रामप्पा मंदिर को सिंगरेनी ओपन कास्ट खदान से खतरा: कार्यकर्ता

विरासत संरक्षकों को आशंका है कि सरकारी कंपनी सिंगरेनी कोलियरीज (SCCL) की प्रस्तावित ओपन कास्ट कोयला खदान से मुलुगु जिले के पालमपेट स्थित 13वीं सदी के रामप्पा मंदिर को खतरा है, जो तेलंगाना का एकमात्र यूनेस्को विश्व विरासत स्थल है। काकतीय हेरिटेज ट्रस्ट के सदस्य एम पांडुरंग राव ने कहा कि 19 वर्षों में 4.04 करोड़ टन कोयला निकालने के लिए 300 मीटर गहरी खनन से स्मारक की नींव अस्थिर हो सकती है। एक एससीसीएल अधिकारी ने कहा कि खदान बफर जोन के बाहर है और कोई खतरा नहीं है। कलेक्टर बोरखड़े हेमंत सहदेवराव ने कहा कि वैज्ञानिक अध्ययन के बिना अनुमति नहीं दी जाएगी।

स्रोत

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Ramappa temple at Palampet, built around 1213 AD, was inscribed as a UNESCO World Heritage Site on July 25, 2021. — Dates and details appear in the source as background; not independently verified here.
  • The proposed SCCL opencast mine would extract about 40.4 million tonnes of coal over roughly 19 years, to a depth of 300 metres. — Figures appear in the source; mining depth attributed to conservationist M Panduranga Rao.
  • The mine at Venkatapur village is barely 5 km from the temple. — Distance stated in the source without an attributed technical document.
  • SCCL says vibrations from controlled blasting would stay below the temple's tolerance thresholds, citing studies involving IITs. — Attributed to a senior SCCL official who declined to be named.
  • Mulugu Collector said no permission would be granted hurriedly without scientific studies and heritage compliance. — Directly attributed and quoted from Collector Borkhade Hemant Sahadevarao.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

यह केवल विरासत-संरक्षण का विवाद नहीं, बल्कि एक राजनीतिक परीक्षा है — राज्य को अपनी ही कंपनी सिंगरेणी से मिलने वाले राजस्व और कोयला-बिजली की ज़रूरत को तेलंगाना की एकमात्र यूनेस्को विश्व विरासत स्थली के सांस्कृतिक गौरव के सामने तौलना है। काकतीय विरासत तेलंगाना की अस्मिता-राजनीति में गहरा भावनात्मक महत्व रखती है, इसलिए "रामप्पा को खतरा" जैसा नैरेटिव खदान के पक्ष में दिखने वाली किसी भी पार्टी के लिए महंगा पड़ सकता है। कलेक्टर का यह रुख कि व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन के बिना मंज़ूरी नहीं मिलेगी, निर्णय को टालकर बोझ तकनीकी जाँच पर डालने की परिचित प्रशासनिक-राजनीतिक रणनीति लगती है।

  • प्रस्तावक स्वयं सरकारी कंपनी होने से यह किसी निजी खननकर्ता से टकराव नहीं, बल्कि सरकार का अपने आप से टकराव जैसा मामला बन जाता है।
  • मार्च 2023 और दिसंबर 2024 में दो बार एनओसी का विरोध होने के बाद भी प्रस्ताव फिर सामने आना बताता है कि कोयला उत्पादन का दबाव कम नहीं हुआ है।
  • यूनेस्को दर्जा दिलाने में काकतीय हेरिटेज ट्रस्ट की भूमिका उसे नैतिक बल देती है, और एएसआई के भी विरोध का ज़िक्र इसे केंद्र-राज्य स्तर की चर्चा बना सकता है।
  • परियोजना क्षेत्र में वन, कृषि और असाइन्ड भूमि तथा रामप्पा झील पर लगभग 30,000 एकड़ की निर्भरता के चलते स्थानीय किसान व भूमि-हानि की राजनीति विरासत अभियान से जुड़ सकती है।
  • सिंगरेणी का तर्क — खदान बफर ज़ोन के बाहर है और आईआईटी से जुड़े अध्ययनों में कंपन सहनसीमा से कम बताए गए — तकनीकी रूप से मज़बूत है, पर भावनात्मक विरासत-दलील के सामने राजनीतिक रूप से कमज़ोर पड़ सकता है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि पालमपेट स्पेशल डेवलपमेंट अथॉरिटी एनओसी पर क्या अंतिम रुख लेती है, नए वैज्ञानिक अध्ययन किससे कराए जाते हैं, और एएसआई या केंद्रीय कोयला मंत्रालय कोई रुख लेते हैं या नहीं।

यह खबर यह स्थापित नहीं करती कि खदान से मंदिर को वास्तव में नुकसान होगा या नहीं, और न ही किसी पार्टी का औपचारिक रुख या सरकारी स्तर पर कोई राजनीतिक निर्णय दर्ज करती है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 6 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

तेलंगाना के मुलुगु जिले के पालमपेट गांव में स्थित 13वीं सदी का रामप्पा (रुद्रेश्वर) मंदिर राज्य का एकमात्र यूनेस्को विश्व विरासत स्थल है, जिसे 25 जुलाई 2021 को यह दर्जा मिला। यह मंदिर अभी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के नियंत्रण में है। सरकारी कंपनी सिंगरेनी कोलियरीज कंपनी लिमिटेड (SCCL) वेंकटापुर गांव में गहरी ओपन कास्ट कोयला खदान का प्रस्ताव रख रही है, जो मंदिर से मात्र 5 किलोमीटर दूर है। काकतीय हेरिटेज ट्रस्ट जैसे विरासत संरक्षकों को डर है कि 300 मीटर गहराई तक खनन और ब्लास्टिंग से मंदिर की अनूठी 'सैंडबॉक्स' नींव अस्थिर हो सकती है।

मुख्य तथ्य

  • रामप्पा मंदिर को 25 जुलाई 2021 को यूनेस्को विश्व विरासत स्थल का दर्जा मिला; यह तेलंगाना का एकमात्र ऐसा स्थल है।
  • मंदिर वेंकटापुर गांव स्थित सिंगरेनी कोलियरीज की ओपन कास्ट खदान से केवल 5 किलोमीटर दूर है।
  • प्रस्तावित खदान से वन, कृषि और असाइन्ड भूमि पर लगभग 19 वर्षों में अनुमानित 4.04 करोड़ टन (40.4 मिलियन टन) कोयला निकाला जाएगा।
  • काकतीय हेरिटेज ट्रस्ट के एम पांडुरंग राव के अनुसार 300 मीटर गहराई तक भारी मशीनरी से मिट्टी में कंपन होगा।
  • मंदिर लगभग 1213 ईस्वी में काकतीय वंश के गणपति देव के सेनापति रेचेर्ला रुद्र ने बनवाया; नाम मुख्य शिल्पकार रामप्पा के नाम पर है।
  • रामप्पा झील काकतीय कालीन सिंचाई कार्य है, जिसकी भंडारण क्षमता लगभग 3 टीएमसी है और यह करीब 30,000 एकड़ खेती को सहारा देती है।
  • काकतीय हेरिटेज ट्रस्ट ने पालमपेट विशेष विकास प्राधिकरण (PSDA) द्वारा एनओसी देने का दो बार विरोध किया – मार्च 2023 और दिसंबर 2024 में।
  • एससीसीएल के वरिष्ठ अधिकारी का दावा: खदान बफर जोन के बाहर है; आईआईटी व अन्य एजेंसियों के अध्ययन के अनुसार नियंत्रित ब्लास्टिंग से कंपन मंदिर की सहनशीलता सीमा से काफी नीचे रहेगा।

समयरेखा

  1. लगभग 1213 ईस्वीकाकतीय वंश के गणपति देव के सेनापति रेचेर्ला रुद्र द्वारा रामप्पा मंदिर का निर्माण।
  2. 25 जुलाई 2021यूनेस्को ने रामप्पा मंदिर को विश्व विरासत स्थल के रूप में मान्यता दी।
  3. मार्च 2023काकतीय हेरिटेज ट्रस्ट ने पीएसडीए द्वारा एनओसी देने का पहली बार विरोध किया।
  4. दिसंबर 2024ट्रस्ट ने दूसरी बार एनओसी के प्रस्ताव का विरोध किया; एएसआई व अन्य विरासत कार्यकर्ताओं ने भी विरोध किया।
  5. 2025केंद्रीय कोयला मंत्रालय को "Impact of Opencast Mining of Singareni Collieries on UNESCO Inscribed Ramappa Temple & the Great Heritage of Ramappa Lake" शीर्षक रिपोर्ट सौंपी गई।
  6. 8 सितंबरमुलुगु में पालमपेट विशेष विकास प्राधिकरण की बैठक में ट्रस्ट सदस्यों ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई; कलेक्टर ने जल्दबाजी में अनुमति न देने की घोषणा की।

किसका दाँव

  • रामप्पा मंदिर / एएसआई — 800 वर्ष से अधिक पुराने यूनेस्को विश्व विरासत स्मारक की संरचनात्मक सुरक्षा; एएसआई इसके नियंत्रण में है और उसने खनन प्रस्ताव का विरोध किया।
  • सिंगरेनी कोलियरीज कंपनी लिमिटेड (SCCL) — 19 वर्षों में 4.04 करोड़ टन कोयला निकालने की परियोजना; कंपनी का कहना है कि खदान बफर जोन के बाहर है और कोई खतरा नहीं।
  • काकतीय हेरिटेज ट्रस्ट व एम पांडुरंग राव — यूनेस्को दर्जा दिलाने में भूमिका; स्मारक की नींव और रामप्पा झील की विरासत बचाने की चिंता।
  • पालमपेट विशेष विकास प्राधिकरण (PSDA) — परियोजना को एनओसी देने का अधिकार; दो बार विरोध का सामना।
  • मुलुगु कलेक्टर बोरखड़े हेमंत सहदेवराव — आपत्तियों की सुनवाई और निर्णय; कहा कि वैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों व विरासत मानदंडों के पालन बिना अनुमति नहीं।
  • स्थानीय किसान व निवासी — रामप्पा झील से लगभग 30,000 एकड़ की सिंचाई और पेयजल; वन, कृषि व असाइन्ड भूमि का अधिग्रहण।

क्यों अहम है

यह मामला ऊर्जा जरूरतों और अपूरणीय विश्व विरासत के संरक्षण के बीच सीधे टकराव को दर्शाता है — एक बार क्षतिग्रस्त होने पर 800 साल पुरानी सैंडबॉक्स नींव बहाल नहीं की जा सकती। रामप्पा झील पर निर्भर 30,000 एकड़ खेती और पेयजल आपूर्ति भी दांव पर है, जिससे यह केवल पुरातात्विक नहीं बल्कि आजीविका का प्रश्न भी बन जाता है। यूनेस्को दर्जे वाले स्थल के आसपास नियामक प्रक्रिया की कसौटी भी यहीं तय होगी।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • रामप्पा (रुद्रेश्वर) मंदिर, पालमपेट, मुलुगु जिला, तेलंगाना – 25 जुलाई 2021 को यूनेस्को विश्व विरासत स्थल घोषित; राज्य का एकमात्र ऐसा स्थल।
  • निर्माण: लगभग 1213 ईस्वी, काकतीय शासक गणपति देव के सेनापति रेचेर्ला रुद्र द्वारा; शिल्पकार रामप्पा के नाम पर।
  • स्थापत्य विशेषताएं: कठोर डोलेराइट व बलुआ पत्थर की नक्काशी, विमान में हल्की 'तैरती ईंटें', और कॉन्फाइंड सैंडबॉक्स नींव।
  • सिंगरेनी कोलियरीज कंपनी लिमिटेड (SCCL) – सरकारी स्वामित्व वाली कोयला कंपनी; वेंकटापुर में प्रस्तावित ओपन कास्ट खदान।
  • रामप्पा झील: काकतीय कालीन सिंचाई संरचना, ~3 टीएमसी क्षमता, ~30,000 एकड़ सिंचाई।
  • रिपोर्ट में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के अवलोकन उद्धृत – मंदिर क्षेत्र पहले से बड़े-छोटे भ्रंशों व जोड़ों से संरचनात्मक रूप से विक्षुब्ध।

मेन्स दृष्टिकोण

रामप्पा मंदिर विवाद विकास और विरासत संरक्षण के बीच क्लासिक टकराव है। एक ओर राज्य के स्वामित्व वाली एससीसीएल 19 वर्षों में 4.04 करोड़ टन कोयला निकालकर ऊर्जा सुरक्षा और राजस्व का तर्क देती है और दावा करती है कि खदान बफर जोन के बाहर है तथा आईआईटी सहित एजेंसियों के अध्ययन नियंत्रित ब्लास्टिंग से कंपन को सहनशीलता सीमा के नीचे बताते हैं। दूसरी ओर काकतीय हेरिटेज ट्रस्ट की 2025 की रिपोर्ट, जीएसआई अवलोकनों का हवाला देते हुए कहती है कि मंदिर क्षेत्र भ्रंशों से पहले से विक्षुब्ध है, फर्श की बड़ी शिलाओं में दरारें और असमान बैठाव दिख रहा है, और चक्रीय कंपन से 'थकान' (फटीग) के कारण दीर्घकाल में क्षति निश्चित है। इसमें रामप्पा झील पर आधारित लगभग 30,000 एकड़ सिंचाई और पेयजल तथा वन एवं कृषि भूमि के हस्तांतरण का सामाजिक-पारिस्थितिक पहलू भी जुड़ा है। आगे का रास्ता कलेक्टर द्वारा बताई गई दिशा में है — स्वतंत्र, व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन, कंपन की सतत निगरानी, एएसआई व यूनेस्को मानदंडों का अनुपालन, स्थानीय समुदाय की सुनवाई, और यदि जोखिम अपरिवर्तनीय हो तो वैकल्पिक स्थल या खनन तकनीक पर विचार।

मुख्य शब्द

ओपन कास्ट खनन
सतह से खुली खुदाई करके खनिज निकालने की विधि; यहां प्रस्तावित गहराई 300 मीटर बताई गई है।
कॉन्फाइंड सैंडबॉक्स फाउंडेशन
बालू से भरी, इष्टतम घनत्व तक संपीडित नींव जो भूकंपीय झटके सोखती है और 800 वर्षों से मंदिर को टिकाए है।
तैरती ईंटें (फ्लोटिंग ब्रिक्स)
रामप्पा मंदिर के विमान में प्रयुक्त अत्यंत हल्की ईंटें, जो शिखर का भार कम करती हैं।
SCCL
सिंगरेनी कोलियरीज कंपनी लिमिटेड – सरकारी कोयला कंपनी, जो वेंकटापुर में प्रस्तावित खदान की परियोजना प्रस्तावक है।
PSDA
पालमपेट विशेष विकास प्राधिकरण – वह निकाय जिसके एनओसी प्रस्ताव का मार्च 2023 व दिसंबर 2024 में विरोध हुआ।
बफर जोन
विरासत स्थल के चारों ओर संरक्षित परिधि; एससीसीएल का दावा है कि खदान इसके बाहर पड़ती है।

अभ्यास प्रश्न

  1. विश्व विरासत स्थलों के निकट खनन परियोजनाओं की मंजूरी में किस तरह के वैज्ञानिक और नियामक सुरक्षा उपाय अनिवार्य होने चाहिए? रामप्पा मंदिर के उदाहरण से समझाइए।
  2. काकतीय स्थापत्य की विशिष्टताओं (सैंडबॉक्स नींव, तैरती ईंटें, डोलेराइट नक्काशी) पर चर्चा करते हुए बताइए कि ये आधुनिक अभियांत्रिकी के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं।
  3. ऊर्जा सुरक्षा और सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के बीच संतुलन कैसे साधा जाए? रामप्पा–सिंगरेनी विवाद के संदर्भ में मूल्यांकन कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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