स्वास्थ्य चंडीगढ़

ऑडिट: जीएमएसएच-16 में 38.57 करोड़ रुपये रोगी कल्याण निधि अनुपयोगी

सरकारी ऑडिट में पाया गया कि चंडीगढ़ के सेक्टर-16 स्थित सरकारी मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल (जीएमएसएच-16) में रोगी कल्याण समिति के तहत उपलब्ध 40.44 करोड़ रुपये में से 38.57 करोड़ रुपये 2024-25 में अनुपयोगी रहे, रोगी कल्याण पर केवल 1.87 करोड़ रुपये खर्च हुए। 2021-22 में 20.40 लाख रुपये से खरीदे 20 फिंगरप्रिंट स्कैनर वर्षों तक स्टोर में पड़े रहे। स्वास्थ्य सेवा निदेशक डॉ सुमन सिंह ने कहा, निधि और अनुमति मिलने पर उपयोग किया जाता है।

स्रोत

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Rs 38.57 crore of Rs 40.44 crore available under Rogi Kalyan Samiti remained unutilised at GMSH-16 in 2024-25, with only Rs 1.87 crore spent on patient welfare. — Figures appear in source and are attributed to a government audit of GMSH-16; internally consistent.
  • 20 fingerprint scanners worth Rs 20.40 lakh procured in 2021-22 lay unused in the hospital store. — Attributed to the audit; source gives supporting dates (one scanner issued May 8, 2023; remaining 19 issued to IT Cell March 19, 2025).
  • RKS guidelines require at least two-thirds of revenue from services to be spent on patient welfare. — Stated in source as per RKS guidelines; no document reference given.
  • Director Health Services Dr Suman Singh said funds are used as and when they and required permissions are received. — Direct quote attributed to a named official in the source.
  • Activist R K Garg, who obtained the audit report, said the findings raise a serious question of accountability. — Named attribution with direct quote; opinion, not verifiable fact.

विश्लेषकों की राय राय

AI नीति विश्लेषक

यह पैसे की कमी की कहानी नहीं है, बल्कि पैसा पड़ा रहने और जिनके लिए था उन तक न पहुंचने की कहानी है। रोगी कल्याण समिति का ढांचा जानबूझकर अस्पताल स्तर पर खर्च का अधिकार देने के लिए बनाया गया था, ताकि मरीज की जरूरत तुरंत पूरी हो — रु 40.44 करोड़ में से केवल रु 1.87 करोड़ खर्च होना बताता है कि यह विकेंद्रीकरण जमीन पर काम नहीं कर सका। स्वास्थ्य सेवा निदेशक का यह कहना कि धन और अनुमतियां मिलने पर उपयोग होता है, अपने आप में एक संरचनात्मक अड़चन की ओर इशारा करता है — मंजूरी की श्रृंखला मरीज की जरूरत की रफ्तार से नहीं चलती।

  • आरकेएस दिशानिर्देशों के अनुसार सेवाओं से मिली आय का कम से कम दो-तिहाई मरीजों के कल्याण पर खर्च होना चाहिए; यहां उपयोग का अनुपात इसके लगभग उलट है।
  • इस निधि के लक्षित लाभार्थी आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित मरीज हैं, और जो मदें अखर्च रहीं — दवा, परिवहन, भोजन, तीमारदार का ठहराव — वही जेब से होने वाले खर्च हैं जो गरीब परिवारों को संकट में डालते हैं।
  • फिंगरप्रिंट स्कैनर का मामला खरीद-नियोजन की चूक है: ऑडिट कहता है कि जरूरत का वास्तविक आकलन नहीं हुआ, जिससे सरकारी धन अवरुद्ध रहा और वारंटी अवधि बिना उपयोग बीत गई।
  • खास बात यह है कि ऑडिट ने खर्च न होने को ही नियमों का उल्लंघन माना है, जो स्वास्थ्य प्रशासन में जवाबदेही को धन के दुरुपयोग से आगे ले जाता है।
  • सूचना के अधिकार से रिपोर्ट हासिल करने वाले कार्यकर्ता ने इसे जिम्मेदारी तय करने का सवाल बताया है — असल मुद्दा यह है कि यह व्यक्तिगत ढिलाई थी या मंजूरी प्रक्रिया की बनावट में खामी।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि प्रशासन आरकेएस मंजूरी प्रक्रिया को सरल और समयबद्ध करता है या नहीं, बची राशि का क्या होता है, और किसी अधिकारी पर जिम्मेदारी औपचारिक रूप से तय होती है या नहीं।

यह खबर यह स्पष्ट नहीं करती कि पैसा अखर्च क्यों रहा, शेष राशि आगे बढ़ेगी या समाप्त हो जाएगी, कितने मरीज प्रभावित हुए — और इसमें धन के गबन का कोई आरोप भी नहीं है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 5 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

चंडीगढ़ के सेक्टर-16 स्थित सरकारी मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल (जीएमएसएच-16) के कामकाज की एक सरकारी ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया है कि रोगी कल्याण समिति (आरकेएस) के तहत उपलब्ध धन का बड़ा हिस्सा 2024-25 में खर्च ही नहीं हुआ। आरकेएस निधि गरीब और वंचित मरीजों के इलाज, परिवहन, भोजन और तीमारदार के ठहरने जैसे खर्चों में राहत देने के लिए बनी है। ऑडिट ने साथ ही 2021-22 में खरीदे गए फिंगरप्रिंट स्कैनरों के वर्षों तक स्टोर में पड़े रहने को भी चिह्नित किया है। रिपोर्ट अस्पताल के पास उपलब्ध संसाधनों और उनके वास्तविक उपयोग के बीच के अंतर की ओर इशारा करती है।

मुख्य तथ्य

  • 2024-25 में आरकेएस के तहत उपलब्ध 40.44 करोड़ रुपये में से 38.57 करोड़ रुपये अनुपयोगी रहे।
  • 2024-25 में रोगी कल्याण पर केवल 1.87 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
  • आरकेएस दिशानिर्देशों के अनुसार सेवाओं से हुई आय का कम से कम दो-तिहाई हिस्सा मरीजों के कल्याण पर खर्च होना चाहिए।
  • 2021-22 में 20.40 लाख रुपये की लागत से 20 फिंगरप्रिंट स्कैनर खरीदे गए।
  • 8 मई 2023 को केवल एक स्कैनर प्रशासनिक ब्लॉक को जारी किया गया — खरीद के लगभग दो साल बाद।
  • शेष 19 स्कैनर 18 मार्च 2025 तक स्टोर में पड़े रहे और 19 मार्च 2025 को आईटी सेल को जारी किए गए।
  • ऑडिट ने कहा कि आरकेएस निधि का उपयोग न होना योजना के मूल उद्देश्य को ही विफल करता है।
  • ऑडिट ने आवश्यकता से अधिक खरीद को अनियमित और निर्धारित नियमों के विरुद्ध बताया।

समयरेखा

  1. 2021-22जीएमएसएच-16 में 20.40 लाख रुपये की लागत से 20 फिंगरप्रिंट स्कैनर खरीदे गए।
  2. 8 मई 202320 में से केवल एक स्कैनर प्रशासनिक ब्लॉक को जारी किया गया।
  3. 2024-25आरकेएस के 40.44 करोड़ रुपये में से 38.57 करोड़ अनुपयोगी रहे; केवल 1.87 करोड़ खर्च।
  4. 18 मार्च 2025शेष 19 स्कैनर इस तारीख तक स्टोर में अनुपयोगी पड़े रहे।
  5. 19 मार्च 2025शेष 19 स्कैनर आईटी सेल को जारी किए गए।

किसका दाँव

  • गरीब और वंचित मरीज — इलाज, दवा, परिवहन, भोजन और तीमारदार के ठहरने के खर्च में मिलने वाली राहत उन तक नहीं पहुंची।
  • जीएमएसएच-16, सेक्टर-16, चंडीगढ़ — ऑडिट में निधि के अनुपयोग और अनियमित खरीद के लिए जवाबदेही सवालों के घेरे में।
  • रोगी कल्याण समिति (आरकेएस) — योजना का मूल उद्देश्य — समान व सस्ती स्वास्थ्य सेवा — पूरा नहीं हुआ।
  • डॉ सुमन सिंह, निदेशक, स्वास्थ्य सेवाएं — संस्थान के कामकाज की जिम्मेदार; कहती हैं निधि और अनुमति मिलने पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत उपयोग होता है।
  • आर के गर्ग, कार्यकर्ता — ऑडिट रिपोर्ट प्राप्त की; जवाबदेही तय करने और सुधारात्मक कदमों की मांग।
  • करदाता/जनता — सार्वजनिक धन अनुपयोगी उपकरणों और अखर्च निधि में अवरुद्ध रहा।

क्यों अहम है

सार्वजनिक अस्पताल में मरीजों के लिए विशेष रूप से निर्धारित लगभग 38.57 करोड़ रुपये का उपयोग न होना दिखाता है कि स्वास्थ्य बजट का आवंटन ही पर्याप्त नहीं, उसका खर्च होना भी जरूरी है। गरीब मरीजों के लिए इलाज से जुड़े अप्रत्यक्ष खर्च — दवा, आना-जाना, भोजन — ही अक्सर सबसे बड़ा बोझ होते हैं, और यही राहत रुकी रही। साथ ही आवश्यकता के आकलन के बिना खरीद ने वारंटी अवधि सहित सार्वजनिक धन को अवरुद्ध किया।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • रोगी कल्याण समिति (आरकेएस) दिशानिर्देश: सेवाओं से अर्जित आय का कम से कम दो-तिहाई मरीजों के कल्याण पर खर्च अनिवार्य।
  • आरकेएस निधि का उपयोग: इलाज, परिवहन, आहार और तीमारदार के ठहरने के खर्च, विशेषकर आर्थिक रूप से कमजोर व हाशिये के मरीजों के लिए।
  • जीएमएसएच-16: सरकारी मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल, सेक्टर 16, चंडीगढ़।
  • 2024-25 आंकड़े: उपलब्ध 40.44 करोड़ रुपये, अनुपयोगी 38.57 करोड़, खर्च 1.87 करोड़।
  • 20 फिंगरप्रिंट स्कैनर, 20.40 लाख रुपये, खरीद 2021-22; 19 स्कैनर 19 मार्च 2025 को आईटी सेल को जारी।
  • डॉ सुमन सिंह — निदेशक, स्वास्थ्य सेवाएं, जो संस्थान का कामकाज भी देखती हैं।

मेन्स दृष्टिकोण

जीएमएसएच-16 की ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशासन की दो पुरानी समस्याओं को उजागर करती है — निधि के अवशोषण (fund absorption) की कमजोरी और आवश्यकता-आधारित खरीद का अभाव। 2024-25 में आरकेएस के 40.44 करोड़ रुपये में से केवल 1.87 करोड़ खर्च हुए, जबकि दिशानिर्देश सेवाओं से हुई आय का दो-तिहाई मरीजों के कल्याण पर खर्च करने को कहते हैं; ऑडिट के अनुसार इससे समान व किफायती स्वास्थ्य सेवा का उद्देश्य ही विफल हुआ। प्रशासन का पक्ष प्रक्रियात्मक है — निधि और अपेक्षित अनुमतियां मिलने पर ही उपयोग संभव है — जो संकेत देता है कि बाधा नीति में नहीं, अनुमोदन-शृंखला और संस्थागत क्षमता में है। दूसरी ओर 2021-22 में खरीदे 20 फिंगरप्रिंट स्कैनरों में 19 का मार्च 2025 तक स्टोर में पड़ा रहना बताता है कि खरीद के समय वास्तविक आवश्यकता का यथार्थपरक आकलन नहीं हुआ, जिससे धन अवरुद्ध हुआ और वारंटी अवधि बेकार गई। आगे का रास्ता: निधि उपयोग की समयबद्ध निगरानी और नियमित रिपोर्टिंग, अनुमति प्रक्रिया का सरलीकरण, अनुपयोग के लिए जवाबदेही का निर्धारण, मांग-आधारित खरीद योजना, तथा मरीजों के बीच पात्रता की जानकारी का सक्रिय प्रसार, जैसा कि कार्यकर्ता आर के गर्ग ने सुधारात्मक उपायों के रूप में मांगा है।

मुख्य शब्द

रोगी कल्याण समिति (आरकेएस)
अस्पताल स्तर की व्यवस्था जिसकी निधि मरीजों के कल्याण — इलाज, परिवहन, आहार, तीमारदार के ठहरने — पर खर्च की जाती है।
जीएमएसएच-16
सरकारी मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल, सेक्टर 16, चंडीगढ़, जिसके कामकाज की सरकारी ऑडिट हुई।
निधि का अनुपयोग (नॉन-यूटिलाइजेशन)
आवंटित/उपलब्ध धन का निर्धारित उद्देश्य पर खर्च न होना; ऑडिट के अनुसार इससे योजना का उद्देश्य विफल होता है।
आवश्यकता से अधिक खरीद
वास्तविक जरूरत के यथार्थपरक आकलन बिना खरीद, जिसे ऑडिट ने अनियमित और नियमों के विरुद्ध बताया।
सरकारी ऑडिट
सरकारी संस्थान के व्यय व खरीद की जांच; यहां रिपोर्ट कार्यकर्ता आर के गर्ग ने प्राप्त की।

अभ्यास प्रश्न

  1. सार्वजनिक अस्पतालों में मरीज कल्याण के लिए निर्धारित निधियों का उपयोग न होने के कारणों की चर्चा करें और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उपाय सुझाएं।
  2. रोगी कल्याण समिति जैसी अस्पताल-स्तरीय व्यवस्थाएं गरीब मरीजों के 'आउट-ऑफ-पॉकेट' खर्च को कम करने में कितनी प्रभावी हैं? जीएमएसएच-16 के उदाहरण से परखें।
  3. सरकारी खरीद में आवश्यकता के यथार्थपरक आकलन का अभाव सार्वजनिक धन और वारंटी अवधि की हानि कैसे करता है? सुधार के उपाय बताएं।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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