कार्बन क्रेडिट से किसानों को 2.5 करोड़ रुपये का भुगतान
बेहतर कृषि पद्धतियों के लिए कार्बन क्रेडिट भुगतान पाने वाले देश के पहले किसान बने लगभग 2,500 किसान, जिनमें करीब 1,400 पंजाब और शेष हरियाणा से हैं। 50,000 से अधिक कार्बन क्रेडिट तैयार हुए और किसानों को 3,000 से 15,000 रुपये तक, कुल मिलाकर लगभग 2.50 करोड़ रुपये मिले। यह कार्यक्रम एग्रो-टेक कंपनी ग्रो इंडिगो ने आईसीएआर के तकनीकी मार्गदर्शन में 2019 में शुरू किया था। लुधियाना में आयोजित कार्यक्रम में किसानों को सम्मानित किया गया। आईसीएआर के अनुसार, पंजाब में खेतों में आग की घटनाएं 2020 में 83,000 से घटकर 2025 में 5,000 से कम रह गईं।
स्रोत
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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- About 2,500 farmers — around 1,400 from Punjab, rest from Haryana — received carbon credit payments totalling about Rs 2.50 crore, with individual payments of Rs 3,000-Rs 15,000. — Figures appear in source; presented as a first-of-its-kind payout, no independent verification possible.
- Over 50,000 carbon credits were generated in the first set of payments, based on verified credits and not acreage. — Figure appears in source, attributed to the programme; verification method described but not documented.
- Programme was initiated by agro-tech firm Grow Indigo in 2019 with technical guidance from ICAR, with an MoU with ICAR-ATARI Ludhiana. — Attributed to source reporting; institutional details named.
- Punjab farm-fire incidents fell from over 83,000 in 2020 to fewer than 5,000 in 2025. — Attributed to ICAR in the source.
- Individual payouts include Sahib Singh Rs 5,700, Jagmail Singh Rs 19,000, Baldev Singh Rs 6,070, Gurpreet Singh Rs 9,075, Bhim Singh Rs 12,000. — Named farmers with amounts in source; note Jagmail Singh's Rs 19,000 exceeds the stated Rs 3,000-15,000 range.
विश्लेषकों की राय राय
आंकड़ा छोटा है — करीब 2,500 किसानों के बीच लगभग 2.5 करोड़ रुपये, यानी प्रति किसान कुछ हज़ार रुपये — लेकिन आर्थिक महत्व रकम का नहीं, बल्कि इस बात का है कि जिस काम की अब तक कोई कीमत नहीं थी, उसे पहली बार एक दाम मिला है। पंजाब या हरियाणा के किसान का सीधी बुवाई अपनाना, जुताई घटाना या पराली जलाने के बजाय उसका प्रबंधन करना — अब इन फैसलों के साथ नकद रिटर्न जुड़ा है, और वह सरकारी खज़ाने से नहीं, एक निजी कार्यक्रम से आ रहा है। इससे पराली प्रबंधन नियम-पालन की लागत से आगे बढ़कर आय की एक (भले पतली) लाइन बन जाता है। खुला सवाल यह है कि 3,000 से 15,000 रुपये का भुगतान इन तरीकों में लगने वाली मशीन, मज़दूरी और उपज-जोखिम की लागत को ढक पाता है या नहीं।
- सबसे बड़ा ढांचागत बदलाव यह है कि पैसा एक निजी एग्री-टेक कार्यक्रम के ज़रिये सत्यापित क्रेडिट बेचकर आ रहा है, राज्य सब्सिडी से नहीं — यानी करदाता पर बोझ सीमित रहता है और किसान को नया आय स्रोत मिलता है।
- प्रति किसान रकम मामूली और बहुत असमान है (रिपोर्ट किए गए मामलों में 3,000 से 15,000 रुपये), और चूंकि भुगतान रकबे से नहीं बल्कि सत्यापित क्रेडिट से जुड़ा है, रिटर्न मापे गए बदलाव पर निर्भर करेगा — तुलना के लिए लागत पक्ष कहानी में स्पष्ट नहीं है।
- असली परिसंपत्ति मापन और सत्यापन का ढांचा है — सैटेलाइट निगरानी, जियो-फेंसिंग, मिट्टी की जांच और आईसीएआर की तकनीकी देखरेख — क्योंकि क्रेडिट की कीमत अंततः खरीदार के भरोसे पर टिकी होती है कि कटौती वास्तविक है।
- पंजाब में खेतों में आग की घटनाएं 2020 के 83,000 से घटकर 2025 में 5,000 से नीचे आना स्वास्थ्य और वायु गुणवत्ता की बड़ी बचत की ओर इशारा करता है, पर कहानी इसे केवल आईसीएआर के आंकड़े के रूप में बताती है, इस कार्यक्रम का श्रेय नहीं देती।
- बड़े पैमाने की अर्थशास्त्र अभी अपरीक्षित है: कुछ हज़ार किसानों पर 50,000 से अधिक क्रेडिट पायलट आकार का बाज़ार है, और विस्तार का मतलब है बार-बार सत्यापन लागत और अस्थिर स्वैच्छिक कार्बन कीमतों पर निर्भरता।
किस पर नज़र रखें — देखने वाली बात यह है कि भुगतान अगले चक्रों में दोहराए और बढ़ते हैं या नहीं, और नए खरीदार व किसान जुड़ते हैं या नहीं — एकबारगी पायलट भुगतान और टिकाऊ सालाना आय का किसानों के व्यवहार पर असर बिल्कुल अलग होगा।
कहानी यह स्थापित नहीं करती कि प्रति क्रेडिट कीमत क्या है, अंतिम खरीदार कौन हैं, किसानों को इन तरीकों को अपनाने में कितनी लागत आती है, या यह कि कार्बन भुगतान से ही खेतों में आग घटी है।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 6 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
भारत में पहली बार किसानों को बेहतर (जलवायु-अनुकूल) कृषि पद्धतियों के लिए कार्बन क्रेडिट का भुगतान मिला है। पंजाब और हरियाणा के लगभग 2,500 किसानों को कुल करीब 2.50 करोड़ रुपये मिले, जो सत्यापित कार्बन क्रेडिट पर आधारित है, रकबे पर नहीं। यह कार्यक्रम एग्रो-टेक कंपनी ग्रो इंडिगो ने 2019 में आईसीएआर के तकनीकी मार्गदर्शन में शुरू किया था। इसका उद्देश्य पराली जलाने से आगे बढ़कर उत्सर्जन घटाने तथा मिट्टी व पानी बचाने वाली पद्धतियों को आर्थिक मूल्य देना है।
मुख्य तथ्य
- लगभग 2,500 किसान पहले लाभार्थी बने — करीब 1,400 पंजाब से और शेष हरियाणा से।
- 50,000 से अधिक कार्बन क्रेडिट तैयार हुए; किसानों को 3,000 से 15,000 रुपये तक, कुल लगभग 2.50 करोड़ रुपये मिले।
- भुगतान किसान से जुड़े सत्यापित कार्बन क्रेडिट पर आधारित है, रकबे (एकड़) से जुड़ा नहीं।
- बठिंडा के कोठे लाल सिंह वाले गांव के 45 वर्षीय साहिब सिंह को 5,700 रुपये मिले; उन्होंने 7-8 साल से पराली नहीं जलाई; उनके पास करीब 13 एकड़ है।
- उसी गांव के जगमैल सिंह को 19,000 रुपये और निशान सिंह को 14,000 रुपये मिले।
- आईसीएआर के अनुसार पंजाब में खेत में आग की घटनाएं 2020 में 83,000 से अधिक से घटकर 2025 में 5,000 से कम रह गईं।
- अगस्त 2024 में शुरू पूर्ववर्ती योजना के तहत पंजाब कृषि भूमि पर पेड़ लगाने-बचाने के लिए भुगतान करता है; पेड़ कम से कम पांच वर्ष रखने अनिवार्य।
- आईसीएआर-अटारी, लुधियाना और ग्रो इंडिगो के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) है; भुगतान पाने वाले किसानों को लुधियाना में सम्मानित किया गया।
समयरेखा
- 2019ग्रो इंडिगो ने आईसीएआर के तकनीकी मार्गदर्शन में कार्बन क्रेडिट कार्यक्रम शुरू किया।
- 2020पंजाब में खेत में आग की 83,000 से अधिक घटनाएं दर्ज।
- अगस्त 2024पंजाब की कृषि-वानिकी आधारित कार्बन क्रेडिट योजना शुरू, जिसमें पेड़ लगाने-बचाने पर भुगतान।
- 2025पंजाब में खेत में आग की घटनाएं 5,000 से कम रह गईं (आईसीएआर)।
- हाल में (तिथि स्रोत में नहीं)नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने कृषि-पारिस्थितिकी व पुनर्योजी कृषि पर उत्कृष्टता केंद्रों के ब्रिक्स नेटवर्क तथा डिजिटल कृषि नेटवर्क की घोषणा अपनाई।
- हाल में (तिथि स्रोत में नहीं)लुधियाना में आयोजित कार्यक्रम में वैज्ञानिकों की उपस्थिति में किसानों को सम्मानित किया गया।
किसका दाँव
- पंजाब व हरियाणा के किसान — पराली न जलाने, डीएसआर, अवशेष प्रबंधन जैसी पद्धतियों से 3,000-15,000 रुपये की अतिरिक्त आय; साहिब सिंह के शब्दों में खेती के तरीके को "आर्थिक मूल्य" मिला।
- ग्रो इंडिगो (एग्रो-टेक कंपनी) — कार्यक्रम की संचालक; कार्यकारी निदेशक डॉ. उषा बारवाले जेहर के अनुसार ध्यान केवल पराली जलाना रोकने से आगे बढ़ रहा है; भुगतान एकबारगी नहीं, सतत प्रक्रिया।
- आईसीएआर व आईसीएआर-अटारी, लुधियाना — तकनीकी मार्गदर्शन, किसानों का प्रशिक्षण तथा पद्धतियों के प्रलेखन-सत्यापन की जिम्मेदारी; ग्रो इंडिगो के साथ एमओयू।
- डीएआरई/आईसीएआर महानिदेशक डॉ. एम एल जाट — निगरानी की विश्वसनीयता — उपग्रह, रिमोट सेंसिंग, जियो-फेंसिंग और मृदा नमूनाकरण से खेतों व मृदा कार्बनिक कार्बन का आकलन।
- पंजाब सरकार — अगस्त 2024 की कृषि-वानिकी कार्बन क्रेडिट योजना चला रही है; खेत में आग घटाने का लक्ष्य।
- जनता/पर्यावरण — ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी, मृदा व जल संरक्षण तथा पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण में गिरावट।
क्यों अहम है
यह पहली बार है जब भारत में जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को सीधे नकद, बाजार-आधारित प्रोत्साहन मिला है, जिससे "अच्छी खेती" किसान के लिए आर्थिक रूप से लाभदायक बनती है। पंजाब-हरियाणा के धान-गेहूं तंत्र में यह पराली जलाने, भूजल दोहन और मृदा क्षरण जैसी समस्याओं का समाधान दंड की जगह प्रोत्साहन से करने का मॉडल पेश करता है। सत्यापन उपग्रह, जियो-फेंसिंग और मृदा नमूनाकरण पर निर्भर है, इसलिए इसकी विश्वसनीयता ही योजना के विस्तार की कुंजी है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- भारत में पहली बार कृषि पद्धतियों के लिए कार्बन क्रेडिट भुगतान: ~2,500 किसान, 50,000+ क्रेडिट, कुल ~2.50 करोड़ रुपये।
- कार्यक्रम: ग्रो इंडिगो, 2019 में शुरू; आईसीएआर का तकनीकी मार्गदर्शन; आईसीएआर-अटारी लुधियाना के साथ एमओयू।
- पंजाब में खेत में आग: 2020 में 83,000+ से घटकर 2025 में 5,000 से कम (आईसीएआर)।
- पंजाब की अगस्त 2024 योजना: कृषि भूमि पर पेड़ लगाने-कम से कम 5 वर्ष बनाए रखने पर कार्बन भुगतान।
- क्रेडिट देने वाली पद्धतियां: डीएसआर (सीधी बुवाई धान), शून्य/न्यूनतम जुताई, अवशेष प्रबंधन, कुशल उर्वरक उपयोग।
- नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन: कृषि-पारिस्थितिकी व पुनर्योजी कृषि पर उत्कृष्टता केंद्रों का ब्रिक्स नेटवर्क तथा डिजिटल कृषि नेटवर्क।
मेन्स दृष्टिकोण
पंजाब-हरियाणा की धान-गेहूं आधारित प्रणाली में पराली जलाना, अत्यधिक जल उपयोग और मृदा कार्बन का ह्रास लंबे समय से नीतिगत चुनौती रहे हैं, जिनका उत्तर मुख्यतः निषेध और दंड से खोजा गया। ग्रो इंडिगो द्वारा 2019 में आईसीएआर के तकनीकी मार्गदर्शन में शुरू किया गया कार्बन क्रेडिट कार्यक्रम इस दृष्टिकोण को पलटता है — डीएसआर, शून्य जुताई, अवशेष प्रबंधन और कुशल उर्वरक उपयोग जैसी पद्धतियों को सत्यापित क्रेडिट के जरिये नकद मूल्य देकर, जिसमें ~2,500 किसानों को 3,000-15,000 रुपये (कुल ~2.50 करोड़ रुपये) मिले। भुगतान रकबे से नहीं, सत्यापित क्रेडिट से जुड़ा है, और निगरानी उपग्रह, रिमोट सेंसिंग, जियो-फेंसिंग तथा मृदा नमूनाकरण पर आधारित है — जिससे प्रलेखन व सत्यापन की गुणवत्ता निर्णायक बन जाती है। डॉ. राजबीर सिंह के अनुसार आईसीएआर की भूमिका किसानों को शिक्षित करना और पद्धतियों का क्षेत्र-प्रमाण के साथ प्रलेखन सुनिश्चित करना है। आगे का रास्ता: भुगतान को एकबारगी नहीं, सतत प्रक्रिया बनाए रखना (जैसा कंपनी अधिकारियों ने कहा), पंजाब की अगस्त 2024 की कृषि-वानिकी योजना जैसी पहलों से तालमेल, और छोटे किसानों तक पहुंच बढ़ाना; ब्रिक्स के पुनर्योजी कृषि व डिजिटल कृषि नेटवर्क इसे व्यापक संस्थागत ढांचा दे सकते हैं।
मुख्य शब्द
- कार्बन क्रेडिट
- उत्सर्जन घटाने या मिट्टी में कार्बन बढ़ाने के सत्यापित योगदान का इकाई-मूल्य, जिसके आधार पर किसान को भुगतान मिलता है।
- डीएसआर (सीधी बुवाई धान)
- रोपाई के बजाय बीज सीधे खेत में बोने की विधि, जिससे पानी की खपत घटती है।
- आईसीएआर-अटारी
- आईसीएआर का कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, लुधियाना; ग्रो इंडिगो के साथ इसका एमओयू है।
- एक्स-सिटू अवशेष प्रबंधन
- फसल अवशेष को खेत से बाहर ले जाकर (जैसे गांठें/बेल बनाकर) उपयोग करना, जलाने के बजाय।
- मृदा कार्बनिक कार्बन
- मिट्टी में मौजूद कार्बन की मात्रा; मृदा नमूनाकरण से इसमें बदलाव आंका जाता है।
- जियो-फेंसिंग
- उपग्रह/रिमोट सेंसिंग आधारित डिजिटल सीमांकन, जिससे खेतों और अवशेष जलाने की निगरानी होती है।
अभ्यास प्रश्न
- भारत में कृषि क्षेत्र के लिए कार्बन क्रेडिट आधारित प्रोत्साहन, पराली जलाने पर दंडात्मक उपायों की तुलना में कितना प्रभावी हो सकता है? पंजाब-हरियाणा के अनुभव के आलोक में परीक्षण करें।
- जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों के सत्यापन में उपग्रह, रिमोट सेंसिंग और मृदा नमूनाकरण की भूमिका पर चर्चा करें तथा विश्वसनीयता की चुनौतियां बताइए।
- पंजाब में खेत में आग की घटनाएं 2020 के 83,000+ से 2025 में 5,000 से कम कैसे हुईं? इस गिरावट को बनाए रखने के लिए नीतिगत सुझाव दें।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
