रोत में नहीं)कर्नाटक हाईकोर्ट ने देचम्मा फैसले का हवाला देते हुए प्रेमिका के खिलाफ कार्यवाही रद्द की।

किसका दाँव

  • याचिकाकर्ता (पति की प्रेमिका) — बीएनएस की धारा 85 और दहेज कानून के तहत आपराधिक मुकदमे से राहत; हाईकोर्ट ने कार्यवाही रद्द कर दी।
  • शिकायतकर्ता पत्नी — क्रूरता और उत्पीड़न की शिकायत में प्रेमिका को आरोपी बनाए रखने का प्रयास विफल; उसके लिए अधिवक्ता पीएम गोपी पेश हुए।
  • कर्नाटक हाईकोर्ट (न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना) — बीएनएस की धारा 85 में 'रिश्तेदार' शब्द के दायरे की व्याख्या करना।
  • सुप्रीम कोर्ट — देचम्मा आईएम फैसले के जरिये तय किया कि विवाहित पुरुष की प्रेमिका उसकी रिश्तेदार नहीं है — यही बाध्यकारी आधार बना।
  • पति (आरोपी संख्या 1) — पत्नी की क्रूरता की शिकायत का मुख्य आरोपी; आदेश प्रेमिका तक सीमित है।
  • अधिवक्ता गगनदीप ई और अजित पीबी — याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी।

क्यों अहम है

वैवाहिक विवादों में पति के अलावा अन्य लोगों को भी आरोपी बनाए जाने की प्रवृत्ति आम है; यह फैसला स्पष्ट करता है कि बीएनएस की धारा 85 का दायरा पति और उसके 'रिश्तेदार' तक सीमित है। इससे आपराधिक कानून के सख्त अर्थान्वयन का सिद्धांत मजबूत होता है, साथ ही यह सवाल भी उठता है कि पत्नी के पास प्रेमिका के आचरण के खिलाफ कौन-से उपाय बचते हैं।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • बीएनएस, 2023 की धारा 85: पति या उसके रिश्तेदार द्वारा महिला के साथ क्रूरता — अधिकतम तीन वर्ष कैद और जुर्माना।
  • बीएनएस की धारा 85 पूर्ववर्ती आईपीसी की धारा 498ए के समरूप प्रावधान है।
  • सुप्रीम कोर्ट का देचम्मा आईएम उर्फ देचम्मा कौशिक बनाम कर्नाटक राज्य मामला: विवाहित पुरुष की प्रेमिका उसकी 'रिश्तेदार' नहीं।
  • दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के तहत भी शिकायत में दहेज लेने का आरोप लगाया गया था।
  • फैसला कर्नाटक हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना ने दिया।
  • 498ए/धारा 85 के मामले में दुर्व्यवहार का दहेज की मांग पूरी न होने से संबंध दिखाना आवश्यक — हाईकोर्ट का मत।

मेन्स दृष्टिकोण

वैवाहिक क्रूरता से जुड़े आपराधिक प्रावधान (पूर्व में आईपीसी की धारा 498ए, अब बीएनएस की धारा 85) जानबूझकर 'पति या उसके रिश्तेदार' तक सीमित रखे गए हैं, ताकि दंडात्मक कानून का विस्तार उन व्यक्तियों तक न हो जाए जो वैवाहिक संबंध के दायरे से बाहर हैं। कर्नाटक हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के देचम्मा फैसले के आधार पर माना कि पति की प्रेमिका या उससे संबंध रखने वाली कोई महिला 'रिश्तेदार' नहीं है, और यह भी जोड़ा कि ऐसे मामलों में रिकॉर्ड पर यह सामग्री होनी चाहिए कि दुर्व्यवहार दहेज की मांग पूरी न होने से जुड़ा था; प्रस्तुत एफआईआर और चार्जशीट में ऐसा कोई कथन नहीं मिला। इसका निहितार्थ दोहरा है — एक ओर यह आपराधिक कानून के सख्त अर्थान्वयन और निर्दोष व्यक्तियों को अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचाने के सिद्धांत को पुष्ट करता है; दूसरी ओर यह पीड़ित पत्नी के लिए उपायों का प्रश्न खुला छोड़ता है, क्योंकि प्रेमिका के आचरण से जुड़ी शिकायतें धारा 85 के ढांचे में नहीं आतीं। आगे का रास्ता यह है कि ऐसे विवादों में शिकायत की जांच तथ्यात्मक सामग्री के आधार पर हो, आरोपियों की सूची में यांत्रिक रूप से नाम जोड़ने से बचा जाए, और पत्नी को उपलब्ध अन्य सामान्य दंड एवं सिविल उपायों का उपयुक्त प्रयोग किया जाए।

मुख्य शब्द

भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023
भारत की नई दंड संहिता, जिसकी धारा 85 वैवाहिक क्रूरता को दंडनीय बनाती है।
बीएनएस की धारा 85
पति या उसके रिश्तेदार द्वारा महिला के साथ क्रूरता; अधिकतम तीन वर्ष कैद और जुर्माना।
आईपीसी की धारा 498ए
पुरानी दंड संहिता का वैवाहिक क्रूरता संबंधी प्रावधान, जिसका उल्लेख अदालत ने तुलना के लिए किया।
देचम्मा आईएम बनाम कर्नाटक राज्य
सुप्रीम कोर्ट का फैसला जिसमें कहा गया कि विवाहित पुरुष की प्रेमिका उसकी रिश्तेदार नहीं मानी जा सकती।
पैरामोर (प्रेमिका/प्रेमी)
विवाहित व्यक्ति का विवाहेतर संबंध रखने वाला साथी; इस मामले में याचिकाकर्ता।
दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961
दहेज लेने-देने पर रोक लगाने वाला कानून, जिसके तहत भी शिकायत में आरोप लगाया गया था।

अभ्यास प्रश्न

  1. बीएनएस की धारा 85 में 'रिश्तेदार' शब्द की संकुचित व्याख्या वैवाहिक क्रूरता के पीड़ितों के उपायों को किस तरह प्रभावित करती है? कर्नाटक हाईकोर्ट के हाल के फैसले के आलोक में चर्चा करें।
  2. आपराधिक कानून के सख्त अर्थान्वयन (strict construction) का सिद्धांत क्या है, और वैवाहिक विवादों में आरोपियों की सूची व्यापक बनाने की प्रवृत्ति पर इसका क्या असर पड़ता है?
  3. आईपीसी की धारा 498ए से बीएनएस की धारा 85 तक की निरंतरता और अदालतों द्वारा दहेज-संबंध की अनिवार्यता पर दिए गए जोर का परीक्षण करें।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

अगली ख़बरसत्य निकेतन हादसा: मालिकों ने सावधानी नहीं बरती, पुलिस ने बताया →
← सभी ख़बरें