'नक्सली' टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट में मेहता और मुरलीधर के बीच तकरार
वंदे मातरम मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता एस मुरलीधर के बीच तीखी बहस हुई। मेहता ने कहा कि कानून निर्माण 'नक्सलियों की सोच' के अनुसार नहीं हो सकता, जिस पर मुरलीधर ने कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि वह इस शब्द को रिकॉर्ड पर नहीं लेगा और केवल संवैधानिक व्याख्या तक सीमित रहेगा। सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ गायक टीएम कृष्णा की याचिका सुन रही थी, जिसमें राष्ट्रीय गौरव अधिनियम में 2026 के संशोधन को चुनौती दी गई है।
स्रोत
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- A Bench of CJI Surya Kant and Justices Joymalya Bagchi and V Mohana heard TM Krishna's plea against the 2026 amendment to the Prevention of Insults to National Honour Act. — Attributed to the source's hearing report; names and bench composition appear in source.
- SG Tushar Mehta said law-making cannot be as per 'Naxalites' idea', and Senior Advocate S Muralidhar objected strongly. — Direct quotes attributed to both counsel in the source's live account.
- The Court said it would not take the word on record and was confining itself to a legal issue. — Quoted oral observation in source; not a written order.
- The amended law provides up to three years' imprisonment, fine or both for intentionally preventing singing of the National Anthem or National Song. — Figure appears in source as description of the 2026 amendment.
- The plea says stanzas 3 to 6 are devotional and invoke Durga, Lakshmi and Saraswati, and cites Bijoe Emmanuel (1986). — Attributed to the petition as reported; petitioner's contention, not a court finding.
विश्लेषकों की राय राय
यह केवल कानूनी बहस नहीं थी, बल्कि वंदे मातरम् से जुड़ी राजनीति का अदालत के भीतर पहुँच जाना था। "नक्सलियों की सोच" जैसे शब्द का प्रयोग और उससे भी अधिक उसे वापस न लेना, उस परिचित राजनीतिक ढाँचे की झलक देता है जिसमें राष्ट्रीय प्रतीकों पर सवाल उठाने को शत्रु विचारधारा बता दिया जाता है। दूसरी ओर, "संसद में हारे लोग अब कोर्ट आ रहे हैं" वाला तर्क भी बहुमत वाली सरकारों की सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया है। पीठ ने उस शब्द को रिकॉर्ड पर न लेकर और "शुद्ध संवैधानिक व्याख्या" तक सीमित रहने की बात कहकर स्पष्ट संकेत दिया कि वह इस मामले को राजनीतिक मैदान बनने नहीं देना चाहती।
- बहस को राष्ट्रभक्ति बनाम राष्ट्रविरोध के रूप में पेश करना सरकार के लिए राजनीतिक रूप से सुविधाजनक है, जबकि याचिकाकर्ता पक्ष इसे कानून बनाने की प्रक्रिया का सवाल बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
- "संसद में आपत्ति जताई, अब यहाँ ले आए" वाली दलील उस सरकारी लाइन को दर्शाती है जो न्यायिक समीक्षा के मुकाबले विधायी बहुमत को ऊपर रखती है।
- शब्द दोहराना और खेद न जताना — मुरलीधर के विरोध के अनुसार गैलरी के लिए खेलना — दिखाता है कि लाइव प्रसारण के दौर में अदालती बहसें राजनीतिक संदेश भी बन जाती हैं।
- एक पूर्व हाई कोर्ट मुख्य न्यायाधीश और भारत के सॉलिसिटर जनरल के बीच यह टकराव विधि जगत और कार्यपालिका के बीच बढ़ते तनाव का संकेत है।
- नोटिस जारी करने से "सनसनी" फैलेगी, यह अनुरोध बताता है कि केंद्र इस मुकदमे को तकनीकी से अधिक राजनीतिक रूप से संवेदनशील मानता है।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि कोर्ट नोटिस जारी करती है या नहीं, केंद्र छह छंदों वाले निर्देशों पर स्पष्टीकरण देता है या नहीं, और विपक्ष तथा सांस्कृतिक जगत "नक्सली" टिप्पणी को राजनीतिक मुद्दा बनाते हैं या नहीं।
यह खबर न मामले का परिणाम बताती है, न यह कि अंततः नोटिस जारी हुआ या नहीं, और न किसी राजनीतिक दल की प्रतिक्रिया — यह केवल एक सुनवाई में हुई तीखी नोकझोंक का विवरण है।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 5 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
कर्नाटक संगीत के गायक टी एम कृष्णा ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में 2026 में किए गए संशोधन की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। संशोधन के तहत राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के गायन को जानबूझकर रोकने या गायन में लगी सभा में बाधा डालने पर तीन साल तक की कैद का प्रावधान है। गृह मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार निर्दिष्ट सरकारी, औपचारिक और सांस्कृतिक अवसरों पर वंदे मातरम के पूरे छह छंद गाए जाने हैं। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा 'नक्सली' शब्द के प्रयोग पर वरिष्ठ अधिवक्ता एस मुरलीधर से तीखी बहस हुई।
मुख्य तथ्य
- सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई मंगलवार को हुई; रिपोर्ट 22 सितंबर 2026 को प्रकाशित।
- पीठ में सीजेआई सूर्य कांत तथा जस्टिस जयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना शामिल थे।
- याचिका राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 में 2026 के संशोधन को चुनौती देती है।
- संशोधित कानून में राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत के गायन को जानबूझकर रोकने पर 3 साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
- याचिका के अनुसार छंद 3 से 6 भक्तिपरक हैं और दुर्गा, लक्ष्मी तथा सरस्वती जैसे देवी-देवताओं का उल्लेख करते हैं।
- याचिका अनुच्छेद 14, 15(1), 19(1)(a), 21 और 25(1) के आधार पर चुनौती देती है।
- याचिका 1986 के बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल राज्य फैसले पर भरोसा करती है, जिसमें राष्ट्रगान न गाने वाले स्कूली बच्चों को संरक्षण मिला था।
- याचिका में कांग्रेस कार्य समिति के 1937 के निर्णय का हवाला है, जिसमें मुस्लिम सदस्यों की आपत्ति के बाद राष्ट्रीय सभाओं में पहले दो छंद तक सीमित रखने का तय हुआ।
समयरेखा
- 1937कांग्रेस कार्य समिति ने मुस्लिम सदस्यों की आपत्तियों के बाद राष्ट्रीय सभाओं में वंदे मातरम के पहले दो छंद तक सीमित रखने का निर्णय लिया (याचिका के अनुसार)।
- 1971राष्ट्रीय प्रतीकों की रक्षा करने वाला राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम लागू।
- 1986बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल राज्य में सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान न गाने वाले बच्चों को संरक्षण दिया।
- 2026अधिनियम की धारा 3 में संशोधन; गृह मंत्रालय ने निर्दिष्ट अवसरों पर पूरे छह छंद गाने के निर्देश जारी किए।
- 22 सितंबर 2026 (मंगलवार की सुनवाई पर रिपोर्ट)सुप्रीम कोर्ट में टी एम कृष्णा की याचिका पर सुनवाई; मेहता और मुरलीधर के बीच 'नक्सली' शब्द पर तकरार।
किसका दाँव
- टी एम कृष्णा (कर्नाटक गायक, याचिकाकर्ता) — दंडात्मक प्रावधान के तहत छह छंद गाने की बाध्यता को अभिव्यक्ति और अंतःकरण की स्वतंत्रता का उल्लंघन बताते हैं।
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (केंद्र की ओर से) — तर्क दिया कि निर्णय संसद करती है और यही संवैधानिक तरीका है; कोर्ट से नोटिस जारी न करने का आग्रह किया।
- वरिष्ठ अधिवक्ता एस मुरलीधर (याचिकाकर्ता के वकील, पूर्व ओडिशा हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश) — 'नक्सली' शब्द पर कड़ी आपत्ति; तर्क कि संशोधन में राष्ट्रगीत परिभाषित नहीं है और कानून-निर्माण प्रक्रिया दोषपूर्ण है।
- सुप्रीम कोर्ट की पीठ (सीजेआई सूर्य कांत, जस्टिस बागची, जस्टिस मोहना) — कहा कि 'नक्सली' शब्द रिकॉर्ड पर नहीं लिया जाएगा और सुनवाई शुद्ध संवैधानिक व्याख्या तक सीमित रहेगी।
- गृह मंत्रालय — निर्दिष्ट सरकारी, औपचारिक और सांस्कृतिक अवसरों पर छह छंदों वाले पूर्ण संस्करण के निर्देश जारी करने वाला प्राधिकरण।
- धार्मिक अल्पसंख्यक और अंतःकरण के आधार पर आपत्ति करने वाले नागरिक — याचिका के अनुसार यह उपाय बहुसंख्यकवादी संकेत देता है और उन पर अभिव्यक्तिगत अधीनता थोपता है।
क्यों अहम है
यह मामला इस मूल प्रश्न को उठाता है कि क्या राज्य आपराधिक दंड के बल पर नागरिकों से किसी राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति सहमति का अनुष्ठान करा सकता है, और इसका अनुच्छेद 19(1)(a), 21 तथा 25(1) से सीधा टकराव है। साथ ही अदालत में सरकार के विधि अधिकारी द्वारा याचिकाकर्ता की दलील को 'नक्सली सोच' कहना न्यायिक शिष्टाचार और असहमति की जगह पर बहस को जन्म देता है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 — राष्ट्रीय प्रतीकों की रक्षा करने वाला कानून; चुनौती धारा 3 के 2026 संशोधन को।
- 2026 संशोधन में राष्ट्रगान/राष्ट्रगीत का गायन रोकने पर 3 वर्ष तक कैद, जुर्माना या दोनों।
- बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986) — राष्ट्रगान न गाने वाले स्कूली बच्चों के पक्ष में फैसला।
- वंदे मातरम बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास 'आनंदमठ' से जुड़ा; छंद 3 से 6 बाद में जोड़े गए (याचिका का कथन)।
- याचिका में उद्धृत अनुच्छेद: 14 (समता), 15(1) (भेदभाव से संरक्षण), 19(1)(a), 21, 25(1)।
- पीठ: सीजेआई सूर्य कांत, जस्टिस जयमाल्य बागची, जस्टिस वी मोहना।
मेन्स दृष्टिकोण
टी एम कृष्णा की याचिका राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और व्यक्तिगत अंतःकरण की स्वतंत्रता के बीच के तनाव को रेखांकित करती है। याचिका का मुख्य तर्क यह है कि 2026 का संशोधन 'राष्ट्रगीत' को परिभाषित किए बिना उसके गायन में बाधा को तीन वर्ष तक की कैद से दंडनीय बनाता है, और गृह मंत्रालय के निर्देश छह छंदों के पूर्ण गायन को अनिवार्य कर देते हैं — जिनमें छंद 3 से 6, याचिका के अनुसार, दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे देवी-देवताओं के उल्लेख के कारण भक्तिपरक और गैर-धर्मनिरपेक्ष हैं। इससे प्रोटोकॉल का विनियमन 'अनिवार्य रूढ़िवाद' में बदल जाता है, जो अनुच्छेद 19(1)(a), 21 और 25(1) के दायरे में आता है; बिजॉय इमैनुएल (1986) का उदाहरण दिखाता है कि सम्मानपूर्वक मौन रहना भी संरक्षित हो सकता है। दूसरी ओर सरकार का पक्ष है कि विधायी निर्णय संसद का क्षेत्र है और संसद में पराजित आपत्तियाँ अदालत में नहीं लाई जानी चाहिए। आगे का रास्ता यह है कि अदालत शुद्ध संवैधानिक व्याख्या तक सीमित रहते हुए परखे कि दंडात्मक प्रावधान की परिभाषात्मक अस्पष्टता और आनुपातिकता टिकती है या नहीं, तथा कार्यपालिका कार्यालय ज्ञापनों के सहारे दंडात्मक कानून को अर्थ देने से बचे; साथ ही विधि अधिकारियों द्वारा खुली अदालत में लांछनात्मक शब्दावली से परहेज़ संस्थागत मर्यादा के लिए आवश्यक है।
मुख्य शब्द
- राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971
- राष्ट्रीय प्रतीकों की रक्षा करने वाला कानून, जिसकी धारा 3 में 2026 का विवादित संशोधन हुआ।
- सॉलिसिटर जनरल
- भारत सरकार का विधि अधिकारी, जो अदालतों में केंद्र का पक्ष रखता है; वर्तमान में तुषार मेहता।
- बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986)
- सुप्रीम कोर्ट का फैसला जिसमें धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान न गाने वाले, पर सम्मानपूर्वक खड़े रहने वाले बच्चों को संरक्षण मिला।
- कार्यालय ज्ञापन (ऑफिस मेमोरैंडम)
- प्रशासनिक निर्देश; मुरलीधर की आपत्ति कि दंडात्मक कानून का अर्थ इसके सहारे तय नहीं किया जा सकता।
- आनंदमठ
- बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास, जिसमें वंदे मातरम को शामिल करते समय याचिका के अनुसार शेष चार छंद जोड़े गए।
- नोटिस जारी करना
- याचिका पर विपक्षी पक्ष से जवाब मांगने की न्यायिक प्रक्रिया; एसजी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इससे 'सनसनी' फैलेगी।
अभ्यास प्रश्न
- क्या आपराधिक दंड के माध्यम से किसी राष्ट्रीय प्रतीक के गायन को अनिवार्य बनाना अनुच्छेद 19(1)(a) और 25(1) के अनुरूप है? बिजॉय इमैनुएल (1986) के आलोक में परीक्षण करें।
- राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में 2026 के संशोधन पर उठाई गई परिभाषात्मक अस्पष्टता और आनुपातिकता की आपत्तियों का मूल्यांकन कीजिए।
- अदालत में सरकार के विधि अधिकारियों से अपेक्षित मर्यादा क्या है, और असहमति को विचारधारात्मक लांछन देने का न्यायिक प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ता है?
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
