कार्बन उत्सर्जन का दोष विकासशील देशों पर गलत तरीके से: मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि कार्बन उत्सर्जन की जिम्मेदारी अक्सर विकासशील देशों पर गलत तरीके से डाली जाती है। नई दिल्ली के विज्ञान भवन में 'द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनामिक्स' अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने कहा कि भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन वैश्विक औसत के आधे से भी कम है। उन्होंने कहा कि पेरिस (कॉप-21) प्रतिबद्धताएं समय से पहले पूरी करने वाला भारत जी-20 का एकमात्र देश है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा 19-20 सितंबर को आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन में 17 देशों के न्यायाधीश शामिल हैं।

स्रोत

Hindustan Times — India · मूल ख़बर पढ़ें ↗

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Responsibility for carbon emissions has often been "wrongly placed" on developing countries. — Direct quote attributed to PM Modi in the source; opinion statement, not independently verified.
  • India's per capita carbon emissions are less than half of the global average. — Attributed to PM Modi in a quoted remark; no supporting data or agency cited in the source.
  • India is the only G-20 country to have fulfilled its COP-21 Paris commitments ahead of schedule. — Stated by PM Modi in a direct quote; no third-party verification in the source.
  • The two-day conference is organised by the National Green Tribunal on September 19-20, with judicial representatives from 17 countries. — Attributed to the NGT and event details listed in the source; figure appears in source.
  • President Murmu will attend the valedictory session on Sunday. — Scheduled event reported in the source; forward-looking, unverified.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

यह जलवायु भाषण के रूप में दिया गया एक कूटनीतिक-राजनीतिक बयान है। भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत के आधे से भी कम होने और पेरिस लक्ष्यों को समय से पहले पूरा करने वाला एकमात्र जी-20 देश होने का उल्लेख करके प्रधानमंत्री मोदी भारत को विकासशील देशों की आवाज़ के रूप में स्थापित कर रहे हैं। 'ग्लोबल साउथ' का ज़िक्र संयोग नहीं है — यह संकेत है कि भारत अमीर देशों की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी वाला तर्क छोड़ने वाला नहीं है।

  • उत्सर्जन का दोष "गलत तरीके से" डाला जा रहा है, यह कहना अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में भारत के पुराने रुख — विकास का अधिकार और ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी — को मज़बूत करता है।
  • "पिछले 12 वर्षों" की प्रगति का उल्लेख घरेलू राजनीतिक संदेश भी देता है, जिसमें जलवायु उपलब्धियों का श्रेय वर्तमान सरकार के कार्यकाल को मिलता है।
  • मंच भी अहम है: एनजीटी का आयोजन, सीजेआई, अटॉर्नी जनरल और 17 देशों के न्यायाधीशों की मौजूदगी भारत को पर्यावरणीय न्याय में मानक तय करने वाले देश के रूप में पेश करने का अवसर देती है।
  • यह ग्लोबल साउथ के नेतृत्व की भारत की व्यापक कोशिश का एक कदम है, जिसका संभावित उद्देश्य आगामी जलवायु वार्ताओं में मोलभाव की ताकत बढ़ाना है।
  • दूसरी ओर, आलोचक और विपक्ष यह तर्क दे सकते हैं कि प्रति व्यक्ति आंकड़े कुल उत्सर्जन, कोयले पर निर्भरता और स्थानीय प्रदूषण को ढक देते हैं — हालांकि इस खबर में ऐसी कोई प्रतिक्रिया दर्ज नहीं है।

किस पर नज़र रखें — रविवार के समापन सत्र के बाद सामने आने वाले रोडमैप पर और यह देखने पर नज़र रखें कि भारत अगली अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में इस ऐतिहासिक-ज़िम्मेदारी के तर्क को कितनी मज़बूती से आगे रखता है।

यह खबर केवल प्रधानमंत्री के दावों को दर्ज करती है — इसमें उत्सर्जन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि, विपक्ष या अन्य देशों की प्रतिक्रिया, या कोई नई नीतिगत घोषणा शामिल नहीं है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 3 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने नई दिल्ली के विज्ञान भवन में 19-20 सितंबर को 'द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनामिक्स' नामक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया। उद्घाटन सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि कार्बन उत्सर्जन की जिम्मेदारी अक्सर विकासशील देशों पर "गलत तरीके से" डाली जाती है, जबकि भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत के आधे से भी कम है। सम्मेलन में न्यायिक, सरकारी और विधिक हितधारकों के साथ 17 देशों के न्यायाधीश भाग ले रहे हैं, और इसका उद्देश्य पर्यावरणीय न्याय तथा संस्थागत सहयोग को मजबूत करना है।

मुख्य तथ्य

  • प्रधानमंत्री मोदी ने शनिवार को कहा कि कार्बन उत्सर्जन की जिम्मेदारी अक्सर विकासशील देशों पर "गलत तरीके से" डाली जाती है।
  • मोदी के अनुसार भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन वैश्विक औसत के आधे से भी कम है।
  • मोदी ने कहा कि भारत जी-20 का एकमात्र देश है जिसने पेरिस (कॉप-21) प्रतिबद्धताएं समयसीमा से पहले पूरी कर ली हैं।
  • उन्होंने कहा कि पिछले 12 वर्षों में भारत ने पर्यावरण से जुड़े हर क्षेत्र में असाधारण प्रगति की है, मुख्य फोकस अक्षय ऊर्जा पर रहा।
  • सम्मेलन एनजीटी द्वारा 19 और 20 सितंबर को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित किया जा रहा है।
  • सम्मेलन में 17 देशों के प्रतिष्ठित न्यायाधीश और न्यायिक प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं।
  • उद्घाटन सत्र में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव, अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और एनजीटी अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव उपस्थित रहे।
  • दो दिवसीय आयोजन में चार तकनीकी सत्र होंगे; रविवार के समापन सत्र में राष्ट्रपति मुर्मू शामिल होंगी।

समयरेखा

  1. 19 सितंबर (शनिवार)विज्ञान भवन, नई दिल्ली में सम्मेलन का उद्घाटन; प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन।
  2. 19-20 सितंबरएनजीटी द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, चार तकनीकी सत्र।
  3. 20 सितंबर (रविवार)समापन सत्र, जिसमें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, मनोहर लाल, जस्टिस पीएस नरसिम्हा, जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता शामिल होंगे।

किसका दाँव

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी / भारत सरकार — जलवायु वार्ता में विकासशील देशों का पक्ष रखना और अक्षय ऊर्जा व कॉप-21 लक्ष्यों में भारत की उपलब्धि प्रस्तुत करना।
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) — सम्मेलन का आयोजक; पर्यावरणीय न्याय और संस्थागत सहयोग मजबूत करना।
  • उच्च न्यायपालिका (सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत, सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के न्यायाधीश) — पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, विकास और न्याय के संबंधों पर न्यायिक संवाद।
  • ग्लोबल साउथ के देश और 17 देशों के न्यायाधीश — उत्सर्जन की ऐतिहासिक जिम्मेदारी तथा साझा पर्यावरणीय चुनौतियों पर अनुभव साझा करना।
  • राज्य संस्थाएं (एसईएसी, एसईआईएए, राज्य वेटलैंड प्राधिकरण, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण) — नीति-निर्माण और क्रियान्वयन की खामियों की पहचान तथा बेहतर प्रथाओं को अपनाना।

क्यों अहम है

जलवायु कूटनीति में यह बहस केंद्रीय है कि उत्सर्जन कटौती का बोझ कौन उठाए — ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन करने वाले विकसित देश या विकासशील देश। प्रधानमंत्री का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन का तर्क भारत की वार्ता-स्थिति को मजबूत करता है, जबकि कॉप-21 लक्ष्य समय से पहले पूरे करने का दावा भारत की साख से जुड़ा है। साथ ही, एनजीटी का यह मंच दिखाता है कि पर्यावरणीय न्याय और नियामक क्षमता अब जलवायु कार्रवाई का अहम हिस्सा है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • सम्मेलन का नाम: 'द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनामिक्स', स्थान विज्ञान भवन, नई दिल्ली; आयोजक एनजीटी; तिथि 19-20 सितंबर।
  • एनजीटी अध्यक्ष: जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव; भारत के मुख्य न्यायाधीश: जस्टिस सूर्य कांत; अटॉर्नी जनरल: आर वेंकटरमणी; सॉलिसिटर जनरल: तुषार मेहता।
  • मोदी का दावा: भारत जी-20 का एकमात्र देश जिसने पेरिस (कॉप-21) प्रतिबद्धताएं समय से पहले पूरी कीं।
  • भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन वैश्विक औसत के आधे से भी कम (स्रोत में उद्धृत)।
  • सम्मेलन में 17 देशों के न्यायाधीश; कुल चार तकनीकी सत्र।
  • समापन सत्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू; केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव उद्घाटन सत्र में उपस्थित।

मेन्स दृष्टिकोण

जलवायु न्याय की बहस का मूल प्रश्न उत्सर्जन की जिम्मेदारी के बँटवारे का है। प्रधानमंत्री मोदी का तर्क — कि जिम्मेदारी अक्सर विकासशील देशों पर \"गलत तरीके से\" डाली जाती है और भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत के आधे से भी कम है — ऐतिहासिक उत्सर्जन और प्रति व्यक्ति मापदंड पर आधारित है, जो ग्लोबल साउथ की साझा चिंता है। इसके साथ भारत अपनी सकारात्मक साख भी प्रस्तुत करता है: अक्षय ऊर्जा, गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता और सौर ऊर्जा में प्रगति तथा जी-20 में एकमात्र देश होने का दावा जिसने कॉप-21 प्रतिबद्धताएं समय-पूर्व पूरी कीं। दूसरी ओर, एनजीटी द्वारा आयोजित यह सम्मेलन संकेत देता है कि चुनौती केवल कूटनीतिक नहीं, संस्थागत भी है — स्रोत के अनुसार सम्मेलन का लक्ष्य नीति-निर्माण और क्रियान्वयन की खामियों की पहचान, सफल प्रथाओं का साझाकरण, तथा संस्थाओं व हितधारकों के बीच सहयोग मजबूत करना है। आगे का रास्ता चार तकनीकी सत्रों से निकलने वाले रोडमैप, न्यायपालिका-सरकार-विधिक तंत्र के समन्वय, और एसईआईएए/एसईएसी जैसे राज्य स्तरीय नियामक निकायों की क्षमता बढ़ाने में है, ताकि पर्यावरण, जलवायु, विकास और न्याय के बीच संतुलन बने।

मुख्य शब्द

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी)
पर्यावरण संबंधी मामलों का निपटारा करने वाला अधिकरण; इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजक, अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव।
कॉप-21 / पेरिस प्रतिबद्धताएं
पेरिस में हुए कॉप-21 शिखर सम्मेलन में किए गए जलवायु वादे; मोदी के अनुसार भारत ने इन्हें समय से पहले पूरा किया।
प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन
किसी देश के कुल उत्सर्जन को उसकी आबादी से बाँटने पर मिलने वाला माप; भारत का यह आंकड़ा वैश्विक औसत के आधे से कम बताया गया।
ग्लोबल साउथ
विकासशील देशों का समूह, जिनके प्रतिनिधि सम्मेलन में उपस्थित थे और जिनकी उत्सर्जन जिम्मेदारी पर बहस केंद्रित है।
एसईआईएए और एसईएसी
राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण और राज्य विशेषज्ञ मूल्यांकन समितियाँ; सम्मेलन में शामिल राज्य स्तरीय पर्यावरण नियामक निकाय।

अभ्यास प्रश्न

  1. जलवायु वार्ताओं में 'प्रति व्यक्ति उत्सर्जन' और 'ऐतिहासिक जिम्मेदारी' के तर्क विकासशील देशों की स्थिति को कैसे मजबूत करते हैं? भारत के संदर्भ में चर्चा करें।
  2. पर्यावरणीय न्याय को मजबूत करने में राष्ट्रीय हरित अधिकरण तथा राज्य स्तरीय पर्यावरण नियामक निकायों की भूमिका का परीक्षण कीजिए।
  3. "कॉप-21 प्रतिबद्धताएं समय से पहले पूरी करना भारत की जलवायु साख को बढ़ाता है, परंतु क्रियान्वयन की खामियाँ अभी भी चुनौती हैं।" मूल्यांकन कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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