छह राज्यों ने किशाऊ परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए, आठ साल का गतिरोध खत्म
यमुना बेसिन के छह राज्यों — हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान — ने मंगलवार को नई दिल्ली में किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना पर समझौते पर हस्ताक्षर किए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे ऐतिहासिक बताया और कहा कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह सुलझने वाला 10वां जल विवाद है। आठ साल से अधिक समय से अटकी 422 मेगावाट की परियोजना की अनुमानित लागत 15,624 करोड़ रुपये है। टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊंचा बांध लगभग 97,000 हेक्टेयर में सिंचाई करेगा। जल घटक की 90 प्रतिशत लागत केंद्र वहन करेगा।
स्रोत
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- Six Yamuna basin states signed an agreement on the Kishau Multipurpose Project in New Delhi on Tuesday. — Attributed to the source report, which names all six states and the signing chief ministers; internally consistent.
- It is the 10th water dispute resolved since Narendra Modi became PM. — Explicitly a claim by Union Home Minister Amit Shah, not independently verified in the source.
- The 422-MW project involves a 232.6-metre dam on the Tons river, storage of 1,562 MCM, irrigation of about 97,000 hectares and 1,476 million units of hydropower, at a cost of Rs 15,624 crore. — Figures appear in the source and are attributed to Shah; project cost figure given without further attribution.
- The Centre will bear about 90% of the water component cost, with states sharing 10% as per the 1994 Yamuna water agreement. — Figure appears in source as terms of the agreement; no document cited.
- Himachal secured that its Rs 2,000-crore power component would be borne by Delhi, Rajasthan and Haryana, and will get about 1,000 MU annually worth around Rs 1,200 crore. — Attributed to Himachal CM Sukhvinder Singh Sukhu; described as an in-principle understanding, no Centre confirmation in source.
विश्लेषकों की राय राय
कागज़ पर किशाऊ समझौता एक जल समझौता है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह केंद्र की सहमति बनाने की क्षमता का प्रदर्शन है। छह हस्ताक्षरकर्ता राज्यों में पाँच भाजपा/एनडीए शासित और एक कांग्रेस शासित होने से तालमेल बनाना तुलनात्मक रूप से आसान रहा — और इससे केंद्र को 'सहकारी संघवाद' का तैयार नैरेटिव मिल गया। अमित शाह द्वारा इसे मोदी के कार्यकाल में सुलझा दसवाँ जल विवाद बताना, नदी विवादों को गिनने योग्य शासन-रिकॉर्ड में बदलने की कोशिश दिखाता है।
- एक ही मंच पर पाँच एनडीए मुख्यमंत्रियों और एक कांग्रेस मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर केंद्र के लिए राजनीतिक रूप से अनुकूल तस्वीर हैं।
- दिल्ली को सबसे बड़ा लाभार्थी बताया जाना और यमुना सफाई का लक्ष्य, राजधानी की सरकार को पानी व नदी के मुद्दे पर एक दिखने वाली उपलब्धि देता है।
- हिमाचल में मुख्यमंत्री सुक्खू का यह दावा कि उन्होंने पिछली सरकार द्वारा स्वीकारा गया भार ठुकरा दिया, साफ तौर पर राज्य की सत्ता-विपक्ष प्रतिस्पर्धा को लक्षित है।
- केंद्र के साथ हस्ताक्षर करते हुए भी जलविद्युत रॉयल्टी की माँगें दोहराना सुक्खू की 'सहयोग करो, मोलभाव जारी रखो' रणनीति है।
- विस्थापन और पर्यावरणीय-सामाजिक लागत पहाड़ी राज्यों पर अधिक पड़ने का तर्क आगे स्थानीय राजनीतिक दबाव बन सकता है।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि हिमाचल के लगभग 2,000 करोड़ रुपये के बिजली हिस्से को दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा उठाएँ — यह सैद्धांतिक सहमति लिखित रूप लेती है या नया अंतरराज्यीय टकराव बनती है।
खबर समझौते पर हस्ताक्षर की पुष्टि करती है, लेकिन पुनर्वास, वन एवं पर्यावरण मंजूरी, हिमाचल की बिजली हिस्सेदारी की अंतिम स्थिति या निर्माण की समयसीमा पर कोई स्पष्टता स्थापित नहीं करती।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 6 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
यमुना बेसिन के छह राज्यों — हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान — ने नई दिल्ली में किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना पर समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिससे आठ साल से अधिक समय से अटकी परियोजना कार्यान्वयन के करीब पहुंच गई। परियोजना में उत्तराखंड-हिमाचल सीमा पर टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रैविटी बांध प्रस्तावित है, जो सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत देगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे "ऐतिहासिक" बताते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह सुलझने वाला 10वां जल विवाद है। जल शक्ति मंत्रालय द्वारा सभी राज्यों की सहमति और तकनीकी-आर्थिक पहलुओं की जांच के बाद 16 जून को औपचारिक सहमति बनी थी।
मुख्य तथ्य
- परियोजना 422 मेगावाट की है और आठ साल से अधिक समय से अटकी हुई थी; अनुमानित लागत 15,624 करोड़ रुपये।
- टोंस नदी पर उत्तराखंड-हिमाचल प्रदेश सीमा पर 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रैविटी बांध; भंडारण क्षमता 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर।
- लगभग 97,000 हेक्टेयर में सिंचाई और 1,476 मिलियन यूनिट जलविद्युत उत्पादन का अनुमान (शाह के अनुसार)।
- जल घटक की लगभग 90 प्रतिशत लागत केंद्र वहन करेगा; शेष 10 प्रतिशत 1994 के यमुना जल समझौते के अनुसार राज्यों में बंटेगा।
- हिमाचल के हिस्से में आने वाला लगभग 2,000 करोड़ रुपये का विद्युत घटक दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा वहन करने पर केंद्र सैद्धांतिक रूप से सहमत — मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू।
- सुक्खू के अनुसार हिमाचल को सालाना करीब 1,000 मिलियन यूनिट बिजली मिलेगी, जो मौजूदा अनुमान से लगभग 1,200 करोड़ रुपये वार्षिक राजस्व दे सकती है (पहले अनुमान करीब 600 करोड़)।
- दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के अनुसार दिल्ली को परियोजना से लगभग 110 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) पानी मिलेगा।
- शाह ने कहा कि समझौते से 25 प्रतिशत पानी उपलब्ध होगा और स्वच्छ यमुना का लक्ष्य 2029 तक हासिल होने का विश्वास जताया।
समयरेखा
- 1994यमुना जल समझौता, जिसके अनुसार किशाऊ परियोजना के जल घटक की शेष 10 प्रतिशत लागत राज्यों में बांटी जाएगी।
- 2018 से 2026शाह के अनुसार यह अवधि कश्मीर से उत्तर प्रदेश तक लगभग सभी बड़े जल विवादों के समाधान के लिए याद रखी जाएगी।
- आठ वर्ष से अधिक422 मेगावाट की किशाऊ परियोजना अटकी रही।
- 16 जूनजल शक्ति मंत्रालय द्वारा सभी राज्यों की सहमति लेने और तकनीकी-आर्थिक पहलुओं की जांच के बाद औपचारिक सहमति बनी।
- मंगलवार (हस्ताक्षर का दिन)नई दिल्ली में अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सी आर पाटील की उपस्थिति में छह राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने समझौते पर हस्ताक्षर किए।
- 2029शाह के अनुसार स्वच्छ यमुना का लक्ष्य हासिल करने का लक्ष्य वर्ष।
किसका दाँव
- केंद्र सरकार / जल शक्ति मंत्रालय — जल घटक की लगभग 90 प्रतिशत लागत वहन; राज्यों की सहमति जुटाना और तकनीकी-आर्थिक परीक्षण।
- हिमाचल प्रदेश (मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू) — विस्थापन तथा पर्यावरणीय-सामाजिक लागत; विद्युत घटक के 2,000 करोड़ रुपये के बोझ से राहत और सालाना ~1,200 करोड़ रुपये राजस्व की उम्मीद।
- दिल्ली (मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता) — शाह के अनुसार सबसे बड़ा लाभार्थी; लगभग 110 MCM पानी और यमुना में पर्यावरणीय प्रवाह में सुधार।
- उत्तर प्रदेश (मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ) — सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, पेयजल उपलब्धता और यमुना की अविरल-स्वच्छ धारा।
- राजस्थान व हरियाणा (मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, नायब सिंह सैनी) — सिंचाई व पेयजल की समस्याओं का समाधान; हिमाचल के विद्युत घटक की लागत साझा करने की भूमिका।
- उत्तराखंड (मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी) और प्रभावित गांव — बांध स्थल राज्य; सुक्खू के अनुसार हिमाचल की तुलना में उत्तराखंड में अधिक गांव प्रभावित होंगे।
- यमुना नदी / पर्यावरण — मूल जल बंटवारे में पर्यावरणीय प्रवाह का हिसाब नहीं था; समझौते से 25 प्रतिशत पानी उपलब्ध होने का दावा।
क्यों अहम है
अंतरराज्यीय जल विवाद भारत में विकास परियोजनाओं को वर्षों तक रोक देते हैं; छह राज्यों की सहमति सहकारी संघवाद और आठ साल के गतिरोध के अंत का उदाहरण है। परियोजना दिल्ली-एनसीआर की पेयजल जरूरत, करीब 97,000 हेक्टेयर की सिंचाई और यमुना के पर्यावरणीय प्रवाह — तीनों को जोड़ती है। साथ ही यह पहाड़ी राज्यों के इस प्रश्न को केंद्र में लाती है कि विस्थापन व पारिस्थितिक लागत उठाने वाले राज्य को जलविद्युत में कितना हिस्सा मिले।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना: टोंस नदी (उत्तराखंड-हिमाचल सीमा) पर 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रैविटी बांध, 422 मेगावाट, लागत 15,624 करोड़ रुपये।
- भंडारण क्षमता 1,562 MCM; सिंचाई ~97,000 हेक्टेयर; जलविद्युत 1,476 मिलियन यूनिट।
- समझौते में शामिल छह यमुना बेसिन राज्य: हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान।
- जल घटक: 90% केंद्र, 10% राज्य — 1994 के यमुना जल समझौते के अनुसार।
- शाह द्वारा उल्लिखित अन्य परियोजनाएं/समझौते: लखवाड़ बहुउद्देश्यीय, शाहपुर कंडी बांध, रेणुकाजी बहुउद्देश्यीय बांध, केन-बेतवा लिंक।
- हिमाचल को वर्तमान में 12% निःशुल्क विद्युत रॉयल्टी तथा 1% स्थानीय क्षेत्र विकास निधि मिलती है।
मेन्स दृष्टिकोण
किशाऊ समझौता दिखाता है कि अंतरराज्यीय जल विवादों का समाधान अदालतों या अधिकरणों से अधिक अक्सर वार्ता और लागत-लाभ के पुनर्संतुलन से निकलता है: आठ वर्ष से अटकी 422 मेगावाट की परियोजना तब आगे बढ़ी जब केंद्र ने जल घटक की 90 प्रतिशत लागत उठाई, शेष 10 प्रतिशत 1994 के यमुना जल समझौते के अनुपात में तय हुआ, और हिमाचल पर पड़ने वाला करीब 2,000 करोड़ रुपये का विद्युत घटक लाभार्थी राज्यों — दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा — पर डालने पर सैद्धांतिक सहमति बनी। इसके पीछे संरचनात्मक कारण है — जलाशय पहाड़ी राज्यों में बनते हैं जहां विस्थापन और पारिस्थितिक लागत आती है, जबकि लाभ मैदानी व शहरी उपभोक्ता राज्यों को मिलता है; इसी असंतुलन से सुक्खू की 12 प्रतिशत निःशुल्क विद्युत रॉयल्टी बढ़ाकर 12वें-30वें वर्ष 30 प्रतिशत, 40 वर्ष बाद परियोजना हस्तांतरण और उसके बाद 50 प्रतिशत रॉयल्टी की मांग उभरती है। निहितार्थ तीन हैं: दिल्ली को ~110 MCM पानी और पेयजल सुरक्षा, उत्तर प्रदेश-राजस्थान-हरियाणा को सिंचाई व पेयजल, तथा यमुना के पर्यावरणीय प्रवाह की वह भरपाई जिसे मूल बंटवारे में गिना ही नहीं गया था। आगे का रास्ता है — भूमि अधिग्रहण प्रावधानों के तहत प्रभावित परिवारों का पर्याप्त पुनर्वास, समयबद्ध निर्माण, और पर्यावरणीय प्रवाह व यमुना सफाई (2029 लक्ष्य) के वादों की निगरानी।
मुख्य शब्द
- किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना
- टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊंचे बांध वाली 422 मेगावाट परियोजना, जो सिंचाई, पेयजल व जलविद्युत तीनों उद्देश्य पूरे करेगी।
- कंक्रीट ग्रैविटी बांध
- अपने भार से जल दबाव झेलने वाला कंक्रीट बांध; किशाऊ में इसकी ऊंचाई 232.6 मीटर प्रस्तावित है।
- 1994 यमुना जल समझौता
- यमुना बेसिन राज्यों के बीच जल बंटवारे का समझौता, जिसके अनुसार किशाऊ के जल घटक का 10 प्रतिशत राज्यांश तय होगा।
- पर्यावरणीय प्रवाह (environmental flow)
- नदी के अपने पारिस्थितिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी जल; शाह के अनुसार मूल यमुना बंटवारे में इसका हिसाब नहीं रखा गया था।
- निःशुल्क विद्युत रॉयल्टी
- जलविद्युत परियोजना से मेजबान राज्य को मिलने वाली मुफ्त बिजली का हिस्सा; हिमाचल को अभी 12 प्रतिशत मिलता है।
- स्थानीय क्षेत्र विकास निधि
- परियोजना प्रभावित क्षेत्र के विकास के लिए कोष; हिमाचल को इसके तहत 1 प्रतिशत मिलता है।
अभ्यास प्रश्न
- अंतरराज्यीय नदी जल विवादों के समाधान में वार्ता-आधारित समझौतों की भूमिका का किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना के उदाहरण से परीक्षण करें।
- हिमालयी राज्य जलविद्युत परियोजनाओं की पारिस्थितिक और सामाजिक लागत उठाते हैं, जबकि लाभ मैदानी राज्यों को मिलता है। इस असंतुलन को दूर करने के उपाय सुझाएं।
- किशाऊ परियोजना दिल्ली की जल सुरक्षा और यमुना के पर्यावरणीय प्रवाह को किस प्रकार प्रभावित कर सकती है? स्रोत में दिए आंकड़ों के आधार पर चर्चा करें।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
