बदलती दुनिया में भारत को लचीलापन जरूरी: संजीव सान्याल
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) के सदस्य संजीव सान्याल ने फर्स्टपोस्ट से कहा कि पुरानी वैश्विक व्यवस्था बिखर रही है और नई अभी बनी नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत को बहु-संरेखण के तहत लचीला रहना होगा और मुद्दे के अनुसार क्वाड, ब्रिक्स, यूरोपीय संघ या ग्लोबल साउथ के साथ काम करना होगा। तेल कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर और अमेरिकी टैरिफ अनिश्चितता का हवाला देते हुए उन्होंने 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि को बहुत अच्छा बताया और कहा कि करीब 7 प्रतिशत वृद्धि बनाए रखना मजबूत परिणाम होगा।
स्रोत
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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- India recorded 7.8% GDP growth, which Sanyal calls 'very good' while saying around 7% would be a strong outcome. — Figure appears in source, attributed to Sanjeev Sanyal, EAC-PM member, in a Firstpost interview.
- Oil prices are well above $100 per barrel. — Stated by Sanyal in the interview; no independent data or date cited in the source.
- China will struggle to grow 4% and the US 2%. — Sanyal's own projection; no source or agency data given.
- Nearly 10 million Indians live in the Middle East and send large remittances. — Asserted by Sanyal without a cited data source.
- Press Note 3 was significantly changed about six months to a year ago. — Sanyal's recollection, stated with uncertainty about timing; unverified in source.
विश्लेषकों की राय राय
सान्याल की बातों का मुख्य आर्थिक संदेश यही है कि भारत की वृद्धि दर अब पूरी तरह भारत के हाथ में नहीं है — तेल की कीमतें, शुल्क और युद्ध उसे काफी हद तक तय कर रहे हैं। 7.8 प्रतिशत के आंकड़े को असाधारण बताते हुए भी आगे 7 प्रतिशत के आसपास टिकना बड़ी उपलब्धि कहना दरअसल अपेक्षाओं को संतुलित करना है। 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर तेल और अमेरिकी शुल्कों की अनिश्चितता के बीच आयात बिल, महंगाई और निर्यात ऑर्डर तीनों दबाव में हैं — इसलिए 'बहु-संरेखण' यहां कूटनीतिक नारा नहीं, लागत संभालने की आर्थिक रणनीति है।
- बड़े ऊर्जा आयातक के लिए 100 डॉलर से ऊपर तेल का मतलब है आयात बिल पर दबाव और ढुलाई व इनपुट लागत में बढ़ोतरी, जिसका एक हिस्सा अंततः उपभोक्ता कीमतों में दिखता है।
- रूसी तेल खरीद पर अमेरिकी शुल्क की धमकी सस्ती ऊर्जा को निर्यात बाजार के जोखिम के सामने खड़ा कर देती है — यह सीधा लागत बनाम बाजार-पहुंच का सौदा है।
- सान्याल पश्चिम एशिया से दोहरा जोखिम गिनाते हैं: वहां रहने वाले करीब एक करोड़ भारतीयों से आने वाला रेमिटेंस, और खाड़ी देशों को जाने वाला भारतीय खाद्य व अन्य निर्यात।
- नई जीडीपी श्रृंखला पर उनका तर्क मानक सांख्यिकीय समझ के अनुरूप है — आधार वर्ष बदलने पर जीडीपी का स्तर घट सकता है और मापी गई वृद्धि दर बढ़ सकती है; आलोचकों का संदेह पूरी तरह मिटने के लिए आंकड़ों को खुली जांच में टिकना होगा।
- यूपीआई एमडीआर पर उनकी 'कोई तो भुगतान करेगा' वाली बात सीधी अर्थशास्त्रीय सच्चाई है; व्यापारियों पर लगा शुल्क आंशिक रूप से उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है, पर उन्होंने खुद कहा कि उन्होंने इस पर काम नहीं किया है।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि तेल 100 डॉलर से ऊपर बना रहता है या नहीं और अमेरिकी शुल्क नीति पर स्पष्टता आती है या नहीं — आने वाली तिमाहियों में वृद्धि 7 प्रतिशत के आसपास टिकेगी या नहीं, यह इन्हीं से तय होगा; साथ ही एमडीआर दरों का ढांचा भी।
यह एक सलाहकार परिषद सदस्य का आकलन है, नीति नहीं — कहानी में न कोई संशोधित सरकारी वृद्धि अनुमान है, न शुल्क पर निर्णय, न एमडीआर दरों का ब्योरा, और उन्होंने स्वयं माना कि उनके पास एमडीआर के आंकड़े नहीं हैं।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 6 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) के सदस्य संजीव सान्याल ने फर्स्टपोस्ट को दिए विशेष साक्षात्कार में कहा कि दुनिया "विघटित" (disrupted) दौर में है, जहाँ पुरानी वैश्विक व्यवस्था टूट रही है और नई व्यवस्था अभी आकार नहीं ले पाई है। पश्चिम एशिया का संघर्ष, रूस-यूक्रेन युद्ध, रूसी तेल आयात पर ट्रंप की 100 प्रतिशत टैरिफ की धमकी और 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर तेल कीमतें भारत की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल रही हैं। इस पृष्ठभूमि में सान्याल भारत की "बहु-संरेखण" (multi-alignment) रणनीति, नई जीडीपी श्रृंखला, यूपीआई पर एमडीआर, चीन के साथ जुड़ाव और एआई नियमन पर अपने विचार रखते हैं।
मुख्य तथ्य
- सान्याल ने हाल की 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि को परिस्थितियों के हिसाब से "असाधारण रूप से अच्छा" बताया, पर कहा कि करीब 7 प्रतिशत वृद्धि बनाए रखना भी बहुत सराहनीय होगा।
- उनके अनुसार तेल कीमतें अभी 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर हैं, जो ऊर्जा के बड़े आयातक भारत पर सीधा असर डालती हैं।
- तुलना में उन्होंने कहा कि चीन 4 प्रतिशत वृद्धि पाने में संघर्ष करेगा और अमेरिका 2 प्रतिशत के लिए जूझ रहा है।
- पश्चिम एशिया में लगभग 1 करोड़ (10 मिलियन) भारतीय रहते हैं; उनकी सुरक्षा और प्रेषण (रेमिटेंस) भारत के लिए आकस्मिक जोखिम हैं।
- भारत की राष्ट्रीय लेखा श्रृंखला 2011 आधार पर थी; 2020, '21, '22 के आंकड़े असामान्य होने से आधार बदलने के लिए 2024 के आंकड़ों का इंतजार करना पड़ा।
- नई श्रृंखला से जीडीपी का डॉलर आकार घटा—रैंक तीसरे के करीब से गिरकर चौथे, संभवतः पाँचवें पर—पर वृद्धि दर बढ़ी।
- चीन से जुड़ाव पर उन्होंने कहा कि प्रेस नोट 3 में लगभग 6 महीने से एक साल पहले महत्वपूर्ण बदलाव किया गया।
- होर्मुज के साथ-साथ बाब-अल-मंदेब भी बाधित स्थिति में है, जिससे वैश्विक व्यापार मार्गों पर दबाव है।
समयरेखा
- 2011भारत की राष्ट्रीय लेखा (जीडीपी) श्रृंखला का पुराना आधार वर्ष, जिसकी समय पर अद्यतन न होने की आईएमएफ व अन्य आलोचकों ने शिकायत की।
- लगभग एक दशक पहलेयूपीआई जैसी भुगतान व्यवस्था को निःशुल्क रखने का निर्णय, ताकि इसका व्यापक प्रसार हो।
- 2020-2022कोविड व्यवधान के कारण ये वर्ष सामान्य नहीं रहे, इसलिए नए जीडीपी आधार के लिए अनुपयुक्त माने गए।
- 2024नए आधार वर्ष के निर्माण के लिए इन आंकड़ों का इंतजार किया गया; तब से नई श्रृंखला प्रयोग में है।
- लगभग 6 महीने से 1 वर्ष पहलेचीनी निवेश से जुड़े प्रेस नोट 3 में महत्वपूर्ण बदलाव किया गया।
- 23 सितंबर 2026 (प्रकाशन)फर्स्टपोस्ट में संजीव सान्याल का विशेष साक्षात्कार प्रकाशित।
किसका दाँव
- ईएसी-पीएम / संजीव सान्याल — आर्थिक सलाह और नीति-दिशा तय करने में भूमिका; लचीलापन व बहु-संरेखण की पैरवी।
- भारतीय अर्थव्यवस्था व नीति-निर्माता — ऊँची तेल कीमतों, टैरिफ अनिश्चितता और भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच करीब 7 प्रतिशत वृद्धि बनाए रखना।
- पश्चिम एशिया में बसे लगभग 1 करोड़ भारतीय — संघर्ष से उनकी सुरक्षा और भारत को भेजे जाने वाले प्रेषण पर जोखिम।
- अमेरिका (ट्रंप प्रशासन) — रूसी तेल आयात पर 100 प्रतिशत टैरिफ की धमकी, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव।
- व्यापारी व यूपीआई उपभोक्ता — एमडीआर लागू होने पर लागत किस पर पड़ेगी—व्यापारी या उपभोक्ता—यह सवाल।
- नीति आयोग व वित्त मंत्रालय — सान्याल के अनुसार एमडीआर से जुड़ी गणना और ट्रेड-ऑफ तय करने की जिम्मेदारी।
- कामगार व एआई-प्रभावित उद्योग — एआई से पुरानी नौकरियाँ खत्म होने और नई पैदा होने के बीच श्रम-बाजार लचीलापन।
क्यों अहम है
यह साक्षात्कार बताता है कि भारत की विदेश और आर्थिक नीति एक ही खेमे से बँधे रहने की जगह मुद्दा-आधारित साझेदारी (क्वाड, ब्रिक्स, यूरोपीय संघ, ग्लोबल साउथ) पर टिक रही है, क्योंकि पुरानी वैश्विक व्यवस्था बिखर रही है। साथ ही यह वृद्धि के आँकड़ों को परिप्रेक्ष्य देता है—100 डॉलर से ऊपर तेल और टैरिफ धमकियों के बीच 7 प्रतिशत के आसपास वृद्धि भी मजबूत नतीजा है। एआई और चीन पर उनका रुख नौकरियों की सुरक्षा बनाम तकनीक अपनाने की बुनियादी नीति-दुविधा को सामने रखता है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- ईएसी-पीएम: प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद; संजीव सान्याल इसके सदस्य हैं।
- बहु-संरेखण (multi-alignment): मुद्दे के अनुसार क्वाड, ब्रिक्स, यूरोपीय संघ या ग्लोबल साउथ के साथ काम करने की भारतीय नीति।
- होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब—दोनों प्रमुख ऊर्जा/व्यापार मार्ग स्रोत के अनुसार बाधित स्थिति में।
- जीडीपी आधार वर्ष 2011 से बदला गया; कोविड वर्षों (2020-22) के असामान्य आंकड़ों के कारण 2024 तक इंतजार करना पड़ा।
- प्रेस नोट 3: चीनी/पड़ोसी देशों के निवेश से जुड़ा नियम, जिसमें लगभग 6 महीने–1 वर्ष पहले बड़ा बदलाव हुआ।
- एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट): व्यापारी द्वारा दी जाने वाली भुगतान-प्रोसेसिंग फीस; यूपीआई पर इसे लागू करने पर बहस।
मेन्स दृष्टिकोण
विघटित वैश्विक व्यवस्था—पश्चिम एशिया का संघर्ष, रूस-यूक्रेन युद्ध का पुनः तीव्र होना, 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर तेल और रूसी तेल आयात पर अमेरिकी 100 प्रतिशत टैरिफ की धमकी—भारत के लिए एक साथ ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी कल्याण (पश्चिम एशिया में लगभग 1 करोड़ भारतीय), निर्यात और प्रेषण का जोखिम खड़ा करती है। सान्याल का तर्क है कि इस वातावरण में कठोर गुटबंदी की जगह बहु-संरेखण ही व्यावहारिक रास्ता है, भले यह अधिक श्रमसाध्य हो; आर्थिक मोर्चे पर लक्ष्य-आधारित सोच की जगह "सड़क की स्थिति" के अनुसार चलना, अर्थात 7 प्रतिशत के आसपास वृद्धि बनाए रखना ही सफलता है—विशेषकर जब चीन 4 और अमेरिका 2 प्रतिशत के लिए जूझ रहे हैं। आगे की राह के तीन संकेत उभरते हैं: बफर और लचीलापन बनाना (नीति-निर्माताओं द्वारा किया गया प्रयास), चीन के साथ चयनात्मक जुड़ाव जिसमें दूरसंचार-सेमीकंडक्टर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में नियंत्रण न जाए जबकि सामान्य व्यापार चलता रहे, और एआई का ऐसा नियमन जो दुरुपयोग रोके व "मानव इन द लूप" रखे, पर पुरानी नौकरियाँ बचाने के नाम पर तकनीक को न रोके—क्योंकि श्रम-बाजार लचीलापन ही नई नौकरियों का रास्ता खोलेगा।
मुख्य शब्द
- ईएसी-पीएम
- प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद, जिसके सदस्य के रूप में संजीव सान्याल ने यह साक्षात्कार दिया।
- बहु-संरेखण (Multi-alignment)
- किसी एक गुट से बँधने के बजाय मुद्दे और संदर्भ के अनुसार विभिन्न समूहों/देशों के साथ साझेदारी करने की नीति।
- एमडीआर
- मर्चेंट डिस्काउंट रेट—डिजिटल भुगतान स्वीकारने पर व्यापारी से ली जाने वाली फीस; यूपीआई अब तक निःशुल्क रहा है।
- प्रेस नोट 3
- विदेशी निवेश से जुड़ा नियम, जिसमें स्रोत के अनुसार लगभग 6 महीने से एक साल पहले महत्वपूर्ण बदलाव किया गया।
- नई जीडीपी श्रृंखला
- 2011 आधार की जगह नया आधार; पुराने क्षेत्रों का भार घटने से जीडीपी का स्तर घटा पर वृद्धि दर बढ़ी।
- लडाइट तर्क (Luddite argument)
- नई तकनीक का विरोध करके पुरानी तकनीक में बँधे रहने की सोच, जिसके खिलाफ सान्याल ने चेताया।
अभ्यास प्रश्न
- "विघटित वैश्विक व्यवस्था" में भारत की बहु-संरेखण नीति किस हद तक व्यावहारिक है? ऊर्जा सुरक्षा और टैरिफ दबाव के उदाहरणों से समझाइए।
- जीडीपी के आधार वर्ष में बदलाव से वृद्धि दर और अर्थव्यवस्था के डॉलर आकार पर विपरीत असर क्यों पड़ता है? आलोचनाओं का मूल्यांकन कीजिए।
- एआई के नियमन में "नौकरियाँ बचाना" बनाम "श्रम-बाजार लचीलापन"—भारत के लिए संतुलित दृष्टिकोण क्या होना चाहिए?
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
