रक्तदाताओं के लिए आधार, आभा आधारित डिजिटल पहचान का प्रस्ताव
देशव्यापी रक्तदाता ट्रैकिंग व्यवस्था के लिए ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (डीटीएबी) ने हर रक्तदाता के आधार या आभा आधारित प्रमाणीकरण का प्रस्ताव दिया है। यह सिफारिश 27 अगस्त को हुई बोर्ड की 94वीं बैठक के कार्यवृत्त में दर्ज है। इसमें ड्रग्स रूल्स, 1945 में संशोधन कर ब्लड सेंटरों का ई-रक्तकोष पोर्टल पर पंजीकरण और डेटा अपलोड करना अनिवार्य करने का सुझाव है। इसका मकसद दान के बाद फॉलो-अप और स्थगित या उच्च जोखिम वाले दाताओं को कई केंद्रों पर रक्तदान से रोकना है।
स्रोत
News18 — India · मूल ख़बर पढ़ें ↗
डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- DTAB has proposed statutory changes to CDSCO to create a nationwide blood donor database. — Attributed to minutes of the 94th DTAB meeting held on August 27, described as seen by News18.
- Donors would be authenticated via ABDM/ABHA ID or Aadhaar-linked OTP verification. — Quoted directly from the panel's recommendations in the source document.
- Registration of blood centres on e-RaktKosh and data uploading would be made mandatory under the Drugs Rules, 1945. — Attributed to the DTAB recommendation as reported in the source.
- The issue was first discussed by the Drugs Consultative Committee in June, with News18 reporting it in July. — Self-referential sourcing by the publication; no external document cited.
- Experts say a centralised donor record would improve blood safety and availability. — Attributed to named experts Anubha Taneja Mukherjee, Dr JS Arora and Dr Sanjiv Sharma.
विश्लेषकों की राय राय
यह भारत की उस परिचित नीति-शैली का उदाहरण है जिसमें नया ढांचा बनाने के बजाय मौजूदा नियमों पर डिजिटल पहचान की परत चढ़ा दी जाती है — डीटीएबी ने सिफारिश की है कि आभा या आधार से जुड़े ओटीपी के जरिये रक्तदाता का प्रमाणीकरण, और ब्लड सेंटरों के लिए ई-रक्तकोष पर अनिवार्य पंजीकरण व डेटा अपलोड, ड्रग्स रूल्स, 1945 में शामिल किए जाएं। डिजाइन का तर्क मरीज-केंद्रित और ठोस है: केंद्र-दर-केंद्र बिखरे रिकॉर्ड ही वह वजह हैं कि अस्वीकृत या उच्च-जोखिम वाला दाता कहीं और जाकर बिना जानकारी के रक्तदान कर सकता है, और यह खाई केवल जुड़े हुए डेटाबेस से भरती है। लेकिन इसकी सफलता लगभग पूरी तरह अमल पर टिकी है — डेटा की गुणवत्ता, सहमति की व्यवस्था, और अपलोड न होने पर जवाबदेही किसकी।
- इसका सीधा लाभ बार-बार रक्त चढ़वाने वाले मरीजों को है, जैसे थैलेसीमिया और सिकल सेल रोग के रोगी, जिनके लिए रक्त की उपलब्धता और हर यूनिट की सुरक्षा दोनों अहम हैं।
- असली बदलाव ई-रक्तकोष पंजीकरण को सलाह के बजाय कानूनी रूप से अनिवार्य बनाना है, क्योंकि स्वैच्छिक डिजिटल रिपोर्टिंग पोर्टलों पर अनुपालन भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में असमान रहा है।
- आभा या आधार-लिंक्ड ओटीपी का रास्ता उस बायोमेट्रिक विकल्प की लागत और उपकरण-बोझ से बचाता है जिसे ड्रग्स कंसल्टेटिव कमेटी ने परखने को कहा था, पर यह बोझ फोन की उपलब्धता और नेटवर्क कनेक्टिविटी पर डाल देता है — खासकर रक्तदान शिविरों में।
- इतने संवेदनशील स्वास्थ्य डेटा पर सहमति और निजता के सवाल उठते हैं, और खबर में विशेषज्ञ इसे डिजाइन में तय पहलू के रूप में नहीं, बल्कि एक अपेक्षा के रूप में रख रहे हैं।
- एक विशेषज्ञ द्वारा उठाया गया जवाबदेही का बिंदु — ब्लड बैंक के विभागाध्यक्ष और संस्थान निदेशक पर जिम्मेदारी तय करना — वही शासन-स्तरीय बारीकी है जो ऐसे आदेशों की सफलता या विफलता तय करती है।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि सीडीएससीओ ड्रग्स रूल्स, 1945 में संशोधन वास्तव में अधिसूचित करता है या नहीं, और अधिसूचित पाठ में सहमति, डेटा रखने की अवधि और जवाबदेही स्पष्ट लिखी जाती है या इन्हें प्रशासनिक व्यवहार पर छोड़ दिया जाता है।
यह डीटीएबी की बैठक के मिनट्स में दर्ज सिफारिश है, अधिसूचित नियम नहीं — खबर से समय-सीमा, अंतिम कानूनी मसौदा, निजी और शिविर-आधारित संग्रह की व्यवस्था, या आभा/आधार-लिंक्ड फोन न रखने वाले दाताओं के बारे में कुछ तय नहीं होता।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
भारत में रक्तदान का रिकॉर्ड अभी अलग-अलग ब्लड सेंटरों के स्तर पर रखा जाता है, जिससे किसी दाता का पिछला इतिहास, स्थगन (deferral) या जोखिम की जानकारी दूसरे केंद्र को नहीं मिलती। देश के शीर्ष औषधि सलाहकार निकाय ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (डीटीएबी) ने अब राष्ट्रव्यापी रक्तदाता डेटाबेस बनाने के लिए क़ानूनी बदलाव का प्रस्ताव केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) को दिया है। प्रस्ताव के तहत हर दाता का आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम)/आभा आईडी या आधार से जुड़े ओटीपी के जरिये प्रमाणीकरण होगा और ब्लड सेंटरों का ई-रक्तकोष पोर्टल पर पंजीकरण व डेटा अपलोड अनिवार्य किया जाएगा।
मुख्य तथ्य
- डीटीएबी ने हर रक्तदाता के लिए एबीडीएम/आभा आईडी या आधार-लिंक्ड ओटीपी सत्यापन से प्रमाणीकरण की सिफारिश की है।
- सिफारिश डीटीएबी की 94वीं बैठक के कार्यवृत्त में दर्ज है, जो 27 अगस्त को हुई थी; कार्यवृत्त News18 ने देखा।
- दो सिफारिशें: ई-रक्तकोष पोर्टल पर ब्लड सेंटरों का पंजीकरण व डेटा अपलोड अनिवार्य करना, और दाता प्रमाणीकरण।
- इसके लिए ड्रग्स रूल्स, 1945 में आवश्यक प्रावधान जोड़ने का प्रस्ताव है।
- प्रस्तावित व्यवस्था संग्रह, जांच से लेकर जारी करने तक रक्तदान का डिजिटल ट्रेल बनाएगी और दान के बाद फॉलो-अप संभव करेगी।
- उद्देश्य: उच्च जोखिम वाले या स्थगित दाताओं को तुरंत कई केंद्रों पर रक्तदान करने से रोकना।
- यह मुद्दा पहले जून में ड्रग्स कंसल्टेटिव कमिटी (डीसीसी) में उठा, जिसने बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के तरीकों की जांच की सिफारिश की थी।
- इसके लिए बनी उप-समिति ने एबीडीएम/आभा या आधार-लिंक्ड ओटीपी के जरिये दाता प्रमाणीकरण की सिफारिश की।
समयरेखा
- जूनड्रग्स कंसल्टेटिव कमिटी (डीसीसी) में मुद्दा पहली बार चर्चा; ई-रक्तकोष पंजीकरण व डेटा अपलोड अनिवार्य करने तथा दाताओं के बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के तरीकों की जांच की सिफारिश।
- जुलाईNews18 ने डीसीसी में चर्चा किए गए प्रस्ताव पर रिपोर्ट प्रकाशित की।
- 27 अगस्तडीटीएबी की 94वीं बैठक; ड्रग्स रूल्स, 1945 में प्रावधान जोड़ने की सिफारिश।
- तिथि स्रोत में उल्लिखित नहींउप-समिति ने एबीडीएम/आभा या आधार-लिंक्ड ओटीपी से दाता प्रमाणीकरण की सिफारिश की।
किसका दाँव
- डीटीएबी (ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड) — शीर्ष औषधि सलाहकार निकाय; इसी की सिफारिश पर नियमों में संशोधन का रास्ता खुलेगा।
- सीडीएससीओ (केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन) — स्वास्थ्य नियामक, जिसे वैधानिक बदलाव का प्रस्ताव भेजा गया है।
- ब्लड सेंटर/ब्लड बैंक — ई-रक्तकोष पर पंजीकरण और डेटा अपलोड अनिवार्य होगा; डॉ. अरोड़ा के अनुसार विभागाध्यक्ष व संस्थान निदेशक पर जवाबदेही तय हो।
- थैलेसीमिया व सिकल सेल रोग के मरीज — नियमित रक्ताधान पर निर्भर; सुरक्षित व भरोसेमंद रक्त आपूर्ति का लाभ।
- रक्तदाता — आधार/आभा आधारित प्रमाणीकरण; सहमति और निजता के अधिकार का प्रश्न।
- थैलेसीमिया पेशेंट्स एडवोकेसी ग्रुप (टीपीएजी) व नेशनल थैलेसीमिया वेलफेयर सोसाइटी — मरीज हितैषी संगठन; कदम का स्वागत, साथ ही सहमति, निजता और जवाबदेही की मांग।
क्यों अहम है
रक्त की उपलब्धता जितनी जरूरी है, हर यूनिट की सुरक्षा उतनी ही अहम है — जुड़ा हुआ राष्ट्रीय दाता रिकॉर्ड ब्लड बैंकों को दाता का पिछला इतिहास और स्थगन की जानकारी देगा, जिससे बार-बार रक्ताधान पर निर्भर मरीजों के लिए सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत बनेगी। यह अलग-अलग केंद्रों के रिकॉर्ड से हटकर राष्ट्रीय ट्रैकिंग ढांचे की ओर बदलाव है। साथ ही यह डिजिटल स्वास्थ्य पहचान, दाता सहमति और निजता के अधिकार से जुड़े सवाल भी खड़े करता है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- डीटीएबी भारत का शीर्ष औषधि तकनीकी सलाहकार निकाय; डीसीसी परामर्शदात्री समिति; सीडीएससीओ राष्ट्रीय औषधि नियामक।
- प्रस्तावित संशोधन ड्रग्स रूल्स, 1945 में किया जाना है।
- ई-रक्तकोष: रक्तदान/ब्लड सेंटर डेटा का पोर्टल, जिस पर पंजीकरण अनिवार्य करने का प्रस्ताव।
- आभा (ABHA) आईडी आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) के तहत जारी डिजिटल स्वास्थ्य पहचान।
- डीटीएबी की 94वीं बैठक 27 अगस्त को हुई; मुद्दा जून में डीसीसी में उठा था।
- लाभार्थी वर्ग: थैलेसीमिया, सिकल सेल रोग व अन्य रक्त विकारों के मरीज।
मेन्स दृष्टिकोण
भारत में रक्त सुरक्षा की सबसे बड़ी कमजोरी रिकॉर्ड का विखंडन है — एक केंद्र पर स्थगित या उच्च जोखिम बताया गया दाता दूसरे केंद्र पर बिना इतिहास के रक्तदान कर सकता है। डीटीएबी की 94वीं बैठक (27 अगस्त) की सिफारिशें इसी अंतर को भरने का प्रयास हैं: ड्रग्स रूल्स, 1945 में संशोधन कर ब्लड सेंटरों का ई-रक्तकोष पंजीकरण व डेटा अपलोड अनिवार्य करना, और एबीडीएम/आभा आईडी या आधार-लिंक्ड ओटीपी से दाता प्रमाणीकरण। इससे संग्रह-जांच-निर्गमन तक डिजिटल ट्रेल, दान के बाद फॉलो-अप और बहु-केंद्र रक्तदान पर रोक संभव होगी, जो थैलेसीमिया व सिकल सेल जैसे नियमित रक्ताधान पर निर्भर मरीजों के लिए उपलब्धता और सुरक्षा दोनों सुधार सकता है। चुनौतियाँ भी स्पष्ट हैं — मरीज संगठनों ने उचित दाता सहमति और निजता के अधिकार के उल्लंघन न होने की अपेक्षा जताई है, और विशेषज्ञों का सुझाव है कि जवाबदेही ब्लड बैंक के विभागाध्यक्ष तथा संस्थान निदेशक पर तय की जाए। आगे का रास्ता: नियमों में स्पष्ट प्रावधान, सहमति-आधारित डेटा उपयोग, केंद्रों की क्षमता निर्माण और स्वैच्छिक रक्तदान ढांचे को मजबूत करना।
मुख्य शब्द
- डीटीएबी (ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड)
- भारत का शीर्ष औषधि सलाहकार पैनल, जिसने रक्तदाता डेटाबेस के लिए वैधानिक बदलाव का प्रस्ताव दिया।
- सीडीएससीओ
- केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन — स्वास्थ्य/औषधि नियामक निकाय, जिसे प्रस्ताव भेजा गया।
- डीसीसी (ड्रग्स कंसल्टेटिव कमिटी)
- वह समिति जिसने जून में पहली बार यह मुद्दा उठाया और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण की जांच की सिफारिश की।
- ई-रक्तकोष
- ब्लड सेंटर व रक्तदान संबंधी डेटा का पोर्टल; इस पर पंजीकरण और डेटा अपलोड अनिवार्य करने का प्रस्ताव।
- आभा/एबीडीएम आईडी
- आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत डिजिटल स्वास्थ्य खाता पहचान, दाता प्रमाणीकरण के लिए प्रस्तावित।
- डेफरल (स्थगन)
- स्वास्थ्य या जोखिम कारणों से किसी व्यक्ति को अस्थायी/स्थायी रूप से रक्तदान न करने की सलाह।
अभ्यास प्रश्न
- आधार/आभा आधारित रक्तदाता प्रमाणीकरण से रक्त सुरक्षा कैसे मजबूत होगी? इसके निजता संबंधी जोखिमों पर चर्चा करें।
- ड्रग्स रूल्स, 1945 में प्रस्तावित संशोधन और ई-रक्तकोष पर अनिवार्य पंजीकरण भारत के रक्त आपूर्ति तंत्र को कैसे बदल सकते हैं?
- डीटीएबी, डीसीसी और सीडीएससीओ की भूमिकाओं को स्पष्ट करते हुए बताइए कि इस प्रस्ताव में उनकी क्रमिक भूमिका क्या रही।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
