एसआईआर रद्द हो, आयुक्तों ने वाजिब सवाल उठाए: पूर्व आयुक्त लवासा
तीन चुनाव आयुक्तों में से सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने उनकी जानकारी के बिना भारत निर्वाचन आयोग के नाम पर लिए गए फैसलों पर आपत्ति जताई, ऐसा इंडियन एक्सप्रेस ने बुधवार को बताया। उन्होंने फॉर्म 6 में बदलाव और आईटी प्रणालियों पर केंद्रीकृत नियंत्रण पर चिंता जताई तथा गोवा का मामला गिनाया, जहां क्षेत्रीय अधिकारियों द्वारा पात्र पाए गए 97 मतदाता सॉफ्टवेयर की वजह से सूची में नहीं जोड़े जा सके। पूर्व आयुक्त अशोक लवासा ने इन्हें गंभीर कानूनी मुद्दे बताते हुए एसआईआर रद्द करने की मांग की। आयोग ने आरोपों से इनकार किया है।
स्रोत
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- Election commissioners Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi objected to decisions taken in the ECI's name without their knowledge — Attributed in source to an Indian Express report of Wednesday; not independently confirmed in the text, and the source says the ECI has denied it.
- In Goa, 97 voters verified as eligible by ground officers could not be added because the software did not allow the update — Figure appears in the source, attributed to the commissioners' concerns as reported; no ECI confirmation cited.
- Form 6 was changed without following due procedure — Stated by Ashok Lavasa, who adds that Form 6 is in the public domain and 'that claim has been verified'; the alleged procedural lapse itself is unverified.
- The ECI refused an RTI seeking minutes of meetings where the SIR decision was taken, saying no such records were maintained — Claim made by Lavasa in the interview; no document or case number given in source.
- Lavasa says the SIR should be scrapped and courts can examine procedural legality — Direct opinion of the named interviewee, clearly attributed.
विश्लेषकों की राय राय
यह घटनाक्रम एसआईआर विवाद को विपक्ष के आरोप से आगे बढ़ाकर चुनाव आयोग के भीतर से उठी आपत्तियों का मामला बना देता है। खबर के मुताबिक तीन में से दो आयुक्तों — सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — ने बिना उनकी जानकारी ईसीआई के नाम पर लिए गए फैसलों पर आपत्ति जताई, और पूर्व आयुक्त अशोक लवासा की 'एसआईआर रद्द हो' वाली मांग इसे राजनीतिक वजन देती है। ईसीआई ने आरोप खारिज किए हैं, इसलिए अब लड़ाई रिकॉर्ड की है — विश्वसनीयता उसी पक्ष के साथ रहेगी जो दस्तावेज सामने रख सके।
- सबसे बड़ा राजनीतिक बदलाव यह है कि मतदाता सूची पर सवाल अब केवल दलीय आरोप नहीं, संस्था के भीतर की आवाज़ों पर टिके हैं।
- बहुमत से फैसले के नियम का हवाला देते हुए लवासा का यह सवाल कि दो आयुक्तों की राय क्यों नहीं चली, इसे व्यक्तिगत हमले की जगह प्रक्रियागत मुद्दा बनाता है — जिसे खारिज करना कठिन है।
- फॉर्म 6 में बदलाव, ईआरओ के अधिकारों पर अंकुश और गोवा में 97 पात्र मतदाताओं का उदाहरण विपक्ष को आसान, ठोस मुद्दे देते हैं।
- अगर ईसीआई सिर्फ खंडन पर रुकता है और बैठकों का रिकॉर्ड सामने नहीं रखता, तो 'फैसले कैसे हुए' यह सवाल राजनीतिक हथियार बना रहेगा।
- अदालतों ने अब तक केवल ईसीआई के संवैधानिक अधिकार पर फैसला दिया है, इसलिए प्रक्रिया और वैधता के सवालों पर नई कानूनी लड़ाई की गुंजाइश खुली है।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि ईसीआई खंडन से आगे बढ़कर यह ब्यौरा देता है या नहीं कि ये फैसले कब और कैसे लिए गए, और विपक्ष इसे संसद या अदालत तक ले जाता है या नहीं।
आयुक्तों की आपत्तियां एक समाचार रिपोर्ट के हवाले से हैं जिसे ईसीआई ने खारिज किया है; यह खबर यह साबित नहीं करती कि किसी कानून का उल्लंघन हुआ, और चुनावी नतीजों पर असर के बारे में कुछ नहीं कहती।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 6 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर आयोग के भीतर से ही सवाल उठे हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार तीन में से दो चुनाव आयुक्तों — सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — ने कहा कि आयोग के नाम पर कई फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए गए। इन फैसलों में फॉर्म 6 में बदलाव, आईटी प्रणालियों (ERONET) पर केंद्रीकृत नियंत्रण और नाम हटाने-जोड़ने से जुड़े निर्णय शामिल हैं। पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा, जिन्होंने 2019 में आचार संहिता उल्लंघन मामलों में आयोग के फैसलों से सार्वजनिक असहमति जताई थी, ने इन मुद्दों को गंभीर कानूनी मसला बताते हुए SIR रद्द करने की मांग की है। आयोग ने आरोपों से इनकार किया है।
मुख्य तथ्य
- इंडियन एक्सप्रेस ने बुधवार को रिपोर्ट किया कि तीन में से दो चुनाव आयुक्तों — सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — ने ECI के नाम पर उनकी जानकारी के बिना लिए गए फैसलों पर आपत्ति जताई।
- आयुक्तों ने मतदाता पंजीकरण फॉर्म में एकपक्षीय बदलाव, आईटी प्रणालियों पर केंद्रीकृत नियंत्रण तथा नाम हटाने और बहाल करने के फैसलों पर चिंता जताई।
- गोवा का मामला: SIR के तहत ज़मीनी अधिकारियों द्वारा पात्र पाए गए 97 मतदाता सूची में नहीं जोड़े जा सके, क्योंकि सॉफ्टवेयर ने अद्यतन दर्ज करने की अनुमति नहीं दी।
- संशोधित फॉर्म 6 में नए मतदाता को घोषित करना होता है कि वह, उसके माता-पिता या दादा-दादी 'अंतिम SIR' सूची में थे या नहीं; लवासा के अनुसार फॉर्म सार्वजनिक क्षेत्र में है और यह दावा सत्यापित है।
- लवासा का तर्क: कानून एक ही फॉर्म निर्धारित करता है, लेकिन दूसरे फॉर्म का उपयोग हो रहा है — किस अधिकार से बदला गया?
- आयुक्तों का कहना है कि अपनाई गई प्रक्रिया ERO (निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी) की सांविधिक शक्तियों में बाधा डाल रही है।
- एक RTI मामले में याचिकाकर्ताओं ने SIR कराने के फैसले वाली बैठकों के कार्यवृत्त मांगे; ECI ने कहा कि ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया।
- लवासा ने कहा कि ECI का संचालन कानून से तय होता है, जिसमें फैसले यथासंभव सर्वसम्मति से, अन्यथा बहुमत से लिए जाते हैं — 'दो हमेशा एक से अधिक है'।
समयरेखा
- 2019तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने आदर्श आचार संहिता उल्लंघन के आरोपी नेताओं को ECI द्वारा क्लीन चिट देने पर सार्वजनिक असहमति जताई।
- तिथि स्रोत में नहींSIR के तहत गोवा में ERO द्वारा पात्र माने गए 97 मतदाता सॉफ्टवेयर की बाधा के कारण सूची में नहीं जोड़े जा सके।
- तिथि स्रोत में नहींRTI याचिका में SIR के फैसले वाली बैठकों के कार्यवृत्त मांगे गए; ECI ने कहा कि ऐसा रिकॉर्ड नहीं रखा गया।
- तिथि स्रोत में नहींन्यायालय ने अब तक केवल यह तय किया है कि ECI के पास इस तरह का SIR कराने की संवैधानिक शक्ति है या नहीं।
- बुधवार (रिपोर्ट प्रकाशन)इंडियन एक्सप्रेस ने दो आयुक्तों की आपत्तियों का खुलासा किया; ECI ने आरोपों से इनकार किया।
- इसके बादHT से बातचीत में अशोक लवासा ने SIR रद्द करने और आयोग द्वारा पूरे तथ्य सार्वजनिक करने की मांग की।
किसका दाँव
- भारत निर्वाचन आयोग (ECI) — संस्थागत विश्वसनीयता और सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया की पारदर्शिता; आरोपों से इनकार के बाद तथ्यों सहित आधिकारिक स्पष्टीकरण का दबाव।
- चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — आयोग के फैसलों में भागीदारी और उनकी आपत्तियों का दर्ज होना; लवासा के अनुसार बहुमत का निर्णय प्रबल होना चाहिए था।
- अशोक लवासा (पूर्व चुनाव आयुक्त) — आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर सार्वजनिक सवाल; SIR रद्द करने और कानूनी प्रक्रियाओं की जांच की मांग।
- ERO और BLO जैसे ज़मीनी चुनाव अधिकारी — कानून द्वारा दी गई नाम जोड़ने/हटाने की सांविधिक शक्ति; केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर से उनकी शक्ति बाधित होने का आरोप।
- मतदाता (जैसे गोवा के 97 पात्र मतदाता) — पात्र पाए जाने के बावजूद सूची में नाम न जुड़ पाने से मताधिकार पर सीधा असर।
- न्यायपालिका — अब तक केवल संवैधानिक शक्ति पर निर्णय; प्रक्रियागत और कानूनी वैधता की जांच का क्षेत्र लवासा के अनुसार खुला है।
क्यों अहम है
मतदाता सूची की शुद्धता और उस पर अधिकारियों की कानून-प्रदत्त शक्ति स्वतंत्र चुनाव की बुनियाद है; गोवा में 97 पात्र मतदाताओं का नाम सॉफ्टवेयर के कारण न जुड़ पाना दिखाता है कि तकनीकी केंद्रीकरण सांविधिक प्रक्रिया पर भारी पड़ सकता है। तीन सदस्यीय आयोग में दो आयुक्तों का यह कहना कि फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए गए, आयोग की सामूहिक निर्णय-प्रणाली और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। SIR की प्रक्रियागत वैधता अब जनता के भरोसे और संभावित न्यायिक समीक्षा दोनों का विषय है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- SIR = विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision), मतदाता सूची पुनरीक्षण की ECI प्रक्रिया।
- फॉर्म 6 = नए मतदाता के पंजीकरण का फॉर्म; संशोधित रूप में स्वयं/माता-पिता/दादा-दादी के 'अंतिम SIR' सूची में होने की घोषणा मांगी गई।
- ERO (निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी) के पास नाम जोड़ने/हटाने की सांविधिक शक्ति; BLO ज़मीनी स्तर का अधिकारी।
- ERONET = मतदाता सूची से जुड़ी आईटी प्रणाली; केंद्रीकृत नियंत्रण पर आयुक्तों ने आपत्ति जताई।
- कानून के अनुसार ECI के फैसले यथासंभव सर्वसम्मति से, अन्यथा बहुमत से लिए जाते हैं।
- अशोक लवासा ने 2019 में आदर्श आचार संहिता मामलों में ECI की क्लीन चिट से सार्वजनिक असहमति जताई थी।
मेन्स दृष्टिकोण
यह प्रकरण एक संवैधानिक निकाय के भीतर निर्णय-प्रक्रिया की वैधता का प्रश्न है। आरोप तीन स्तरों पर हैं: (क) कानून द्वारा निर्धारित फॉर्म 6 को उचित प्रक्रिया के बिना बदलना, (ख) केंद्रीकृत आईटी नियंत्रण (ERONET) के जरिए ERO की सांविधिक शक्तियों में बाधा, जिसका ठोस उदाहरण गोवा में पात्र पाए गए 97 मतदाताओं का नाम न जुड़ पाना है, और (ग) तीन सदस्यीय आयोग में दो आयुक्तों की जानकारी के बिना ECI के नाम पर फैसले लेना, जबकि कानून सर्वसम्मति या बहुमत से निर्णय की अपेक्षा करता है। लवासा के अनुसार तकनीक केवल एक साधन है; सूचियों के एकीकरण में कोई बुराई नहीं, पर वह कानून द्वारा अधिकारियों को दी गई शक्ति को छीन नहीं सकती। RTI में बैठकों के कार्यवृत्त न होने का उत्तर और आरोपों का सादा खंडन, उनके मत में, पर्याप्त नहीं — आयोग को तथ्यों सहित बताना चाहिए कि फैसले कब और किस बैठक में लिए गए और आयुक्त उपस्थित थे या नहीं। आगे का रास्ता: SIR रद्द करना, पूर्ण तथ्यों का सार्वजनिक प्रकटन, यह जांच कि कोई कानूनी प्रक्रिया उल्लंघित हुई या नहीं, और चूँकि अदालत ने अब तक केवल संवैधानिक शक्ति पर विचार किया है, प्रक्रियागत वैधता की न्यायिक पड़ताल का क्षेत्र खुला है।
मुख्य शब्द
- SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण)
- मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण करने की ECI प्रक्रिया, जिसे लवासा रद्द करने की मांग कर रहे हैं।
- फॉर्म 6
- नए मतदाता के पंजीकरण का निर्धारित फॉर्म; इसमें 'अंतिम SIR' सूची से संबंध की घोषणा जोड़ी गई।
- ERO (निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी)
- वह अधिकारी जिसे कानून के तहत आवेदन सुनकर नाम जोड़ने या हटाने की शक्ति प्राप्त है।
- BLO (बूथ स्तर अधिकारी)
- ज़मीनी स्तर पर मतदाता सूची से जुड़ा अधिकारी, जिसकी भूमिका सूची की प्रामाणिकता में रही है।
- ERONET
- मतदाता सूची प्रबंधन की तकनीकी प्रणाली; इसके केंद्रीकृत नियंत्रण पर आयुक्तों ने चिंता जताई।
- आदर्श आचार संहिता (MCC)
- चुनाव के दौरान नेताओं/दलों के आचरण के नियम; 2019 में इसके उल्लंघन मामलों में लवासा ने असहमति जताई थी।
अभ्यास प्रश्न
- भारत निर्वाचन आयोग जैसे बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय में सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया क्यों आवश्यक है? SIR विवाद के आलोक में परीक्षण कीजिए।
- मतदाता सूची प्रबंधन में तकनीकी केंद्रीकरण, ERO जैसी सांविधिक शक्तियों को कैसे प्रभावित कर सकता है? गोवा के 97 मतदाताओं के उदाहरण से समझाइए।
- क्या SIR जैसी प्रक्रियाओं की प्रक्रियागत वैधता न्यायिक समीक्षा का विषय होनी चाहिए, जबकि अदालत ने अब तक केवल संवैधानिक शक्ति पर निर्णय दिया है? चर्चा कीजिए।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
