एससी-एसटी अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के प्रमुख प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि 2020 के प्रथ्वीराज चौहान मामले में तीन-न्यायाधीशों की पीठ पहले ही पर्याप्त सुरक्षा उपाय तय कर चुकी है। बृजभूषण सैनी के नेतृत्व में 19 लोगों ने अग्रिम जमानत रोकने वाली धारा 18 और 18ए को चुनौती दी थी। पीठ ने कहा, दुरुपयोग के मामले अलग से देखे जा सकते हैं।

स्रोत

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Supreme Court on Tuesday dismissed a challenge to the constitutional validity of provisions of the SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989. — Attributed to a bench headed by CJI Surya Kant, with direct quotes cited in the source.
  • Safeguards were already laid down by a three-judge bench in the Prathviraj Chauhan case (2020). — Quoted directly from the bench; case name and year appear in source.
  • The PIL was filed by 19 people led by Brijbhushan Saini, who claimed to be victims of false prosecutions. — Figure and name appear in source; the claim of false prosecution is the petitioners' own assertion.
  • Sections 18 and 18A deny anticipatory bail and bar prior police enquiry before FIR registration. — Described in source and echoed in petitioners' counsel's arguments; presented as the legal position, not independently verified.
  • The August 2024 Shajan Skaria judgment held the Section 18 bar applies only where prima facie material exists. — Attributed to the bench's reference in the source; figure/date appears in source.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

एससी-एसटी अधिनियम के कड़े प्रावधानों को दी गई चुनौती को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज करना राजनीतिक रूप से उन सभी दलों के लिए राहत है जो दलित और आदिवासी मतदाताओं पर नज़र रखते हैं। अतीत में इस कानून को कमज़ोर करने की कोशिश पर देशव्यापी विरोध और फिर संसदीय संशोधन हुआ था, इसलिए यह मुद्दा कभी केवल अदालत तक सीमित नहीं रहा। पीठ का यह कहना कि दुरुपयोग के मामलों को अलग से देखा जा सकता है, पर वह कानून की वैधता पर संदेह का आधार नहीं — दोनों पक्षों को कुछ न कुछ देता है।

  • यह आदेश दलित-आदिवासी संगठनों और उनके राजनीतिक प्रतिनिधियों के लिए स्पष्ट जीत है, जिनके पास अब यह संदेश तैयार है कि कानून कमज़ोर नहीं हुआ।
  • याचिका को 'कथित रूप से जनहित में' बताकर कोर्ट ने भविष्य की ऐसी चुनौतियों की राजनीतिक और कानूनी गुंजाइश घटा दी है।
  • दूसरी ओर, प्रथ्वीराज चौहान और शाजन स्कारिया फैसलों की सुरक्षा-व्यवस्थाओं का उल्लेख कर कोर्ट ने 'झूठे मुकदमों' की शिकायत उठाने वालों के लिए दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं किया।
  • बहस अब निरस्तीकरण से हटकर अमल और छानबीन की गुणवत्ता की ओर जा सकती है — तमिलनाडु में जागरूकता से मामले घटने वाले संदर्भ में यही संकेत है।
  • केंद्र और राज्य सरकारों के लिए यह कम लागत वाला नतीजा है: कानून के बचाव का भार न्यायपालिका ने उठाया, राजनीतिक कीमत चुकाने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

किस पर नज़र रखें — देखना यह है कि दल चुनावी संदेश में इस फैसले का कैसे उपयोग करते हैं, और क्या दुरुपयोग के व्यक्तिगत दावे अब हाई कोर्टों में केस-दर-केस याचिकाओं के रूप में पहुँचते हैं।

यह खबर न यह स्थापित करती है कि दुरुपयोग कितना व्यापक है, न याचिकाकर्ताओं के झूठे मुकदमों के दावों की पुष्टि करती है, और इसमें किसी दल की आधिकारिक प्रतिक्रिया दर्ज नहीं है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 7 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 दलितों और आदिवासियों के विरुद्ध अत्याचारों से निपटने के लिए बनाया गया विशेष कानून है, जिसमें 2015 और 2018 में संशोधन किए गए। इसकी धारा 18 और 18ए अग्रिम जमानत पर रोक लगाती हैं और एफआईआर दर्ज करने से पहले पुलिस द्वारा प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं रखतीं। कथित झूठे मुकदमों के पीड़ित होने का दावा करने वाले 19 लोगों ने इन प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को जनहित याचिका के रूप में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यह याचिका खारिज कर दी और कहा कि पहले के फैसलों में तय सुरक्षा उपाय दुरुपयोग रोकने के लिए पर्याप्त हैं।

मुख्य तथ्य

  • सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के प्रमुख प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी।
  • पीठ की अध्यक्षता सीजेआई सूर्यकांत ने की; इसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना भी शामिल थे।
  • पीठ ने कहा कि 2020 के प्रथ्वीराज चौहान मामले में तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने पर्याप्त सुरक्षा उपाय तय कर दिए हैं।
  • याचिका बृजभूषण सैनी के नेतृत्व में 19 लोगों ने दायर की थी, जिन्होंने कानून के तहत झूठे मुकदमों का शिकार होने का दावा किया।
  • चुनौती धारा 18 और 18ए को दी गई थी, जो अग्रिम जमानत से इनकार करती हैं और एफआईआर से पहले पुलिस जांच की आवश्यकता नहीं रखतीं।
  • अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने कहा कि धारा 18ए का व्यापक दुरुपयोग हो रहा है और यह बीएनएसएस, 2023 की धारा 35 को प्रभावित करती है।
  • पीठ ने कहा, "दुरुपयोग के उदाहरणों को अदालत अलग से देख सकती है, लेकिन यह अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर संदेह का आधार नहीं हो सकता।"
  • अगस्त 2024 के शजन स्कारिया फैसले के अनुसार धारा 18 की रोक केवल तब लागू होगी जब अपराध का प्रथम दृष्टया सामग्री मौजूद हो।

समयरेखा

  1. 1989अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम लागू।
  2. 2015अधिनियम में संशोधन।
  3. 2018अधिनियम में दूसरा संशोधन (धारा 18ए संबंधित प्रावधान)।
  4. 2020प्रथ्वीराज चौहान मामले में तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने सुरक्षा उपाय तय किए — प्रथम दृष्टया मामला न बनने पर धारा 18 व 18ए की रोक लागू नहीं होगी।
  5. 2023भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) ने दंड प्रक्रिया संहिता का स्थान लिया।
  6. अगस्त 2024शजन स्कारिया मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला — धारा 18 की रोक केवल प्रथम दृष्टया सामग्री होने पर।
  7. मंगलवार (हाल में)सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने बृजभूषण सैनी व 19 याचिकाकर्ताओं की जनहित याचिका खारिज की।

किसका दाँव

  • सुप्रीम कोर्ट (सीजेआई सूर्यकांत की पीठ) — अधिनियम की संवैधानिक वैधता बनाए रखना और दुरुपयोग के मामलों को अलग से देखने का रास्ता खुला रखना।
  • अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति समुदाय — अत्याचारों के विरुद्ध कड़े कानूनी संरक्षण की निरंतरता।
  • बृजभूषण सैनी व 19 याचिकाकर्ता — कानून के तहत कथित झूठे मुकदमों से राहत; याचिका खारिज होने से संवैधानिक चुनौती असफल।
  • अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन — याचिकाकर्ताओं की ओर से धारा 18ए के दुरुपयोग और बीएनएसएस की धारा 35 पर उसके प्रभाव का तर्क।
  • पुलिस/जांच एजेंसियां — प्रारंभिक जांच के बिना एफआईआर दर्ज करने और गिरफ्तारी के अधिकार का दायरा।
  • अभियुक्त व्यक्ति — अग्रिम जमानत की उपलब्धता; प्रथम दृष्टया मामला न बनने पर न्यायालय से राहत का विकल्प।

क्यों अहम है

यह फैसला एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून के कड़े प्रावधानों को अक्षुण्ण रखता है और स्पष्ट करता है कि दुरुपयोग की शिकायतें कानून को असंवैधानिक ठहराने का आधार नहीं बन सकतीं। साथ ही यह संतुलन भी दोहराता है कि जहां प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता, वहां अग्रिम जमानत की रोक लागू नहीं होगी और संवैधानिक अदालतें मुकदमे रद्द कर सकती हैं। इससे वंचित समुदायों के संरक्षण और अभियुक्त की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच न्यायिक संतुलन का ढांचा और पुष्ट होता है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 — 2015 और 2018 में संशोधित।
  • धारा 18 व 18ए: अग्रिम जमानत पर रोक; एफआईआर से पहले प्रारंभिक जांच अनिवार्य नहीं।
  • प्रथ्वीराज चौहान मामला (2020): तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने सुरक्षा उपाय तय किए।
  • शजन स्कारिया मामला (अगस्त 2024): धारा 18 की रोक केवल प्रथम दृष्टया सामग्री होने पर लागू।
  • बीएनएसएस, 2023 की धारा 35: सात वर्ष तक की सजा वाले संज्ञेय अपराध में विश्वसनीय सूचना/उचित संदेह पर गिरफ्तारी।
  • पीठ: सीजेआई सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची, न्यायमूर्ति वी मोहना।

मेन्स दृष्टिकोण

एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 सामाजिक रूप से वंचित समूहों के विरुद्ध अत्याचारों की गंभीरता को देखते हुए कड़े प्रावधान रखता है — धारा 18 व 18ए अग्रिम जमानत पर रोक लगाती हैं और एफआईआर से पूर्व पुलिस जांच की अनिवार्यता हटाती हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह ढांचा बीएनएसएस, 2023 की धारा 35 के तहत शिकायत की विश्वसनीयता आंकने की पुलिस शक्ति को निष्प्रभावी करता है और व्यापक दुरुपयोग को जन्म देता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को संवैधानिक वैधता के प्रश्न से अलग किया — दुरुपयोग के व्यक्तिगत उदाहरण कानून को अवैध नहीं बनाते, और उपचार न्यायिक स्तर पर उपलब्ध है: प्रथ्वीराज चौहान (2020) के अनुसार प्रथम दृष्टया मामला न बनने पर धाराओं की रोक लागू नहीं होगी तथा असाधारण मामलों में संवैधानिक अदालतें मुकदमे रद्द कर सकती हैं; शजन स्कारिया (अगस्त 2024) ने भी यही सीमा दोहराई। आगे का रास्ता कानून को कमजोर करने में नहीं, बल्कि इन न्यायिक सुरक्षा उपायों के अनुशासित अनुपालन, एफआईआर व गिरफ्तारी में जवाबदेही और शीघ्र न्यायिक छानबीन में है, जिससे पीड़ितों का संरक्षण और अभियुक्त की स्वतंत्रता दोनों सुरक्षित रहें।

मुख्य शब्द

एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989
अनुसूचित जातियों व जनजातियों के विरुद्ध अत्याचार रोकने के लिए बनाया गया विशेष कानून; 2015 व 2018 में संशोधित।
धारा 18 / 18ए
अधिनियम के वे प्रावधान जो अग्रिम जमानत से इनकार करते हैं और एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं रखते।
प्रथ्वीराज चौहान मामला (2020)
तीन-न्यायाधीशों की पीठ का फैसला: प्रथम दृष्टया मामला न बनने पर धारा 18/18ए की रोक लागू नहीं; अदालतें मुकदमे रद्द कर सकती हैं।
शजन स्कारिया मामला (अगस्त 2024)
सुप्रीम कोर्ट का फैसला कि धारा 18 की अग्रिम जमानत रोक केवल तब लागू होगी जब अपराध की प्रथम दृष्टया सामग्री हो।
बीएनएसएस, 2023 की धारा 35
पुलिस को उचित शिकायत, विश्वसनीय सूचना या उचित संदेह पर सात वर्ष तक की सजा वाले संज्ञेय अपराध में गिरफ्तारी की अनुमति।
जनहित याचिका (पीआईएल)
जनहित में दायर याचिका; इस मामले में कोर्ट ने इसे "कथित रूप से जनहित" कहकर सुनने से इनकार किया।

अभ्यास प्रश्न

  1. एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 18 और 18ए के संदर्भ में वंचित समुदायों के संरक्षण और अभियुक्त की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर चर्चा कीजिए।
  2. "दुरुपयोग के उदाहरण किसी कानून की संवैधानिक वैधता पर संदेह का आधार नहीं हो सकते" — सुप्रीम कोर्ट के इस दृष्टिकोण का परीक्षण कीजिए।
  3. प्रथ्वीराज चौहान (2020) और शजन स्कारिया (2024) के फैसलों ने अग्रिम जमानत पर रोक की व्याख्या को कैसे आकार दिया है?

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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