राष्ट्रीय उत्तराखंड

उत्तराखंड के ग्लेशियर सालाना 23.23 मीटर पीछे हट रहे: अध्ययन

उत्तराखंड के मध्य हिमालय में ग्लेशियर औसतन 23.23 मीटर प्रति वर्ष पीछे हट रहे हैं, यह एक नए अध्ययन में सामने आया है, जो 1990 से 2024 तक के अवलोकनों और उपग्रह चित्रों पर आधारित है। देहरादून के वाडिया इंस्टिट्यूट के मनीष मेहता और यूपीईएस के शोधकर्ताओं ने पाया कि भागीरथी व सतोपंथ में यह दर 3.7 मीटर तो खटलिंग में 88 मीटर सालाना रही। वर्ष 2000 से कुछ क्षेत्रों में संतुलन रेखा लगभग 500 मीटर ऊपर उठी है और मिलम ग्लेशियर ने करीब 47 नई हिमनद झीलें बनाई हैं।

स्रोत

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Glaciers in Uttarakhand's Central Himalaya are retreating by an average of 23.23 metres a year. — Attributed to the study and to lead author Manish Mehta; figure appears in source.
  • Retreat rates range from about 3.7 m/yr (Bhagirathi, Satopanth) to 88 m/yr (Khatling Glacier). — Directly quoted from Mehta in the source.
  • The equilibrium line altitude has risen by nearly 500 metres in some regions since 2000. — Stated in the source as a study finding; no independent verification possible.
  • Milam Glacier has spawned nearly 47 new glacial lakes. — Attributed to the study; figure appears in source.
  • Glacier geometry, slope, aspect and shape index account for up to 46% of local variation in ice loss; Ganga basin supports around 800 million people. — Both figures appear in the source as study findings; sourcing quality adequate.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

यह खबर विज्ञान की दिखती है, लेकिन इसका राजनीतिक भार कम नहीं है। उत्तराखंड में ग्लेशियरों का पीछे हटना और नई हिमनद झीलों का बनना आपदा प्रबंधन, तीर्थयात्रा मार्ग, पनबिजली और पहाड़ी राज्य के विकास मॉडल को फिर बहस के केंद्र में ला सकता है। गंगा बेसिन पर करीब 80 करोड़ लोगों की निर्भरता इसे केवल राज्य का मुद्दा नहीं, उत्तर भारत का नीतिगत एजेंडा बनाने की क्षमता रखती है।

  • सरकारी संस्थानों से जुड़े ऐसे अध्ययन स्थानीय पर्यावरण आंदोलनों और बड़ी पहाड़ी परियोजनाओं के आलोचकों को मजबूत तर्क-सामग्री देते हैं।
  • दूसरी ओर, अध्ययन में स्थानीय भूगोल और मलबे की परत की भूमिका बताए जाने से सरकारें जिम्मेदारी को व्यापक वैश्विक तापवृद्धि पर मोड़ने का तर्क भी दे सकती हैं।
  • मिलाम में लगभग 47 नई हिमनद झीलों का बनना GLOF पूर्व-चेतावनी तंत्र के लिए केंद्र-राज्य वित्तपोषण और जवाबदेही के सवाल फिर खड़े करता है।
  • शोधकर्ताओं की सतत निगरानी की मांग — सैटेलाइट रडार, ड्रोन और क्षेत्रीय सर्वे — बजट आवंटन में बदलती है, जो किसी भी सरकार के लिए तुलनात्मक रूप से सस्ता और दिखने वाला राजनीतिक जवाब है।
  • निचले राज्यों की जल सुरक्षा से जुड़ाव के कारण यह आगे चलकर अंतरराज्यीय नदी जल राजनीति में एक नया तर्क बिंदु बन सकता है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि राज्य और केंद्र सरकार इस अध्ययन पर औपचारिक रूप से प्रतिक्रिया देकर निगरानी व पूर्व-चेतावनी तंत्र के लिए धन की घोषणा करती हैं या मामला चुपचाप गुजर जाता है।

यह खबर पूरी तरह एक वैज्ञानिक अध्ययन पर है; इसमें किसी सरकार, दल या नेता की प्रतिक्रिया, नीतिगत फैसला या राजनीतिक विवाद दर्ज नहीं है — राजनीतिक निहितार्थ मेरा आकलन हैं, रिपोर्ट किया गया तथ्य नहीं।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 5 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

उत्तराखंड के मध्य हिमालय (सेंट्रल हिमालय) के ग्लेशियरों पर एक नया अध्ययन "Time-dependent assessment of glacier recession in the Indian Central Himalaya" इसी महीने Discover Geoscience में प्रकाशित हुआ है। यह 1990 से 2024 तक के क्षेत्रीय अवलोकनों और उपग्रह चित्रों पर आधारित है। अध्ययन के अनुसार ग्लेशियर औसतन 23.23 मीटर प्रति वर्ष की दर से पीछे हट रहे हैं, और कुछ ग्लेशियर 88 मीटर सालाना तक बर्फ खो रहे हैं। शोध में पाया गया कि बढ़ता तापमान, ग्लेशियर की प्रकृति (साफ बर्फ या मलबे से ढकी) और स्थानीय भू-आकृति मिलकर बर्फ क्षय की गति तय करते हैं।

मुख्य तथ्य

  • मध्य हिमालय (उत्तराखंड) में ग्लेशियरों की औसत अग्रभाग पीछे हटने की दर 23.23 मीटर प्रति वर्ष पाई गई।
  • भागीरथी (उत्तरकाशी) और सतोपंथ (चमोली) जैसे स्थिर या मलबे से ढके ग्लेशियरों में दर लगभग 3.7 मीटर/वर्ष रही।
  • खटलिंग ग्लेशियर (भागीरथी घाटी, टिहरी गढ़वाल), एक साफ-बर्फ वाला ग्लेशियर, 88 मीटर प्रति वर्ष तक पीछे हटा।
  • वर्ष 2000 के बाद से कुछ क्षेत्रों में संतुलन रेखा ऊँचाई (ELA) लगभग 500 मीटर ऊपर उठ गई है।
  • पिथौरागढ़ जिले की मिलम घाटी के मिलम ग्लेशियर ने करीब 47 नई हिमनद झीलें बनाई हैं।
  • ग्लेशियर की ज्यामिति, ढाल, दिशा और शेप इंडेक्स मिलकर स्थानीय बर्फ क्षय में 46% तक भिन्नता समझाते हैं।
  • 1980-1999 का दौर 'वार्मिंग-ड्राइंग' प्रवृत्ति का रहा; 2000 के बाद वर्षा बढ़ने से अधिक आर्द्र चरण शुरू हुआ।
  • गंगा बेसिन लगभग 80 करोड़ (800 मिलियन) लोगों का भरण-पोषण करता है।

समयरेखा

  1. 1980-1999मौसम व रीएनालिसिस आँकड़ों में स्पष्ट 'वार्मिंग-ड्राइंग' प्रवृत्ति — वर्षा घटती और तापमान बढ़ता रहा।
  2. 1990-2024अध्ययन की अवधि: इसी दौरान के क्षेत्रीय अवलोकन और उपग्रह चित्रों का विश्लेषण किया गया।
  3. 2000 के आसपासजलवायु का महत्वपूर्ण मोड़; इसके बाद वर्षा बढ़ी और कुछ पूर्वी मलबा-ढके ग्लेशियरों को अस्थायी राहत मिली।
  4. 2000 के बादकुछ क्षेत्रों में संतुलन रेखा ऊँचाई लगभग 500 मीटर ऊपर उठी, मास बैलेंस और नकारात्मक हुआ।
  5. इस महीने (प्रकाशन)अध्ययन Discover Geoscience पत्रिका में प्रकाशित हुआ।

किसका दाँव

  • वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, देहरादून — मनीष मेहता के नेतृत्व में अध्ययन; हिमालयी ग्लेशियर निगरानी और वैज्ञानिक आकलन की जिम्मेदारी।
  • यूपीईएस (UPES), देहरादून — ज्योति कुमारी, गिरीश सी कोठियारी और अतुल कुमार पाटीदार शोध में सहभागी।
  • गंगा बेसिन की आबादी (लगभग 80 करोड़ लोग) — ग्लेशियर पिघलने से क्षेत्रीय जल-विज्ञान और दीर्घकालिक जल सुरक्षा पर सीधा असर।
  • उत्तराखंड के पर्वतीय जिले (उत्तरकाशी, चमोली, टिहरी गढ़वाल, पिथौरागढ़) — ग्लेशियरों का पीछे हटना और नई हिमनद झीलें बनने से आपदा जोखिम, विशेषकर GLOF।
  • आपदा प्रबंधन व नीति-निर्माता एजेंसियाँ — तेजी से बदलते ग्लेशियरों और झीलों से जुड़े खतरों के आकलन व शमन की जरूरत।

क्यों अहम है

हिमालयी ग्लेशियर उत्तर भारत की नदियों के जल भंडार हैं और गंगा बेसिन पर ही करीब 80 करोड़ लोग निर्भर हैं, इसलिए 23.23 मीटर सालाना की औसत पीछे हटने की दर जल सुरक्षा का प्रश्न है। संतुलन रेखा 500 मीटर ऊपर उठने और मिलम ग्लेशियर से 47 नई झीलें बनने का अर्थ है कि बर्फ का संचय घट रहा है और हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) जैसे खतरे बढ़ रहे हैं। अध्ययन बताता है कि वर्षा बढ़ने से मिली राहत अस्थायी है, दीर्घकालिक बर्फ क्षय जारी है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • अध्ययन शीर्षक: 'Time-dependent assessment of glacier recession in the Indian Central Himalaya', पत्रिका Discover Geoscience।
  • वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी देहरादून में स्थित है; मुख्य शोधकर्ता मनीष मेहता।
  • औसत पीछे हटने की दर 23.23 मीटर/वर्ष; न्यूनतम 3.7 मीटर (भागीरथी, सतोपंथ), अधिकतम 88 मीटर (खटलिंग)।
  • संतुलन रेखा ऊँचाई (ELA): शुद्ध हिम संचय क्षेत्र और शुद्ध पिघलाव क्षेत्र के बीच की सीमा; 2000 के बाद ~500 मीटर ऊपर उठी।
  • मिलम ग्लेशियर पिथौरागढ़ जिले की मिलम घाटी में; इससे लगभग 47 नई हिमनद झीलें बनीं।
  • अध्ययन की सिफारिश: उपग्रह रडार, यूएवी (ड्रोन) और लक्षित क्षेत्र सर्वेक्षण का संयोजन।

मेन्स दृष्टिकोण

1990-2024 के अवलोकनों पर आधारित यह अध्ययन दर्शाता है कि भारतीय मध्य हिमालय में विहिमनदीकरण (deglaciation) का मुख्य चालक वायुमंडलीय तापवृद्धि है, परंतु प्रतिक्रिया एकरूप नहीं है: साफ-बर्फ वाले ग्लेशियर (खटलिंग, 88 मी/वर्ष) तीव्र तापीय क्षय और प्रो-ग्लेशियल झीलों में कैल्विंग के कारण अधिक संवेदनशील हैं, जबकि मोटे मलबे से ढके ग्लेशियर (भागीरथी, सतोपंथ, 3.7 मी/वर्ष) प्राकृतिक ऊष्मारोधी कवच के कारण धीमे पिघलते हैं। ग्लेशियर की ज्यामिति, ढाल, दिशा और शेप इंडेक्स स्थानीय भिन्नता का 46% तक स्पष्टीकरण देते हैं; दक्षिणमुखी ग्लेशियर अधिक सिकुड़ रहे हैं और छोटे, अधिक वृत्ताकार खंड जल्दी टूटते हैं। 2000 के बाद वर्षा बढ़ने से कुछ पूर्वी मलबा-ढके ग्लेशियरों को अस्थायी बफर मिला, पर ELA में ~500 मीटर की वृद्धि ने मास बैलेंस को और नकारात्मक कर दिया है। आगे का रास्ता, अध्ययन के अनुसार, पद्धतिगत रूप से सुसंगत और सुदृढ़ निगरानी है — उपग्रह रडार, यूएवी और लक्षित क्षेत्रीय सर्वेक्षणों का संयोजन — जिससे शेष मीठे जल भंडार का आकलन तथा GLOF सहित हिमनद खतरों का शमन बेहतर हो सके, क्योंकि गंगा बेसिन की करीब 80 करोड़ आबादी की जल सुरक्षा इससे जुड़ी है।

मुख्य शब्द

संतुलन रेखा ऊँचाई (ELA)
वह सीमा जो ग्लेशियर के शुद्ध हिम-संचय क्षेत्र को शुद्ध पिघलाव क्षेत्र से अलग करती है।
मास बैलेंस
ग्लेशियर में जुड़ने वाली बर्फ और खोने वाली बर्फ का संतुलन; नकारात्मक होने पर ग्लेशियर घटता है।
मलबा-ढके बनाम साफ-बर्फ ग्लेशियर
मोटा मलबा ऊष्मारोधी कवच की तरह पिघलाव घटाता है; साफ बर्फ तीव्र तापीय क्षय के प्रति संवेदनशील।
प्रो-ग्लेशियल झील और कैल्विंग
पीछे हटते ग्लेशियर के सामने/नीचे बनी झील; बर्फ के बड़े टुकड़े झील में टूटकर गिरना कैल्विंग है।
GLOF
हिमनद झील विस्फोट बाढ़ — हिमनद झील के अचानक टूटने से आने वाली विनाशकारी बाढ़।
आइस फ्लक्स
ऊपरी हिम-संचय क्षेत्र से ग्लेशियर के निचले हिस्से या अग्रभाग की ओर बर्फ की गति।

अभ्यास प्रश्न

  1. भारतीय मध्य हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे हटने की दर में भिन्नता के जलवायु और गैर-जलवायु कारकों की विवेचना कीजिए। (250 शब्द)
  2. संतुलन रेखा ऊँचाई (ELA) में वृद्धि ग्लेशियर के मास बैलेंस और नदी-जल उपलब्धता को कैसे प्रभावित करती है? समझाइए।
  3. नई हिमनद झीलों के बनने से उत्पन्न GLOF जोखिम के आकलन और शमन के लिए किस प्रकार की निगरानी प्रणाली आवश्यक है?

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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