आठ सरकारी बैंकों में गैर-कार्यकारी अध्यक्ष का पद खाली

फाइनेंशियल सर्विसेज इंस्टीट्यूशंस ब्यूरो (एफएसआईबी) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारतीय स्टेट बैंक को छोड़कर देश के 11 सरकारी बैंकों में से आठ में गैर-कार्यकारी अध्यक्ष नहीं है। केवल बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक और यूको बैंक में यह पद भरा है। इंडियन बैंक में आठ वर्ष और बैंक ऑफ महाराष्ट्र में 22 अप्रैल 2015 से 11 वर्ष से पद रिक्त है। 14 जुलाई को जारी और 1 अक्टूबर से लागू आरबीआई के नए गवर्नेंस ढांचे के मद्देनजर यह मुद्दा अहम है।

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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Eight of India's 11 public sector banks, excluding SBI, lack a non-executive chairman; only Bank of India, Indian Overseas Bank and UCO Bank have one. — Attributed to latest Financial Services Institutions Bureau data reviewed by Mint; figures internally consistent.
  • Vacancies range from 8 years at Indian Bank to 11 years at Bank of Maharashtra, whose post is vacant from 22 April 2015. — Dates appear in source and match the stated durations approximately; drawn from the FSIB database.
  • Canara Bank, Punjab National Bank and Union Bank of India have had no non-executive chairman since 7 November 2025. — Figure appears in source, cited to the current FSIB database; no independent confirmation possible.
  • A new RBI governance framework was issued on 14 July and is effective from 1 October. — Stated in source without document reference; year not specified.
  • The government is not prioritising filling vacancies. — Opinion attributed by name to former finance secretary Subhash Chandra Garg; no official explanation available as banks and DFS did not respond.

विश्लेषकों की राय राय

AI आर्थिक विश्लेषक

यह केवल खाली कुर्सियों की गिनती नहीं है — यह जनता के पैसे को संभालने वाले संस्थानों में बोर्ड निगरानी की गुणवत्ता का सवाल है, जिसका ठोस आर्थिक मूल्य होता है। 1 अक्टूबर से लागू आरबीआई के नए गवर्नेंस ढांचे में बोर्ड का एजेंडा तय करने की मुख्य जिम्मेदारी चेयरपर्सन पर है, ऐसे में 11 में से 8 सरकारी बैंकों में यह पद खाली रहना नियामकीय मंशा और जमीनी हकीकत के बीच अंतर दिखाता है। रोजमर्रा का कामकाज एमडी एवं सीईओ के जिम्मे चलता रहता है, इसलिए तत्काल परिचालन असर नहीं है; जोखिम यह है कि रिस्क मैनेजमेंट और रणनीति पर स्वतंत्र निगरानी कमजोर पड़े — जिसे स्टोरी में विशेषज्ञ कमजोर गवर्नेंस का अग्रिम संकेत बताते हैं।

  • सरकारी बैंक सरकार के स्वामित्व में हैं लेकिन शेयर बाजार में सूचीबद्ध भी हैं, इसलिए गवर्नेंस की कमी की कीमत अल्पांश शेयरधारकों, जमाकर्ताओं और अंततः करदाताओं को चुकानी पड़ती है।
  • बाजार गवर्नेंस की गुणवत्ता को कीमत में शामिल करता है — स्वतंत्र निगरानी पर संदेह उन कारकों में है जो सरकारी बैंकों के वैल्यूएशन डिस्काउंट को बनाए रख सकते हैं।
  • बोर्डों में कार्यकारी निदेशकों, प्रबंध निदेशकों और सरकारी नामितों का प्रतिनिधित्व पहले से भारी है, ऐसे में खाली चेयर से स्वतंत्रता और पतली पड़ सकती है, जैसा स्टोरी में विशेषज्ञ चेताते हैं।
  • 2015 में चेयरमैन और प्रबंध निदेशक पदों का अलगाव चेक्स एंड बैलेंस मजबूत करने का सुधार था; वर्षों तक खाली पद उस सुधार का आर्थिक लाभ घटाते हैं।
  • स्टोरी के अनुसार नियुक्ति प्रक्रिया में छह-सात महीने से अधिक लग सकते हैं, यानी कुछ देरी प्रक्रियागत है — लेकिन इससे आठ से ग्यारह साल की रिक्तियां नहीं समझाई जा सकतीं।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि एफएसआईबी की सिफारिशें और वित्तीय सेवा विभाग की नियुक्तियां कितनी तेजी से होती हैं, और क्या आरबीआई यह स्पष्ट करता है कि पद खाली रहने पर चेयरपर्सन की गवर्नेंस भूमिका कौन निभाएगा।

स्टोरी यह स्थापित नहीं करती कि इन बैंकों में कोई विशिष्ट गवर्नेंस चूक, नुकसान या वित्तीय असर हुआ है, और देरी पर सरकार की कोई सार्वजनिक सफाई भी उपलब्ध नहीं है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 8 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) को छोड़कर देश के 11 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में से आठ में इस समय गैर-कार्यकारी अध्यक्ष (नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन) का पद खाली है। गैर-कार्यकारी अध्यक्ष बोर्ड को नेतृत्व, व्यापक नीतिगत दिशा और गवर्नेंस की निगरानी देता है, और बोर्ड व प्रबंधन के बीच जवाबदेही की एक अलग परत बनाता है। एसबीआई में शीर्ष अधिकारी कार्यकारी अध्यक्ष होता है, जबकि अन्य सरकारी व निजी बैंकों में एमडी एवं सीईओ होता है। आरबीआई का नया गवर्नेंस ढांचा 14 जुलाई को जारी हुआ और 1 अक्टूबर से प्रभावी है, जिससे यह रिक्तियां और अहम हो गई हैं।

मुख्य तथ्य

  • एसबीआई को छोड़कर 11 सरकारी बैंकों में से आठ में गैर-कार्यकारी अध्यक्ष का पद रिक्त है।
  • केवल बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक और यूको बैंक में गैर-कार्यकारी अध्यक्ष कार्यरत हैं — एफएसआईबी के ताजा आंकड़े।
  • बैंक ऑफ महाराष्ट्र में पद 22 अप्रैल 2015 से रिक्त है, यानी करीब 11 वर्ष; अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक के पद अलग करने के बाद।
  • इंडियन बैंक में पद 14 अगस्त 2018 से (आठ वर्ष) खाली है।
  • केनरा बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में 7 नवंबर 2025 से पद रिक्त है।
  • बैंक ऑफ बड़ौदा में 1 मार्च 2024, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में 23 मई 2021 और पंजाब एंड सिंध बैंक में 7 नवंबर 2024 से पद खाली है।
  • आरबीआई का नया गवर्नेंस ढांचा 14 जुलाई को जारी और 1 अक्टूबर से लागू; इसमें अध्यक्ष पर बोर्ड का एजेंडा तय करने की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
  • एग्जीक्यूटिव सर्च फर्म फाइनहैंड कंसल्टेंट्स की वीनू नेहरू दत्ता के मुताबिक नियुक्ति प्रक्रिया में 6-7 महीने से अधिक लग सकते हैं।

समयरेखा

  1. 22 अप्रैल 2015बैंक ऑफ महाराष्ट्र में अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक के पद अलग होने के बाद गैर-कार्यकारी अध्यक्ष का पद रिक्त हुआ।
  2. 14 अगस्त 2018इंडियन बैंक में गैर-कार्यकारी अध्यक्ष का पद खाली हुआ।
  3. 23 मई 2021सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में पद रिक्त हुआ।
  4. 1 मार्च 2024बैंक ऑफ बड़ौदा में गैर-कार्यकारी अध्यक्ष का पद खाली हुआ।
  5. 7 नवंबर 2024पंजाब एंड सिंध बैंक में पद रिक्त हुआ।
  6. 14 जुलाईआरबीआई ने बैंकों के लिए नया गवर्नेंस ढांचा जारी किया।
  7. 1 अक्टूबरआरबीआई का नया गवर्नेंस ढांचा प्रभावी हुआ।
  8. 7 नवंबर 2025केनरा बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में पद रिक्त हुए।

किसका दाँव

  • सार्वजनिक क्षेत्र के आठ बैंक (बीओबी, पीएनबी, केनरा, यूनियन बैंक, सेंट्रल बैंक, इंडियन बैंक, पंजाब एंड सिंध बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र) — बोर्ड नेतृत्व के अभाव में निगरानी और स्वतंत्रता कमजोर पड़ने का जोखिम।
  • फाइनेंशियल सर्विसेज इंस्टीट्यूशंस ब्यूरो (एफएसआईबी) — सरकारी बैंकों, वित्तीय संस्थानों और सरकारी बीमा कंपनियों में पूर्णकालिक निदेशकों व गैर-कार्यकारी अध्यक्षों के नाम सिफारिश करना।
  • भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) — नया गवर्नेंस ढांचा लागू करना; दिशानिर्देश अध्यक्ष की अनुपस्थिति में गवर्नेंस भूमिका पर मौन हैं।
  • वित्त मंत्रालय का वित्तीय सेवाएं विभाग (डीएफएस) — सरकारी बैंकों से जुड़े नीतिगत मामले व नियुक्तियां; ईमेल का जवाब नहीं दिया।
  • जमाकर्ता, अल्पांश शेयरधारक और जनता — सार्वजनिक धन संभालने वाले बैंकों में जवाबदेही; बैंकिंग व प्रतिभूति बाजार दोनों नियामक ढांचों के तहत बोर्ड की जिम्मेदारी।
  • एमडी एवं सीईओ — आरबीआई नियमों के तहत अध्यक्ष की अनुपस्थिति में बोर्ड बैठक की अध्यक्षता करना, जिससे शक्ति संतुलन पर सवाल।

क्यों अहम है

सरकारी बैंक जनता का पैसा संभालते हैं और शेयर बाजारों में सूचीबद्ध भी हैं, इसलिए उनके बोर्ड बैंकिंग तथा प्रतिभूति बाजार, दोनों नियामक ढांचों के तहत जवाबदेह हैं। अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक के पद अलग करने का सुधार बोर्ड व प्रबंधन के बीच चेक्स एंड बैलेंस के लिए किया गया था; वर्षों तक अध्यक्ष का पद खाली रहने से यह संतुलन और बोर्ड की स्वतंत्रता कमजोर पड़ सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक लंबी रिक्तियां कमजोर गवर्नेंस का अग्रिम संकेत हैं।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • एफएसआईबी सरकारी बैंकों, वित्तीय संस्थानों व सरकारी बीमा कंपनियों में शीर्ष पदों के लिए उम्मीदवारों की सिफारिश करता है।
  • एसबीआई में कार्यकारी अध्यक्ष होता है, बाकी सरकारी व निजी बैंकों में एमडी एवं सीईओ शीर्ष कार्यकारी होता है।
  • आरबीआई का नया बैंक गवर्नेंस ढांचा: 14 जुलाई को जारी, 1 अक्टूबर से प्रभावी।
  • बैंक ऑफ महाराष्ट्र में गैर-कार्यकारी अध्यक्ष का पद 22 अप्रैल 2015 से खाली — अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक पदों के पृथक्करण के बाद।
  • आरबीआई दिशानिर्देश अध्यक्ष की अनुपस्थिति में प्रबंध निदेशक को बोर्ड बैठक की अध्यक्षता की अनुमति देते हैं।
  • वित्तीय सेवाएं विभाग (डीएफएस), वित्त मंत्रालय के अधीन, सरकारी बैंकों से जुड़े नीतिगत मामलों के लिए जिम्मेदार है।

मेन्स दृष्टिकोण

सार्वजनिक क्षेत्र के 11 बैंकों में से आठ में गैर-कार्यकारी अध्यक्ष का पद खाली होना—इंडियन बैंक में आठ वर्ष और बैंक ऑफ महाराष्ट्र में 11 वर्ष से—भारत में बैंकिंग गवर्नेंस सुधारों के अधूरे कार्यान्वयन को उजागर करता है। कारण बहुस्तरीय हैं: नियुक्ति प्रक्रिया में 6-7 महीने से अधिक का समय, आंतरिक उत्तराधिकार योजना की देरी, और पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के शब्दों में गवर्नेंस को प्राथमिकता न देने की सरकारी प्रवृत्ति। प्रभाव गंभीर हैं—ग्रांट थॉर्नटन भारत के विवेक अय्यर के अनुसार बोर्डों में कार्यकारी निदेशकों, एमडी और सरकारी नामितों का बड़ा प्रतिनिधित्व होने से स्वतंत्र निदेशकों की उपस्थिति पहले से कम होती है, और अध्यक्ष का पद खाली रहने पर बोर्ड की स्वतंत्रता और पतली पड़ जाती है; गेफियन कैपिटल के प्रकाश अग्रवाल इसे बोर्ड निगरानी की गुणवत्ता व स्वतंत्रता के कमजोर होने के रूप में देखते हैं। आरबीआई का नया ढांचा अध्यक्ष पर बोर्ड एजेंडा तय करने की प्राथमिक जिम्मेदारी डालता है, पर यह मौन है कि अध्यक्ष के अभाव में यह गवर्नेंस भूमिका कौन निभाएगा। आगे की राह समयबद्ध नियुक्ति प्रक्रिया, पारदर्शी उत्तराधिकार योजना, और निजी व सरकारी बैंकों के लिए गवर्नेंस अपेक्षाओं पर समान ध्यान में निहित है।

मुख्य शब्द

गैर-कार्यकारी अध्यक्ष
बोर्ड का प्रमुख जो दैनिक प्रबंधन में शामिल नहीं होता, पर बोर्ड नेतृत्व, नीतिगत दिशा और गवर्नेंस निगरानी देता है।
एफएसआईबी (फाइनेंशियल सर्विसेज इंस्टीट्यूशंस ब्यूरो)
सरकारी बैंकों, वित्तीय संस्थानों व सरकारी बीमा कंपनियों के बोर्डों में पूर्णकालिक निदेशकों और गैर-कार्यकारी अध्यक्षों की सिफारिश करने वाली संस्था।
आरबीआई गवर्नेंस ढांचा
14 जुलाई को जारी और 1 अक्टूबर से प्रभावी दिशानिर्देश, जिनके तहत बोर्ड व्यावसायिक रणनीति, वित्तीय मजबूती, प्रमुख कार्मिक निर्णय, गवर्नेंस व जोखिम प्रबंधन के लिए अंतिम रूप से जिम्मेदार है।
एमडी एवं सीईओ
बैंक का शीर्ष कार्यकारी प्रमुख; अध्यक्ष की अनुपस्थिति में आरबीआई नियमों के तहत बोर्ड बैठक की अध्यक्षता कर सकता है।
अध्यक्ष-प्रबंध निदेशक पदों का पृथक्करण
बोर्ड और प्रबंधन के बीच अधिक चेक्स एंड बैलेंस के लिए किया गया सुधार, जो बैंक ऑफ महाराष्ट्र में 2015 में लागू हुआ।
वित्तीय सेवाएं विभाग (डीएफएस)
वित्त मंत्रालय के अंतर्गत विभाग, जो सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों से जुड़े नीतिगत मामले देखता है।

अभ्यास प्रश्न

  1. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में गैर-कार्यकारी अध्यक्ष के पद की लंबी रिक्तियां बोर्ड की स्वतंत्रता और निगरानी को कैसे प्रभावित करती हैं? चर्चा करें।
  2. अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक के पदों को अलग करने के सुधार के उद्देश्य क्या थे, और व्यवहार में इसके कार्यान्वयन की चुनौतियां क्या हैं?
  3. आरबीआई का 1 अक्टूबर से प्रभावी नया गवर्नेंस ढांचा बैंक बोर्डों पर क्या जिम्मेदारियां डालता है, और इसमें कौन-सी कमी रह गई है?

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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