समलैंगिक, अविवाहित साथी ले सकते हैं चिकित्सा निर्णय: एनएमसी

समलैंगिक साथी और अविवाहित जोड़े आपात स्थिति में अपने साथी की ओर से चिकित्सा निर्णय ले सकते हैं, बशर्ते अक्षमता की स्थिति के लिए उन्हें नामित या अधिकृत किया गया हो, राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) ने बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट में हलफनामे में कहा। यह भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद विनियम, 2002 के नियम 7.16 के विरुद्ध अर्शिया टक्कर की याचिका पर दाखिल हुआ। पूर्व नामांकन के बिना भी, कानून, सत्यापन और सुरक्षा उपायों के अधीन साथी को 'नेक्स्ट फ्रेंड' माना जा सकता है। जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा की बेंच 17 सितंबर को इस पर विचार करेगी।

स्रोत

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Same-sex partners and unmarried couples can make medical decisions for an incapacitated partner if nominated or authorised. — Attributed to an NMC affidavit filed in the Delhi High Court on Wednesday; quoted directly in source.
  • Petitioner Arshiya Takkar challenged regulation 7.16 of the Indian Medical Council (Professional Conduct, Etiquette and Ethics) Regulations, 2002. — Named petitioner and regulation appear in source; no court document cited beyond the report.
  • On August 20 the court questioned the government over exclusion of same-sex and unmarried partners from such decisions. — Date and observation stated in source, attributed to the court.
  • NMC cited the October 2023 Supreme Court verdict declining recognition of same-sex marriage and an August 2024 ration card advisory. — Both references appear in source as part of the affidavit's reasoning; figures/dates internally consistent.
  • A bench of Justice Swarana Kanta Sharma will consider the affidavit on September 17. — Judge's name and hearing date appear in source; no further attribution given.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

यह अदालत का फैसला नहीं है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह एक अहम कदम है: एक सरकारी नियामक विवाह की मान्यता जैसे विवादास्पद सवाल को छुए बिना, प्रशासनिक स्तर पर व्यावहारिक अधिकार बढ़ाने का रास्ता चुन रहा है। 2023 के सुप्रीम कोर्ट फैसले ने समान-लिंगी विवाह को मान्यता देने से इंकार किया, मगर ऐसे संबंधों को लाभ देने की जिम्मेदारी राज्य पर डाली — और एनएमसी ने इस हलफनामे को राशन कार्ड एडवाइजरी तथा संयुक्त बैंक खाते की स्पष्टता के साथ जोड़कर रखा है। यानी विवाह कानून बदले बिना, नियामक व्याख्या के जरिए आगे बढ़ना।

  • नियम 7.16 को "सामंजस्यपूर्ण ढंग से पढ़ने" की व्याख्या से कानून बनाने की जरूरत टलती है, और संसदीय टकराव से भी बचाव होता है।
  • यह हलफनामा 20 अगस्त को अदालत के सवालों के बाद आया — न्यायिक दबाव ने प्रशासनिक स्पष्टता को तेज किया।
  • याचिकाकर्ता के लिए यह जीत है, पर "लागू कानून, सत्यापन और सुरक्षा उपायों के अधीन" जैसी शर्तें व्यवहार में अस्पतालों के विवेक पर बहुत कुछ छोड़ देती हैं।
  • चूंकि दायरा आपातकालीन चिकित्सा निर्णयों तक सीमित है, वैवाहिक दर्जे तक नहीं, इसलिए तीखे रूढ़िवादी विरोध की संभावना कम दिखती है।
  • राजनीतिक लाभ दो पक्षों को है — अधिकार पैरोकारों को एक ठोस हक मिला, और सरकार कह सकती है कि विवाह की परिभाषा अछूती है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि 17 सितंबर को जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा की बेंच इस हलफनामे को किस तरह लेती है — बयान से संतुष्ट होती है या स्पष्ट दिशानिर्देश/सर्कुलर मांगती है।

यह अभी अदालती आदेश नहीं, केवल एक नियामक का रुख है; नियम 7.16 में औपचारिक संशोधन होगा या नहीं, अस्पताल इसे कैसे लागू करेंगे और सरकार के अन्य विभागों का रुख क्या है — यह खबर नहीं बताती।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 5 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (व्यावसायिक आचरण, शिष्टाचार एवं नैतिकता) विनियम, 2002 के नियम 7.16 के तहत चिकित्सा प्रक्रियाओं और इलाज के लिए सहमति पति या पत्नी, माता-पिता, या अवयस्क/रोगी के मामले में अभिभावक से लेना अनिवार्य है। इसी नियम को अर्शिया टक्कर ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी, यह मांग करते हुए कि सरकार समलैंगिक साथियों को चिकित्सा स्थितियों और आपात स्थितियों में सहमति देने की अनुमति देने वाले दिशानिर्देश बनाए। इसी याचिका के जवाब में राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) ने बुधवार को हलफनामा दाखिल किया, जिसमें कहा गया कि नामित या अधिकृत समलैंगिक साथी और अविवाहित जोड़े आपात स्थिति में एक-दूसरे की ओर से चिकित्सा निर्णय ले सकते हैं।

मुख्य तथ्य

  • एनएमसी ने बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा कि समलैंगिक साथी और अविवाहित जोड़े, अक्षमता की स्थिति के लिए नामित/अधिकृत होने पर, साथी की ओर से आपात चिकित्सा निर्णय ले सकते हैं।
  • याचिका भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (व्यावसायिक आचरण, शिष्टाचार एवं नैतिकता) विनियम, 2002 के नियम 7.16 के विरुद्ध है, जो सहमति पति/पत्नी, माता-पिता या अभिभावक से अनिवार्य करता है।
  • एनएमसी ने कहा कि पूर्व नामांकन के अभाव में भी साथी को उपयुक्त परिस्थितियों में, लागू कानून, सत्यापन और सुरक्षा उपायों के अधीन, 'देखभाल के संबंध' में व्यक्ति या 'नेक्स्ट फ्रेंड' माना जा सकता है।
  • हलफनामे के अनुसार जहां सक्षम वयस्क ने साथी को अधिकृत किया है, वहां केवल लिंग, जेंडर या यौन रुझान के आधार पर या विवाह की पारंपरिक समझ में न आने के कारण उसे बाहर रखने का कोई चिकित्सीय या नैतिक आधार नहीं दिखता।
  • 20 अगस्त को अदालत ने सरकार से आपात स्थिति में एक-दूसरे के लिए चिकित्सा निर्णय लेने से समलैंगिक साथियों और अविवाहित जोड़ों को बाहर रखने पर सवाल किया।
  • एनएमसी ने अक्टूबर 2023 के सुप्रीम कोर्ट फैसले का हवाला दिया, जिसने समलैंगिक विवाह/सिविल यूनियन को कानूनी मान्यता देने से इनकार किया, पर राज्य को ऐसे संबंधों को मान्यता देने और लाभ देने के लिए बाध्य ठहराया।
  • अगस्त 2024 की एक एडवाइजरी के तहत क्वीयर संबंध में साथियों को राशन कार्ड के प्रयोजन से एक ही परिवार के सदस्य माना जा सकता है।
  • केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि क्वीयर समुदाय के सदस्यों के संयुक्त बैंक खाते खोलने या क्वीयर संबंध में व्यक्ति को नामिती बनाने पर कोई रोक नहीं है।

समयरेखा

  1. अक्टूबर 2023सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह/सिविल यूनियन को कानूनी मान्यता देने से इनकार किया, लेकिन कहा कि राज्य ऐसे संबंधों को मान्यता देकर लाभ देने के लिए बाध्य है।
  2. अगस्त 2024एडवाइजरी के तहत क्वीयर संबंध में साथियों को राशन कार्ड के प्रयोजन से एक ही परिवार का सदस्य माना जाना अनुमत।
  3. 20 अगस्तदिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार से समलैंगिक साथियों व अविवाहित जोड़ों को चिकित्सा निर्णय से बाहर रखने पर सवाल किया; कहा कि लिव-इन संबंधों की मान्यता के साथ संगत अधिकार भी आने चाहिए।
  4. बुधवार (हलफनामा दाखिल)एनएमसी ने दिल्ली हाईकोर्ट में हलफनामा दाखिल कर नामित साथियों द्वारा चिकित्सा निर्णय लेने का समर्थन किया।
  5. 17 सितंबरजस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा की बेंच हलफनामे पर विचार करेगी।

किसका दाँव

  • राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) — चिकित्सा शिक्षा, पेशेवरों, संस्थानों और शोध का नियामक; नियम 7.16 की सामंजस्यपूर्ण व्याख्या का पक्ष रखा।
  • अर्शिया टक्कर (याचिकाकर्ता) — समलैंगिक साथियों को चिकित्सा स्थितियों व आपात स्थितियों में सहमति देने की अनुमति वाले दिशानिर्देश बनवाने की मांग।
  • दिल्ली हाईकोर्ट, जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा की बेंच — 17 सितंबर को हलफनामे पर विचार; नियम 7.16 के दायरे पर निर्णय।
  • समलैंगिक साथी, अविवाहित/लिव-इन जोड़े और क्वीयर समुदाय — आपात स्थिति में साथी की ओर से चिकित्सा निर्णय लेने का अधिकार, राशन कार्ड व संयुक्त बैंक खाते जैसे लाभ।
  • केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय — क्वीयर समुदाय के लिए भेदभाव कम करने व स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत करने के उपाय; असाध्य रोगियों के मामले में मित्रों/निकट परिचितों को निर्णय की अनुमति।
  • केंद्रीय वित्त मंत्रालय — क्वीयर व्यक्तियों के संयुक्त बैंक खाते और नामिती बनाने पर रोक न होने की स्पष्टता।
  • अस्पताल व चिकित्सक — सहमति लेने के लिए किसे अधिकृत माना जाए, इस पर स्पष्टता; सत्यापन व सुरक्षा उपायों का पालन।

क्यों अहम है

आपात स्थिति में सहमति देने वाला कौन है, यह इलाज की गति और रोगी की गरिमा तय करता है; अब तक नियम 7.16 की शब्दावली विवाहित परिवारों तक सीमित मानी जाती थी। एनएमसी का रुख यह दर्शाता है कि विवाह की कानूनी मान्यता के अभाव में भी क्वीयर और लिव-इन साथियों को व्यावहारिक अधिकार दिए जा सकते हैं, जैसे राशन कार्ड और बैंक नामांकन में हुआ। अदालत का फैसला अस्पतालों के लिए एकरूप प्रक्रिया और भेदभाव-मुक्त इलाज का आधार बन सकता है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • नियम 7.16, भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (व्यावसायिक आचरण, शिष्टाचार एवं नैतिकता) विनियम, 2002 — चिकित्सा प्रक्रिया के लिए पति/पत्नी, माता-पिता या अभिभावक से सहमति अनिवार्य।
  • एनएमसी चिकित्सा शिक्षा, पेशेवरों, संस्थानों और शोध का नियमन करता है।
  • अक्टूबर 2023: सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह/सिविल यूनियन को मान्यता देने से इनकार किया, पर राज्य को ऐसे संबंधों को मान्यता व लाभ देने के लिए बाध्य बताया।
  • अगस्त 2024 एडवाइजरी: राशन कार्ड के लिए क्वीयर साथी एक ही परिवार के सदस्य माने जा सकते हैं।
  • वित्त मंत्रालय: क्वीयर व्यक्तियों के संयुक्त बैंक खाते खोलने व नामिती बनाने पर कोई रोक नहीं।
  • मामले की सुनवाई: जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा की बेंच, 17 सितंबर; याचिकाकर्ता अर्शिया टक्कर।

मेन्स दृष्टिकोण

मुद्दा यह है कि विवाह-केंद्रित सहमति ढांचा (नियम 7.16) उन साथियों को बाहर कर देता है जिनका संबंध कानूनी विवाह के दायरे में नहीं आता, जिससे आपात चिकित्सा निर्णयों में देरी और भेदभाव की आशंका बनती है। इसका कारण अक्टूबर 2023 के सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद बनी स्थिति है, जिसमें समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं मिली, पर राज्य पर ऐसे संबंधों को मान्यता देकर लाभ देने का दायित्व बताया गया; दिल्ली हाईकोर्ट ने 20 अगस्त को टिप्पणी की कि लिव-इन संबंधों की मान्यता के साथ संगत अधिकार भी आने चाहिए और बहुसंख्यक से भिन्न राह चुनने वालों को अक्सर निशाना बनाया जाता है। एनएमसी का हलफनामा एक व्यावहारिक रास्ता सुझाता है — नियम 7.16 को कानूनी ढांचे के साथ सामंजस्यपूर्ण और उद्देश्यपरक ढंग से पढ़ा जाए, ताकि सक्षम वयस्क द्वारा विधिवत नामित/अधिकृत साथी को लिंग, जेंडर, यौन रुझान या औपचारिक वैवाहिक संबंध के अभाव के आधार पर बाहर न रखा जाए, और पूर्व नामांकन के अभाव में उसे 'देखभाल के संबंध' में व्यक्ति या 'नेक्स्ट फ्रेंड' माना जाए। आगे का रास्ता: सत्यापन और सुरक्षा उपायों सहित स्पष्ट दिशानिर्देश, राशन कार्ड व बैंक नामांकन जैसी प्रशासनिक स्वीकृतियों की तर्ज पर स्वास्थ्य क्षेत्र में एकरूपता, तथा असाध्य रोगियों के मामले में मित्र/निकट परिचित को निर्णय की अनुमति देने वाले स्वास्थ्य मंत्रालय के उपायों का विस्तार।

मुख्य शब्द

एनएमसी (राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग)
चिकित्सा शिक्षा, चिकित्सा पेशेवरों, संस्थानों और शोध का नियमन करने वाला निकाय।
नियम 7.16, आईएमसी विनियम 2002
चिकित्सा प्रक्रिया/इलाज के लिए पति या पत्नी, माता-पिता या अवयस्क/रोगी के मामले में अभिभावक से सहमति अनिवार्य करता है।
नेक्स्ट फ्रेंड
वह व्यक्ति जो अक्षम रोगी की ओर से, उपयुक्त परिस्थितियों तथा कानून, सत्यापन व सुरक्षा उपायों के अधीन, निर्णय ले सकता है।
सामंजस्यपूर्ण एवं उद्देश्यपरक व्याख्या
नियम को कानूनी ढांचे के साथ इस तरह पढ़ना कि उसका उद्देश्य पूरा हो और अनुचित बहिष्कार न हो।
अक्षमता (incapacity)
वह स्थिति जिसमें रोगी स्वयं चिकित्सा निर्णय लेने में असमर्थ हो, जिसके लिए पूर्व नामांकन/अधिकार-पत्र प्रासंगिक होता है।
हलफनामा (एफिडेविट)
अदालत में दाखिल शपथपत्र, जिसमें पक्ष अपना आधिकारिक रुख दर्ज कराता है।

अभ्यास प्रश्न

  1. आपात चिकित्सा निर्णयों में सहमति देने के अधिकार को विवाह से जोड़ने के क्या परिणाम हैं? नियम 7.16 पर एनएमसी के रुख के आलोक में परीक्षण करें।
  2. अक्टूबर 2023 के सुप्रीम कोर्ट फैसले में समलैंगिक विवाह को मान्यता न देते हुए भी राज्य पर लाभ विस्तारित करने का दायित्व बताया गया। राशन कार्ड, बैंक नामांकन और चिकित्सा सहमति के उदाहरणों से इस दायित्व के क्रियान्वयन का मूल्यांकन करें।
  3. 'नेक्स्ट फ्रेंड' के रूप में साथी को मान्यता देने में सत्यापन और सुरक्षा उपाय क्यों आवश्यक हैं? रोगी की स्वायत्तता और दुरुपयोग की आशंका के बीच संतुलन पर चर्चा करें।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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