कृषि महाराष्ट्र

महाराष्ट्र का कानून: भूमिहीन महिलाओं को किसान मान्यता

महाराष्ट्र ने जुलाई 2026 में महिला किसान सशक्तीकरण विधेयक पारित किया, जो भूमि स्वामित्व से अलग 'महिला किसान प्रमाणपत्र' के जरिये महिलाओं को स्वतंत्र किसान मान्यता देता है। इसमें भूमिहीन काश्तकार, कृषि मजदूर, पशुपालक और चरवाहे शामिल हैं। 2025 में कृषि में करीब 11 करोड़ महिलाएं और 12.7 करोड़ पुरुष कार्यरत थे, फिर भी महिलाओं के पास 14% जोत हैं और पीएम-किसान लाभार्थियों में वे 23% हैं।

स्रोत

The Hindu — Business · मूल ख़बर पढ़ें ↗

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Maharashtra passed the Women Farmers' Empowerment Bill in July 2026, granting women recognition as farmers irrespective of land ownership via a Woman Farmer Certificate. — Stated as fact in the source with date and mechanism; no separate document cited.
  • In 2025 agriculture employed about 110 million women and 127 million men in rural India. — Figure appears in source, attributed to PLFS (Census adjusted).
  • Over 41% of female agricultural workers were unpaid in 2025 against 20% of men. — Figure appears in source with chart reference; underlying dataset cited as PLFS.
  • Women hold only 14% of operational agricultural land holdings. — Attributed in source to Agricultural Census 2015-16.
  • Only 23% of PM-KISAN beneficiaries are women; Meghalaya 70% and Kerala 44%. — Figures appear in source with chart reference but no dataset year given.

विश्लेषकों की राय राय

AI आर्थिक विश्लेषक

इसे कल्याणकारी सौगात से ज़्यादा पहचान के ढाँचे की मरम्मत के रूप में पढ़ना चाहिए। चूँकि लाभार्थी सूचियों का एकमात्र आधार भूमि रिकॉर्ड है, खेती में लगभग आधी भागीदारी रखने वाली महिलाएँ व्यवस्थागत रूप से छँट जाती हैं — 14% परिचालन जोत और पीएम-किसान में 23% हिस्सेदारी इसी छँटाई के लक्षण हैं। 'महिला किसान प्रमाणपत्र' के ज़रिये किसान की पहचान को भूस्वामित्व से अलग करने पर तुलनात्मक रूप से कम राजकोषीय लागत में नई ऋण और इनपुट मांग खुल सकती है; असल फ़ायदा प्रमाणपत्र जारी होने की गति और योजनाओं से जुड़ाव की गुणवत्ता पर निर्भर करेगा।

  • आर्थिक दृष्टि से असली अड़चन ज़मीन की कमी नहीं, बल्कि वह पहचान प्रणाली है जिसमें भूमि रिकॉर्ड द्वारपाल बन जाता है — मेघालय (70% लाभार्थी) और केरल (44%) के अपवाद यही संकेत देते हैं।
  • 41% से अधिक महिला कृषि श्रमिक अवैतनिक हैं, जबकि पुरुषों में यह 20% है; इसका अर्थ है कि उत्पादक श्रम आय-आकलन और योजना डेटाबेस, दोनों में कम दर्ज होता है।
  • स्वतंत्र पहचान मिलने से संस्थागत ऋण, सब्सिडी और विस्तार सेवाओं तक पहुँच बन सकती है और अनौपचारिक साहूकारों पर निर्भरता घट सकती है — दीर्घकाल में उत्पादकता के लिए सकारात्मक।
  • लागत कौन उठाएगा, यह कहानी में स्पष्ट नहीं: नए लाभार्थी जुड़ने से योजना व्यय बढ़ेगा या मौजूदा पारिवारिक इकाई के भीतर ही पुनर्वितरण होगा, यह अमल के नियमों पर निर्भर है।
  • ग्राम सभा या स्व-पंजीकरण से पहचान, डुप्लिकेशन से बचाव और एग्री स्टैक/फार्मर आईडी से जुड़ाव — ये प्रशासनिक क्षमता के काम हैं; चूक या दोहराव आर्थिक लाभ को कमज़ोर कर देगा।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि वास्तव में कितने प्रमाणपत्र जारी होते हैं, वे फार्मर आईडी और एग्री स्टैक से जुड़ते हैं या नहीं, और 2026 के अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष में अन्य राज्य इस मॉडल को अपनाते हैं या नहीं।

कहानी यह स्थापित करती है कि कानून पारित हुआ है — यह नहीं कि कितने प्रमाणपत्र बँटे, ऋण या योजनाओं तक पहुँच कितनी बढ़ी, या राजकोषीय लागत क्या होगी।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 7 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

भारत में 'किसान' की पहचान परंपरागत रूप से भूमि अभिलेखों से जुड़ी रही है, जिससे खेतों में काम करने वाली करोड़ों महिलाएं आंकड़ों और योजनाओं में अदृश्य रह जाती हैं। जुलाई 2026 में महाराष्ट्र ने महिला किसान सशक्तीकरण विधेयक पारित किया, जो 'महिला किसान प्रमाणपत्र' के जरिये भूमि स्वामित्व से स्वतंत्र रूप से महिलाओं को किसान के रूप में मान्यता देता है। यह 2007 की राष्ट्रीय किसान नीति में दी गई गतिविधि-आधारित, भूमि-निरपेक्ष 'किसान' परिभाषा को लागू करने वाला पहला राज्य कानून है। लेख ICRIER के लेखकों द्वारा लिखा गया है।

मुख्य तथ्य

  • जुलाई 2026 में महाराष्ट्र ने महिला किसान सशक्तीकरण विधेयक पारित किया, जो 'महिला किसान प्रमाणपत्र' देता है।
  • 2025 में कृषि में लगभग 11 करोड़ महिलाएं और 12.7 करोड़ पुरुष कार्यरत थे (ग्रामीण, PLFS, जनगणना समायोजित)।
  • 2017-18 के बाद महिला कृषि कार्यबल दोगुने से अधिक हुआ; ग्रामीण महिला श्रमिकों में लगभग तीन-चौथाई कृषि में हैं, पुरुषों में आधे से कम।
  • 2025 में 41% से अधिक महिला कृषि श्रमिक अवैतनिक थीं, पुरुषों में 20%; स्व-नियोजित (own-account) पुरुष लगभग 63%, महिलाएं 39%।
  • कृषि गणना 2015-16 के अनुसार केवल 14% परिचालन कृषि जोत महिलाओं के पास हैं।
  • पीएम-किसान लाभार्थियों में केवल 23% महिलाएं हैं; योजना पात्र भूमिधारक किसान परिवारों को सालाना ₹6,000 देती है।
  • मेघालय में लाभार्थियों में महिलाएं 70%, केरल में 44%; जम्मू-कश्मीर व हिमाचल प्रदेश में महिलाएं कार्यबल का लगभग दो-तिहाई पर लाभार्थी अंश बहुत कम।
  • संयुक्त राष्ट्र ने 2026 को अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष घोषित किया है।

समयरेखा

  1. 2007राष्ट्रीय किसान नीति ने गतिविधि-आधारित, भूमि-निरपेक्ष 'किसान' परिभाषा दी, पर इसे कभी क्रियान्वित नहीं किया गया।
  2. 2011राज्यसभा में इसी तरह का राष्ट्रीय स्तर का विधेयक पेश हुआ, जो लैप्स हो गया।
  3. 2015-16कृषि गणना: महिलाओं के पास केवल 14% परिचालन जोत।
  4. 2017-18इस वर्ष के बाद से महिला कृषि कार्यबल दोगुने से अधिक हुआ।
  5. 2025कृषि में लगभग 11 करोड़ महिलाएं, 12.7 करोड़ पुरुष; 41% से अधिक महिला कृषि श्रमिक अवैतनिक।
  6. जुलाई 2026महाराष्ट्र ने महिला किसान सशक्तीकरण विधेयक पारित किया।
  7. 2026संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष।

किसका दाँव

  • भूमिहीन महिला काश्तकार, कृषि मजदूर, पशुपालक, चरवाहे, बागान श्रमिक — कानून में स्पष्ट रूप से शामिल श्रेणियां; स्वतंत्र कृषि पहचान, कल्याण योजनाओं और ऋण तक पहुंच दांव पर।
  • महाराष्ट्र सरकार — प्रमाणपत्र जारी करना, नया महिला किसान डेटाबेस बनाना और क्रियान्वयन सुनिश्चित करना।
  • ग्राम सभा — स्व-पंजीकरण के विकल्प के साथ बिना भूमि या भूमि-अभिलेख वाली महिला किसानों की पहचान की जिम्मेदारी।
  • केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय — एग्री स्टैक और फार्मरID के जरिये महिला किसानों को डिजिटल कृषि तंत्र में जोड़ना।
  • अन्य राज्य सरकारें — समान परिभाषाओं, प्रमाणपत्र और डेटाबेस की मानकीकृत प्रणाली अपनाने का अवसर; केरल की कुदुम्बश्री, ओडिशा की कालिया जैसी पहलें।
  • महिला किसान आंदोलन व नागरिक समाज संगठन — तीन दशकों की पैरवी का परिणाम; क्रियान्वयन की निगरानी।

क्यों अहम है

भूमि अभिलेख को 'सत्य का स्रोत' मानने से महिलाएं ऋण, सब्सिडी, तकनीक और विस्तार सेवाओं से बाहर रह जाती हैं—पीएम-किसान में उनका हिस्सा केवल 23% है। महाराष्ट्र का कानून भूमि के मालिक की जगह वास्तव में खेती करने वाले व्यक्ति को मान्यता देने की दिशा में बदलाव है, जो कृषि में लगभग लैंगिक समानता वाले कार्यबल के लिए अहम है। यदि यह एग्री स्टैक व फार्मरID से जुड़ता है तो अन्य राज्यों के लिए भी मॉडल बन सकता है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • राष्ट्रीय किसान नीति, 2007 ने भूमि-निरपेक्ष, गतिविधि-आधारित 'किसान' परिभाषा दी; महाराष्ट्र का 2026 कानून उसे लागू करने वाला पहला राज्य कानून।
  • पीएम-किसान: पात्र भूमिधारक किसान परिवारों को ₹6,000 प्रति वर्ष; महिला लाभार्थी 23%।
  • कृषि गणना 2015-16: महिलाओं के पास 14% परिचालन जोत।
  • केरल—कुदुम्बश्री सामूहिक खेती; ओडिशा—कालिया योजना (भूमिहीन व बटाईदार महिलाओं तक पहुंच)।
  • एग्री स्टैक: केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का डिजिटल प्लेटफॉर्म; फार्मरID जारी करता है।
  • संयुक्त राष्ट्र: 2026 अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष।

मेन्स दृष्टिकोण

भारत में कृषि का 'महिलाकरण' आंकड़ों में स्पष्ट है—2025 में लगभग 11 करोड़ महिलाएं कृषि में कार्यरत थीं और ग्रामीण महिला श्रमिकों की तीन-चौथाई इसी क्षेत्र में हैं—पर पहचान की प्रणाली पितृसत्तात्मक भूमि अभिलेखों पर टिकी है, जिससे केवल 14% जोत महिलाओं के नाम हैं और पीएम-किसान लाभार्थियों में वे 23% हैं। परिणाम: 41% से अधिक महिला कृषि श्रमिक अवैतनिक, और ऋण, सब्सिडी, तकनीक व विस्तार सेवाओं से बहिष्करण। मेघालय (70%) और केरल (44%) के उदाहरण दिखाते हैं कि बाध्यकारी अड़चन भूमि नहीं, बल्कि भूमि पर आधारित पहचान-प्रणाली है—जहां वैकल्पिक तंत्र (मातृवंशीय/प्रथागत भू-धारण, कुदुम्बश्री जैसी सामूहिक खेती) मौजूद है, वहां पहुंच बढ़ती है। महाराष्ट्र का महिला किसान प्रमाणपत्र (कम से कम एक कृषि मौसम की गतिविधि पर आधारित) इस अड़चन को तोड़ने का प्रयास है। आगे की राह: स्व-पंजीकरण या ग्राम सभा द्वारा पहचान के साथ मजबूत सूचना अभियान, दोहराव व बहिष्करण से बचते हुए नए डेटाबेस का मौजूदा कृषि डेटाबेस से समन्वय, राज्यों में मानकीकृत परिभाषाएं, और एग्री स्टैक व फार्मरID से जोड़कर योजनाओं तक वास्तविक पहुंच सुनिश्चित करना।

मुख्य शब्द

महिला किसान प्रमाणपत्र
महाराष्ट्र के कानून के तहत भूमि की प्रकृति से निरपेक्ष, वर्ष में कम से कम एक कृषि मौसम खेती करने वाली महिला निवासी को दी जाने वाली स्वतंत्र किसान पहचान।
राष्ट्रीय किसान नीति, 2007
वह नीति जिसने गतिविधि-आधारित, भूमि-निरपेक्ष 'किसान' परिभाषा प्रस्तावित की, लेकिन उसे क्रियान्वित नहीं किया गया।
पीएम-किसान
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि; पात्र भूमिधारक किसान परिवारों को खेती व घरेलू खर्च के लिए ₹6,000 वार्षिक सीधी वित्तीय सहायता।
कुदुम्बश्री
केरल की महिला सामूहिक/समूह खेती व्यवस्था, जो महिलाओं को भागीदारी और मान्यता का वैकल्पिक मार्ग देती है।
कालिया योजना
ओडिशा की योजना, जिसने भूमिहीन और बटाईदार महिलाओं तक पहुंच बनाई।
एग्री स्टैक / फार्मरID
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का डिजिटल प्लेटफॉर्म और उससे जारी किसान डिजिटल पहचान।

अभ्यास प्रश्न

  1. भारत में 'किसान' की पहचान भूमि अभिलेखों से जोड़े जाने के कारण महिला कृषि श्रमिकों के बहिष्करण की व्याख्या करें। महाराष्ट्र का महिला किसान सशक्तीकरण विधेयक, 2026 इसे किस हद तक दूर कर सकता है?
  2. कृषि के 'महिलाकरण' के आंकड़ों (2025 में 11 करोड़ महिलाएं, 41% अवैतनिक) के आलोक में महिला किसानों की ऋण, सब्सिडी और विस्तार सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने के उपाय सुझाइए।
  3. मेघालय और केरल में पीएम-किसान महिला लाभार्थियों का अनुपात अन्य राज्यों से अधिक क्यों है? इससे नीति-निर्माण के लिए क्या सबक मिलते हैं?

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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