महिला नकद हस्तांतरण पर 12 राज्य खर्च करेंगे 1.68 लाख करोड़

मध्य प्रदेश की लाडली बहना योजना, झारखंड की मैया सम्मान योजना और तमिलनाडु की मगलिर उरिमै तोगै जैसी योजनाओं में महिलाओं को हर महीने 1,000 से 2,500 रुपये दिए जाते हैं। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार 2025-26 में 12 राज्य बिना शर्त नकद हस्तांतरण पर 1.68 लाख करोड़ रुपये खर्च करेंगे, जबकि केंद्र ने मनरेगा के लिए 86,000 करोड़ रुपये दिए। ईएसी-पीएम अध्ययन में महाराष्ट्र और ओडिशा में उपभोग तथा बचत बढ़ी। आरबीआई ने ऊंचे कर्ज को राज्य वित्त के लिए जोखिम बताया।

स्रोत

PRS Legislative Research · मूल ख़बर पढ़ें ↗

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (4)
  • 12 states were estimated to spend Rs 1.68 lakh crore on unconditional cash transfers in 2025-26. — Attributed in source to a PRS Legislative Research report; figure appears in source.
  • The Union government allocated Rs 86,000 crore for MGNREGA in 2025-26. — Figure appears in source without a named document, used as a comparison point.
  • An EAC-PM working paper study found improved consumption and savings among beneficiaries in Maharashtra and Odisha. — Attributed to the named study 'Unconditional Women Cash Transfer Programmes in India'; findings summarised, not quantified.
  • States' consolidated debt fell from 31% in March 2021 to 29.2% in 2026 (budget estimates), with Punjab at 46.4% of GSDP, West Bengal 38.9% and Bihar 36.8%. — Figures appear in source; debt-sustainability warning is quoted from the RBI, the Axis Bank report is cited for funding methods.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

महिलाओं को दी जा रही बिना शर्त नकद राशि अब सिर्फ कल्याण नहीं, भारतीय राजनीति का सबसे असरदार चुनावी औजार बन चुकी है। 2025-26 में 12 राज्यों का रु.1.68 लाख करोड़ खर्च — उसी साल मनरेगा के लिए केंद्र के रु.86,000 करोड़ के आवंटन से करीब दोगुना — बताता है कि प्राथमिकता रोजगार गारंटी से सीधे नकद की ओर खिसक गई है। मध्य प्रदेश, झारखंड और तमिलनाडु जैसे अलग-अलग राजनीतिक रंग वाले राज्यों का यही रास्ता चुनना दिखाता है कि यह किसी एक दल का एजेंडा नहीं, बल्कि नई राजनीतिक सहमति है।

  • इन योजनाओं का मूल राजनीतिक तर्क महिलाओं को एक अलग वोट ब्लॉक के रूप में पहचानना है; लाभार्थी तक सीधे पहुंचने वाला हस्तांतरण जाति और क्षेत्र के गणित से ऊपर काम करता है, जिससे राजनीतिक लाभ साफ दिखता है।
  • भाजपा शासित मध्य प्रदेश और झारखंड के साथ द्रमुक शासित तमिलनाडु का एक ही मॉडल अपनाना संकेत देता है कि अब कोई दल इन योजनाओं के विरोध में चुनाव नहीं लड़ सकता।
  • ईएसी-पीएम अध्ययन में उपभोग और बचत बढ़ने का निष्कर्ष समर्थकों को नीतिगत बचाव देता है और 'मुफ्तखोरी' वाली सरल आलोचना को कमजोर करता है।
  • दूसरी ओर आरबीआई की यह चेतावनी कि इससे निवेश 'क्राउडिंग आउट' हो सकता है, और पंजाब में जीएसडीपी का 46.4%, पश्चिम बंगाल में 38.9% व बिहार में 36.8% कर्ज — वित्तीय अनुशासन बनाम कल्याण की राजनीतिक बहस खड़ी करती है।
  • एक बार शुरू होने के बाद इन योजनाओं को वापस लेना राजनीतिक रूप से लगभग असंभव है, इसलिए आगे की सरकारें राशि घटाने की छूट पाने की बजाय उसे बढ़ाने की होड़ में उतर सकती हैं।

किस पर नज़र रखें — अगले विधानसभा चुनावों में राशि बढ़ाने की होड़ बनती है या नहीं, और भारी कर्ज वाले राज्य इसके लिए किन मदों में चुपचाप कटौती करते हैं — इन पर नजर रखें।

यह खबर यह साबित नहीं करती कि किसी एक योजना ने किसी चुनाव नतीजे को कितना बदला, न ही यह बताती है कि राज्य किन क्षेत्रों में खर्च घटा रहे हैं या दीर्घकालिक वित्तीय बोझ कितना होगा।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

हाल के वर्षों में कई राज्यों ने महिलाओं के लिए बिना शर्त नकद हस्तांतरण योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें हर महीने 1,000 से 2,500 रुपये दिए जाते हैं। मध्य प्रदेश की लाडली बहना योजना, झारखंड की मैया सम्मान योजना और तमिलनाडु की मगलिर उरिमै तोगै इसके उदाहरण हैं। ये योजनाएं महिला सशक्तीकरण और सामाजिक कल्याण का साधन बनी हैं, साथ ही राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीति भी। इनके बढ़ते आकार ने राज्यों की वित्तीय स्थिति और अन्य क्षेत्रों में खर्च की क्षमता पर सवाल खड़े किए हैं।

मुख्य तथ्य

  • पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार 2025-26 में 12 राज्यों द्वारा बिना शर्त नकद हस्तांतरण पर अनुमानित 1.68 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाने का अनुमान था।
  • तुलना के लिए: केंद्र सरकार ने 2025-26 में मनरेगा के लिए 86,000 करोड़ रुपये आवंटित किए।
  • इन योजनाओं में आमतौर पर प्रति महीने 1,000 से 2,500 रुपये का हस्तांतरण होता है।
  • ईएसी-पीएम वर्किंग पेपर सीरीज़ का अध्ययन 'Unconditional Women Cash Transfer Programmes in India' महाराष्ट्र और ओडिशा की योजनाओं की जांच करता है।
  • अध्ययन के अनुसार लाभार्थियों की खपत और बचत में सुधार हुआ, तथा चिकित्सा, शैक्षिक और जीवनशैली पर अधिक खर्च हुआ।
  • राज्यों का समेकित ऋण मार्च 2021 के 31 प्रतिशत से घटकर 2026 (बजट अनुमान) में 29.2 प्रतिशत हो गया।
  • पंजाब का ऋण बोझ जीएसडीपी का 46.4 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल का 38.9 प्रतिशत और बिहार का 36.8 प्रतिशत है।
  • आरबीआई के अनुसार ऊंचा ऋण स्तर, गारंटियों से बढ़ती आकस्मिक देनदारियां और नकद हस्तांतरण योजनाएं राज्य वित्त के लिए जोखिम हैं।

समयरेखा

  1. मार्च 2021राज्यों का समेकित ऋण जीएसडीपी के 31 प्रतिशत पर था।
  2. 2025-2612 राज्यों द्वारा बिना शर्त नकद हस्तांतरण पर 1.68 लाख करोड़ रुपये खर्च का अनुमान; केंद्र ने मनरेगा को 86,000 करोड़ रुपये दिए।
  3. 2026 (बजट अनुमान)राज्यों का समेकित ऋण घटकर 29.2 प्रतिशत रह गया, पर राज्यों के बीच भारी अंतर बना रहा।
  4. 8 जुलाई 2026बिना शर्त महिला नकद हस्तांतरण पर यह विश्लेषण प्रकाशित हुआ।

किसका दाँव

  • महिला लाभार्थी — मासिक 1,000-2,500 रुपये से खपत, बचत तथा चिकित्सा व शिक्षा पर खर्च बढ़ा; घरेलू कल्याण में सुधार।
  • राज्य सरकारें (मध्य प्रदेश, झारखंड, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, ओडिशा आदि) — योजनाओं का वित्तपोषण व्यय-परिवर्तन और ऊंचे घाटे से; अन्य क्षेत्रों में खर्च की क्षमता पर असर।
  • आरबीआई — चेतावनी दी कि ये योजनाएं निवेश को 'क्राउडिंग आउट' कर सकती हैं और राज्य वित्त के लिए जोखिम हैं।
  • ईएसी-पीएम — वर्किंग पेपर के जरिए इन योजनाओं के कल्याणकारी प्रभाव का प्रमाण प्रस्तुत करना।
  • राजनीतिक दल — नकद हस्तांतरण चुनावी रणनीति के रूप में उभरे हैं।
  • ऋणग्रस्त राज्य (पंजाब, पश्चिम बंगाल, बिहार) — जीएसडीपी के अनुपात में क्रमशः 46.4%, 38.9% और 36.8% ऋण बोझ, वित्तीय गुंजाइश सीमित।

क्यों अहम है

महिलाओं को दिए जा रहे बिना शर्त नकद हस्तांतरण का आकार अब मनरेगा जैसे बड़े केंद्रीय कार्यक्रम के आवंटन से लगभग दोगुना हो गया है, जो कल्याण की प्राथमिकताओं में बड़े बदलाव का संकेत है। साक्ष्य बताते हैं कि इससे घरेलू खपत, बचत और स्वास्थ्य-शिक्षा पर खर्च बढ़ा है, लेकिन आरबीआई और अन्य विश्लेषण इसे ऊंचे ऋण, बढ़ती आकस्मिक देनदारियों और पूंजीगत निवेश के 'क्राउडिंग आउट' से जोड़ते हैं। इसलिए कल्याण और राजकोषीय स्थिरता के बीच संतुलन राज्यों के लिए केंद्रीय नीति प्रश्न बन गया है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • लाडली बहना योजना – मध्य प्रदेश; मैया सम्मान योजना – झारखंड; मगलिर उरिमै तोगै – तमिलनाडु।
  • 2025-26 में 12 राज्यों का बिना शर्त नकद हस्तांतरण व्यय अनुमान: 1.68 लाख करोड़ रुपये (पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च)।
  • 2025-26 में मनरेगा के लिए केंद्रीय आवंटन: 86,000 करोड़ रुपये।
  • ईएसी-पीएम वर्किंग पेपर: 'Unconditional Women Cash Transfer Programmes in India' – महाराष्ट्र और ओडिशा पर आधारित।
  • राज्यों का समेकित ऋण: मार्च 2021 में 31%, 2026 (बजट अनुमान) में 29.2% जीएसडीपी।
  • ऋण/जीएसडीपी: पंजाब 46.4%, पश्चिम बंगाल 38.9%, बिहार 36.8%।

मेन्स दृष्टिकोण

बिना शर्त महिला नकद हस्तांतरण भारत में सामाजिक कल्याण, महिला सशक्तीकरण और चुनावी राजनीति के संगम पर खड़े हैं। 2025-26 में 12 राज्यों का अनुमानित 1.68 लाख करोड़ रुपये का व्यय, जो मनरेगा के 86,000 करोड़ रुपये के केंद्रीय आवंटन से कहीं अधिक है, इस बदलाव के पैमाने को दर्शाता है। पक्ष में साक्ष्य ईएसी-पीएम के अध्ययन से आता है, जिसने महाराष्ट्र और ओडिशा में लाभार्थियों की खपत तथा बचत में सुधार तथा चिकित्सा, शैक्षिक व जीवनशैली संबंधी खर्च में वृद्धि पाई—अर्थात घरेलू कल्याण बढ़ा। दूसरी ओर चिंता यह है कि इन योजनाओं और मुफ्त बिजली जैसे लोकलुभावन उपायों पर संसाधन लगाने से अन्य क्षेत्रों, विशेषकर निवेश, के लिए गुंजाइश घटती है; आरबीआई ने इसे निवेश के 'क्राउडिंग आउट' का जोखिम कहा है। एक्सिस बैंक की रिपोर्ट के अनुसार संसाधन व्यय-परिवर्तन और ऊंचे घाटे से जुटाए जाते हैं; समेकित राज्य ऋण 31% (मार्च 2021) से 29.2% (2026 बजट अनुमान) तक घटा है, पर पंजाब (46.4%), पश्चिम बंगाल (38.9%) और बिहार (36.8%) जैसे राज्यों में भिन्नता तीखी है। आगे का रास्ता: लाभों का प्रमाण-आधारित मूल्यांकन, ऋण व गारंटी से उत्पन्न आकस्मिक देनदारियों पर कड़ी निगरानी, तथा पूंजीगत व्यय की सुरक्षा—स्रोत के शब्दों में इसे 'निकट ध्यान' की आवश्यकता है।

मुख्य शब्द

बिना शर्त नकद हस्तांतरण (Unconditional Cash Transfer)
लाभार्थी पर किसी शर्त के बगैर सीधे नकद राशि देना; महिलाओं को मासिक 1,000-2,500 रुपये देने वाली राज्य योजनाएं इसका उदाहरण।
ईएसी-पीएम
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद, जिसकी वर्किंग पेपर सीरीज़ में महिला नकद हस्तांतरण पर अध्ययन प्रकाशित हुआ।
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च
नीति एवं विधायी शोध संस्था, जिसकी रिपोर्ट में 12 राज्यों के 1.68 लाख करोड़ रुपये के व्यय का अनुमान दिया गया।
क्राउडिंग आउट
सरकारी खर्च या उधारी के कारण निवेश के लिए संसाधन घट जाना; आरबीआई ने इसका जोखिम बताया।
आकस्मिक देनदारियां (Contingent Liabilities)
सरकारी गारंटियों से उत्पन्न संभावित भुगतान दायित्व, जिन्हें आरबीआई ने राज्य वित्त के लिए बढ़ता जोखिम कहा।
मनरेगा
ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम, जिसके लिए केंद्र ने 2025-26 में 86,000 करोड़ रुपये आवंटित किए।

अभ्यास प्रश्न

  1. क्या महिलाओं के लिए बिना शर्त नकद हस्तांतरण कल्याणकारी नीति का प्रभावी साधन है? ईएसी-पीएम अध्ययन के निष्कर्षों और राजकोषीय चिंताओं के आलोक में परीक्षण करें।
  2. राज्यों के बढ़ते ऋण स्तर और गारंटियों से उत्पन्न आकस्मिक देनदारियों के संदर्भ में 'क्राउडिंग आउट' की आरबीआई की चेतावनी का मूल्यांकन कीजिए।
  3. 2025-26 में 12 राज्यों का 1.68 लाख करोड़ रुपये का नकद हस्तांतरण व्यय बनाम मनरेगा के 86,000 करोड़ रुपये—भारत में कल्याण प्राथमिकताओं में इस बदलाव के निहितार्थ क्या हैं?

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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