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पश्चिमी घाट: कर्नाटक विधानसभा ने जमीनी सर्वे की मांग की

कर्नाटक विधानसभा ने मंगलवार को सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर पश्चिमी घाट के पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्रों पर कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की समीक्षा और अंतिम अधिसूचना से पहले भौतिक सर्वेक्षण के लिए एक वर्ष का समय मांगा। जुलाई के मसौदे में राज्य के 10 जिलों के 1,449 गांवों में फैले 20,668 वर्ग किमी को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने का प्रस्ताव है। राज्य का कहना है कि इसमें खेत, बागान और घर आ सकते हैं। पर्यावरणविदों के मुताबिक प्रतिबंध मुख्यतः खनन और प्रदूषणकारी उद्योगों पर लगेंगे।

स्रोत

Hindustan Times — India · मूल ख़बर पढ़ें ↗

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Karnataka Assembly unanimously adopted a resolution on Tuesday seeking review of the Kasturirangan report and one year for a physical survey. — Attributed in source to the Assembly proceedings; figure of one year appears in source.
  • The latest July draft notification proposes 20,668 sq km of Karnataka's Western Ghats as an ESA, covering 1,449 villages in 10 districts. — Figures appear in source; drawn from the draft notification, not independently verified.
  • The 2013 Kasturirangan report proposed an ESA over about 37% of the Western Ghats, or 59,940 sq km across six states. — Figures appear in source and are internally consistent with the Karnataka share cited.
  • Chief Minister DK Shivakumar said the state is seeking a scientific revision, not disrespecting the recommendations. — Direct quote attributed to the named chief minister in the source.
  • Environmentalist Akhilesh Chipli said restrictions would mainly target mining and highly polluting industries. — Attributed to a named individual; opinion, not a verified fact.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

सबसे बड़ा संकेत यही है कि प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ — पश्चिमी घाट पर कर्नाटक की सभी पार्टियों ने मान लिया है कि दस जिलों के किसानों और बागान मालिकों के सामने दिल्ली में बने नक्शे की पैरवी करने में कोई चुनावी लाभ नहीं है। सीधे अस्वीकार करने के बजाय एक साल के क्षेत्रीय सर्वेक्षण की मांग रखकर राज्य सरकार पर्यावरण-संरक्षण का नैतिक आधार भी बचा लेती है और प्रतिबंधों की राजनीतिक कीमत केंद्र के खाते में डाल देती है। केंद्रीय सहायता और वैकल्पिक आजीविका की मांग अगला स्वाभाविक कदम है, जो पारिस्थितिक विवाद को केंद्र-राज्य मोलभाव में बदल देती है।

  • दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर सर्वसम्मति दिखाती है कि 10 जिलों के 1,449 गांव ऐसा वोट-समूह हैं जिसे कोई पक्ष नाराज़ नहीं करना चाहता, और इससे यह मुद्दा राज्य की रोज़मर्रा की दलगत लड़ाई से बाहर निकल जाता है।
  • मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने जो भाषा चुनी — अस्वीकार नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पुनरीक्षण — वह राजनीतिक रूप से किफ़ायती है, क्योंकि इससे किसान वर्ग और संरक्षण-समर्थक शहरी राय, दोनों को साथ रखा जा सकता है।
  • सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली प्रस्तावित समिति, जिसमें किसान, उद्योग, वैज्ञानिक और ग्राम पंचायत की राय शामिल होगी, अंतिम सीमा-निर्णय की जिम्मेदारी बांट देती है और सरकार को आरोपों से बचाती है।
  • इतिहास देरी की रणनीति के पक्ष में है: राज्यों की आपत्तियों के बीच पहले के छह मसौदे समय पूरा होने पर निष्प्रभावी हो गए, और मसौदे की 725 दिन की अवधि राज्यों को समझौते की जगह बातचीत खींचने का प्रोत्साहन देती है।
  • केरल और महाराष्ट्र ने भी अधिसूचनाओं का विरोध किया है, इसलिए केंद्र के सामने किसी एक असहमत सरकार के बजाय बहु-राज्यीय मोर्चा है, जिससे मौजूदा मसौदा थोपने की राजनीतिक लागत बढ़ती है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय एक साल की मोहलत देता है या मौजूदा मसौदे को अपनी अवधि पूरी करने देता है, और कर्नाटक की प्रस्तावित समिति वादे के मुताबिक किसान, उद्योग तथा पंचायत प्रतिनिधित्व के साथ वास्तव में गठित होती है या नहीं।

यह खबर यह स्थापित नहीं करती कि 20,668 वर्ग किमी में कितना हिस्सा पहले से अधिसूचित वन है और कितना खेती व बस्तियों का — राज्य और पर्यावरणविदों के बीच यही मूल तथ्यात्मक विवाद अनसुलझा है — और न ही इसमें प्रस्ताव पर केंद्र की प्रतिक्रिया दर्ज है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 8 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

पश्चिमी घाट की जैव विविधता बचाने के लिए केंद्र दो दशक से पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र (ESA) अधिसूचित करने की कोशिश कर रहा है। 2010 में माधव गाडगिल समिति और फिर 2013 में के कस्तूरीरंगन की उच्चस्तरीय कार्यसमूह रिपोर्ट आई, जिसने पश्चिमी घाट के करीब 37% हिस्से को ESA घोषित करने की सिफारिश की। तब से सात मसौदा अधिसूचनाएं जारी हुईं, जिनमें से छह राज्यों की असहमति के कारण समाप्त हो गईं। जुलाई की ताज़ा मसौदा अधिसूचना के विरोध में कर्नाटक विधानसभा ने मंगलवार को सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित कर भौतिक सर्वेक्षण के लिए एक वर्ष मांगा है।

मुख्य तथ्य

  • कर्नाटक विधानसभा ने मंगलवार को सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की समीक्षा और अंतिम अधिसूचना से पहले एक वर्ष का समय मांगा।
  • ताज़ा मसौदा अधिसूचना कर्नाटक के 20,668 वर्ग किमी पश्चिमी घाट को ESA घोषित करने का प्रस्ताव करती है, जिसमें 10 जिलों के 1,449 गांव शामिल हैं।
  • कस्तूरीरंगन कार्यसमूह की 2013 रिपोर्ट ने छह राज्यों में 59,940 वर्ग किमी, यानी पश्चिमी घाट के लगभग 37% को ESA बनाने का सुझाव दिया।
  • पहली मसौदा अधिसूचना 10 मार्च 2014 को जारी हुई; हर मसौदा जारी होने के 725 दिन बाद समाप्त हो जाता है।
  • पश्चिमी घाट 1,600 किमी लंबा है, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में फैला है, और 2012 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित हुआ।
  • पश्चिमी घाट में कम से कम 325 वैश्विक रूप से संकटग्रस्त प्रजातियां पाई जाती हैं।
  • राज्य को आपत्ति है कि यदि किसी गांव का एक-पांचवां हिस्सा वन सीमा में आता है तो पूरा गांव ESA में शामिल किया जा सकता है; विधानसभा ने इसे अवैज्ञानिक कहा।
  • 2022 से मंत्रालय द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति राज्यों के सुझावों की जांच कर रही है।

समयरेखा

  1. 2010केंद्र ने पारिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल की अध्यक्षता में पश्चिमी घाट संरक्षण के लिए विशेषज्ञ समिति नियुक्त की।
  2. 2012पश्चिमी घाट को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।
  3. 2013इसरो के पूर्व अध्यक्ष के कस्तूरीरंगन की उच्चस्तरीय कार्यसमूह रिपोर्ट आई, जिसमें 59,940 वर्ग किमी ESA का प्रस्ताव था।
  4. 10 मार्च 2014पहली मसौदा ESA अधिसूचना जारी; इसके बाद की छह मसौदा अधिसूचनाएं राज्यों के मतभेद के कारण समाप्त हो गईं।
  5. 2022 सेकेंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति राज्यों के सुझावों की जांच कर रही है।
  6. जुलाई (हाल ही में)सातवीं और ताज़ा मसौदा अधिसूचना जारी, जिसमें कर्नाटक के 20,668 वर्ग किमी को ESA प्रस्तावित किया गया।
  7. मंगलवारकर्नाटक विधानसभा ने सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित कर समीक्षा और भौतिक सर्वेक्षण के लिए एक वर्ष मांगा।
  8. बुधवारमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा कि राज्य सिफारिशों का अनादर नहीं कर रहा, बल्कि वैज्ञानिक संशोधन चाहता है।

किसका दाँव

  • कर्नाटक सरकार और विधानसभा — सीमांकन को अधिसूचित वनों तक सीमित रखवाना, खेती, बागान, बस्तियों को बाहर रखना और सर्वेक्षण के लिए एक वर्ष हासिल करना।
  • केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय — मसौदों पर आपत्तियां लेकर अंतिम ESA अधिसूचना जारी करना; 2022 से विशेषज्ञ समिति सुझावों की जांच कर रही है।
  • पश्चिमी घाट के निवासी व किसान — निर्माण, पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे, उत्तराधिकार, सड़क-बिजली-स्वास्थ्य सुविधाओं पर प्रभाव की आशंका।
  • पर्यावरणविद (जैसे सागर के अखिलेश चिपली) — जैव विविधता संरक्षण; उनका तर्क कि प्रतिबंध मुख्यतः खनन और अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों पर लगेंगे।
  • अन्य पश्चिमी घाट राज्य (केरल, महाराष्ट्र आदि) — क्षेत्रफल और विकास प्रतिबंधों पर असहमति; इनके विरोध से पहले के मसौदे समाप्त हो चुके हैं।
  • खनन, उत्खनन व रेड श्रेणी उद्योग — ESA में खनन, रेत निकासी, ताप बिजली घर और बड़ी परियोजनाओं पर प्रतिबंध का सामना।

क्यों अहम है

पश्चिमी घाट भारत के सबसे समृद्ध जैवविविधता क्षेत्रों में है, जहां कम से कम 325 वैश्विक रूप से संकटग्रस्त प्रजातियां हैं, और 2014 से सात मसौदा अधिसूचनाएं राज्यों की असहमति में अटकी रही हैं। कर्नाटक का प्रस्ताव दिखाता है कि संरक्षण की सीमा कहां खींची जाए और उसमें रहने वाले लोगों का क्या हो—यह विवाद का केंद्र है। उपग्रह आधारित सीमांकन बनाम भौतिक सर्वेक्षण का यह टकराव पर्यावरण संघवाद और आजीविका-संरक्षण संतुलन का बड़ा उदाहरण है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • कस्तूरीरंगन उच्चस्तरीय कार्यसमूह (2013): पश्चिमी घाट के ~37% यानी 59,940 वर्ग किमी को ESA; कर्नाटक का हिस्सा ~20,668 वर्ग किमी।
  • माधव गाडगिल विशेषज्ञ पैनल 2010 में गठित; इसने श्रेणीबद्ध पारिस्थितिक संरक्षण व स्थानीय समुदायों की अधिक भागीदारी सुझाई।
  • पश्चिमी घाट: 1,600 किमी लंबा; गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल; 2012 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल।
  • पहली ESA मसौदा अधिसूचना 10 मार्च 2014; प्रत्येक मसौदा 725 दिन बाद समाप्त हो जाता है; अब तक सात मसौदे।
  • के कस्तूरीरंगन इसरो के पूर्व अध्यक्ष थे।
  • 'बगर हुकुम' दावे: सरकारी भूमि पर खेती को नियमित कराने के आवेदन; 'डीम्ड फॉरेस्ट': वन जैसी विशेषताओं वाली अनधिसूचित भूमि।

मेन्स दृष्टिकोण

पश्चिमी घाट ESA विवाद संरक्षण-विज्ञान, संघीय सहमति और आजीविका के टकराव का उदाहरण है। गाडगिल पैनल (2010) की श्रेणीबद्ध संरक्षण योजना राज्यों के विरोध में अटकी, तो केंद्र ने कस्तूरीरंगन कार्यसमूह बनाया, जिसकी 2013 रिपोर्ट ने 59,940 वर्ग किमी (लगभग 37%) को ESA घोषित करने और खनन, रेत निकासी, ताप बिजली, रेड श्रेणी उद्योगों व बड़ी परियोजनाओं पर रोक की सिफारिश की। 2014 से सात मसौदे जारी हुए, पर छह 725 दिन की अवधि में राज्यों की असहमति के कारण समाप्त हो गए—यह दिखाता है कि पर्यावरणीय निर्णय राज्यों की सहमति के बिना लागू नहीं हो पाते। कर्नाटक की आपत्ति पद्धति पर है: सीमाएं उपग्रह आंकड़ों से, संयुक्त भौतिक सर्वेक्षण व सर्वे नंबर आधारित सीमांकन के बिना तय हुईं; एक-पांचवां हिस्सा वन होने पर पूरा गांव शामिल करने का तरीका अवैज्ञानिक बताया गया; बगर हुकुम, वन अधिकार, डीम्ड फॉरेस्ट और न्यायालयीन विवाद अनसुलझे हैं। दूसरी ओर पर्यावरणविदों का तर्क है कि चिह्नित भूमि का बड़ा भाग पहले से अधिसूचित वन है और प्रतिबंध मुख्यतः खनन व प्रदूषणकारी उद्योगों पर पड़ेंगे। आगे का रास्ता: सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में बहु-हितधारक समिति, ग्राम पंचायत स्तर के इनपुट, सर्वे नंबर आधारित पारदर्शी सीमांकन, और प्रभावितों के लिए वित्तीय सहायता व वैकल्पिक आजीविका—ताकि संरक्षण स्थानीय विश्वास के साथ चले।

मुख्य शब्द

पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र (ESA)
अधिसूचित क्षेत्र जहां खनन, रेत निकासी, ताप बिजली घर, रेड श्रेणी उद्योग और बड़ी विकास परियोजनाएं प्रतिबंधित/सीमित होती हैं।
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट (2013)
इसरो के पूर्व अध्यक्ष के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाले उच्चस्तरीय कार्यसमूह की रिपोर्ट, जिसने 59,940 वर्ग किमी को ESA सुझाया।
गाडगिल पैनल (2010)
पारिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल की अध्यक्षता वाला विशेषज्ञ पैनल; श्रेणीबद्ध संरक्षण व सामुदायिक भागीदारी की सिफारिश, राज्यों ने विरोध किया।
रेड श्रेणी उद्योग
प्रदूषण की सर्वाधिक गंभीर श्रेणी वाले उद्योग, जिन पर ESA में प्रतिबंध प्रस्तावित है।
बगर हुकुम
सरकारी भूमि पर की जा रही खेती को नियमित कराने के लिए दिए गए आवेदन/दावे।
डीम्ड फॉरेस्ट
वन जैसी विशेषताओं वाली भूमि, जिसे औपचारिक रूप से वन के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया है।

अभ्यास प्रश्न

  1. पश्चिमी घाट में पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र अधिसूचित करने के प्रयास बार-बार विफल क्यों हुए? गाडगिल और कस्तूरीरंगन सिफारिशों की तुलना करते हुए चर्चा करें।
  2. उपग्रह आंकड़ों पर आधारित सीमांकन बनाम संयुक्त भौतिक सर्वेक्षण—पारिस्थितिक संरक्षण में किस पद्धति से जन-विश्वास बढ़ेगा? कर्नाटक के उदाहरण से समझाएं।
  3. संरक्षण और स्थानीय आजीविका के बीच संतुलन के लिए किस प्रकार की संस्थागत व्यवस्था उपयुक्त होगी? पश्चिमी घाट के संदर्भ में मूल्यांकन करें।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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