सीईसी और दोनों चुनाव आयुक्तों के आचरण पर उठे सवाल

इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर को प्रकाशित जांच के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता सूची, फॉर्म 6, मतदाता डेटा तक पहुंच और आयोग की आईटी प्रणाली पर 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कराईं। इससे सीईसी ज्ञानेश कुमार के एसआईआर संचालन पर सवाल उठे। विश्लेषक रजत सेठी और योगेंद्र यादव ने पूछा कि आपत्तियों के बाद भी दोनों आयुक्त संयुक्त प्रेस वार्ताओं में क्यों शामिल हुए, राष्ट्रपति के बजाय कैबिनेट सचिव को क्यों लिखा और पद पर क्यों बने रहे।

स्रोत

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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • ECs Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi recorded objections at least 14 times over 10 months, including four times in one day. — Attributed in source to an Indian Express investigation published September 23; underlying documents not public.
  • Joshi recorded on May 16, 2026 that Form 6 changes could not be made via an SIR order as the form is prescribed under the Registration of Electors Rules, 1960; Sandhu concurred on May 19, and Sandhu on August 13 called the changes 'unauthorised or illegal'. — Dates and quoted wording appear in source, attributed to The Indian Express.
  • Sandhu and Joshi separately wrote to Cabinet Secretary TV Somanathan on July 29 after a July 28 work-allocation change by Senior Deputy Election Commissioner Maneesh Garg. — Attributed to The Indian Express; no ECI confirmation cited.
  • The Indian Express sent a questionnaire to the ECI and emails to both ECs on September 21 and received no response. — Stated in source as the newspaper's own account; unverifiable independently.
  • Article 324 and the 2023 law make the ECI a multi-member body where a majority prevails absent unanimity, and the CEC is equal to the ECs. — Presented in source as legal background without citation of specific provisions.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

चुनाव आयोग के भीतर के मतभेद सामने आने से विपक्ष और सत्ता पक्ष, दोनों को राजनीतिक हथियार मिला है — पर बराबर वजन का नहीं। विपक्ष अब कह सकता है कि मतदाता सूची पर उसकी आपत्तियों को संस्था के भीतर से ही समर्थन मिला; सत्ता पक्ष तर्क दे सकता है कि जब दोनों आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज कराने के बाद भी संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिया और पद पर बने रहे, तो व्यवस्था काम कर रही थी। राजनीतिक नुकसान किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि आयोग की निष्पक्ष छवि नामक संस्थागत पूंजी का है।

  • सीईसी और दोनों आयुक्त कानूनी रूप से समान हैं, इसलिए 'एक व्यक्ति की मनमानी' वाला सरल राजनीतिक आख्यान टिकाना कठिन है।
  • एसआईआर के संचालन पर उठे सवाल विपक्ष के इस दावे को बल देते हैं कि मतदाता सूची से जुड़ी शिकायतों का संस्थागत आधार है।
  • आपत्तियों के बावजूद संयुक्त ब्रीफिंग में उपस्थिति और पद पर बने रहना वह कमजोर कड़ी है जिसका सत्ता पक्ष इस्तेमाल कर सकता है।
  • राष्ट्रपति के बजाय कैबिनेट सचिव को पत्र लिखना इस आलोचना को जन्म देता है कि एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था सरकारी कार्यपालिका पर निर्भर दिखी।
  • यह स्पष्ट न होने से कि दोनों आयुक्त कभी औपचारिक बहुमत बने या नहीं, दोनों खेमे रिकॉर्ड की अपने-अपने पक्ष में व्याख्या कर सकते हैं।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि आयोग की बैठकों के मिनट्स और आंतरिक नोट सार्वजनिक होते हैं या नहीं, और विपक्ष इसे संसद या अदालत में लगातार मुद्दा बनाता है या नहीं।

यह रिपोर्ट यह साबित नहीं करती कि किसी ने कानून तोड़ा या मतदाता सूचियों में वास्तव में छेड़छाड़ हुई; आयोग के अंतिम निर्णय, बहुमत की स्थिति और ईसीआई या दोनों आयुक्तों का पक्ष अब भी सार्वजनिक नहीं है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 10 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के बाद भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के भीतर मतभेद सार्वजनिक बहस का विषय बन गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता सूची, फॉर्म 6, मतदाता डेटा तक पहुंच और आयोग की आईटी व्यवस्था पर बार-बार आपत्तियां दर्ज कराईं, जिससे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) संचालन पर सवाल उठे। अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और 2023 का कानून बहुसदस्यीय आयोग में बहुमत से निर्णय की व्यवस्था करता है। बहस अब दो-तरफा है — सीईसी की जवाबदेही और साथ ही यह प्रश्न कि दोनों आयुक्तों ने अपनी असहमति को अंतिम सीमा तक क्यों नहीं ले गए।

मुख्य तथ्य

  • इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर (बुधवार) को प्रकाशित जांच में आयोग के कामकाज पर दो आयुक्तों की आपत्तियों का पैटर्न सामने आया।
  • रिपोर्ट के अनुसार संधू और जोशी ने "10 महीनों में कम से कम 14 बार" आपत्तियां दर्ज कराईं — एक दिन में चार बार भी।
  • आपत्तियों में यह चिंता शामिल थी कि मतदाता सूची डेटाबेस के केंद्रीकृत नियंत्रण से निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ERO) की सांविधिक शक्तियां घट रही हैं।
  • 16 मई 2026 को जोशी ने दर्ज किया कि फॉर्म 6 में बदलाव SIR आदेश से नहीं हो सकते क्योंकि यह निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित है; 19 मई को संधू ने सहमति जताई।
  • 13 अगस्त को संधू ने पुनः दर्ज किया कि ECINet पोर्टल पर आए विवादित बदलाव "अनधिकृत या अवैध" हैं और हटाए जाने चाहिए।
  • 28 जुलाई को वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग द्वारा कार्य आवंटन बदलने के बाद 29 जुलाई को दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे।
  • राहुल गांधी ने 7 अगस्त 2025 को "वोट चोरी" का आरोप लगाते हुए पहली प्रेस वार्ता की; 17 अगस्त को ज्ञानेश कुमार ने जवाब दिया, जिसमें संधू और जोशी साथ मौजूद थे।
  • ECINet 22 जनवरी को लॉन्च हुआ; तीनों आयुक्त 10 मार्च की प्रेस ब्रीफिंग और 15 मार्च की चुनाव कार्यक्रम घोषणा में साथ दिखे।

समयरेखा

  1. 7 अगस्त 2025राहुल गांधी की "वोट चोरी" आरोपों पर पहली प्रेस वार्ता।
  2. 17 अगस्त 2025सीईसी ज्ञानेश कुमार ने आरोपों का जवाब दिया; संधू और जोशी साथ मौजूद।
  3. 22 जनवरीECINet पोर्टल लॉन्च; मतदाता सूची डेटा के केंद्रीकरण पर चिंताएं दर्ज होती रहीं।
  4. 10 मार्चतीनों आयुक्तों की संयुक्त प्रेस ब्रीफिंग।
  5. 15 मार्चचुनाव कार्यक्रम की संयुक्त घोषणा।
  6. 16 मई 2026जोशी ने दर्ज किया कि फॉर्म 6 में बदलाव SIR आदेश से नहीं, नियम संशोधन से होने चाहिए।
  7. 19 मईसंधू ने जोशी की राय से सहमति जताई।
  8. 28 जुलाईवरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग ने प्रशासन प्रभाग में कार्य आवंटन बदला।
  9. 29 जुलाईसंधू और जोशी ने कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे; बाद में दोनों ने मिलकर आदेश पलटा।
  10. 13 अगस्तसंधू ने ECINet पर आए फॉर्म 6 बदलावों को "अनधिकृत या अवैध" कहा।

किसका दाँव

  • मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार — SIR संचालन, वैध बहुमत की अवहेलना और आयोग की मंजूरी के बिना निर्णय लेने के आरोपों पर जवाबदेही; इस्तीफे की मांग भी उठी।
  • चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी — असहमति दर्ज कराने के बाद भी संयुक्त प्रेस वार्ताओं में शामिल होने, कैबिनेट सचिव को लिखने और पद पर बने रहने पर सवाल।
  • भारत निर्वाचन आयोग (ECI) — अनुच्छेद 324 के तहत स्वतंत्र संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता और बहुसदस्यीय निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता।
  • निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) — मतदाता सूची डेटाबेस के केंद्रीकृत नियंत्रण से उनकी सांविधिक शक्तियों में कटौती की चिंता।
  • मतदाता/नागरिक — फॉर्म 6 से पंजीकरण, मतदाता सूची की तैयारी और रखरखाव की प्रक्रिया की वैधता सीधे प्रभावित।
  • कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन — एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय के आंतरिक विवाद में सरकारी कार्यपालिका के हस्तक्षेप का प्रश्न।
  • विपक्ष / राहुल गांधी — "वोट चोरी" के आरोपों को नई रिपोर्ट से बल; चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता का राजनीतिक मुद्दा।

क्यों अहम है

मतदाता सूची और फॉर्म 6 वही तंत्र हैं जिनसे नागरिक मतदाता बनते हैं और सूचियां तैयार होती हैं — इसलिए यह विवाद प्रशासनिक मतभेद नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की वैधता का प्रश्न है। यदि सीईसी ने आयोग को दरकिनार कर या वैध बहुमत की अवहेलना कर निर्णय लिए, तो अनुच्छेद 324 के तहत मिली संस्थागत स्वतंत्रता की साख पर असर पड़ता है। साथ ही यह सवाल भी उतना ही अहम है कि असहमति दर्ज कराना ही जवाबदेही का अंत है या आयुक्तों के पास उपलब्ध कानूनी शक्तियों का पूरा उपयोग भी अपेक्षित था।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • अनुच्छेद 324 — भारत निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र संवैधानिक अधिकार प्रदान करता है।
  • सीईसी और दोनों चुनाव आयुक्त समान हैं; "मुख्य" होने से सीईसी अधिक शक्तिशाली नहीं होता।
  • 2023 का कानून: बहुसदस्यीय आयोग में सर्वसम्मति न होने पर बहुमत से निर्णय।
  • फॉर्म 6 — नए मतदाता के पंजीकरण का सांविधिक फॉर्म, निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित।
  • ECINet — ECI का ऑनलाइन पोर्टल, 22 जनवरी को लॉन्च।
  • सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित होती है; आयोग कैबिनेट सचिव के प्रशासनिक अधीन नहीं।

मेन्स दृष्टिकोण

इंडियन एक्सप्रेस की जांच ने भारत निर्वाचन आयोग के भीतर की असहमति को सार्वजनिक बहस में ला दिया है: 10 महीनों में कम से कम 14 बार दो चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची डेटाबेस के केंद्रीकरण, ERO की सांविधिक शक्तियों में कटौती, फॉर्म 6 में SIR आदेश के जरिये बदलाव और आईटी ढांचे पर आपत्तियां दर्ज कीं। मुद्दे के दो पहलू हैं। पहला, सीईसी की जवाबदेही — यदि आयोग को दरकिनार कर, वैध बहुमत की अवहेलना कर या सांविधिक प्रक्रिया को शिथिल कर निर्णय लिए गए तो 2023 के कानून की बहुमत-आधारित निर्णय व्यवस्था का उल्लंघन है और जनता स्पष्ट उत्तर की हकदार है। दूसरा, आयुक्तों का आचरण — रजत सेठी का तर्क है कि यदि दोनों एक ही निर्णय के विरुद्ध थे तो वे स्वयं आयोग की पूर्ण बैठक बुला सकते थे; योगेंद्र यादव का प्रश्न है कि "क्या कैबिनेट सचिव ECI का मालिक है?" — संवैधानिक मार्ग राष्ट्रपति के पास जाना था। 28 जुलाई के कार्य-आवंटन आदेश को दोनों ने मिलकर पलट दिया, जिससे सिद्ध होता है कि सामूहिक संस्थागत अधिकार का प्रयोग संभव था। आगे का रास्ता: आयोग की बैठकों की कार्यवृत्त, नोट और अभिलेख सार्वजनिक हों, यह स्पष्ट हो कि बहुमत की राय का निपटारा कानून के अनुसार हुआ या नहीं, और भीतर के विवाद निपटाने के लिए संस्थागत तंत्र पर सार्वजनिक स्पष्टता आए।

मुख्य शब्द

SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण)
मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया, जिसके संचालन को लेकर सीईसी ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठे।
फॉर्म 6
नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए निर्धारित सांविधिक फॉर्म, जो निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत तय है।
ECINet
निर्वाचन आयोग का ऑनलाइन पोर्टल, 22 जनवरी को लॉन्च; इस पर विवादित फॉर्म 6 बदलाव दिखे।
ERO (निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी)
मतदाता सूची तैयार करने वाला सांविधिक अधिकारी, जिसकी शक्तियों में कटौती की आपत्ति दर्ज हुई।
अनुच्छेद 324
संविधान का वह प्रावधान जो निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकार देता है।
बहुसदस्यीय आयोग
सीईसी और दो आयुक्तों वाला निकाय, जिसमें सर्वसम्मति न होने पर बहुमत से निर्णय होता है (2023 का कानून)।

अभ्यास प्रश्न

  1. भारत निर्वाचन आयोग की बहुसदस्यीय संरचना में असहमति का निपटारा किस प्रकार होना चाहिए? अनुच्छेद 324 और 2023 के कानून के आलोक में परीक्षण करें।
  2. "असहमति दर्ज कराना ही जवाबदेही का अंत नहीं है" — स्वतंत्र संवैधानिक निकायों के सदस्यों की संस्थागत जिम्मेदारी के संदर्भ में इस कथन का मूल्यांकन करें।
  3. चुनाव आयुक्तों द्वारा आंतरिक विवाद में कैबिनेट सचिव से संपर्क करने से निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता पर क्या प्रश्न उठते हैं? चर्चा करें।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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