राजनीति जम्मू-कश्मीर

ओबीसी आरक्षण पर फैसला लंबित, जम्मू-कश्मीर पंचायत चुनाव अटके

जम्मू-कश्मीर में स्थानीय निकायों का कार्यकाल पूरा होने के दो साल बाद भी पंचायत चुनाव के आसार नहीं हैं, क्योंकि सरकार ने ग्रामीण निकायों में ओबीसी आरक्षण पर फैसला नहीं किया है। अधिकारियों के अनुसार, पूर्व हाईकोर्ट न्यायाधीश जानक राज कोतवाल की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय ओबीसी आयोग ने पिछले साल फरवरी में रिपोर्ट सौंपी थी। मंत्री जाविद अहमद डार ने कहा कि रिपोर्ट कैबिनेट में रखी जाएगी, इसके बाद परिसीमन और आरक्षण होगा। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि चुनाव उचित समय पर होंगे।

स्रोत

Indian Express — India · मूल ख़बर पढ़ें ↗

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • J&K panchayat elections are stalled because the government has not decided on OBC reservation in grassroots bodies — Attributed to officials and an unnamed State Election Commission official quoted in the source.
  • A three-member OBC Commission led by former high court judge Janak Raj Kotwal submitted its report in February last year — Attributed to officials; minister Javid Ahmed Dar confirms receipt of the report.
  • Terms of panchayats and BDCs ended on January 9, 2024; municipalities in October-November 2023; District Development Councils on February 24, 2026 — Dates appear in the source; the DDC date is in the future relative to the other dates and should be verified by the desk.
  • SEC told the Chief Secretary in August that a decision was needed by September to hold polls before winter — Attributed to a senior official, unnamed.
  • Municipal polls cannot be held until assembly electoral rolls are revised after the SIR — Attributed to an unnamed official; SIR is not expanded in the source.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

ओबीसी आरक्षण भले तकनीकी और कानूनी अड़चन दिखे, लेकिन जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनावों की देरी को पूरी तरह प्रशासनिक मानना मुश्किल है। दो साल से निर्वाचित स्थानीय निकाय न होने का मतलब है कि जमीनी स्तर की सत्ता जनप्रतिनिधियों के बजाय नौकरशाही के पास है — यह संदेश किसी भी दल के लिए सहज नहीं है। ओबीसी आयोग की रिपोर्ट पिछले साल फरवरी से सरकार के पास है और अब तक कैबिनेट में नहीं आई, यही तथ्य विपक्ष को फैसला टालने के आरोप का मौका देता है।

  • पहले ओबीसी फैसला, फिर परिसीमन और आरक्षण — इस क्रम से चुनाव का कैलेंडर सरकार के हाथ में रहता है, जबकि राज्य निर्वाचन आयोग कहता है कि वह तैयार है और उसे केवल तारीखें चाहिए।
  • मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का "उचित समय" वाला वाक्यांश ध्यान खींचता है — रिपोर्ट बताती है कि यही भाषा भाजपा नेता राज्य का दर्जा बहाल करने पर इस्तेमाल करते रहे हैं, जो राजनीतिक तंज का रास्ता खोलता है।
  • ओबीसी कोटे पर फैसला जो भी हो, वह क्षेत्रों और सामाजिक समूहों के बीच स्थानीय समीकरण बदलेगा — यही वजह हो सकती है कि कोई पक्ष जल्दबाजी में उसे अपने नाम नहीं लेना चाहता।
  • शहरी निकायों का इंतजार और लंबा है, क्योंकि नगरपालिका चुनाव विधानसभा मतदाता सूचियों पर निर्भर हैं, जिनका पुनरीक्षण एसआईआर के बाद ही होगा।
  • निर्वाचित पंचायतों के अभाव में स्थानीय नेतृत्व की पौध तैयार होना रुक जाता है — यह कैडर आधारित दलों के लिए नुकसान और प्रशासनिक तंत्र के जरिये काम करने वालों के लिए तुलनात्मक लाभ है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि कोतवाल आयोग की रिपोर्ट कब कैबिनेट तक पहुंचती है और सर्दियों से पहले सरकार आयोग को तारीखें बताती है या नहीं — एक और मौसम चूकने पर देरी के जानबूझकर होने का आरोप और तेज होगा।

यह रिपोर्ट देरी के पीछे किसी राजनीतिक मंशा को साबित नहीं करती, न ही यह स्पष्ट है कि आयोग ने क्या सिफारिश की और कैबिनेट इसे कब उठाएगी।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 8 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

जम्मू-कश्मीर में पंचायत, बीडीसी, नगर निकाय और जिला विकास परिषदों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और अब केंद्र शासित प्रदेश में कोई भी निर्वाचित स्थानीय निकाय अस्तित्व में नहीं है। 2019 तक वहां पंचायत चुनाव जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम के तहत होते थे, जिसमें ओबीसी कोटा अनिवार्य नहीं था, लेकिन सात साल पहले केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद ओबीसी आरक्षण के नियम जम्मू-कश्मीर पर भी लागू होंगे। सरकार ने अब तक ओबीसी आयोग की रिपोर्ट पर फैसला नहीं लिया है, जिससे ग्रामीण निकाय चुनाव अटके हुए हैं।

मुख्य तथ्य

  • जम्मू-कश्मीर के पूर्ववर्ती स्थानीय निकायों का कार्यकाल समाप्त होने के दो साल बाद भी पंचायत चुनाव के कोई संकेत नहीं हैं।
  • पूर्व हाईकोर्ट न्यायाधीश जानक राज कोतवाल की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय ओबीसी आयोग ने पिछले साल फरवरी में सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी।
  • पूर्ववर्ती पंचायतों और ब्लॉक विकास परिषदों (बीडीसी) का कार्यकाल 9 जनवरी 2024 को समाप्त हुआ।
  • नगरपालिकाओं का कार्यकाल अक्टूबर-नवंबर 2023 में और जिला विकास परिषदों का 24 फरवरी 2026 को पूरा हुआ।
  • पंचायती राज अधिनियम के अनुसार ओबीसी आरक्षण प्रत्येक पंचायत में आबादी के अनुपात में होना चाहिए, जिसके बिना अधिकारियों के मुताबिक चुनाव संभव नहीं।
  • राज्य निर्वाचन आयोग ने अगस्त में मुख्य सचिव अटल डुल्लू के साथ बैठक में कहा कि इस साल चुनाव कराने हैं तो सितंबर तक निर्णय बताया जाए, क्योंकि कड़ी सर्दी से पहले चुनाव जरूरी हैं।
  • एसईसी को चुनाव कराने के लिए कम से कम डेढ़ से दो महीने की तैयारी चाहिए; पंचायतों की अलग व सुव्यवस्थित मतदाता सूचियां हैं जिनका सरसरी पुनरीक्षण कर नवंबर में चुनाव संभव थे।
  • नगर निकाय चुनाव विधानसभा क्षेत्रों की मतदाता सूचियों पर आधारित हैं, जो अद्यतन नहीं हैं और एसआईआर के बाद ही संशोधित होंगी।

समयरेखा

  1. 2019 तकक्षेत्र में पंचायत चुनाव जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम के तहत हुए, जिसमें ओबीसी कोटा आवश्यक नहीं था।
  2. सात साल पहलेजम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश में परिवर्तन के बाद ओबीसी आरक्षण के नियम वहां भी लागू होने की स्थिति बनी।
  3. अक्टूबर-नवंबर 2023जम्मू-कश्मीर की नगरपालिकाओं का कार्यकाल पूरा हुआ।
  4. 9 जनवरी 2024पूर्ववर्ती पंचायतों और ब्लॉक विकास परिषदों का कार्यकाल समाप्त हुआ।
  5. फरवरी (पिछले वर्ष)जानक राज कोतवाल की अध्यक्षता वाले ओबीसी आयोग ने सरकार को रिपोर्ट सौंपी।
  6. अगस्तएसईसी ने मुख्य सचिव अटल डुल्लू के साथ बैठक में सितंबर तक निर्णय बताने का आग्रह किया।
  7. पिछले महीनेमुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि स्थानीय निकाय चुनाव 'उचित समय' पर होंगे।
  8. 24 फरवरी 2026जिला विकास परिषदों का कार्यकाल समाप्त हुआ।

किसका दाँव

  • जम्मू-कश्मीर सरकार / कैबिनेट — ओबीसी आयोग की रिपोर्ट पर निर्णय, परिसीमन और आरक्षण तय करना, तथा एसईसी के परामर्श से चुनाव तिथियां अंतिम करना।
  • राज्य निर्वाचन आयोग (एसईसी) — कहता है कि ग्रामीण निकाय चुनाव की सभी आवश्यक तैयारियां पूरी; सरकार से एक-दो महीने पहले तिथि बताने की मांग।
  • ओबीसी समुदाय — पंचायतों में आबादी के अनुपात में आरक्षण का प्रश्न, जिस पर निर्णय लंबित है।
  • मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला — कहा कि चुनाव 'उचित समय' पर होंगे; वही शब्द जो भाजपा नेता राज्य का दर्जा बहाली पर प्रयोग करते हैं।
  • मंत्री जाविद अहमद डार (ग्रामीण विकास व पंचायती राज) — रिपोर्ट कैबिनेट में रखी जाएगी, उसके बाद परिसीमन व आरक्षण, फिर ग्रामीण निकाय चुनाव।
  • ग्रामीण मतदाता व पंचायत प्रतिनिधि — तीनों स्तरों के पंचायती राज संस्थान अस्तित्वहीन; कोई निर्वाचित स्थानीय निकाय नहीं।
  • मुख्य सचिव अटल डुल्लू — एसईसी के साथ बैठक में चुनाव समयसीमा पर सरकार का पक्ष।

क्यों अहम है

जम्मू-कश्मीर में तीनों स्तरों के पंचायती राज संस्थान अस्तित्वहीन हो जाने से जमीनी स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधित्व और स्थानीय स्वशासन का ढांचा ठप है। ओबीसी आरक्षण, परिसीमन और मतदाता सूचियों के अद्यतन जैसे प्रक्रियागत मुद्दे चुनावी शून्यता को लंबा खींच रहे हैं, और शहरी निकाय चुनाव एसआईआर के बाद ही संभव बताए जा रहे हैं।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम के तहत 2019 तक हुए पंचायत चुनावों में ओबीसी कोटा आवश्यक नहीं था।
  • तीन सदस्यीय ओबीसी आयोग के अध्यक्ष: पूर्व हाईकोर्ट न्यायाधीश जानक राज कोतवाल; रिपोर्ट पिछले वर्ष फरवरी में सौंपी गई।
  • पंचायतों व बीडीसी का कार्यकाल 9 जनवरी 2024 को, नगरपालिकाओं का अक्टूबर-नवंबर 2023 में और डीडीसी का 24 फरवरी 2026 को समाप्त।
  • पंचायती राज अधिनियम के अनुसार चुनाव तिथियां सरकार द्वारा राज्य निर्वाचन आयोग के परामर्श से तय होती हैं।
  • पंचायतों की अपनी अलग मतदाता सूचियां; नगर निकाय चुनाव विधानसभा क्षेत्रों की सूचियों पर आधारित।
  • जम्मू-कश्मीर के ग्रामीण विकास व पंचायती राज मंत्री: जाविद अहमद डार; मुख्य सचिव: अटल डुल्लू।

मेन्स दृष्टिकोण

जम्मू-कश्मीर में स्थानीय निकाय चुनावों का टलना संवैधानिक-प्रशासनिक प्रक्रिया और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों से जुड़ा मामला है। तात्कालिक कारण ओबीसी आरक्षण पर निर्णय का लंबित रहना है—पंचायती राज अधिनियम के अनुसार यह आरक्षण प्रत्येक पंचायत में आबादी के अनुपात में होना है, और कोतवाल आयोग की फरवरी (पिछले वर्ष) की रिपोर्ट अभी कैबिनेट के विचाराधीन जानी है; उसके बाद परिसीमन और सीटों का आरक्षण होगा। परिणाम यह है कि पंचायतों, बीडीसी, डीडीसी और नगरपालिकाओं के कार्यकाल समाप्त होने के बाद केंद्र शासित प्रदेश में कोई निर्वाचित स्थानीय निकाय नहीं बचा, जबकि एसईसी कह रहा है कि उसकी तैयारियां पूरी हैं और उसे केवल एक-दो महीने पहले तिथि की सूचना चाहिए। शहरी निकायों की अतिरिक्त अड़चन यह है कि उनके चुनाव विधानसभा क्षेत्रों की मतदाता सूचियों पर आधारित हैं, जो एसआईआर के बाद ही संशोधित होंगी। आगे का रास्ता स्रोत में बताए तथ्यों के अनुसार यही है—कैबिनेट द्वारा आयोग की रिपोर्ट पर निर्णय, परिसीमन व आरक्षण, तथा एसईसी से परामर्श कर समयसीमा तय करना, जिसमें कठोर सर्दी जैसी व्यावहारिक बाध्यताएं भी ध्यान में रखी जाएं।

मुख्य शब्द

ओबीसी आयोग (कोतवाल आयोग)
पूर्व हाईकोर्ट न्यायाधीश जानक राज कोतवाल की अध्यक्षता वाला तीन सदस्यीय आयोग, जिसने आरक्षण पर रिपोर्ट सौंपी।
राज्य निर्वाचन आयोग (एसईसी)
स्थानीय निकाय चुनाव कराने वाली संस्था; कहती है कि ग्रामीण निकाय चुनाव की सभी आवश्यक तैयारियां पूरी हैं।
जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम
वह कानून जिसके तहत 2019 तक चुनाव हुए; इसके अनुसार चुनाव तिथियां सरकार एसईसी के परामर्श से तय करती है।
ब्लॉक विकास परिषद (बीडीसी)
पंचायती राज का मध्य स्तर, जिसका कार्यकाल 9 जनवरी 2024 को समाप्त हुआ।
जिला विकास परिषद (डीडीसी)
पंचायती राज का जिला स्तरीय निकाय, जिसका कार्यकाल 24 फरवरी 2026 को पूरा हुआ।
एसआईआर
मतदाता सूची से जुड़ी वह प्रक्रिया, जिसके बाद ही विधानसभा क्षेत्रों की सूचियां संशोधित होंगी और नगर निकाय चुनाव संभव होंगे।

अभ्यास प्रश्न

  1. जम्मू-कश्मीर में पंचायती राज संस्थानों के चुनाव टलने के कारणों का परीक्षण कीजिए और जमीनी स्तर के लोकतंत्र पर इसके प्रभाव पर चर्चा कीजिए।
  2. केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद जम्मू-कश्मीर में ओबीसी आरक्षण के नियमों के अनुप्रयोग से पंचायत चुनाव प्रक्रिया कैसे प्रभावित हुई है? स्पष्ट कीजिए।
  3. स्थानीय निकाय चुनावों में मतदाता सूचियों और परिसीमन की भूमिका पर जम्मू-कश्मीर के उदाहरण से टिप्पणी कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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