चुनाव आयोग में मतभेद की अटकलें, पुराने विवाद फिर चर्चा में
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी के बीच मतभेद की अटकलों के बीच चुनाव आयोग विवाद में है। एक खबर में कहा गया कि दोनों आयुक्तों ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) समेत अहम फैसलों पर आपत्ति जताई, जिसके बाद विपक्ष ने कुमार के इस्तीफे और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की मांग की। आयोग ने एकपक्षीय फैसलों के आरोप खारिज करते हुए सभी निर्णय सर्वसम्मत बताए। भाजपा ने दूरी बनाई। पहले टीएन शेषन, नवीन चावला, अशोक लवासा और अरुण गोयल प्रकरण भी हुए।
स्रोत
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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- Election commissioners Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi objected to certain key ECI decisions, including on the Special Intensive Revision (SIR) — Attributed in the source to an unnamed news report; not independently confirmed, and denied in effect by the ECI.
- ECI rejected charges of one-sided decision-making, saying differences are part of deliberation but all decisions are unanimous — Attributed to the poll body in the source; consistent internally.
- Supreme Court in July 1995 rejected TN Seshan's challenge, holding Article 324 permits a multi-member Election Commission — Specific date and legal reasoning appear in the source; presented as historical record.
- President Pratibha Patil rejected CEC N Gopalaswami's January 2009 recommendation to remove Navin Chawla; Chawla became CEC in April 2009 — Dates and sequence appear in the source; no external verification possible.
- Arun Goel resigned in March 2024 citing personal reasons, per CEC Rajiv Kumar; the precise reason was never publicly established — Attributed to Rajiv Kumar in the source, which also notes the reason remains unestablished.
विश्लेषकों की राय राय
देखने में यह चुनाव आयोग का अंदरूनी मामला है, लेकिन राजनीतिक रूप से इसका मूल्य बहुत बड़ा है — विपक्ष को यह कथा मिल जाती है कि एसआईआर पर उसकी आपत्तियों की गूंज आयोग के भीतर से भी आ रही है। इसीलिए विपक्ष सीधे अधिकतम मांगों पर गया: सीईसी का इस्तीफा और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप। आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि मतभेद विचार-विमर्श का हिस्सा हैं और निर्णय सर्वसम्मत होते हैं; भाजपा का दूरी बनाना भी एक रणनीति है — विवाद को दलीय लड़ाई बनने से रोकना।
- विपक्ष का निशाना कोई एक फैसला नहीं, बल्कि एसआईआर प्रक्रिया की विश्वसनीयता और उसके जरिये पूरी चुनावी प्रक्रिया पर संदेह खड़ा करना है।
- आयोग की भाषा सोच-समझकर चुनी गई है — मतभेद को पूरी तरह नकारे बिना यह जोर देना कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मत हैं, संस्थागत एकजुटता बचाने की कोशिश है।
- भाजपा की चुप्पी बचाव भी हो सकती है और दांव भी — सत्तारूढ़ दल का कोई हस्तक्षेप 'सरकारी प्रभाव' के आरोप को ही मजबूत करता।
- शेषन, चावला, लवासा और गोयल के पुराने प्रसंग बताते हैं कि आयोग में टकराव नया नहीं है, पर चुनावी कवायद के करीब सामने आने पर वह राजनीतिक हथियार बन जाता है।
- कानूनन सर्वसम्मति 'यथासंभव' अपेक्षित है और बहुमत का मत मान्य होता है, इसलिए असहमति से फैसले अवैध नहीं होते — लड़ाई वैधता की नहीं, विश्वसनीयता की है।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि दोनों आयुक्त सार्वजनिक रूप से कुछ कहते हैं या नहीं, सुप्रीम कोर्ट मामला सुनवाई के लिए लेता है या नहीं, और एसआईआर की समयसारिणी में कोई बदलाव होता है या नहीं।
यह खबर यह साबित नहीं करती कि मतभेद वास्तव में हैं या किन विशेष फैसलों पर आपत्ति जताई गई — पूरा विवरण एक समाचार रिपोर्ट और अटकलों पर आधारित है।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 10 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
भारत का निर्वाचन आयोग (ECI) तीन सदस्यीय संस्था है, जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) अध्यक्ष होते हैं और दो निर्वाचन आयुक्त सदस्य होते हैं। हाल ही में CEC ज्ञानेश कुमार तथा आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के बीच मतभेद की अटकलों से आयोग विवादों में आ गया। एक समाचार रिपोर्ट के अनुसार दोनों आयुक्तों ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) सहित कुछ अहम निर्णयों पर आपत्ति जताई। आयोग ने एकपक्षीय निर्णय लेने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि मतभेद विचार-विमर्श का हिस्सा हैं, लेकिन सभी निर्णय सर्वसम्मत होते हैं।
मुख्य तथ्य
- CEC ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी के बीच मतभेद की अटकलों के बीच तीन सदस्यीय आयोग विवाद में है।
- रिपोर्ट के अनुसार संधू और जोशी ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े निर्णयों समेत कुछ अहम फैसलों पर आपत्ति जताई।
- विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की मांग की तथा चुनाव प्रक्रिया की शुचिता पर सवाल उठाए; सत्तारूढ़ भाजपा ने विवाद से दूरी बनाई।
- अक्टूबर 1989 में दो निर्वाचन आयुक्त नियुक्त हुए, लेकिन व्यवस्था जनवरी 1990 तक ही चली; आयोग 1993 तक एक-सदस्यीय ढांचे में लौट आया।
- 1993 में नरसिंह राव सरकार ने एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति को निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया, जिसे CEC टीएन शेषन ने चुनौती दी।
- जुलाई 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने शेषन की चुनौती खारिज कर कहा कि अनुच्छेद 324 बहु-सदस्यीय आयोग की अनुमति देता है और अन्य आयुक्त केवल सलाहकार नहीं हैं।
- जनवरी 2009 में CEC एन गोपालस्वामी ने आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की; सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने इसे अस्वीकार किया और चावला अप्रैल 2009 में CEC बने।
- मार्च 2024 में लोकसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से कुछ दिन पहले आयुक्त अरुण गोयल ने अचानक इस्तीफा दिया, जिससे CEC राजीव कुमार अस्थायी रूप से एकमात्र सदस्य रह गए।
समयरेखा
- अक्टूबर 1989पहली बार दो निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किए गए।
- जनवरी 1990यह व्यवस्था समाप्त; आयोग एक-सदस्यीय ढांचे में लौटा।
- 1993नरसिंह राव सरकार ने एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति को निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया।
- जुलाई 1995सुप्रीम कोर्ट ने शेषन की चुनौती खारिज की; अनुच्छेद 324 के तहत बहु-सदस्यीय आयोग वैध ठहराया।
- 1995अमेरिका प्रवास के दौरान शेषन ने उप निर्वाचन आयुक्त को 'करेंट चार्ज' दिया; गिल और कृष्णमूर्ति ने आपत्ति जताई।
- जनवरी 2009CEC गोपालस्वामी ने नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की; चावला ने आरोप खारिज कर इस्तीफा देने से मना किया।
- अप्रैल 2009चावला गोपालस्वामी के उत्तराधिकारी के रूप में CEC बने।
- 2019लोकसभा चुनाव प्रचार में आयुक्त अशोक लवासा ने आदर्श आचार संहिता मामलों में 2-1 बहुमत के विरुद्ध असहमति दर्ज की और बैठकों से अलग हो गए।
- मार्च 2024आयुक्त अरुण गोयल का अचानक इस्तीफा, चुनाव कार्यक्रम घोषणा से कुछ दिन पहले।
- वर्तमानज्ञानेश कुमार, संधू और जोशी के बीच मतभेद की अटकलें; आयोग ने सभी निर्णय सर्वसम्मत बताए।
किसका दाँव
- भारत निर्वाचन आयोग (ECI) — संस्थागत विश्वसनीयता और सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया की छवि; एकपक्षीय निर्णय के आरोपों को खारिज किया।
- CEC ज्ञानेश कुमार — नेतृत्व और निष्पक्षता पर सवाल; विपक्ष उनके इस्तीफे की मांग कर रहा है।
- निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — रिपोर्ट के अनुसार SIR समेत अहम निर्णयों पर आपत्ति; आयोग में उनकी भूमिका दर्ज होने का प्रश्न।
- विपक्षी दल — चुनाव प्रक्रिया की शुचिता पर सवाल; CEC के इस्तीफे और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की मांग।
- भारतीय जनता पार्टी (सत्तारूढ़ दल) — विवाद से दूरी बनाई।
- सुप्रीम कोर्ट — 1995 में अनुच्छेद 324 की व्याख्या; अब विपक्ष द्वारा हस्तक्षेप की मांग।
- मतदाता — SIR जैसी मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रियाओं और निष्पक्ष चुनाव पर भरोसा।
क्यों अहम है
निर्वाचन आयोग की वैधता उसकी निष्पक्षता की सार्वजनिक धारणा पर टिकी है; भीतर मतभेद की खबरें स्वयं चुनावी प्रक्रिया की शुचिता पर सवाल खड़े कर देती हैं। शेषन, चावला, लवासा और गोयल प्रकरण दिखाते हैं कि CEC अध्यक्ष हैं, पर आयोग एक सामूहिक संस्था है जिसमें असहमति को दर्ज करने की व्यवस्था विवादास्पद रही है। SIR जैसी संवेदनशील प्रक्रिया पर मतभेद की अटकलें लाखों मतदाताओं के भरोसे से जुड़ी हैं।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- अनुच्छेद 324: सुप्रीम कोर्ट (जुलाई 1995) के अनुसार यह बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग की अनुमति देता है; अन्य आयुक्त केवल CEC के सलाहकार नहीं।
- 1991 का कानून: आयोग के निर्णय 'यथासंभव' सर्वसम्मत हों; मतभेद की स्थिति में बहुमत का मत मान्य।
- अक्टूबर 1989 में पहली बार दो आयुक्त नियुक्त; जनवरी 1990 में व्यवस्था समाप्त; 1993 में गिल व कृष्णमूर्ति की नियुक्ति।
- जनवरी 2009: CEC गोपालस्वामी की नवीन चावला हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सरकार की सलाह पर अस्वीकार की।
- 2019: अशोक लवासा ने आदर्श आचार संहिता मामलों में 2-1 बहुमत के विरुद्ध असहमति दर्ज की।
- मार्च 2024: अरुण गोयल के इस्तीफे से CEC राजीव कुमार अस्थायी रूप से आयोग के एकमात्र सदस्य रह गए।
मेन्स दृष्टिकोण
भारत का निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत गठित बहु-सदस्यीय संस्था है, जिसमें CEC अध्यक्ष होते हैं पर निर्णय सामूहिक माने जाते हैं—यह सिद्धांत सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 1995 में शेषन प्रकरण में स्पष्ट किया था। वर्तमान विवाद, जिसमें CEC ज्ञानेश कुमार और आयुक्तों संधू व जोशी के बीच SIR सहित अहम निर्णयों पर मतभेद की अटकलें हैं, तीन संरचनात्मक प्रश्न उठाता है: असहमति को आयोग के अभिलेख और अंतिम आदेशों में कैसे दर्ज किया जाए (2019 में लवासा प्रकरण के बाद तय हुआ कि सभी सदस्यों के विचार कार्यवाही में दर्ज होंगे पर अल्पमत असहमति अनिवार्यतः सार्वजनिक आदेश का हिस्सा नहीं होगी); आयुक्तों को हटाने या पद छोड़ने से जुड़ी प्रक्रिया (2009 का चावला प्रकरण, 2024 में गोयल का अचानक इस्तीफा); और सार्वजनिक धारणा का प्रबंधन, जहाँ विपक्ष इस्तीफे तथा न्यायिक हस्तक्षेप की मांग कर रहा है और सत्तारूढ़ दल दूरी बना रहा है। आगे का रास्ता आयोग की आंतरिक विचार-विमर्श प्रक्रिया की पारदर्शिता, असहमति के अभिलेखन की स्पष्ट व्यवस्था और 1991 के कानून की 'यथासंभव सर्वसम्मति' की भावना के अनुरूप संस्थागत आचरण में निहित है—बिना संस्था की सामूहिक वैधता को कमजोर किए।
मुख्य शब्द
- विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR)
- निर्वाचन आयोग की विवादास्पद प्रक्रिया जिससे जुड़े निर्णयों पर रिपोर्ट के अनुसार दो आयुक्तों ने आपत्ति जताई; विस्तृत विवरण स्रोत में नहीं है।
- अनुच्छेद 324
- संविधान का प्रावधान जो निर्वाचन आयोग से संबंधित है; सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में इसे बहु-सदस्यीय आयोग के अनुकूल ठहराया।
- आदर्श आचार संहिता (MCC)
- चुनाव प्रचार के दौरान लागू नियम, जिनके उल्लंघन के मामलों में 2019 में लवासा ने असहमति दर्ज की थी।
- 1991 का कानून
- आयोग के निर्णय 'यथासंभव' सर्वसम्मत होने और मतभेद पर बहुमत मत प्रभावी होने की व्यवस्था करता है।
- करेंट चार्ज
- 1995 में विदेश प्रवास के दौरान शेषन द्वारा एक उप निर्वाचन आयुक्त को दिया गया अस्थायी प्रभार, जिस पर अन्य आयुक्तों ने आपत्ति की।
अभ्यास प्रश्न
- भारत निर्वाचन आयोग की बहु-सदस्यीय संरचना में असहमति दर्ज करने की व्यवस्था पर चर्चा करें। शेषन, लवासा और गोयल प्रकरणों के आलोक में इसकी सीमाएँ बताइए।
- 'निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता उसकी आंतरिक सामूहिकता पर निर्भर है।' अनुच्छेद 324 तथा 1995 के सुप्रीम कोर्ट निर्णय के संदर्भ में परीक्षण करें।
- क्या निर्वाचन आयुक्तों की असहमति को सार्वजनिक आदेशों में दर्ज करना अनिवार्य होना चाहिए? पक्ष-विपक्ष में तर्क दें।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।