वायु अनुदान से 573.88 करोड़ खर्च, मुंबई की रैंकिंग फिसली
15वें वित्त आयोग के वायु गुणवत्ता अनुदान के तहत मिले 620.11 करोड़ रुपये में से बीएमसी ने 573.88 करोड़ रुपये, यानी 92.54 प्रतिशत खर्च किए हैं। इसमें से 493.37 करोड़ रुपये (79.56 प्रतिशत) बेस्ट को इलेक्ट्रिक बसों के लिए दिए गए। बेस्ट का बेड़ा 2021-22 के 3,546 बसों से घटकर 2026-27 में 2,532 रह गया और ऑर्डर की गई 2,100 बसों में आधी अब तक नहीं मिलीं। 2026 स्वच्छ वायु सर्वे में मुंबई 48 शहरों में 28वें स्थान पर रहा, 2025 में 25वें स्थान पर था।
स्रोत
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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- BMC has spent Rs 573.88 crore, 92.54% of the Rs 620.11 crore received under the 15th Finance Commission air-quality grant. — Figure appears in source, attributed to documents obtained under the RTI Act by The Indian Express.
- Rs 493.37 crore (79.56%) was allocated to BEST for electric buses under a wet lease arrangement. — Figure appears in source and is internally consistent with the stated grant total.
- Mumbai ranked 28th among 48 cities in the 2026 national clean air survey, down from 25th in 2025. — Figure appears in source; survey findings said to have been announced earlier this month, no ranking agency named.
- BEST fleet fell from 3,546 buses in 2021-22 to 2,532 in 2026-27; about half of 2,100 ordered e-buses undelivered. — Attributed to source data and BEST officials; the 29% decline is consistent with the two fleet figures.
- No rule mandates a fixed share of the grant be spent on electric vehicles. — Attributed to an unnamed senior bureaucrat in the Union environment ministry.
विश्लेषकों की राय राय
यह पर्यावरण की कहानी से ज़्यादा जवाबदेही की कहानी है — कि मुंबई के नागरिक खर्च का हिसाब कौन देगा। केंद्रीय अनुदान का 92.54 प्रतिशत खर्च होने के बाद भी शहर 2023 के 10वें स्थान से 2026 में 28वें स्थान पर आ जाना, "पैसा गया, नतीजा नहीं" जैसे आसान चुनावी आरोप में बदल सकता है। प्रशासन का तर्क कि बड़े निर्माण कार्यों की धूल ने प्रदूषण बढ़ाया और प्राथमिकता वाहन उत्सर्जन घटाने की थी, राजनीतिक रूप से कमज़ोर नहीं है, मगर घटता बस बेड़ा उसे कमज़ोर करता है।
- निर्वाचित पार्षदों के बजाय प्रशासक के अधीन चल रही बीएमसी में इस खर्च की ज़िम्मेदारी का सवाल सीधे राज्य सरकार की ओर मुड़ता है।
- अनुदान का 79.56 प्रतिशत इलेक्ट्रिक बसों को देना — जबकि बीएमसी की अपनी योजना निर्माण धूल, सड़क धूल और कचरा जलाने को मुख्य कारण बताती है — विपक्ष को प्राथमिकताओं पर साफ़ हथियार देता है।
- केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारी का यह कहना कि ईवी पर तय हिस्सा खर्च करने का कोई नियम नहीं था, केंद्र और राज्य के बीच दोषारोपण की ज़मीन तैयार करता है।
- ऑर्डर की गई 2,100 बसों में आधी न मिलना और बेड़ा 3,546 से 2,532 रह जाना आम यात्री के रोज़मर्रा अनुभव से जुड़ा मुद्दा है, जो रैंकिंग से ज़्यादा वोट प्रभावित करता है।
- शोध और हॉटस्पॉट पहचान पर बहुत कम राशि खर्च होना, और वैज्ञानिक की आलोचना, इस आरोप को बल देते हैं कि दिखने वाली खरीद को तरजीह मिली।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि नगर निकाय चुनावों से पहले विपक्ष रैंकिंग गिरावट और बेस्ट के सिकुड़ते बेड़े को कितना बड़ा मुद्दा बनाता है, और बाकी 46.23 करोड़ रुपये के इस्तेमाल पर केंद्र-राज्य पत्राचार सार्वजनिक होता है या नहीं।
यह खबर यह साबित नहीं करती कि खर्च के तरीके से ही रैंकिंग गिरी, और न ही यह तय करती है कि बस आपूर्ति में देरी का ज़िम्मेदार कौन है या राजनीतिक कीमत कौन चुकाएगा।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 10 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
15वें वित्त आयोग (FFC) के तहत केंद्रीय वित्त मंत्रालय का व्यय विभाग राज्यों के शहरी स्थानीय निकायों को वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए अनुदान देता है, जिसकी सिफारिश पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) करता है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) को 2020-21 से 2022-23 के बीच इस मद में 620.11 करोड़ रुपये मिले, जिसका लगभग 80 प्रतिशत बेस्ट (BEST) की इलेक्ट्रिक बसों पर लगाया गया। सूचना का अधिकार कानून के तहत प्राप्त दस्तावेज़ों से सामने आया है कि खर्च 92.54 प्रतिशत तक पहुँच गया, लेकिन मुंबई की स्वच्छ वायु रैंकिंग फिर फिसल गई और बेस्ट का बस बेड़ा घटता गया। बीएमसी की अपनी मुंबई वायु प्रदूषण न्यूनीकरण योजना निर्माण-विध्वंस धूल, सड़क धूल और कचरे के खुले में जलने को शीर्ष तीन कारण बताती है।
मुख्य तथ्य
- बीएमसी को 15वें वित्त आयोग के वायु गुणवत्ता अनुदान से 2020-21 से 2022-23 के बीच 620.11 करोड़ रुपये मिले।
- जनवरी (इस वर्ष) तक 573.88 करोड़ रुपये यानी 92.54 प्रतिशत राशि खर्च हो चुकी थी; 46.23 करोड़ रुपये शेष।
- 493.37 करोड़ रुपये (79.56 प्रतिशत) बेस्ट को वेट लीज़ व्यवस्था के तहत इलेक्ट्रिक बसें लेने के लिए दिए गए।
- शेष राशि में 21.47 करोड़ कचरा प्रसंस्करण संयंत्र, 9.27 करोड़ हरित क्षेत्र विस्तार और 8.47 करोड़ श्मशानों में पीएनजी लाइनों के लिए निर्धारित।
- अनुसंधान पर मामूली खर्च: आईआईटी बॉम्बे की विशेषज्ञ व शोध सेवाओं के लिए 50 लाख रुपये निर्धारित, प्रदूषण हॉटस्पॉट पहचान पर 36 लाख रुपये खर्च।
- बेस्ट का बेड़ा 2021-22 के 3,546 बसों से घटकर 2026-27 में 2,532 रह गया, यानी लगभग 29 प्रतिशत की कमी।
- मार्च 2022 में बेस्ट ने 2,100 इलेक्ट्रिक बसों का टेंडर दिया, आपूर्ति अगस्त 2023 तक पूरी होनी थी; अधिकारियों के अनुसार लगभग आधी अब तक नहीं मिलीं।
- 2026 राष्ट्रीय स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में मुंबई 48 प्रमुख महानगरों में 28वें स्थान पर; 2025 में 25वां, 2024 में 28वां और 2023 में 10वां स्थान।
समयरेखा
- 2020-21 से 2022-23बीएमसी को 15वें वित्त आयोग के वायु गुणवत्ता अनुदान के तहत 620.11 करोड़ रुपये प्राप्त हुए।
- 2021-22बेस्ट का बस बेड़ा 3,546 बसों का था।
- मार्च 2022बेस्ट ने 2,100 इलेक्ट्रिक बसों के लिए टेंडर दिया, आपूर्ति अगस्त 2023 तक पूरी होने का लक्ष्य।
- 2023स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में मुंबई 10वें स्थान पर।
- अगस्त 20232,100 इलेक्ट्रिक बसों की आपूर्ति पूरी होने की निर्धारित समय-सीमा।
- 2024द इंडियन एक्सप्रेस ने अनुदान के उपयोग पर पहली रिपोर्ट प्रकाशित की; मुंबई सर्वेक्षण में 28वें स्थान पर।
- 2025स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में मुंबई 25वें स्थान पर।
- जनवरी (इस वर्ष)अनुदान से 573.88 करोड़ रुपये का उपयोग दर्ज; 46.23 करोड़ शेष।
- इस महीने की शुरुआत2026 राष्ट्रीय स्वच्छ वायु सर्वेक्षण के नतीजे घोषित; मुंबई 48 शहरों में 28वें स्थान पर।
- 2026-27बेस्ट का बेड़ा घटकर 2,532 बसें।
किसका दाँव
- बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) — अनुदान की खर्च प्राथमिकताओं के लिए जवाबदेह; 620.11 करोड़ में से 573.88 करोड़ खर्च करने के बाद भी रैंकिंग गिरी।
- बेस्ट (BEST) — 493.37 करोड़ रुपये मिले, पर बेड़ा 3,546 से 2,532 पर आ गया और ऑर्डर की आधी बसें अनुपलब्ध।
- केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय — अनुदान की सिफारिश करता है; अधिकारी के अनुसार ईवी पर खर्च की कोई अनिवार्यता नहीं, बसें न मिलने पर धन अन्य कार्यों में लगाने को कहा गया।
- केंद्रीय वित्त मंत्रालय का व्यय विभाग — शहरी स्थानीय निकायों को वायु गुणवत्ता प्रबंधन अनुदान आवंटित करता है।
- मुंबई के नागरिक — निर्माण धूल, सड़क धूल और कचरा जलने से प्रभावित वायु गुणवत्ता तथा घटती बस सेवा दोनों का असर।
- वायुमंडलीय वैज्ञानिक डॉ. गुफरान बेग — तर्क देते हैं कि धन स्थानीय हॉटस्पॉट पहचान, शोध व डिज़ाइन पर लगना चाहिए था, ईवी खरीद पर नहीं।
क्यों अहम है
यह मामला दिखाता है कि वायु प्रदूषण से लड़ने में केवल धन का खर्च हो जाना पर्याप्त नहीं है — खर्च की प्राथमिकता और परिणाम भी मायने रखते हैं। बीएमसी ने 92.54 प्रतिशत अनुदान खर्च किया, पर मुंबई की स्वच्छ वायु रैंकिंग 2023 के 10वें स्थान से 2026 में 28वें पर आ गई और बस बेड़ा भी घट गया। शहरी स्थानीय निकायों की क्षमता, अनुबंध क्रियान्वयन और स्रोत-आधारित प्रदूषण नियंत्रण पर यह गंभीर सवाल उठाता है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- 15वें वित्त आयोग का वायु गुणवत्ता अनुदान केंद्रीय वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग द्वारा शहरी स्थानीय निकायों को दिया जाता है।
- इस अनुदान का वितरण MoEFCC (पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय) की सिफारिशों पर होता है।
- बीएमसी को 620.11 करोड़ रुपये मिले, 573.88 करोड़ (92.54%) खर्च; 493.37 करोड़ (79.56%) बेस्ट की इलेक्ट्रिक बसों पर।
- 2026 राष्ट्रीय स्वच्छ वायु सर्वेक्षण: मुंबई 48 प्रमुख महानगरों में 28वां (2025 में 25वां, 2024 में 28वां, 2023 में 10वां)।
- मुंबई वायु प्रदूषण न्यूनीकरण योजना के अनुसार शीर्ष तीन कारण: निर्माण-विध्वंस धूल, सड़क धूल, ठोस कचरे का खुले में जलना।
- बेस्ट ने मार्च 2022 में 2,100 इलेक्ट्रिक बसों का टेंडर 'वेट लीज़' आधार पर दिया था।
मेन्स दृष्टिकोण
मुंबई का मामला भारत में वायु गुणवत्ता वित्तपोषण की एक बुनियादी विसंगति उजागर करता है: निधि-उपयोग (92.54 प्रतिशत) उच्च है, लेकिन परिणाम प्रतिकूल हैं — स्वच्छ वायु रैंकिंग 2023 के 10वें स्थान से 2026 में 28वें स्थान पर पहुँच गई। कारण तीन स्तरों पर दिखते हैं। पहला, प्राथमिकता-विसंगति: बीएमसी की अपनी न्यूनीकरण योजना निर्माण-विध्वंस धूल, सड़क धूल और कचरे के खुले में जलने को शीर्ष कारण बताती है, फिर भी 79.56 प्रतिशत अनुदान इलेक्ट्रिक बसों को गया, जबकि MoEFCC के अधिकारी के अनुसार ईवी पर खर्च की कोई अनिवार्यता नहीं थी। दूसरा, क्रियान्वयन-विफलता: मार्च 2022 में दिए गए 2,100 बसों के टेंडर की आपूर्ति अगस्त 2023 तक पूरी होनी थी, पर आधी बसें अब तक नहीं मिलीं और बेड़ा 3,546 से 2,532 पर आ गया — यानी खर्च हुआ धन सार्वजनिक परिवहन क्षमता में भी नहीं बदला। तीसरा, ज्ञान-आधार की उपेक्षा: शोध पर केवल 50 लाख रुपये निर्धारित और हॉटस्पॉट पहचान पर 36 लाख खर्च हुए, जिस पर डॉ. गुफरान बेग का तर्क है कि स्थानीय हॉटस्पॉट व स्थानीय समाधानों पर अधिक निवेश चाहिए था। नागरिक प्रशासन का पक्ष है कि तटीय सड़क और नवी मुंबई हवाई अड्डे जैसे निर्माण कार्यों के दौर में वाहन उत्सर्जन घटाना प्राथमिकता थी। आगे का रास्ता: स्रोत-विभाजन अध्ययन के आधार पर आवंटन, धूल नियंत्रण व कचरा प्रसंस्करण पर व्यय, अनुबंध आपूर्ति की समयबद्ध निगरानी, और अप्रयुक्त/अवरुद्ध धन का पुनर्नियोजन।
मुख्य शब्द
- 15वें वित्त आयोग का वायु गुणवत्ता अनुदान (FFC)
- केंद्रीय वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग द्वारा शहरी स्थानीय निकायों को बेहतर वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए दिया जाने वाला अनुदान।
- शहरी स्थानीय निकाय (ULB)
- नगर निगम/नगर पालिका जैसे स्थानीय शासन निकाय, जिन्हें यह अनुदान सीधे मिलता है — मुंबई में बीएमसी।
- बेस्ट (BEST)
- मुंबई की सार्वजनिक बस व बिजली आपूर्ति करने वाला परिवहन उपक्रम, जिसे अनुदान से 493.37 करोड़ रुपये मिले।
- वेट लीज़ व्यवस्था
- बसें खरीदने के बजाय संचालक से बस, चालक व रखरखाव सहित किराये पर लेने की व्यवस्था।
- मुंबई वायु प्रदूषण न्यूनीकरण योजना
- बीएमसी की योजना, जो निर्माण-विध्वंस धूल, सड़क धूल और ठोस कचरे के खुले में जलने को प्रदूषण के शीर्ष तीन स्रोत बताती है।
- राष्ट्रीय स्वच्छ वायु सर्वेक्षण
- प्रमुख महानगरों की वायु गुणवत्ता प्रयासों की राष्ट्रीय रैंकिंग; 2026 में मुंबई 48 शहरों में 28वां।
अभ्यास प्रश्न
- "वायु गुणवत्ता अनुदान का उच्च उपयोग बेहतर वायु गुणवत्ता की गारंटी नहीं है।" मुंबई के अनुभव के आलोक में इस कथन का परीक्षण करें।
- शहरी स्थानीय निकायों को वायु प्रदूषण नियंत्रण निधि आवंटित करते समय स्रोत-आधारित प्राथमिकता तय करना क्यों आवश्यक है? बीएमसी के व्यय पैटर्न से उदाहरण देते हुए समझाइए।
- सार्वजनिक परिवहन के विद्युतीकरण में अनुबंध क्रियान्वयन की विफलताएँ (जैसे बेस्ट का घटता बेड़ा) शहरी गतिशीलता और उत्सर्जन लक्ष्यों को कैसे प्रभावित करती हैं?
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
