मानसून 15 प्रतिशत कमी के साथ समाप्त, उपज पर चिंता

आईएमडी के आंकड़ों के अनुसार एक जून से 21 सितंबर के बीच देश में सामान्य 827.2 मिमी के मुकाबले 703.7 मिमी बारिश हुई, जो 15 प्रतिशत कम है। दक्षिण प्रायद्वीप में वर्षा सामान्य से 27 प्रतिशत कम रही, तेलंगाना में 21 और तटीय आंध्र प्रदेश में 37 प्रतिशत कम। आईआईटी गांधीनगर के सूखा मॉनिटर के मुताबिक देश का 52.5 प्रतिशत क्षेत्र सूखे की श्रेणी में है। बुवाई 110.4 मिलियन हेक्टेयर रही, जो 1.3 प्रतिशत कम है।

स्रोत

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • India received 703.7mm rain against a normal 827.2mm between June 1 and September 21, a 15% deficit. — Attributed in source to latest India Meteorological Department data.
  • India Drought Monitor places 52.5% of the country's area in the drought category; Maharashtra at 83.5%. — Attributed to the India Drought Monitor maintained by the Water and Climate Lab at IIT Gandhinagar.
  • Kharif sowing covered 110.4 million hectares, down 1.3% year-on-year, with paddy down 3.7% and maize down 2.2%. — Figures appear in source; sowing-share figures (98% of normal) attributed to a CRISIL report, acreage data unattributed.
  • 2026-27 kharif production target set at 176.16 million tonnes against 176.04 million tonnes in 2025-26. — Presented as the government's own target; no specific document cited in source.
  • Farmer Lal Singh Thakur of Pipla, Nagpur, invested Rs 40,000 and expects no earnings this year. — First-person account quoted directly in the source; not independently verifiable.

विश्लेषकों की राय राय

AI आर्थिक विश्लेषक

15 प्रतिशत मानसून की कमी बुवाई से ज़्यादा उत्पादकता की कहानी है — किसानों ने रकबा लगभग बनाए रखा (केवल 1.3 प्रतिशत घटकर, क्रिसिल के अनुसार सामान्य का 98 प्रतिशत), लेकिन जब फसल को पानी चाहिए था, तब वह नहीं मिला। समग्र आर्थिक असर सीमित दिखता है: सिंचाई कवरेज 2015-16 के 48.8 प्रतिशत से बढ़कर शुद्ध बोए गए क्षेत्र के करीब 60 प्रतिशत तक पहुंच गई है, और सरकार का 2026-27 खरीफ लक्ष्य 176.16 मिलियन टन पिछले साल के 176.04 मिलियन टन से मामूली ही ऊपर है, यानी उत्पादन स्थिर रहने का संकेत। चोट का बंटवारा असमान है — पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे सिंचित क्षेत्र लगभग बचे रहेंगे, जबकि वर्षा-आधारित महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश का किसान परिवार स्तर पर नुकसान उठाएगा, जैसा विदर्भ में सोयाबीन पर लगाए गए ₹40,000 के डूबने से दिखता है।

  • जोखिम रकबे से हटकर उत्पादकता पर आ गया है: बुवाई 110.4 मिलियन हेक्टेयर पर टिकी रही (1.3 प्रतिशत की गिरावट), इसलिए नुकसान खाली खेतों में नहीं, प्रति हेक्टेयर पैदावार में दिखेगा।
  • कीमतों के लिहाज़ से फसल-विशेष जोखिम अहम है: क्रिसिल ने कपास, बाजरा, मक्का, तुअर, मूंगफली और सोयाबीन को संवेदनशील बताया है, जो व्यापक खाद्य संकट के बजाय तिलहन और दलहन पर दबाव की ओर इशारा करता है।
  • अनाज की आपूर्ति सुरक्षित दिखती है — 2026-27 खरीफ विपणन सत्र के लिए 70.864 मिलियन टन का धान खरीद लक्ष्य हाल की खरीद से कम है, लेकिन एक पूर्व कृषि सचिव का आकलन है कि मौजूदा अधिशेष घरेलू ज़रूरत पूरी कर देगा।
  • बढ़ी हुई सिंचाई इस सीज़न का असली कवच है, और इसीलिए बोझ असिंचित छोटे किसानों पर असमान रूप से पड़ रहा है, जिन्हें घाटा अपनी जेब से सहना पड़ता है।
  • रबी पर असर कम आंका गया आर्थिक रास्ता है: सूखे बोरवेल का मतलब दूसरी फसल की आय का नुकसान और प्रभावित जिलों में कमज़ोर ग्रामीण मांग, खर्च तथा कृषि-इनपुट खरीद।

किस पर नज़र रखें — आने वाले हफ्तों में प्रायद्वीपीय कमी वाले राज्यों में रबी बुवाई और जलाशय स्तर, साथ ही तिलहन-दलहन के मंडी भाव पर नज़र रखें — इससे पता चलेगा कि यह स्थानीय आय झटका रहता है या खाद्य महंगाई में बदलता है।

यह खबर अंतिम उत्पादन या पैदावार के आंकड़े, फसल नुकसान की भरपाई का पैमाना, या उपभोक्ता कीमतों तक असर कितना पहुंचेगा, यह स्थापित नहीं करती — नुकसान के सर्वे अभी शुरू ही हुए हैं।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 6 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

दक्षिण-पश्चिम मानसून इस वर्ष देशभर में 15 प्रतिशत वर्षा की कमी के साथ समाप्ति की ओर है। आईएमडी के अनुसार 1 जून से 21 सितंबर के बीच सामान्य 827.2 मिमी के मुकाबले 703.7 मिमी बारिश दर्ज हुई। जून में भारी कमी, जुलाई में सुधार और अगस्त-सितंबर में फिर कमजोर वर्षा के कारण बुवाई क्षेत्र पर असर सीमित रहा, लेकिन उपज (यील्ड) पर जोखिम बढ़ गया है। नागपुर के विदर्भ जैसे वर्षा-आधारित क्षेत्रों में सोयाबीन जैसी फसलें सूखने और बोरवेल सूखने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

मुख्य तथ्य

  • आईएमडी: 1 जून से 21 सितंबर के बीच देश में 703.7 मिमी वर्षा, सामान्य 827.2 मिमी के मुकाबले 15% कम।
  • क्षेत्रीय कमी: दक्षिण प्रायद्वीप 27%, पूर्व व पूर्वोत्तर भारत 26%, उत्तर-पश्चिम भारत 10% कम।
  • उपक्षेत्रीय कमी: मराठवाड़ा 37%, तेलंगाना 21%, तटीय आंध्र प्रदेश 37%, कर्नाटक के तीन मुख्य उपखंडों में 28% से 32%।
  • आईआईटी गांधीनगर के वाटर एंड क्लाइमेट लैब के इंडिया ड्राउट मॉनिटर के अनुसार देश का 52.5% क्षेत्र सूखा श्रेणी में, 47.5% सामान्य; महाराष्ट्र में 83.5% क्षेत्र सूखा प्रभावित।
  • बुवाई 110.4 मिलियन हेक्टेयर, पिछले वर्ष से 1.3% कम; धान का क्षेत्र 3.7% और मक्का 2.2% घटा।
  • मासिक प्रवृत्ति: जून में लगभग 35.4% कमी, जुलाई में सामान्य से ~1% अधिक, अगस्त में ~16% कमी, सितंबर में कमजोर व असमान।
  • सरकार ने 2026-27 का खरीफ उत्पादन लक्ष्य 176.16 मिलियन टन रखा, जो 2025-26 के 176.04 मिलियन टन उत्पादन से मामूली अधिक।
  • 1 अक्टूबर से शुरू होने वाले खरीफ विपणन सत्र 2026-27 के लिए धान खरीद लक्ष्य 70.864 मिलियन टन, जबकि इस वर्ष 5 अगस्त तक 72.074 मिलियन टन खरीद हुई थी।

समयरेखा

  1. जूनमानसून वर्षा सामान्य से लगभग 35.4% कम रही।
  2. जुलाईवर्षा में सुधार, सामान्य से लगभग 1% अधिक; धान व गन्ना जैसी जल-गहन फसलों को राहत। लाल सिंह ठाकुर ने नागपुर के पिपला में तीन एकड़ में सोयाबीन बोया।
  3. 5 अगस्त (इस वर्ष)धान की खरीद 72.074 मिलियन टन तक पहुंची।
  4. अगस्तवर्षा की कमी फिर बढ़कर लगभग 16% हो गई।
  5. 1 जून से 21 सितंबरदेश में कुल 703.7 मिमी वर्षा, सामान्य से 15% कम (आईएमडी आंकड़े)।
  6. 1 अक्टूबरखरीफ विपणन सत्र 2026-27 की शुरुआत, धान खरीद लक्ष्य 70.864 मिलियन टन।

किसका दाँव

  • वर्षा-आधारित किसान (जैसे नागपुर के लाल सिंह ठाकुर) — 40,000 रुपये का निवेश डूबा; पिछले वर्ष 18 क्विंटल से करीब 1 लाख रुपये की आय हुई थी, इस बार लागत निकलने की उम्मीद नहीं।
  • महाराष्ट्र (विदर्भ, मराठवाड़ा) — 83.5% क्षेत्र सूखा प्रभावित; सोयाबीन उत्पादकता पर दबाव और रबी बुवाई अनिश्चित।
  • आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक — वर्षा पर अधिक निर्भरता के कारण उपज में सबसे अधिक गिरावट की आशंका।
  • पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश — सिंचित क्षेत्र होने के कारण उपज में बड़ी गिरावट की संभावना नहीं (पूर्व कृषि सचिव देवेश चतुर्वेदी)।
  • आईएमडी और आईआईटी गांधीनगर का इंडिया ड्राउट मॉनिटर — वर्षा व सूखे की निगरानी और आंकड़े, जिन पर नीतिगत आकलन आधारित है।
  • केंद्र सरकार — उत्पादन व खरीद लक्ष्य, खाद्य आपूर्ति और किसानों को सहायता से जुड़े निर्णय।
  • स्थानीय प्रशासन — फसल नुकसान के आकलन के लिए सर्वेक्षण शुरू किए गए हैं, पर किसान को सहायता मिलने की उम्मीद कम।

क्यों अहम है

देश के आधे से अधिक क्षेत्र (52.5%) के सूखा श्रेणी में आने का असर सीधे किसानों की आय, ग्रामीण मांग और खरीफ उपज पर पड़ेगा, विशेषकर कपास, बाजरा, मक्का, तूर, मूंगफली और सोयाबीन जैसी फसलों पर। पूर्व कृषि सचिव के अनुसार उत्पादन पिछले वर्ष से कम रहेगा, पर अधिशेष भंडार के चलते खाद्य संकट की आशंका नहीं है। सिंचाई कवरेज 2015-16 के 48.8% से बढ़कर 2024-25 में शुद्ध बोए गए क्षेत्र के लगभग 60% होने से झटका पहले से कम है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • आईएमडी आंकड़े: 1 जून–21 सितंबर में 703.7 मिमी वर्षा बनाम सामान्य 827.2 मिमी, यानी 15% कमी।
  • इंडिया ड्राउट मॉनिटर आईआईटी गांधीनगर की वाटर एंड क्लाइमेट लैब द्वारा संचालित; 52.5% क्षेत्र सूखा श्रेणी में।
  • खरीफ विपणन सत्र (KMS) 1 अक्टूबर से शुरू होता है; 2026-27 के लिए धान खरीद लक्ष्य 70.864 मिलियन टन।
  • 2026-27 खरीफ उत्पादन लक्ष्य 176.16 मिलियन टन; 2025-26 में उत्पादन 176.04 मिलियन टन।
  • सिंचाई कवरेज शुद्ध बोए गए क्षेत्र का लगभग 60% (2024-25), 2015-16 में 48.8% (क्रिसिल)।
  • क्रिसिल: खरीफ बुवाई सामान्य क्षेत्र का 98% और पिछले वर्ष के स्तर का 96%।

मेन्स दृष्टिकोण

इस वर्ष का दक्षिण-पश्चिम मानसून 15% कमी के साथ समाप्त हो रहा है, लेकिन संकट का स्वरूप बदला हुआ है — जोखिम अब बोए गए क्षेत्र से हटकर उपज पर केंद्रित है। जून में 35.4% कमी के बाद जुलाई में सुधार ने धान और गन्ने को राहत दी, वहीं वर्षा-तनाव वाले इलाकों में किसानों ने मक्का, बाजरा और मूंग जैसी कम अवधि की फसलों की ओर रुख किया, जिससे बुवाई सामान्य के 98% पर टिकी रही और कुल क्षेत्र केवल 1.3% घटा। फिर भी अगस्त में 16% और सितंबर की कमजोर वर्षा ने कपास, बाजरा, मक्का, तूर, मूंगफली और सोयाबीन को असुरक्षित बना दिया, क्योंकि सिंचाई कवरेज असमान है — गुजरात में 2024-25 में मूंगफली क्षेत्र का केवल 49.3% सिंचित था। प्रभाव भी क्षेत्रीय रूप से विषम है: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे सिंचित क्षेत्र सुरक्षित, जबकि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे वर्षा-आधारित क्षेत्र अधिक चपेट में। आगे का रास्ता सिंचाई विस्तार (48.8% से 60% तक की प्रगति को आगे बढ़ाना), सूखा-सहिष्णु फसलों (उड़द, ज्वार, बाजरा) को बढ़ावा, फसल नुकसान के त्वरित व पारदर्शी सर्वेक्षण व मुआवजा, तथा भूजल पर निर्भरता घटाने में निहित है — जैसा नागपुर में 300 फुट के बोरवेल सूखने और 1,000 फुट तक पहुंचने वाली सोसाइटियों के ही पानी पाने के उदाहरण से स्पष्ट है।

मुख्य शब्द

आईएमडी (भारत मौसम विज्ञान विभाग)
वर्षा व मौसम के आंकड़े जारी करने वाली सरकारी संस्था, जिसके अनुसार इस मानसून में 15% कमी रही।
इंडिया ड्राउट मॉनिटर
आईआईटी गांधीनगर की वाटर एंड क्लाइमेट लैब द्वारा संचालित सूखा निगरानी प्रणाली; 52.5% क्षेत्र सूखा श्रेणी में।
खरीफ विपणन सत्र (KMS)
खरीफ फसल की सरकारी खरीद का सत्र, जो 1 अक्टूबर से शुरू होता है।
वर्षा की कमी (रेनफॉल डेफिसिट)
सामान्य दीर्घावधि औसत वर्षा की तुलना में वास्तविक वर्षा में गिरावट, प्रतिशत में व्यक्त।
सिंचाई कवरेज
शुद्ध बोए गए क्षेत्र का वह हिस्सा जो सिंचित है; 2024-25 में लगभग 60%, 2015-16 में 48.8%।
कम अवधि की फसलें
मक्का, बाजरा, मूंग जैसी फसलें जिन्हें कम समय व कम पानी चाहिए, वर्षा-तनाव में किसान इन्हें चुनते हैं।

अभ्यास प्रश्न

  1. इस वर्ष 15% वर्षा की कमी के बावजूद खरीफ बुवाई क्षेत्र में गिरावट सीमित क्यों रही? बुवाई क्षेत्र और उपज के बीच के अंतर को स्पष्ट करें।
  2. भारत की वर्षा-आधारित कृषि की संवेदनशीलता के कारण बताइए और सिंचाई विस्तार तथा फसल विविधीकरण के जरिए इसे कम करने के उपायों पर चर्चा करें।
  3. सूखा निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणालियां कृषि नीति निर्णयों (उत्पादन व खरीद लक्ष्य) को किस प्रकार प्रभावित कर सकती हैं? उदाहरणों सहित समझाइए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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