एसआईआर विवाद: विपक्ष ने सीईसी को हटाने की मांग की
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार उन मतदाता सूची संबंधी फैसलों पर दर्ज आपत्ति जताई, जो उनकी जानकारी के बिना लिए गए। इसके बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर हमले तेज कर दिए। टीएमसी सांसद डेरेक ओब्रायन ने सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव लाने की मांग की और कहा कि पांच माह पहले 60 से अधिक राज्यसभा सांसदों ने सभापति को पत्र लिखा था। आयोग ने कहा कि सभी फैसले सर्वसम्मत थे।
स्रोत
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi objected on record at least 14 times in 10 months to decisions taken without their knowledge — Attributed in source to an Indian Express report; not independently confirmed, EC is cited as saying all decisions were unanimous
- More than 60 Rajya Sabha MPs wrote to the Rajya Sabha chairman five months ago seeking a motion to remove CEC Gyanesh Kumar — Attributed to TMC MP Derek O'Brien; figure appears in source, no document cited
- A new Form 6 question on whether an applicant's parents appeared on the previous SIR roll was added without the required rule amendment; Sandhu called it 'unauthorised and ILLEGAL' — Quote and detail sourced to the same newspaper report, attributed
- TMC alleges Seema Khanna admitted software 'flaws' in WhatsApp chats and that screenshots exist — Unverified allegation by a political party about a named individual; no evidence presented in source, handle with caution
- A July administrative order on IT files was issued without informing the commissioners and was struck down the next day after they wrote to Cabinet Secretary T V Somanathan — Reported detail attributed to the newspaper report; no official confirmation in source
विश्लेषकों की राय राय
अब तक विपक्ष का एसआईआर अभियान 'राजनीतिक आरोप' कहकर खारिज किया जा सकता था; आयोग के भीतर से ही दर्ज आपत्तियों की खबर उसे वह संस्थागत आधार देती है जिसकी कमी थी। इसीलिए टीएमसी ने पाँच महीने पुराने राज्यसभा पत्र को फिर सामने लाकर सीईसी के विरुद्ध हटाने का प्रस्ताव आगे बढ़ाया है — मकसद वोट जीतना नहीं, राजनीतिक संदेश देना है। आयोग के यह कहने के बाद कि सभी निर्णय सर्वसम्मत थे, लड़ाई सबूत से ज़्यादा विश्वसनीयता की हो गई है।
- कांग्रेस, टीएमसी, सपा, शिवसेना (यूबीटी) और आप का एक ही दिन एक ही मुद्दे पर बोलना दिखाता है कि एसआईआर को साझा विपक्षी एजेंडा बनाने की कोशिश हो रही है।
- सीईसी को हटाने की प्रक्रिया जानबूझकर कठिन रखी गई है; 60 से अधिक सांसदों के पत्र के बाद भी विपक्ष के पास संख्या नहीं है, इसलिए प्रस्ताव मुख्यतः संदेश का औज़ार है।
- टीएमसी के लिए मुद्दा दोहरा लाभ देता है — बंगाल की मतदाता सूची और पार्टी के नाम-चिह्न विवाद को 'संस्थाओं के दुरुपयोग' की एक ही कथा में जोड़ा जा सकता है।
- भाजपा और आयोग की स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही होगी कि किसी भी सामूहिक संस्था में मतभेद सामान्य है और अंतिम फैसले सर्वसम्मत रहे — आयोग ने यह कह भी दिया है।
- आयुक्तों की चयन समिति से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने का मुद्दा उठाकर कांग्रेस बहस को व्यक्तियों से हटाकर ढांचागत सुधार की मांग तक ले जा रही है।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि राज्यसभा में प्रस्ताव वास्तव में आता है या नहीं, अदालत में मामला किस दिशा में बढ़ता है, और बाकी विपक्षी दल एक मंच पर आते हैं या नहीं।
ये आपत्तियां एक समाचार रिपोर्ट पर आधारित हैं जिसकी स्वतंत्र पुष्टि यहाँ नहीं है, और यह खबर यह साबित नहीं करती कि किसी मतदाता सूची में वास्तव में गड़बड़ी हुई।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 6 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
चुनाव आयोग (ईसी) द्वारा चलाई जा रही मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया और ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर पर विवाद गहरा गया है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार दोनों चुनाव आयुक्तों — सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज कराई कि मतदाता सूची से जुड़े अहम फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए गए। कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों आयुक्त मिलकर फैसला करते हैं और मतभेद होने पर बहुमत चलता है। रिपोर्ट के बाद कांग्रेस, टीएमसी, सपा, शिवसेना (यूबीटी) और आप सहित विपक्षी दलों ने आयोग पर हमला तेज कर दिया, जबकि आयोग ने कहा कि सभी फैसले सर्वसम्मत थे।
मुख्य तथ्य
- इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज की।
- टीएमसी सांसद डेरेक ओब्रायन ने कहा कि पांच महीने पहले 60 से अधिक राज्यसभा सांसदों ने सभापति को पत्र लिखकर सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव मांगा था।
- रिपोर्ट के मुताबिक मई से अगस्त के बीच पूर्ण आयोग (फुल कमिशन) की बैठक नहीं हुई।
- फॉर्म 6 में नया प्रश्न जोड़ा गया कि आवेदक के माता-पिता पिछली एसआईआर सूची में थे या नहीं; दोनों आयुक्तों ने मई में कहा था कि इसके लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियमों में संशोधन आवश्यक है। संधू ने इसे "अनधिकृत और अवैध" कहा।
- जुलाई का एक प्रशासनिक आदेश, जो आईटी फाइलों का नियंत्रण बदल सकता था, दोनों आयुक्तों को बताए बिना जारी हुआ; कैबिनेट सचिव टी वी सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे जाने के बाद अगले दिन आदेश रद्द कर दिया गया।
- रिपोर्ट में एक उदाहरण — एक अधिकारी ने 97 मतदाताओं को पात्र पाया, लेकिन सॉफ्टवेयर में निर्णय दर्ज करने की सुविधा न होने से उन्हें जोड़ा नहीं जा सका।
- सचिन पायलट ने पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, महाराष्ट्र और हरियाणा की मतदाता डेटाबेस की विश्वसनीयता पर चिंता जताई और चयन समिति से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की भूमिका हटाने पर आपत्ति उठाई।
- टीएमसी ने कहा कि अभिषेक बनर्जी ने दिसंबर 2025 में सबसे पहले सीमा खन्ना की भूमिका और सॉफ्टवेयर की "खामियों" वाले व्हाट्सएप चैट का मुद्दा सार्वजनिक रूप से उठाया था।
समयरेखा
- दिसंबर 2025टीएमसी के अनुसार अभिषेक बनर्जी ने सीमा खन्ना की भूमिका और सॉफ्टवेयर की खामियों से जुड़े व्हाट्सएप चैट का दावा सार्वजनिक रूप से पहली बार उठाया।
- मई (वर्ष स्रोत में नहीं)दोनों चुनाव आयुक्तों ने कहा कि फॉर्म 6 में बदलाव के लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियमों में संशोधन जरूरी है।
- मई से अगस्तरिपोर्ट के अनुसार इस अवधि में पूर्ण आयोग की कोई बैठक नहीं हुई।
- जुलाईआईटी फाइलों के नियंत्रण से जुड़ा प्रशासनिक आदेश आयुक्तों को सूचित किए बिना जारी; पत्र लिखे जाने के बाद अगले दिन रद्द।
- लगभग पांच महीने पहले (रिपोर्ट के समय से)60 से अधिक राज्यसभा सांसदों ने सभापति को सीईसी को हटाने के प्रस्ताव के लिए पत्र लिखा।
- 23 सितंबर 2026इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद विपक्ष का हमला तेज; समाचार रिपोर्ट प्रकाशित (11:58 IST)।
किसका दाँव
- मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार — विपक्ष उनके हटाने/निलंबन की मांग कर रहा है; उनके नेतृत्व में लिए गए फैसलों की प्रक्रिया पर सवाल।
- चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — रिपोर्ट के अनुसार उन्हें अहम फैसलों से बाहर रखा गया; सॉफ्टवेयर ऑडिट की उनकी मांग अनुत्तरित रही।
- भारत निर्वाचन आयोग (संस्था) — इसकी निष्पक्षता, आंतरिक निर्णय-प्रक्रिया और आईटी नियंत्रण पर विश्वसनीयता दांव पर; आयोग का कहना है सभी फैसले सर्वसम्मत थे।
- विपक्षी दल (कांग्रेस, टीएमसी, सपा, शिवसेना यूबीटी, आप) — एसआईआर व मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी को चुनावी निष्पक्षता का मुद्दा बना रहे हैं; हटाने का प्रस्ताव और अदालती हस्तक्षेप की मांग।
- मतदाता — नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया और सॉफ्टवेयर की सीमाओं से मताधिकार प्रभावित होने की आशंका (जैसे 97 पात्र मतदाता जोड़े न जा सकने का मामला)।
- उच्चतम न्यायालय — पश्चिम बंगाल में सूची पुनरीक्षण उसके निर्देश पर हुआ; अखिलेश यादव ने स्वतः संज्ञान की मांग की, टीएमसी ने सबूत अदालत में देने की बात कही।
- कैबिनेट सचिव टी वी सोमनाथन — दोनों आयुक्तों ने उन्हें अलग-अलग पत्र लिखकर जुलाई के आदेश को कानून का "स्पष्ट उल्लंघन" बताया।
क्यों अहम है
मतदाता सूची पर नियंत्रण और उसे बदलने वाले सॉफ्टवेयर की पारदर्शिता सीधे तौर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की नींव से जुड़ी है। यदि बहु-सदस्यीय आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय की व्यवस्था और आंतरिक जांच-संतुलन काम नहीं कर रहे, तो बड़े पैमाने पर चल रहे पुनरीक्षण की वैधता तथा आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता दोनों पर सवाल उठते हैं। यह विवाद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया और हटाने की संवैधानिक व्यवस्था को भी राजनीतिक बहस के केंद्र में ले आता है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- एसआईआर = स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण); ईसीआईनेट = चुनाव आयोग का सॉफ्टवेयर मंच।
- कानून के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त मिलकर निर्णय लेते हैं; सर्वसम्मति न होने पर बहुमत मान्य होता है।
- वर्तमान सीईसी: ज्ञानेश कुमार; चुनाव आयुक्त: सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी।
- मतदाता सूची में नाम जोड़ने का आवेदन फॉर्म 6 से होता है; इसमें बदलाव के लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियमों में संशोधन आवश्यक बताया गया।
- बीएलओ, ईआरओ और एईआरओ मतदाता सूची पुनरीक्षण की क्षेत्रीय मशीनरी हैं।
- सचिन पायलट के अनुसार चुनाव आयुक्त चयन समिति से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की भूमिका हटाई गई।
मेन्स दृष्टिकोण
यह विवाद एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय के भीतर सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया के क्षरण का प्रश्न उठाता है: रिपोर्ट के अनुसार दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में 14 बार आपत्ति दर्ज की, मई-अगस्त के बीच पूर्ण आयोग की बैठक नहीं हुई, फॉर्म 6 में बदलाव को एक आयुक्त ने \"अनधिकृत और अवैध\" बताया, और जुलाई का आईटी-नियंत्रण संबंधी आदेश आयुक्तों को बताए बिना जारी होकर अगले दिन रद्द हुआ। मूल चिंता तकनीकी केंद्रीकरण की है — स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों के बजाय दिल्ली स्थित आईटी डिवीजन के पास मतदाता सूची में बदलाव का नियंत्रण, सॉफ्टवेयर ऑडिट की मांग अनुत्तरित, और 97 पात्र मतदाताओं का मामला जहां सॉफ्टवेयर ने निर्णय दर्ज ही नहीं होने दिया। इसके निहितार्थ गंभीर हैं: मताधिकार, सूची की शुचिता और आयोग की निष्पक्षता की जनधारणा। आगे का रास्ता स्रोत में नीतिगत रूप से नहीं बताया गया, लेकिन बहस में उठी मांगें हैं — स्वतंत्र सॉफ्टवेयर ऑडिट, निर्णयों और फाइलों में पारदर्शिता, चयन समिति की संरचना पर पुनर्विचार, तथा संसदीय/न्यायिक जांच (सीईसी को हटाने का राज्यसभा प्रस्ताव, उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान)।
मुख्य शब्द
- एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण)
- मतदाता सूची का बड़े पैमाने पर पुनरीक्षण अभियान, जिसमें नाम जोड़े और हटाए जाते हैं; इसी पर विपक्ष की आपत्तियां केंद्रित हैं।
- ईसीआईनेट
- चुनाव आयोग का सॉफ्टवेयर, जिसके जरिए मतदाता सूची में बदलाव दर्ज होते हैं; इसके नियंत्रण और ऑडिट पर विवाद है।
- फॉर्म 6
- मतदाता सूची में नया नाम जोड़ने का आवेदन प्रपत्र; इसमें माता-पिता के पिछली एसआईआर सूची में होने का नया प्रश्न जोड़ा गया।
- निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम
- मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया और प्रपत्रों को नियंत्रित करने वाले नियम; आयुक्तों के अनुसार फॉर्म बदलने हेतु इनमें संशोधन जरूरी था।
- बीएलओ / ईआरओ / एईआरओ
- बूथ लेवल ऑफिसर, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी और सहायक ईआरओ — मतदाता सत्यापन व सूची अद्यतन करने वाले क्षेत्रीय अधिकारी।
- हटाने का प्रस्ताव (रिमूवल मोशन)
- सीईसी को पद से हटाने के लिए संसद में लाया जाने वाला प्रस्ताव; 60 से अधिक राज्यसभा सांसदों ने इसके लिए सभापति को पत्र लिखा।
अभ्यास प्रश्न
- भारत निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय है, जिसमें निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं। हाल के एसआईआर विवाद के आलोक में परखें कि आयोग के आंतरिक जांच-संतुलन कितने प्रभावी हैं।
- मतदाता सूची प्रबंधन के तकनीकी केंद्रीकरण (जैसे ईसीआईनेट) के लाभ और जोखिम क्या हैं? पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए क्या सुरक्षा-उपाय आवश्यक हैं?
- चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया पर उठ रहे प्रश्न संस्थागत स्वायत्तता की जन-धारणा को कैसे प्रभावित करते हैं? चर्चा करें।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
