ईसीआई में मतभेद की रिपोर्ट पर विपक्ष के निशाने पर ज्ञानेश कुमार

चुनाव आयोग में आंतरिक मतभेद का दावा करने वाली इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद विपक्षी नेताओं ने बुधवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं। राहुल गांधी ने कथित "वोट चोरी" को देशद्रोह कहा, तो अरविंद केजरीवाल ने कुमार की गिरफ्तारी और एसआईआर रद्द करने की मांग की। आयोग ने कहा, मतभेद सामान्य हैं और फैसले सर्वसम्मति से हुए।

स्रोत

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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi raised written objections at least 14 times over 10 months. — Attributed in source to an Indian Express report; not independently confirmed in the text.
  • The ECI says differing views are normal and all decisions were unanimous with full legal sanction. — Attributed to the Election Commission's official response quoted in the source.
  • Arvind Kejriwal's claim that 13 crore names were deleted nationwide under SIR and that the process is illegal. — Attributed to Kejriwal as an allegation; figure is his claim, with no official corroboration in the source.
  • Rahul Gandhi calling alleged 'vote chori' treason by BJP, RSS and EC. — Direct quote attributed to Gandhi on X and in a video message; allegation, not established fact.
  • Uddhav Thackeray's statement that the two commissioners wrote to the cabinet secretary. — Attributed to Thackeray; not corroborated elsewhere in the source.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने विपक्ष को वही चीज़ दे दी है जिसकी उसके 'वोट चोरी' अभियान में कमी थी — आयोग के बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से असहमति का दावा। इसीलिए कांग्रेस, सपा, आप, शिवसेना (यूबीटी), टीएमसी, डीएमके और वामदल एक ही दिन एक सुर में उतर आए, जो अलग-अलग लड़ने वाले दलों के लिए दुर्लभ साझा ज़मीन है। लेकिन मांगें साफ़ तौर पर बँटी हुई हैं: अखिलेश यादव भविष्य के चुनावों पर, केजरीवाल गिरफ़्तारी और चुनाव रद्द करने पर, चिदंबरम संसदीय समीक्षा पर टिके हैं। आयोग अपनी 'मतभेद सामान्य हैं, फ़ैसले सर्वसम्मत थे' पंक्ति से इस विवाद को प्रक्रियागत बहस तक सीमित करने की कोशिश कर रहा है।

  • सबसे ज़्यादा फ़ायदा विपक्ष को: अब तक पक्षपाती कहकर खारिज किया गया आरोप अब आयोग की कथित आंतरिक प्रक्रिया से जोड़ा जा सकता है।
  • मांगों का फैलाव एकता को कमज़ोर कर सकता है — चुनाव रद्द कराना या सीईसी की गिरफ़्तारी, एसआईआर रोकने या संसदीय समीक्षा से कहीं कठिन लक्ष्य हैं।
  • उद्धव ठाकरे का प्रधानमंत्री से कार्रवाई की मांग करना रणनीतिक है, जो लड़ाई को 'आयोग बनाम विपक्ष' से 'सरकार बनाम संवैधानिक संस्थाएँ' की ओर मोड़ता है।
  • मनीष तिवारी की 'अदृश्य हाथ' और केजरीवाल की 'केंद्रीकरण' वाली दलील, दोनों बहस को एक अधिकारी के आचरण से हटाकर संस्था की विश्वसनीयता पर ले जाती हैं।
  • आयोग की प्रतिक्रिया रक्षात्मक पर सोची-समझी है: 14 नोट्स को बड़ी संख्या में हुए फ़ैसलों के सामने रखकर वह 'तस्वीर का एक पहलू' का फ़्रेम गढ़ता है।

किस पर नज़र रखें — देखना यह है कि एसआईआर जारी रहते और आगामी राज्य चुनावों के बीच विपक्ष इसे संसद के अंदर टिकाऊ साझा मंच बनाता है या अलग-अलग मांगों में बिखर जाता है।

रिपोर्ट के दावों की स्वतंत्र पुष्टि यहाँ नहीं है, और यह खबर यह स्थापित नहीं करती कि आपत्तियाँ कितनी गंभीर थीं, एसआईआर की वैधता पर उनका क्या असर है, या दोनों आयुक्त स्वयं सार्वजनिक रूप से क्या कहते हैं।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में लिए गए फैसलों पर आंतरिक असहमति रही। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं, जिनमें मतदाता सूची में बदलाव, एसआईआर, फॉर्म 6 और मतदाता सूची डेटा तक पहुंच से जुड़े मुद्दे शामिल थे। इसके बाद बुधवार को राहुल गांधी, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, उद्धव ठाकरे सहित विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई, हटाने, गिरफ्तारी या हाल के चुनावों की समीक्षा की मांग की। आयोग ने रिपोर्ट का खंडन करते हुए कहा कि भिन्न विचार उसकी आंतरिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और सभी फैसले पूर्ण आयोग द्वारा सर्वसम्मति से लिए गए।

मुख्य तथ्य

  • इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं।
  • आपत्तियां मतदाता सूची में बदलाव, एसआईआर, फॉर्म 6 और मतदाता सूची डेटा तक पहुंच से जुड़े आदेशों पर थीं; रिपोर्ट में डेटाबेस के 'क्रमिक केंद्रीकरण' का भी उल्लेख।
  • रिपोर्ट के मुताबिक एक लिखित आपत्ति में संधू ने आयुक्तों की लिखित सलाह के विपरीत की गई कार्रवाई को 'अनधिकृत और अवैध' बताया।
  • राहुल गांधी ने एक्स पर कथित 'वोट चोरी' को भारतीय जनता के खिलाफ अपराध और संविधान पर सीधा हमला कहा; भाजपा, आरएसएस और ईसी पर 'देशद्रोह' का आरोप लगाया।
  • अरविंद केजरीवाल ने दावा किया कि एसआईआर के जरिए देशभर में 13 करोड़ नाम हटाए गए और पूरी प्रक्रिया अवैध है; तीन साल पुरानी मतदाता सूची बहाल करने की मांग की।
  • केजरीवाल ने दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र के हाल के चुनाव रद्द कर दोबारा कराने तथा ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी व अभियोजन की मांग की।
  • अखिलेश यादव ने मांग की कि भविष्य के चुनाव ज्ञानेश कुमार के अधीन न हों; आरोप लगाया कि 'यूपी मॉडल' पश्चिम बंगाल और बिहार में लागू किया गया।
  • चुनाव आयोग ने कहा कि सभी आदेशों को 'पूर्ण कानूनी स्वीकृति' है और पिछले एक वर्ष के फैसले पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति का परिणाम हैं; ईसीआईनेट सख्त डेटा-सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत चलता है।

समयरेखा

  1. पिछले 10 महीने (रिपोर्ट के अनुसार)चुनाव आयुक्त संधू और जोशी ने कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं।
  2. रिपोर्ट प्रकाशित होने परइंडियन एक्सप्रेस ने आयोग में आंतरिक असहमति, एसआईआर व डेटाबेस केंद्रीकरण पर आपत्तियों की खबर दी।
  3. बुधवारराहुल गांधी, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, उद्धव ठाकरे सहित विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
  4. इसके बादचुनाव आयोग ने रिपोर्ट का खंडन किया—भिन्न विचार सामान्य, फैसले सर्वसम्मत।

किसका दाँव

  • मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार — विपक्ष उनके हटाने, गिरफ्तारी और अभियोजन की मांग कर रहा है; एकपक्षीय आदेश जारी करने के आरोप।
  • चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं; उनकी सलाह की अवहेलना का दावा।
  • भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) — संस्थागत विश्वसनीयता और निर्णय-प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल; आयोग ने खंडन जारी किया।
  • विपक्षी दल (कांग्रेस, सपा, आप, शिवसेना-यूबीटी, टीएमसी, राजद, डीएमके, सीपीआई-एम) — एसआईआर रोकने, हाल के चुनावों की समीक्षा और संसदीय समिति से जांच की मांग।
  • मतदाता — नाम हटाए जाने और मतदाता सूची में बदलाव से मताधिकार प्रभावित होने की आशंका।
  • ईआरओ और जिला निर्वाचन अधिकारी — मतदाता पंजीकरण/विलोपन पर उनके सांविधिक अधिकार और डेटाबेस तक पहुंच का प्रश्न।

क्यों अहम है

चुनाव आयोग की साख भारत की चुनावी व्यवस्था की नींव है; उसके भीतर निर्णय-प्रक्रिया पर सवाल उठने का असर चुनाव परिणामों की स्वीकार्यता पर पड़ता है। विवाद का केंद्र एसआईआर, मतदाता सूची में नाम हटाने और डेटाबेस के केंद्रीकरण जैसे मुद्दे हैं, जो सीधे नागरिकों के मताधिकार से जुड़े हैं। तीन सदस्यीय आयोग में सर्वसम्मति या बहुमत से फैसले लेने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है, यह प्रश्न भी संस्थागत जवाबदेही से जुड़ा है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • भारत निर्वाचन आयोग तीन सदस्यीय निकाय है—एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त; वर्तमान सीईसी ज्ञानेश कुमार, आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी।
  • कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी के अनुसार तीन सदस्यीय आयोग में फैसले सर्वसम्मति से या असहमति की स्थिति में बहुमत से लिए जाते हैं।
  • एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया है, जो विवाद के केंद्र में है।
  • ईसीआईनेट चुनाव आयोग का डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसे आयोग ने सख्त डेटा-सुरक्षा प्रोटोकॉल के अधीन बताया।
  • फॉर्म 6 नए मतदाता के पंजीकरण से जुड़ा आवेदन प्रपत्र है; इसमें बदलाव पर केजरीवाल ने सवाल उठाए।
  • पी. चिदंबरम ने ईसीआई के हाल के फैसलों की संसदीय समिति से समीक्षा और एसआईआर स्थगित करने की मांग की।

मेन्स दृष्टिकोण

यह प्रकरण चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय-प्रक्रिया, पारदर्शिता और संस्थागत विश्वसनीयता के प्रश्न को केंद्र में लाता है। रिपोर्ट के अनुसार दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं—मुख्यतः एसआईआर, मतदाता सूची में बदलाव, फॉर्म 6 और मतदाता सूची डेटाबेस के 'क्रमिक केंद्रीकरण' पर—और एक आपत्ति में कार्रवाई को 'अनधिकृत और अवैध' कहा गया। विपक्ष इसे मताधिकार पर हमला बताकर सीईसी को हटाने, गिरफ्तारी, एसआईआर रद्द करने और हाल के चुनावों की समीक्षा या पुनर्मतदान की मांग कर रहा है; कांग्रेस ने संसदीय समिति से समीक्षा का सुझाव दिया है। दूसरी ओर आयोग का तर्क है कि लिखित नोट और भिन्न मत उसकी आंतरिक 'चेक्स-एंड-बैलेंस' प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं, जो पारदर्शिता, विधिक अनुपालन और परिचालन कठोरता सुनिश्चित करते हैं, सभी आदेश सांविधिक प्रक्रिया के अनुरूप और सर्वसम्मत हैं, तथा केवल 14 नोटों पर ध्यान देना एकपक्षीय चित्र है। आगे का रास्ता आयोग की निर्णय-प्रक्रिया के अभिलेखन और सार्वजनिक संप्रेषण को अधिक स्पष्ट बनाने, ईआरओ/डीईओ के सांविधिक अधिकारों की रक्षा, डेटा-सुरक्षा प्रोटोकॉल की स्वतंत्र पुष्टि और संसदीय पर्यवेक्षण के माध्यम से विश्वास बहाली में निहित दिखता है।

मुख्य शब्द

एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन)
मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण; केजरीवाल के दावे के अनुसार इसके तहत देशभर में 13 करोड़ नाम हटाए गए।
फॉर्म 6
मतदाता पंजीकरण से जुड़ा प्रपत्र, जिसमें किए गए बदलावों पर विपक्ष ने सवाल उठाए।
ईसीआईनेट
चुनाव आयोग का डिजिटल प्लेटफॉर्म, जिसे आयोग ने सख्त डेटा-सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत संचालित बताया।
ईआरओ (निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी)
मतदाता पंजीकरण और नाम हटाने के सांविधिक अधिकार रखने वाला अधिकारी; डेटाबेस पहुंच पर विवाद।
'वोट चोरी'
राहुल गांधी द्वारा प्रयुक्त शब्द, जिसे उन्होंने जनता के खिलाफ अपराध और संविधान पर सीधा हमला कहा।
'अदृश्य हाथ'
मनीष तिवारी का आरोप कि आयोग के बाहर से कोई शक्ति उसके कामकाज को प्रभावित कर रही है।

अभ्यास प्रश्न

  1. भारत निर्वाचन आयोग की बहु-सदस्यीय संरचना संस्थागत जवाबदेही को कैसे प्रभावित करती है? हाल के विवाद के संदर्भ में परीक्षण करें।
  2. मतदाता सूची के पुनरीक्षण (एसआईआर) और मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण से जुड़ी चिंताओं का मताधिकार पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? चर्चा करें।
  3. संवैधानिक निकायों की विश्वसनीयता बनाए रखने में पारदर्शिता और संसदीय पर्यवेक्षण की भूमिका पर टिप्पणी कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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