2023 के सीईसी नियुक्ति कानून पर विवाद फिर सुप्रीम कोर्ट में

विपक्ष ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर फिर सवाल उठाए हैं। विवाद 2023 के उस कानून पर केंद्रित है, जिसने सीईसी और चुनाव आयुक्तों की चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया। विधेयक 12 दिसंबर 2023 को राज्यसभा और 21 दिसंबर को लोकसभा में ध्वनिमत से पारित हुआ, जब 100 लोकसभा सांसद निलंबित थे। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा बड़ी बेंच को भेजने पर असहमत रहे और मामला सीजेआई को भेजा।

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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi recorded objections at least 14 times over 10 months. — Attributed in source to an Indian Express report; not independently confirmed in the text and rejected by the Election Commission.
  • The 2023 Act created a three-member selection panel of the PM, Leader of Opposition in Lok Sabha and a Union Cabinet minister nominated by the PM, replacing the CJI. — Figure and composition appear in the source with reference to the named Act; internally consistent.
  • The Bill was passed by voice vote in the Rajya Sabha on December 12, 2023, and in the Lok Sabha on December 21, 2023 after about 1 hour 40 minutes of discussion. — Dates and duration appear in the source and are internally consistent.
  • 146 MPs across both Houses were suspended during the Winter Session; 100 Lok Sabha MPs stood suspended on the day of passage, when the Opposition had 142 Lok Sabha MPs. — Figures appear in the source; no originating document cited.
  • Justices Dipankar Datta and Satish Chandra Sharma differed on referring the challenge to a Constitution Bench and sent the matter to the CJI. — Attributed to court proceedings described in the source; no order copy cited.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

यह दिखने में कानूनी विवाद है, लेकिन इसकी जड़ राजनीतिक विश्वसनीयता की लड़ाई है। चयन समिति के तीन में से दो सदस्य कार्यपालिका से होने का तथ्य विपक्ष को "चुनाव आयोग की स्वतंत्रता" पर टिकाऊ हथियार देता है — वहीं दिसंबर 2023 में लोकसभा में विपक्ष की चुप्पी सरकार को उतना ही मजबूत जवाब देती है। दो-सदस्यीय पीठ में ही मतभेद उभरने और मामला सीजेआई के पास जाने के बाद यह बहस लंबी चलने वाली है।

  • विपक्ष की रणनीति है कि हमला अलग-अलग नतीजों से हटाकर नियुक्ति प्रक्रिया पर केंद्रित किया जाए, जिससे दीर्घकालिक संस्थागत आलोचना खड़ी हो।
  • सरकार का जवाब तैयार है: राज्यसभा बहस के दौरान विपक्ष ने वॉकआउट किया और लोकसभा में केवल एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने विधेयक के विरोध में बोला।
  • जिस दिन लोकसभा के 100 विपक्षी सांसद निलंबित थे, उसी दिन ध्वनिमत से विधेयक पारित होना विपक्ष को प्रक्रिया और वैधता का मजबूत तर्क देता है।
  • जस्टिस दत्ता की यह टिप्पणी कि नेता प्रतिपक्ष की भूमिका "मुख्यतः दिखावटी" हो सकती है, विपक्ष के नैरेटिव को बल देती है; जस्टिस शर्मा का यह मत कि यह प्रश्न अदालत ने पहले तय नहीं किया, सरकार के पक्ष को सहारा देता है।
  • सीईसी के खिलाफ महाभियोग की मांग और आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों की खबरों के साथ मिलकर यह विवाद आगामी चुनावी नतीजों पर विश्वसनीयता की छाया डाल सकता है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि सीजेआई मामले को संविधान पीठ को भेजते हैं या नहीं और सुनवाई कब होती है — इसी से तय होगा कि यह अदालती सवाल रहेगा या चुनावी मुद्दा बनेगा।

यह खबर न तो कानून को असंवैधानिक साबित करती है, न यह स्थापित करती है कि आयोग के फैसले वास्तव में प्रभावित हुए — आयोग ने रिपोर्ट खारिज की है और कोई न्यायिक फैसला अभी नहीं आया।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 6 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर विवाद फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मार्च 2023 में अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने तय किया था कि संसद द्वारा कानून बनने तक नियुक्तियां प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सिफारिश पर होंगी। दिसंबर 2023 में संसद ने कानून बनाकर सीजेआई की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को समिति में शामिल कर दिया। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों के दावों ने यह बहस फिर गरम कर दी है।

मुख्य तथ्य

  • 2023 का कानून — मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 — तीन सदस्यीय चयन समिति का प्रावधान करता है।
  • चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल हैं; राष्ट्रपति औपचारिक रूप से नियुक्ति करते हैं।
  • मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनूप बरनवाल मामले में निर्देश दिया था कि संसद का कानून बनने तक समिति में सीजेआई तीसरे सदस्य होंगे।
  • विधेयक राज्यसभा में 12 दिसंबर 2023 को ध्वनिमत से पारित हुआ, जिससे पहले विपक्ष ने वॉकआउट किया; कांग्रेस सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने बहस शुरू की थी।
  • लोकसभा में विधेयक 21 दिसंबर 2023 को लगभग 1 घंटे 40 मिनट की चर्चा के बाद ध्वनिमत से पारित हुआ; बहस में 12 सांसदों ने भाग लिया, अधिकतर भाजपा और एनडीए से।
  • एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी लोकसभा में विधेयक के विरोध में बोलने वाले एकमात्र विपक्षी सांसद थे; राहुल गांधी निलंबित नहीं थे पर बहस में नहीं बोले।
  • 19 दिसंबर 2023 तक दोनों सदनों के 141 सांसद निलंबित थे; 21 दिसंबर को तीन और कांग्रेस सांसदों के निलंबन से लोकसभा में निलंबित सांसदों की संख्या 100 हो गई, शीतकालीन सत्र में कुल 146; तब लोकसभा में विपक्ष के 142 सांसद थे।
  • इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं; कुछ कार्यों को 'अनधिकृत और अवैध' बताया गया।

समयरेखा

  1. मार्च 2023अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ में सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीश पीठ ने पीएम, नेता प्रतिपक्ष और सीजेआई की समिति द्वारा नियुक्ति का अंतरिम निर्देश दिया।
  2. 12 दिसंबर 2023विपक्ष के वॉकआउट के बाद राज्यसभा ने विधेयक ध्वनिमत से पारित किया।
  3. 13 दिसंबर 2023दो घुसपैठिए लोकसभा कक्ष में घुसे और स्मोक कैनिस्टर छोड़े — बड़ी सुरक्षा चूक; विपक्ष ने गृह मंत्री के बयान की मांग की।
  4. 19 दिसंबर 2023दोनों सदनों के 141 सांसद निलंबित हो चुके थे।
  5. 21 दिसंबर 2023तीन और कांग्रेस सांसद निलंबित; उसी दिन लोकसभा ने विधेयक ध्वनिमत से पारित किया।
  6. हाल में (बुधवार, स्रोत में तारीख नहीं)जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ में मतभेद; मामला बड़ी बेंच पर विचार के लिए सीजेआई को भेजा गया।

किसका दाँव

  • चुनाव आयोग (ईसीआई) और सीईसी ज्ञानेश कुमार — संस्थागत स्वतंत्रता, विश्वसनीयता और कार्यप्रणाली पर सवाल; आयोग ने आंतरिक मतभेद की रिपोर्ट को खारिज किया है।
  • चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — रिपोर्ट के अनुसार पूर्ण आयोग के नाम पर लिए गए निर्णयों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं।
  • सुप्रीम कोर्ट — यह तय करना कि संसद सीजेआई की जगह कैबिनेट मंत्री रख सकती है या नहीं; मामला अब सीजेआई के पास बड़ी बेंच के लिए।
  • केंद्र सरकार/कार्यपालिका — 2023 कानून के तहत तीन सदस्यीय समिति में दो सदस्य कार्यपालिका से — पीएम और उनके नामित मंत्री।
  • विपक्ष (कांग्रेस, राहुल गांधी, अन्य दल) — आयोग की स्वतंत्रता और चयन प्रक्रिया पर हमला; लोकसभा में कानून पारित होते समय उनकी भूमिका पर भी सवाल।
  • असदुद्दीन ओवैसी (एआईएमआईएम) — लोकसभा में विधेयक का विरोध करने वाले एकमात्र विपक्षी वक्ता।

क्यों अहम है

चुनाव आयोग की स्वतंत्रता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की बुनियाद है; यदि चयन समिति में कार्यपालिका का बहुमत हो तो नियुक्तियों की निष्पक्षता की धारणा प्रभावित हो सकती है। जस्टिस दत्ता की टिप्पणी कि सामूहिक उत्तरदायित्व से बंधा मंत्री प्रधानमंत्री का विरोध शायद न करे और नेता प्रतिपक्ष की उपस्थिति "बड़े हद तक दिखावटी" रह जाए, इस बहस का मूल है। मामला कार्यपालिका-न्यायपालिका के बीच नियुक्ति अधिकार की व्यापक खींचतान से भी जुड़ा है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 — तीन सदस्यीय चयन समिति: पीएम, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष, पीएम द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री।
  • अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (मार्च 2023): पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ; अंतरिम व्यवस्था में सीजेआई समिति के सदस्य थे, जो संसद का कानून बनने तक ही लागू थी।
  • राज्यसभा में पारित: 12 दिसंबर 2023; लोकसभा में पारित: 21 दिसंबर 2023 — दोनों ध्वनिमत से।
  • 13 दिसंबर 2023: लोकसभा कक्ष में सुरक्षा चूक — दो घुसपैठिए, स्मोक कैनिस्टर।
  • शीतकालीन सत्र 2023 में दोनों सदनों से कुल 146 सांसद निलंबित; लोकसभा में 100 निलंबित, विपक्ष के पास 142 सांसद।
  • नियुक्तियां राष्ट्रपति द्वारा औपचारिक रूप से की जाती हैं, समिति की सिफारिश पर।

मेन्स दृष्टिकोण

2023 के सीईसी नियुक्ति कानून पर विवाद का केंद्र यह है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका का प्रभुत्व कितना स्वीकार्य है। कारण की जड़ मार्च 2023 के अनूप बरनवाल निर्णय में है, जिसने संसद के कानून बनने तक पीएम, नेता प्रतिपक्ष और सीजेआई की समिति बनाई; संसद ने दिसंबर 2023 में सीजेआई की जगह पीएम द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री रखकर समिति में कार्यपालिका को 2:1 बहुमत दे दिया। इसके निहितार्थ दो स्तरों पर हैं — वास्तविक स्वतंत्रता और "स्वतंत्र दिखने" की धारणा, जिसे जस्टिस दत्ता ने रेखांकित किया, तथा विधायी प्रक्रिया की गुणवत्ता, क्योंकि विधेयक लोकसभा में उस दिन ध्वनिमत से पारित हुआ जब 100 विपक्षी सांसद निलंबित थे और चर्चा लगभग 1 घंटे 40 मिनट चली। साथ ही आयोग के भीतर आंतरिक असहमति के दावे संस्थागत पारदर्शिता पर सवाल उठाते हैं, जिन्हें आयोग ने सामान्य विचार-विमर्श बताकर खारिज किया है। आगे का रास्ता सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है — जस्टिस शर्मा के अनुसार यह प्रश्न अभी अनिर्णीत है कि संसद सीजेआई को हटा सकती है या नहीं, और मामला बड़ी बेंच के गठन पर विचार के लिए सीजेआई को भेजा गया है; संस्थागत विश्वसनीयता के लिए पारदर्शी बहस और व्यापक सहमति आवश्यक है।

मुख्य शब्द

अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ
सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीश संविधान पीठ का 2023 का फैसला, जिसने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए अंतरिम समिति (पीएम, नेता प्रतिपक्ष, सीजेआई) तय की।
सीईसी अधिनियम, 2023
मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, जो तीन सदस्यीय चयन समिति बनाता है।
ध्वनिमत (वॉइस वोट)
सदन में हां/नहीं की आवाज़ से निर्णय, जिसमें मतों की गिनती दर्ज नहीं होती; इसी से यह विधेयक दोनों सदनों में पारित हुआ।
सामूहिक उत्तरदायित्व
मंत्रिपरिषद के मंत्री सामूहिक रूप से बंधे होते हैं; जस्टिस दत्ता ने कहा कि इसी कारण नामित मंत्री पीएम का विरोध शायद न करें।
संविधान पीठ
सुप्रीम कोर्ट की कम से कम पांच न्यायाधीशों वाली पीठ, जो महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर विचार करती है; इस मामले को ऐसी बड़ी बेंच भेजने पर मतभेद हुआ।
एनजेएसी
स्रोत में उल्लिखित संदर्भ — नियुक्तियों के अधिकार पर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच लंबी खींचतान का उदाहरण; विस्तृत ब्योरा स्रोत में नहीं है।

अभ्यास प्रश्न

  1. चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के लिए नियुक्ति प्रक्रिया क्यों निर्णायक है? 2023 के कानून और अनूप बरनवाल मामले की अंतरिम व्यवस्था की तुलना करते हुए चर्चा करें।
  2. क्या संसद सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई अंतरिम व्यवस्था को कानून बनाकर बदल सकती है? इस प्रश्न पर जस्टिस दत्ता और जस्टिस शर्मा के भिन्न दृष्टिकोणों का विश्लेषण करें।
  3. सामूहिक निलंबन और ध्वनिमत से महत्वपूर्ण विधेयक पारित होना भारतीय संसदीय जवाबदेही के लिए क्या संकेत देता है? 2023 के शीतकालीन सत्र के उदाहरण से समझाएं।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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