बांग्लादेश के बार-बार आते ऊर्जा संकट की जड़ नीतियां: अनु मुहम्मद

बांग्लादेश में गैस की कमी और रोज़ चार से पांच घंटे की बिजली कटौती एक साथ जारी है, यह अर्थशास्त्री और ऊर्जा कार्यकर्ता अनु मुहम्मद ने 'द डेली स्टार' से कहा। उन्होंने संकट की जड़ 1990 के दशक की नीतियों और 2010 में जाइका द्वारा तैयार पावर सेक्टर मास्टर प्लान में बताई, जिसमें एलएनजी आयात, कोयला और परमाणु बिजली को प्राथमिकता दी गई। आयातित एलएनजी घरेलू गैस से करीब 60 गुना महंगा है, इसलिए घरेलू गैस और सौर ऊर्जा का विस्तार ज़रूरी है।

स्रोत

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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Bangladesh faces four to five hours of load-shedding daily alongside gas shortages — Attributed to Anu Muhammad in the interview; no independent data cited in source.
  • The 2010 Power Sector Master Plan was prepared by JICA without any Bangladeshi expert on the committee — Claim made by the interviewee; source gives no documentary corroboration.
  • Imported LNG costs nearly 60 times as much as gas from domestic exploration — Figure appears in source as the interviewee's assertion; no methodology or source provided.
  • Vietnam added about 11,000 MW of solar capacity in a single year; Bangladesh's peak demand is around 17,000 MW — Figures stated by the interviewee in the source; not independently attributed.
  • An Alternative Master Plan begun in 2015 and first published in July 2017 rejects LNG, coal and nuclear power — Internally consistent account by its co-author; dates appear in source.

विश्लेषकों की राय राय

AI रणनीतिक मामलों के विश्लेषक

ऊपर से देखने पर यह बिजली कटौती पर एक साक्षात्कार भर है; सामरिक नज़र से देखें तो यह तर्क है कि बांग्लादेश ने एक ऊर्जा समस्या को राष्ट्रीय-सुरक्षा निर्भरता में बदल लिया है। अनु मुहम्मद का मुख्य दावा — कि 1990 के दशक की नीतिगत दिशा और जायका द्वारा तैयार 2010 पावर सेक्टर मास्टर प्लान ने देश को आयातित एलएनजी, कोयला और परमाणु बिजली से बाँध दिया, जबकि बापेक्स और पेट्रोबांग्ला जैसी राष्ट्रीय संस्थाएँ कमज़ोर रहीं — ऐसे ऊर्जा ढाँचे की ओर इशारा करता है जिसकी आपूर्ति, कीमत और मरम्मत की समय-सीमा बड़े हिस्से में ढाका के नियंत्रण से बाहर है। उनके लागत के आँकड़े से सहमत हों या न हों, आयात पर निर्भरता का यह ढाँचागत पहलू उस किस्म की कमज़ोरी है जिसकी चिंता केवल अर्थशास्त्री नहीं, रक्षा-योजनाकार भी करते हैं। जिस प्रतिवाद पर वे पूरी तरह नहीं जाते, वह यह है कि आयात-आधारित क्षमता इसीलिए चुनी गई क्योंकि घरेलू अन्वेषण धीमा, पूँजी-गहन और अनिश्चित होता है।

  • आयात निर्भरता केवल वित्तीय नहीं, सामरिक जोखिम है: कहानी के अनुसार देश के दो एलएनजी टर्मिनलों में से एक के खराब होने पर मरम्मत में एक महीना या अधिक लग सकता है, यानी बहुत कम परिसंपत्तियों पर असमान रूप से बड़ा राष्ट्रीय दारोमदार है।
  • उनका कहना है कि विश्व बैंक, आईएमएफ, एडीबी और जायका जैसी बाहरी संस्थाओं ने नीति-ढाँचे को आकार दिया — इससे यह परिचित सवाल उठता है कि कर्ज़ लेने वाले देशों के पास महत्वपूर्ण अधोसंरचना में अपनी नीतिगत स्वायत्तता कितनी बचती है।
  • उनकी यह बात कि एक ही सरकार के कार्यकाल में चीनी परियोजनाएँ, अमेरिकी कंपनियों से एलएनजी सहयोग और भारत से संबंध — सभी बढ़े, किसी एक शक्ति के 'पक्ष' वाली सरल व्याख्या को कमज़ोर करती है और बताती है कि निर्भरताएँ प्रतिस्पर्धी राजधानियों में बाँट दी गईं।
  • यह दावा कि समुद्री ब्लॉकों का ठीक से अन्वेषण नहीं हुआ, जबकि म्यांमार और भारत को समान भूगर्भीय संरचनाओं में गैस मिली, समुद्री ऊर्जा को भूविज्ञान से अधिक सामरिक उपेक्षा का मुद्दा बना देता है।
  • उनका कहना है कि सरकार बदलने के बाद भी, अंतरिम व्यवस्था के दौरान भी, नीति की निरंतरता बनी रही — यानी असली चालक संस्थागत और आर्थिक हैं, दलगत नहीं, और नेतृत्व बदलने से ये बदलने की संभावना कम है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि ढाका मौजूदा परिचालकों के साथ और एलएनजी टर्मिनल समझौते करता है या समुद्री अन्वेषण में निवेश तथा बापेक्स-पेट्रोबांग्ला को मज़बूत करने की दिशा में स्पष्ट कदम उठाता है — यही चुनाव बताएगा कि अगले दशक के लिए कौन सा सामरिक रास्ता तय हो रहा है।

यह एक साक्षात्कार में दी गई एक विशेषज्ञ की आलोचनात्मक राय है: कहानी में सरकार या नामित कंपनियों का पक्ष नहीं है, लागत, कोयला संयंत्रों के प्रदर्शन या परमाणु संयंत्र के बंद होने से जुड़े स्वतंत्र रूप से सत्यापित आँकड़े नहीं हैं, और यह भी स्थापित नहीं होता कि घरेलू गैस व सौर ऊर्जा का उनका सुझाया विकल्प आवश्यक समय-सीमा में मांग पूरी कर सकेगा।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 8 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

बांग्लादेश एक साथ गैस की भारी कमी और रोज़ चार से पांच घंटे की बिजली कटौती से जूझ रहा है। 'द डेली स्टार' को दिए साक्षात्कार में अर्थशास्त्री और ऊर्जा कार्यकर्ता अनु मुहम्मद का तर्क है कि यह संकट किसी एक सरकार की देन नहीं, बल्कि 1990 के दशक से अपनाई गई नवउदारवादी नीतियों और 2010 में जाइका द्वारा बनाए पावर सेक्टर मास्टर प्लान (पीएसएमपी) का नतीजा है, जिसने एलएनजी आयात, कोयला बिजली और परमाणु बिजली को तीन मुख्य रास्ते बताया। उनका कहना है कि घरेलू गैस, मज़बूत राष्ट्रीय संस्थाएं (पेट्रोबांग्ला, बापेक्स) और तेज़ी से सौर ऊर्जा विस्तार ही सस्ता, स्वच्छ और टिकाऊ विकल्प है। साक्षात्कार 19 सितंबर 2026 को प्रकाशित हुआ।

मुख्य तथ्य

  • बांग्लादेश में रोज़ चार से पांच घंटे की लोड-शेडिंग के साथ-साथ गैस की भी भारी कमी बनी हुई है।
  • आयातित एलएनजी उतनी ही मात्रा की घरेलू गैस खोज की तुलना में लगभग 60 गुना महंगी पड़ती है।
  • 2010 में दो बड़े कदम हुए: ऊर्जा क्षेत्र के लिए इंडेमनिटी (क्षतिपूर्ति) कानून और जाइका द्वारा तैयार पावर सेक्टर मास्टर प्लान, जिसकी समिति में एक भी बांग्लादेशी विशेषज्ञ नहीं था।
  • 2009 में शेख हसीना सरकार ने विरोध दबाकर कोनोकोफिलिप्स से समझौता किया; कंपनी ने काम का हिस्सा एक चीनी कंपनी को सबकॉन्ट्रैक्ट किया, जो शुरुआती काम कर चली गई।
  • बांग्लादेश के पास केवल दो एलएनजी टर्मिनल हैं; एक खराब होने पर मरम्मत में एक महीने से छह हफ्ते तक लग जाते हैं।
  • वियतनाम ने अपने ऊर्जा संकट के दौरान एक ही साल में लगभग 11,000 मेगावाट सौर क्षमता जोड़ी, जबकि बांग्लादेश की पीक मांग करीब 17,000 मेगावाट है।
  • सरकार 12 या 14 टका प्रति यूनिट के दीर्घकालिक सौर अनुबंध कर रही है, जबकि भारत में तुलनीय सौर बिजली 4 या 5 टका प्रति यूनिट में बन सकती है।
  • वैकल्पिक मास्टर प्लान पर काम 2015 में शुरू हुआ और पहला मसौदा जुलाई 2017 में प्रकाशित हुआ; उसका निष्कर्ष है कि देश को एलएनजी आयात, कोयला खनन, कोयला व परमाणु बिजली की ज़रूरत नहीं।

समयरेखा

  1. 1960 के दशक के अंतनॉर्वे में तेल की खोज; शुरुआत में विदेशी कंपनियों पर निर्भरता, पर उसी दौर में अपनी संस्थाएं और तकनीकी क्षमता बनाई।
  2. 1980 के दशक सेलगातार सरकारें यह तर्क दोहराती रहीं कि बांग्लादेश में क्षमता नहीं है, इसलिए विदेशी कंपनियां ज़रूरी हैं।
  3. 1990 के दशक की शुरुआतप्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (पीएससी) व्यवस्था लागू; विदेशी कंपनियों का प्रवेश, पर राष्ट्रीय संस्थाओं का उसी गति से विकास नहीं।
  4. 2009सत्ता में आने के तुरंत बाद हसीना सरकार ने कोनोकोफिलिप्स से समझौता किया; विरोध बल से दबाया गया, कंपनी का शेयर भाव बढ़ा।
  5. 2010ऊर्जा क्षेत्र के लिए इंडेमनिटी कानून और जाइका द्वारा तैयार पावर सेक्टर मास्टर प्लान — एलएनजी आयात, कोयला व परमाणु बिजली के तीन रास्ते।
  6. 2015वैकल्पिक मास्टर प्लान पर काम शुरू; करीब दो साल तक तैयारी।
  7. जुलाई 2017वैकल्पिक मास्टर प्लान का पहला मसौदा प्रकाशित।
  8. 19 सितंबर 2026'द डेली स्टार' में अनु मुहम्मद का साक्षात्कार प्रकाशित; वैकल्पिक योजना का अद्यतन कार्य जारी।

किसका दाँव

  • बांग्लादेश के आम उपभोक्ता व उद्योग — रोज़ 4-5 घंटे की बिजली कटौती और गैस की कमी से घरेलू जीवन, सिंचाई और औद्योगिक उत्पादन प्रभावित।
  • पेट्रोबांग्ला और बापेक्स — क्षमता विस्तार के बार-बार प्रस्ताव दिए, पर विदेशी कंपनियों पर निर्भरता जारी; भीतर स्वदेशी क्षमता के पक्षधर अधिकारी हाशिए पर या स्थानांतरित।
  • विश्व बैंक, आईएमएफ, एडीबी, जाइका — 1990 के दशक से नीतिगत ढांचा और मास्टर प्लान गढ़ने में भूमिका; निजी-विदेशी निवेश केंद्रित मॉडल।
  • विदेशी कंपनियां (कोनोकोफिलिप्स, एक्सेलरेट एनर्जी, अमेरिकी व चीनी कंपनियां) — अन्वेषण सौदे, एलएनजी टर्मिनल और बिजली परियोजनाओं से लाभ; टर्मिनल की बार-बार खराबी पर जवाबदेही का सवाल।
  • अंतरिम सरकार और वर्तमान सरकार — परियोजनाओं की समीक्षा की अपेक्षा थी, पर बड़े कारोबार-नौकरशाही-बहुपक्षीय संस्थाओं वाला ढांचा नहीं बदला; कहीं नीतियां और आगे बढ़ाई गईं।
  • सुंदरबन और पर्यावरण — रामपाल कोयला संयंत्र से दुनिया के सबसे बड़े मैंग्रोव वन व यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल पर गंभीर असर।
  • बुएट व विज्ञान-प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय — राष्ट्रीय तकनीकी क्षमता व विशेषज्ञता पैदा करने की भूमिका, जो 'हमारे पास क्षमता नहीं' के तर्क से कमज़ोर पड़ी।

क्यों अहम है

दशकों के निवेश, कोयला संयंत्रों, एलएनजी टर्मिनलों और परमाणु कार्यक्रम के बाद भी बांग्लादेश गैस व बिजली की तीव्र कमी में फंसा है — यह दिखाता है कि आयात-निर्भर ऊर्जा मॉडल महंगा, पर्यावरणीय रूप से नुकसानदेह और तकनीकी रूप से नाज़ुक है। भारत के पड़ोस में ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी कर्ज़ और सुंदरबन जैसे साझा पारिस्थितिक तंत्र जुड़े हैं, इसलिए यह क्षेत्रीय महत्व का मुद्दा है। साथ ही यह बहस करती है कि ओएनजीसी या पेट्रोनास जैसी राष्ट्रीय संस्थाएं बनाना ही दीर्घकालिक विकल्प है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • पावर सेक्टर मास्टर प्लान (पीएसएमपी) 2010 जाइका ने तैयार किया; इसमें एलएनजी आयात, कोयला और परमाणु बिजली को प्राथमिकता।
  • प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (पीएससी) व्यवस्था बांग्लादेश में 1990 के दशक की शुरुआत में लागू हुई।
  • सुंदरबन दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है; रामपाल संयंत्र के विरुद्ध लंबा आंदोलन चला।
  • बापेक्स और पेट्रोबांग्ला बांग्लादेश की राष्ट्रीय तेल-गैस संस्थाएं हैं; तुलना में भारत का ओएनजीसी, मलेशिया का पेट्रोनास।
  • आयातित एलएनजी घरेलू गैस अन्वेषण की तुलना में लगभग 60 गुना महंगी; बांग्लादेश में दो एलएनजी टर्मिनल।
  • वियतनाम ने एक वर्ष में करीब 11,000 मेगावाट सौर क्षमता जोड़ी; बांग्लादेश की पीक मांग लगभग 17,000 मेगावाट।

मेन्स दृष्टिकोण

बांग्लादेश का ऊर्जा संकट अनु मुहम्मद के विश्लेषण में तकनीकी नहीं, नीतिगत है: 1990 के दशक से विश्व बैंक, आईएमएफ, एडीबी और जाइका के प्रभाव में बना नवउदारवादी ढांचा, पीएससी व्यवस्था, 2010 का इंडेमनिटी कानून और बिना किसी बांग्लादेशी विशेषज्ञ के तैयार पीएसएमपी — इन सबने आयातित एलएनजी, कोयला और परमाणु बिजली को केंद्र में रखा और राष्ट्रीय क्षमता-निर्माण को हाशिए पर डाल दिया। परिणाम है भारी कर्ज़, घरेलू गैस से 60 गुना महंगी एलएनजी, वैश्विक कीमतों के उतार-चढ़ाव का जोखिम, दो टर्मिनलों पर तकनीकी निर्भरता, कोयला संयंत्रों का अपेक्षा से कम चलना, परमाणु संयंत्र की बार-बार बंदी और सुंदरबन पर रामपाल का असर; सरकार बदलने पर भी बड़े कारोबार, नौकरशाही और बहुपक्षीय संस्थाओं की सतत भूमिका के कारण नीतिगत निरंतरता बनी रही। आगे का रास्ता उन्होंने ठोस बताया: भोला की गैस के तीन विकल्पों पर तत्काल व्यवहार्यता अध्ययन, छतक/टेंगराटिला की गैस का राष्ट्रीय संस्था के ज़िम्मे उत्पादन एक-दो वर्ष में, मौजूदा गैस क्षेत्रों की मरम्मत से दो-चार महीने में उत्पादन वृद्धि, ऑफशोर अन्वेषण में स्वामित्व व नियंत्रण राष्ट्रीय संस्थाओं के पास रखते हुए चार-पांच वर्ष की योजना, और छतों व खुली जगहों के नियोजित उपयोग से सौर विस्तार — जिसके लिए शुल्क ढांचे में सुधार, स्थानीय पैनल निर्माण को प्रोत्साहन तथा शुरुआती चरण में राज्य की अग्रणी भूमिका आवश्यक है, अन्यथा 12-14 टका प्रति यूनिट जैसे अनुबंध दीर्घकालिक बोझ बन जाएंगे।

मुख्य शब्द

पावर सेक्टर मास्टर प्लान (पीएसएमपी) 2010
जाइका द्वारा तैयार योजना जिसने बांग्लादेश के लिए एलएनजी आयात, कोयला बिजली और परमाणु बिजली के तीन रास्ते तय किए; अक्षय ऊर्जा हाशिए पर रही।
प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (पीएससी)
तेल-गैस अन्वेषण में विदेशी कंपनियों के साथ उत्पादन-बंटवारे की व्यवस्था, बांग्लादेश में 1990 के दशक की शुरुआत में लागू।
एलएनजी (तरलीकृत प्राकृतिक गैस)
आयातित गैस जिसे 'ब्रिज फ्यूल' कहा जाता है; यहां घरेलू गैस से लगभग 60 गुना महंगी और कीमत-उतार-चढ़ाव के जोखिम वाली बताई गई।
बापेक्स / पेट्रोबांग्ला
बांग्लादेश की राष्ट्रीय तेल-गैस अन्वेषण व ऊर्जा संस्थाएं, जिनकी तकनीकी क्षमता बढ़ाने के प्रस्ताव बार-बार उपेक्षित रहे।
इंडेमनिटी कानून (2010)
ऊर्जा क्षेत्र के कदमों को कानूनी चुनौती से बचाने वाला कानून, उसी वर्ष पीएसएमपी के साथ लागू।
वैकल्पिक मास्टर प्लान
2015 में शुरू और जुलाई 2017 में प्रकाशित नागरिक-विशेषज्ञ योजना: एलएनजी, कोयला व परमाणु के बजाय घरेलू गैस और तेज़ सौर विस्तार।

अभ्यास प्रश्न

  1. बांग्लादेश के ऊर्जा संकट के आलोक में परखें कि आयात-निर्भर एलएनजी मॉडल किस तरह ऊर्जा सुरक्षा, राजकोषीय बोझ और पर्यावरण के लिए जोखिम पैदा करता है।
  2. 'क्षमता की कमी' का तर्क विकासशील देशों में विदेशी-नेतृत्व वाली ऊर्जा परियोजनाओं का स्थायी आधार कैसे बन जाता है? नॉर्वे, भारत, मलेशिया और चीन के अनुभवों के संदर्भ में चर्चा करें।
  3. सरकारें बदलने पर भी ऊर्जा नीतियां क्यों नहीं बदलतीं? बड़े कारोबार, नौकरशाही और बहुपक्षीय वित्तीय संस्थाओं की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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