राष्ट्रीय गीत का चयन सरकार के अधिकार क्षेत्र में: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता देने या उसके आधिकारिक गायन में दो अथवा छह छंद होने के प्रश्न पर विचार करने से इनकार कर दिया और कहा कि राष्ट्रीय प्रतीकों का चयन निर्वाचित सरकार के अधिकार क्षेत्र में है। सीजेआई सूर्यकांत तथा जस्टिस जॉयमाल्य बागची एवं वी मोहना की पीठ 2026 संशोधन के दंडात्मक प्रावधानों की जांच पर सहमत हुई और कहा कि अंतरात्मा के आधार पर इनकार करने वालों पर मुकदमा नहीं चलेगा। टीएम कृष्णा की याचिका पर केंद्र को दो सप्ताह का समय दिया गया।

स्रोत

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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • A bench of CJI Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi and Justice V Mohana declined to examine whether Vande Mataram should be the National Song or how many stanzas it should have. — Attributed to the bench's oral observations as reported in the source; names and composition appear in the source.
  • The 2026 amendment to the Prevention of Insults to National Honour Act extended Section 3 protection to the National Song, with up to three years imprisonment, fine or both. — Figure and provision appear in the source text; no independent verification possible.
  • The petition was filed by Carnatic vocalist TM Krishna, challenging the amendment and MHA directions prescribing the six-stanza version. — Attributed in source, with counsel S Muralidhar named as appearing for the petitioner.
  • The bench said Bijoe Emmanuel vs State of Kerala (1986) would continue to govern the field and conscientious objectors would not face penal consequences. — Direct quotes attributed to the bench in the source; case details as described in source.
  • The Centre was given two weeks to respond after the petition is furnished to the Solicitor General. — Procedural direction stated in source; no order copy cited.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

राजनीतिक रूप से यह एक बंटा हुआ नतीजा है, जिसमें दोनों पक्षों को कुछ मिला है। राष्ट्रीय प्रतीकों का चयन निर्वाचित सरकार के दायरे में है, यह कहकर पीठ ने वंदे मातरम और छह चरणों के सवाल पर केंद्र को गुंजाइश दी; वहीं अंतरात्मा के आधार पर न गाने वालों पर मुकदमा नहीं चलेगा, यह स्पष्ट करके याचिकाकर्ता की मूल चिंता को मान्यता भी दी। इससे बहस अब 'कौन सा गीत, कितने चरण' से हटकर 'दंडात्मक कानून कहां तक बाध्य कर सकता है' पर केंद्रित होने की संभावना है।

  • राष्ट्रीय प्रतीक तय करना सरकार का अधिकार है, यह टिप्पणी केंद्र के लिए तत्काल राहत और 2026 संशोधन के बचाव का राजनीतिक आधार है।
  • लेकिन दंडात्मक परिणामों की जांच जारी रखने और बिजोय इमैनुएल (1986) का हवाला देने से कानून का सबसे विवादित हिस्सा अदालत की निगरानी में बना हुआ है।
  • कर्नाटक में विधानसभा विरोध और भाजपा की पदयात्रा बताती है कि यह मुद्दा अदालत तक सीमित नहीं, जमीनी गोलबंदी का साधन भी बन रहा है।
  • याचिकाकर्ता किसी दल का नहीं बल्कि सांस्कृतिक क्षेत्र का चेहरा है, इसलिए बहस धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अंतरात्मा के इर्द-गिर्द ढलने की संभावना अधिक है।
  • सॉलिसिटर जनरल के साथ तीखी नोकझोंक दिखाती है कि यह मामला शुष्क कानूनी व्याख्या नहीं, आवेशित राजनीतिक माहौल में लड़ा जा रहा है।

किस पर नज़र रखें — दो हफ्तों में केंद्र का जवाब देखना होगा — खासकर यह कि वह छह चरणों वाले निर्देश और दंड प्रावधान का सख्ती से बचाव करता है या उनका दायरा नरम करता है।

यह केवल प्रारंभिक चरण है; संशोधन की संवैधानिकता पर अंतिम फैसला, गृह मंत्रालय के निर्देशों का भविष्य या किस दल को चुनावी लाभ होगा, यह खबर तय नहीं करती।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

कर्नाटक संगीत गायक, लेखक और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता टी एम कृष्णा ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में हुए 2026 संशोधन तथा गृह मंत्रालय के उन निर्देशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जो विशिष्ट सरकारी, औपचारिक व सांस्कृतिक अवसरों पर वंदे मातरम के पूरे छह छंदों के गायन को निर्धारित करते हैं। संशोधन ने अधिनियम की धारा 3 को बदलकर राष्ट्रगान के साथ-साथ "राष्ट्रीय गीत" को भी आपराधिक संरक्षण दिया। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि राष्ट्रीय प्रतीकों का चयन निर्वाचित सरकार का क्षेत्र है, लेकिन वह यह जांचेगा कि अंतरात्मा या धर्म के आधार पर न गाने वाले नागरिक पर आपराधिक परिणाम थोपे जा सकते हैं या नहीं।

मुख्य तथ्य

  • सीजेआई सूर्यकांत तथा जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी मोहना की पीठ ने वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत मानने या दो/छह छंद के प्रश्न पर विचार करने से इनकार किया।
  • 2026 संशोधन ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 को प्रतिस्थापित किया और "राष्ट्रीय गीत" को इसमें जोड़ा।
  • संशोधित धारा 3 के तहत राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत के गायन में जानबूझकर बाधा डालने पर तीन वर्ष तक कारावास, जुर्माना या दोनों।
  • पीठ ने कहा: "अनुच्छेद 25, 26 के अधिकारों के उल्लंघन का अनुभव करने वाले किसी व्यक्ति पर दंडात्मक परिणाम नहीं लगाए जाएंगे।"
  • पीठ ने संकेत दिया कि बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986) में निर्धारित विधि लागू रहेगी।
  • याचिका के अनुसार छह छंद वाले संस्करण के अंतिम चार छंदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के संदर्भ हैं।
  • वरिष्ठ अधिवक्ता एस मुरलीधर ने कहा कि लगभग 80 वर्षों से आधिकारिक उद्देश्यों के लिए वंदे मातरम के पहले दो छंद ही माने जाते रहे।
  • कोर्ट ने याचिका सॉलिसिटर जनरल को देने का निर्देश दिया और केंद्र को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया।

समयरेखा

  1. 1971राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम लागू, जिसमें "राष्ट्रीय गीत" का कोई उल्लेख नहीं था।
  2. 1986बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रगान न गाने वाले तीन यहोवा विटनेस छात्रों को संरक्षण दिया।
  3. 2026संशोधन द्वारा अधिनियम की धारा 3 में "राष्ट्रीय गीत" जोड़ा गया; गृह मंत्रालय ने छह छंदों वाला संस्करण निर्धारित किया।
  4. मंगलवार (सुनवाई का दिन)सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय गीत के चयन पर विचार से इनकार किया, दंडात्मक प्रावधानों की जांच पर सहमति दी, केंद्र को दो सप्ताह दिए।

किसका दाँव

  • टी एम कृष्णा (याचिकाकर्ता) — कर्नाटक गायक व रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता; संशोधन और गृह मंत्रालय निर्देशों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है।
  • सुप्रीम कोर्ट की पीठ (सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस बागची, जस्टिस मोहना) — राष्ट्रीय प्रतीक के चयन और उसमें अनिवार्य भागीदारी के बीच संवैधानिक रेखा तय करना।
  • केंद्र सरकार / गृह मंत्रालय — संशोधन और छह छंदों वाले निर्देशों का बचाव; दो सप्ताह में जवाब दाखिल करना है।
  • सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता — संसद के विधायी अधिकार का बचाव; "नक्सलवादी" शब्द के प्रयोग पर मुरलीधर ने आपत्ति जताई।
  • अंतरात्मा के आधार पर इनकार करने वाले नागरिक व गैर-हिंदू नागरिक — याचिका के अनुसार अनिवार्य गायन से धर्म व अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा समानता प्रभावित; कोर्ट ने अभियोजन से छूट का संकेत दिया।

क्यों अहम है

यह मामला इस मूल संवैधानिक प्रश्न को छूता है कि राज्य राष्ट्रीय प्रतीक चुन सकता है, लेकिन क्या वह आपराधिक विधि के जरिये उसमें भागीदारी को बाध्यकारी बना सकता है। कोर्ट का यह संकेत कि बिजो इमैनुएल (1986) की विधि लागू रहेगी, अनुच्छेद 25-26 के तहत अंतरात्मा की स्वतंत्रता को दंडात्मक कानून से बचाने की दिशा तय करता है। साथ ही यह प्रश्न भी खुला है कि कार्यपालिका के कार्यालय ज्ञापन आपराधिक दायित्व का आधार बन सकते हैं या नहीं।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 — 2026 संशोधन ने धारा 3 में "राष्ट्रीय गीत" जोड़ा; सजा तीन वर्ष तक कारावास/जुर्माना/दोनों।
  • बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986): यहोवा विटनेस छात्रों का राष्ट्रगान न गाना अनादर नहीं; निष्कासन का आधार नहीं बन सकता।
  • अनुच्छेद 25 व 26: धर्म की स्वतंत्रता तथा धार्मिक संस्थाओं के अधिकार — पीठ ने इनका उल्लंघन होने पर दंडात्मक परिणाम से इनकार किया।
  • याचिकाकर्ता टी एम कृष्णा — कर्नाटक संगीत गायक, लेखक और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता।
  • छह छंद वाले वंदे मातरम के अंतिम चार छंदों में दुर्गा, लक्ष्मी व सरस्वती के संदर्भ (याचिका का दावा)।
  • पीठ का कथन: "प्रथा और प्रयोग से राष्ट्रीय गीत सदैव वंदे मातरम के रूप में समझा गया है।"

मेन्स दृष्टिकोण

वंदे मातरम विवाद राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान और उनकी अभिव्यक्ति में बाध्य भागीदारी के बीच के अंतर को उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में राष्ट्रीय भावनाओं व आकांक्षाओं को स्वर देने के लिए निर्वाचित राज्य ही सर्वोत्तम स्थिति में है और अदालत इसका पुनर्मूल्यांकन नहीं करेगी; किंतु 2026 संशोधन द्वारा धारा 3 में जोड़े गए दंडात्मक परिणाम न्यायिक जांच के दायरे में हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि दंडात्मक कानून में "राष्ट्रीय गीत" को परिभाषित किए बिना जोड़ना, और कार्यपालिका के निर्देश (कार्यालय ज्ञापन) के आधार पर छह छंदों का अनिवार्य गायन, समानता, धार्मिक स्वतंत्रता, वाक्-स्वतंत्रता तथा भेदभाव-विरोधी अधिकारों का उल्लंघन है और गैर-हिंदू नागरिकों पर असमान प्रभाव डालता है; साथ ही लगभग 80 वर्षों की परिपाटी दो छंदों की रही है। आगे का रास्ता बिजो इमैनुएल (1986) के सिद्धांत में निहित दिखता है — प्रतीक का चयन राज्य का, पर अंतरात्मा के आधार पर इनकार करने वाले पर अभियोजन नहीं; और राष्ट्रीय प्रतीकों का विकास बाध्यता की जगह सार्वजनिक सहमति से हो, जैसा मुरलीधर ने तर्क दिया। केंद्र का जवाब दो सप्ताह में अपेक्षित है।

मुख्य शब्द

राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971
राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान को दंडनीय बनाने वाला कानून; मूल रूप में इसमें "राष्ट्रीय गीत" का उल्लेख नहीं था।
2026 संशोधन
अधिनियम की धारा 3 को प्रतिस्थापित कर राष्ट्रगान के साथ राष्ट्रीय गीत को भी आपराधिक संरक्षण देने वाला संशोधन।
अंतरात्मा के आधार पर इनकार करने वाला (conscientious objector)
वह व्यक्ति जो सच्ची धार्मिक या नैतिक मान्यता के कारण गायन जैसी भागीदारी से इनकार करता है; पीठ के अनुसार उस पर मुकदमा नहीं चलेगा।
बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986)
सुप्रीम कोर्ट का फैसला जिसमें राष्ट्रगान न गाने वाले यहोवा विटनेस बच्चों के निष्कासन को अवैध ठहराया गया।
गृह मंत्रालय के निर्देश
विशिष्ट सरकारी, औपचारिक व सांस्कृतिक अवसरों पर वंदे मातरम के पूरे छह छंदों का गायन निर्धारित करने वाले कार्यपालिका निर्देश।

अभ्यास प्रश्न

  1. राष्ट्रीय प्रतीकों के चयन का अधिकार राज्य के पास होने और उनमें भागीदारी को आपराधिक कानून से बाध्य करने के बीच संवैधानिक अंतर की विवेचना करें।
  2. बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986) के आलोक में अनुच्छेद 25 और 26 के तहत अंतरात्मा की स्वतंत्रता की सीमाओं का परीक्षण कीजिए।
  3. क्या कार्यपालिका के कार्यालय ज्ञापन आपराधिक दायित्व का आधार बन सकते हैं? टी एम कृष्णा की याचिका के संदर्भ में तर्क दें।

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