आंध्र प्रदेश गंभीर सूखा हॉटस्पॉट बन रहा: 52 साल का अध्ययन
आईएमडी, एनसीएमआरडब्ल्यूएफ और ऑस्ट्रिया के विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के 52 वर्षीय (1971-2022) अध्ययन ने चेताया है कि आंध्र प्रदेश देश के सर्वाधिक सूखा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हो रहा है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लाइमेटोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 1990 से पहले दक्षिण भारत के 10 प्रतिशत क्षेत्र में सूखे की स्थिति थी, जो 2000 के बाद 40 प्रतिशत तक फैल गई। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और ओडिशा का पूर्वी तट सूखा हॉटस्पॉट बन गया है, ऐसा मुख्य शोधकर्ता थोटा मोहन ने कहा।
स्रोत
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- A 52-year (1971-2022) study by IMD, NCMRWF and Austrian university researchers found Andhra Pradesh turning into a severe drought hotspot. — Attributed in source to the named institutions; study said to be published in the International Journal of Climatology.
- Drought conditions covered only 10% of south India before 1990 and expanded to 40% after 2000. — Figures appear in the source, cited to the report; no page or data table reference given.
- Drought severity area rose from 20% in the 1980s to 30% by 2011-2021. — Figure appears in the source as a report finding; internally consistent with the expansion claim.
- Lead researcher Thota Mohan said drought is the fastest-spreading climate extreme; former Earth Sciences Ministry secretary M. Rajeevan said Andhra Pradesh has faced severe drought in recent years. — Directly attributed to named individuals; quotes paraphrased in source.
- Urbanisation, emissions and the urban heat index are eliminating night-time cooling, affecting crops and health. — Presented as a report finding; no supporting figures given in the source.
विश्लेषकों की राय राय
यह रिपोर्ट जलवायु विज्ञान की है, लेकिन आंध्र प्रदेश में इसके राजनीतिक असर गहरे हैं। सूखा मतलब पानी, फसल, किसान कर्ज, रोज़गार और पलायन — यही मुद्दे राज्य की चुनावी राजनीति तय करते हैं। अध्ययन 1971 से 2022 तक की लंबी प्रवृत्ति दिखाता है, इसलिए किसी एक सरकार पर ठीकरा फोड़ना कठिन है; फिर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों इसे अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर सकते हैं और सिंचाई परियोजनाएँ तथा जल प्रबंधन बहस के केंद्र में लौट सकते हैं।
- आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और ओडिशा वाले पूर्वी तट को 'सूखा हॉटस्पॉट' कहना दक्षिणी राज्यों को साझा मांगों और केंद्रीय सहायता की पैरवी के लिए वैज्ञानिक आधार दे सकता है।
- निष्कर्ष दशकों की प्रवृत्ति पर आधारित हैं, इसलिए हर दल कह सकता है कि समस्या उसके कार्यकाल में शुरू नहीं हुई — इससे जवाबदेही धुंधली पड़ने का जोखिम है।
- विपक्ष के लिए यह सिंचाई परियोजनाओं में देरी और जल प्रबंधन की चूक पर सवाल उठाने का हथियार बनेगा; सरकार के लिए केंद्र से अधिक निधि और राहत पैकेज मांगने का तर्क।
- शहरीकरण, उत्सर्जन और बढ़ते रात के तापमान का उल्लेख शहरी तथा राजधानी-विकास मॉडल की आलोचना को हवा दे सकता है और हरित योजनाएँ घोषणापत्रों में जगह पा सकती हैं।
- सूखा प्रभावित मंडलों की घोषणा, मुआवज़ा और ग्रामीण रोज़गार कार्यों का आवंटन सीधे मतदाताओं को छूते हैं, इसलिए ये राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहेंगे।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि राज्य सरकार और विपक्ष इस अध्ययन का औपचारिक उल्लेख करते हैं या नहीं, और केंद्र से विशेष सूखा निधि या दीर्घकालिक जल नीति की मांग उठती है या नहीं।
यह खबर केवल एक वैज्ञानिक अध्ययन के निष्कर्ष बताती है; किसी नीतिगत विफलता, राजनीतिक प्रतिक्रिया या चुनावी असर की पुष्टि इससे नहीं होती।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 5 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD), राष्ट्रीय मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र (NCMRWF) और ऑस्ट्रिया के एक विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने मिलकर 1971 से 2022 तक के 52 वर्षों के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन किया है। 'भारतीय उपमहाद्वीप में मौसमी तीव्रताओं का विकासक्रम' नामक यह रिपोर्ट 'इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लाइमेटोलॉजी' में प्रकाशित हुई है। रिपोर्ट के अनुसार एक समय उपजाऊ और समृद्ध माने जाने वाला आंध्र प्रदेश तेज़ी से सूख रहा है और देश के सर्वाधिक सूखा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हो रहा है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और ओडिशा वाला पूर्वी तटीय क्षेत्र अब 'सूखा हॉटस्पॉट' बन गया है।
मुख्य तथ्य
- अध्ययन 52 वर्षों (1971-2022) के आंकड़ों पर आधारित है और IMD, NCMRWF तथा ऑस्ट्रिया के विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने संयुक्त रूप से किया।
- रिपोर्ट 'भारतीय उपमहाद्वीप में मौसमी तीव्रताओं का विकासक्रम' शीर्षक से 'इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लाइमेटोलॉजी' में प्रकाशित हुई।
- 1990 से पहले दक्षिण भारत के केवल 10 प्रतिशत क्षेत्र में सूखे जैसी स्थिति थी।
- वर्ष 2000 के बाद दक्षिण भारत में सूखा प्रभावित क्षेत्र बढ़कर 40 प्रतिशत तक फैल गया।
- 1980 के दशक की तुलना में 2011-2021 तक सूखे की तीव्रता वाला क्षेत्र 20% से 30% हो गया।
- आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और ओडिशा वाला पूर्वी तटीय क्षेत्र सबसे गंभीर 'सूखा हॉटस्पॉट' बन गया है।
- मुख्य शोधकर्ता थोटा मोहन के अनुसार जलवायु तीव्रताओं में सूखा सबसे तेज़ी से फैल रहा है।
- केंद्रीय भू-विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव एम. राजीवन के अनुसार आंध्र प्रदेश पिछले कुछ वर्षों से गंभीर सूखे की स्थिति झेल रहा है।
समयरेखा
- 1990 से पहलेदक्षिण भारत के केवल लगभग 10 प्रतिशत क्षेत्र में सूखे की स्थिति दर्ज होती थी।
- 1980 का दशकसूखे की तीव्रता वाला क्षेत्र लगभग 20 प्रतिशत था।
- 2000 के बाददक्षिण भारत में सूखा प्रभावित क्षेत्र 40 प्रतिशत तक विस्तारित हुआ।
- 2011-2021सूखे की तीव्रता वाला क्षेत्र 30 प्रतिशत तक पहुँचा।
- 1971-202252 वर्षों की अवधि का यह संयुक्त अध्ययन किया गया, जिसकी रिपोर्ट इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लाइमेटोलॉजी में प्रकाशित हुई।
किसका दाँव
- आंध्र प्रदेश के किसान — वर्षा की कमी और रात के बढ़ते तापमान से फसलों की वृद्धि प्रभावित हो रही है।
- आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा की सरकारें — पूर्वी तट के सूखा हॉटस्पॉट बनने पर जल प्रबंधन और पेयजल आपूर्ति की तत्काल योजना बनानी होगी।
- IMD और NCMRWF — जलवायु तीव्रताओं की निगरानी, पूर्वानुमान और वैज्ञानिक चेतावनी देने की जिम्मेदारी।
- शहरी निवासी — शहरीकरण, उत्सर्जन और अर्बन हीट इंडेक्स के कारण रातें ठंडी न होने से स्वास्थ्य समस्याएँ।
- ग्रामीण आबादी — दीर्घकालिक जल संकट और पेयजल की किल्लत का खतरा।
- शोधकर्ता थोटा मोहन व एम. राजीवन — अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर नीतिगत कार्रवाई की वकालत।
क्यों अहम है
दक्षिण भारत में सूखा प्रभावित क्षेत्र का 10 प्रतिशत से 40 प्रतिशत तक फैल जाना यह संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब स्थायी जल संकट का रूप ले रहा है। कम वर्षा के साथ अधिक गर्मी से मिट्टी की नमी तेज़ी से वाष्पित हो रही है, जिससे कृषि उत्पादन, पेयजल आपूर्ति और जन-स्वास्थ्य तीनों पर सीधा दबाव है। रिपोर्ट के अनुसार सरकारों को तत्काल समग्र जल प्रबंधन और हरित योजनाओं पर काम करना होगा।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- अध्ययन अवधि: 1971-2022 (52 वर्ष); प्रकाशन: इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लाइमेटोलॉजी।
- NCMRWF: नेशनल सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्टिंग; अध्ययन में IMD और ऑस्ट्रिया के विश्वविद्यालय के साथ साझेदार।
- 1990 से पहले दक्षिण भारत में सूखा क्षेत्र 10%, 2000 के बाद 40%।
- 1980 के दशक में सूखा तीव्रता क्षेत्र 20%, 2011-2021 में 30%।
- सूखा हॉटस्पॉट: आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और ओडिशा का पूर्वी तटीय क्षेत्र।
- मुख्य शोधकर्ता: थोटा मोहन; टिप्पणीकार: एम. राजीवन, केंद्रीय भू-विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव।
मेन्स दृष्टिकोण
आंध्र प्रदेश सहित दक्षिण भारत का सूखा हॉटस्पॉट में बदलना जलवायु तीव्रताओं के बदलते स्वरूप का उदाहरण है। अध्ययन के अनुसार सामान्य वर्षा में भारी कमी और अधिक तापमान के कारण मिट्टी की नमी का तेज़ वाष्पीकरण दीर्घकालिक जल संकट पैदा कर रहा है; बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दबाव क्षेत्रों और अवदाबों का सीधे भीतरी क्षेत्रों तक न पहुँचना वर्षा की कमी का प्रमुख कारण बताया गया है। साथ ही तेज़ शहरीकरण, बढ़ते उत्सर्जन और अर्बन हीट इंडेक्स के प्रभाव से रात का ठंडापन समाप्त हो रहा है, जिससे फसलों की वृद्धि बाधित हो रही है और लोगों में स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ रही हैं; खाड़ी की निकटता से नमी और सतही तापमान मिलकर तीव्र उमस पैदा कर रहे हैं। आगे का रास्ता रिपोर्ट व विशेषज्ञों के सुझावों में निहित है — समग्र जल प्रबंधन नीतियों का कार्यान्वयन, वर्षा जल संचयन कार्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता, शहरी ताप प्रभाव कम करने के लिए व्यापक हरित योजनाएँ व हरियाली बढ़ाना, और ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल किल्लत रोकने के लिए पूर्व-नियोजन।
मुख्य शब्द
- IMD (भारत मौसम विज्ञान विभाग)
- देश की मौसम निगरानी व पूर्वानुमान संस्था, इस 52 वर्षीय अध्ययन में सहभागी।
- NCMRWF
- नेशनल सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्टिंग; मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान का केंद्र, अध्ययन में भागीदार।
- सूखा हॉटस्पॉट
- वह क्षेत्र जहाँ सूखे की स्थिति सर्वाधिक तीव्र व लगातार बनी रहती है; यहाँ आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा का पूर्वी तट।
- अर्बन हीट इंडेक्स
- शहरीकरण व उत्सर्जन के कारण शहरी क्षेत्रों में बढ़ी गर्मी का प्रभाव, जिससे रातें ठंडी नहीं होतीं।
- निम्न दबाव क्षेत्र व अवदाब
- बंगाल की खाड़ी में बनने वाली मौसमी प्रणालियाँ; इनका भीतरी क्षेत्रों तक न पहुँचना वर्षा की कमी का कारण।
- इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लाइमेटोलॉजी
- अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका जिसमें यह रिपोर्ट प्रकाशित हुई।
अभ्यास प्रश्न
- दक्षिण भारत में सूखा प्रभावित क्षेत्र 1990 से पहले के 10 प्रतिशत से 2000 के बाद 40 प्रतिशत तक कैसे पहुँचा? इस विस्तार के कारणों और कृषि पर प्रभाव की विवेचना करें।
- 'रात के तापमान में वृद्धि' कृषि और जन-स्वास्थ्य के लिए दिन की गर्मी से अधिक चुनौतीपूर्ण है। आंध्र प्रदेश के संदर्भ में परीक्षण कीजिए।
- पूर्वी तटीय क्षेत्र के सूखा हॉटस्पॉट बनने की पृष्ठभूमि में समग्र जल प्रबंधन, वर्षा जल संचयन और शहरी हरित योजनाओं की भूमिका पर चर्चा कीजिए।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
