12 साल का 'मेक इन इंडिया': वृद्धि, रोजगार पर सीमित असर
25 सितंबर 2014 को शुरू हुए 'मेक इन इंडिया' के 12 साल बाद 12 संकेतकों के विश्लेषण से पता चलता है कि वृद्धि, रोजगार और वैश्विक निर्यात में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग अपरिवर्तित रही। गैर-पेट्रोलियम वस्तु निर्यात 253.5 अरब डॉलर से 53% बढ़कर 2025-26 में 388.3 अरब डॉलर हुआ, लेकिन वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 1.7% पर ही रही। 14 पीएलआई योजनाओं में 2.4 लाख करोड़ रुपये निवेश आया, जिसमें 83% पांच क्षेत्रों का रहा। विनिर्माण रोजगार 5.1 करोड़ से 5.3 करोड़ हुआ।
स्रोत
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- Non-petroleum goods exports rose 53% to $388.3 billion in 2025-26 from $253.5 billion in 2014. — Figures appear in source; attributed to trade data, no specific ministry cited.
- India's share in global merchandise exports was 1.7% in 2013 and remained the same in 2025-26. — Attributed in source to UNCTAD data.
- 14 PLI schemes drew cumulative investment of Rs 2.4 lakh crore as of March 2026, with top five sectors accounting for nearly 83%. — Figures appear in source, presented as government scheme data.
- Manufacturing employment grew from 5.1 crore in 2016-17 to 5.3 crore in 2025-26. — Attributed to CMIE data sourced from the Ministry of Labour and Employment.
- Manufacturing GVA share rose marginally from 14.6% in 2022-23 to 15.6% in 2025-26 under the new series. — Figure appears in source, based on GVA series comparison.
विश्लेषकों की राय राय
'मेक इन इंडिया' के 12 साल एक ही कहानी कहते हैं — उत्पादन बढ़ा, लेकिन अर्थव्यवस्था में विनिर्माण की हिस्सेदारी नहीं। पीएलआई जैसी प्रोत्साहन योजनाओं ने कुछ क्षेत्रों में निवेश खींचा, पर जिन पैमानों से 'विकास-अनुकूल माहौल' झलकता है — निजी पूंजीगत खर्च, क्षमता उपयोग, वैश्विक निर्यात में हिस्सेदारी — वे कमजोर बने हुए हैं। आंकड़े बताते हैं कि रियायतें आंकड़े सुधार सकती हैं, लेकिन व्यापक और रोजगारपरक विनिर्माण उछाल अभी नहीं आया है।
- गैर-पेट्रोलियम निर्यात 53% बढ़ा, फिर भी वैश्विक व्यापारिक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 1.7% पर टिकी रही — यानी भारत विश्व व्यापार के साथ बढ़ा, उससे तेज नहीं।
- पीएलआई के 2.4 लाख करोड़ रुपये के निवेश का 83% केवल पांच क्षेत्रों में केंद्रित होना दिखाता है कि लाभ पूंजी-प्रधान उद्योगों को मिला, श्रम-प्रधान को नहीं।
- विनिर्माण रोजगार 5.1 करोड़ से 5.3 करोड़ और कुल रोजगार में हिस्सेदारी एक दशक बाद भी लगभग वही — यह श्रम बाजार का कायांतरण नहीं, और खर्च हुए सार्वजनिक धन को देखते हुए बड़ा सवाल है।
- निजी जीएफसीएफ का जीडीपी में घटता अनुपात और क्षमता उपयोग का 80% से नीचे रहना संकेत देता है कि कंपनियों को नए संयंत्र लगाने लायक मांग का भरोसा अभी नहीं है।
- एमएसएमई कर्ज की तेज वृद्धि के साथ उत्पादन वृद्धि न होना विशेषज्ञों की इस राय को बल देता है कि कर्ज कार्यशील पूंजी के लिए है, नई क्षमता के लिए नहीं।
किस पर नज़र रखें — आगे देखें कि क्षमता उपयोग 80% पार करता है या नहीं और निजी जीएफसीएफ में सुधार आता है या नहीं — यही प्रोत्साहन-आधारित उत्पादन से आत्मनिर्भर निवेश चक्र की ओर बदलाव का पहला ठोस संकेत होगा।
यह रिपोर्ट 12 संकेतकों के रुझान दिखाती है, पर महामारी, व्यापार तनाव या वैश्विक सुस्ती जैसे झटकों को अलग नहीं करती, इसलिए यह साबित नहीं करती कि इन नतीजों का कारण नीति ही है।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 9 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
25 सितंबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मेक इन इंडिया' अभियान शुरू किया था, जिसका उद्देश्य भारत को विनिर्माण केंद्र बनाना था। 12 साल बाद वृद्धि, निवेश, रोजगार और निर्यात से जुड़े 12 संकेतकों के विश्लेषण से पता चलता है कि अर्थव्यवस्था, रोजगार और वैश्विक निर्यात में विनिर्माण की हिस्सेदारी लगभग अपरिवर्तित है। अभियान शुरू करते समय मोदी ने कहा था कि उद्योगपति "किसी आकर्षक प्रोत्साहन योजना" के कारण नहीं आते, बल्कि "विकास और वृद्धि-उन्मुख माहौल" चाहिए होता है। आंकड़े बताते हैं कि सफलता मुख्यत: सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं (पीएलआई) में मिली, वहीं विकास-उन्मुख माहौल दर्शाने वाले संकेतक कमजोर रहे।
मुख्य तथ्य
- गैर-पेट्रोलियम वस्तु निर्यात 2014 के 253.5 अरब डॉलर से 53% बढ़कर 2025-26 में 388.3 अरब डॉलर हुआ; इससे पहले के 12 वर्षों में यह 400% से अधिक बढ़ा था (छोटे आधार पर)।
- UNCTAD के आंकड़े: वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 2002 के लगभग 0.8% से 2013 में 1.7% हुई और 2025-26 में भी 1.7% पर ही रही।
- पुरानी श्रृंखला के अनुसार 12 में से केवल 5 वर्षों में विनिर्माण क्षेत्र ने समग्र अर्थव्यवस्था से तेज वृद्धि दर्ज की; नई श्रृंखला में तीनों वर्षों (2023-24 से 2025-26) में तेज, पर अंतर तेजी से घट रहा है।
- आईआईपी में विनिर्माण ने पुरानी श्रृंखला के अनुसार 12 में से केवल 3 वर्षों में समग्र सूचकांक से तेज वृद्धि दिखाई; नई श्रृंखला में 2023-24 में बराबर, अगले दो वर्षों में धीमी।
- नई जीवीए श्रृंखला में विनिर्माण की हिस्सेदारी 2022-23 के 14.6% से बढ़कर 2025-26 में 15.6%; पुरानी श्रृंखला में 2025-26 की हिस्सेदारी 2014 से कम।
- 2020 और 2021 में शुरू 14 पीएलआई योजनाओं में मार्च 2026 तक 2.4 लाख करोड़ रुपये का संचयी निवेश; शीर्ष पांच क्षेत्रों का हिस्सा लगभग 83%।
- पीएलआई के तहत 8.5 लाख लोगों को रोजगार, जिसमें पांच क्षेत्रों का 86% से अधिक हिस्सा; सरकार के अनुसार तीन क्षेत्रों से 5.7 लाख अतिरिक्त अप्रत्यक्ष रोजगार।
- श्रम मंत्रालय से सीएमआईई के आंकड़े: विनिर्माण में कुल रोजगार 2016-17 के 5.1 करोड़ से 2025-26 में 5.3 करोड़; कुल रोजगार में हिस्सेदारी एक दशक पहले जैसी ही।
समयरेखा
- 2002वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत की हिस्सेदारी लगभग 0.8% (UNCTAD)।
- 2013भारत की वैश्विक वस्तु निर्यात हिस्सेदारी बढ़कर 1.7% हुई।
- 25 सितंबर 2014प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 'मेक इन इंडिया' अभियान की शुरुआत।
- 2014-15कुल एफडीआई में विनिर्माण की हिस्सेदारी लगभग 48%; निजी क्षेत्र का जीएफसीएफ-जीडीपी अनुपात बाद के वर्षों से ऊंचा।
- 2020 और 202114 उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाएं शुरू की गईं।
- 2022-23नई श्रृंखला में जीएफसीएफ/जीडीपी अनुपात में गिरावट शुरू; विनिर्माण की जीवीए हिस्सेदारी 14.6%।
- 2023-24पुरानी श्रृंखला का अंतिम वर्ष: निजी क्षेत्र का जीएफसीएफ-जीडीपी अनुपात 2014-15 से कम।
- मार्च 2026पीएलआई योजनाओं में संचयी निवेश 2.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा।
- 2025-26गैर-पेट्रोलियम निर्यात 388.3 अरब डॉलर; एफडीआई में विनिर्माण हिस्सा 55%; विनिर्माण रोजगार 5.3 करोड़।
किसका दाँव
- केंद्र सरकार / वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय — 'मेक इन इंडिया' और 14 पीएलआई योजनाओं के जरिए विनिर्माण हिस्सेदारी बढ़ाने का लक्ष्य; परिणाम कुछ ही क्षेत्रों में केंद्रित।
- निजी उद्योग/निवेशक — जीएफसीएफ में गिरावट और 80% से नीचे क्षमता उपयोग के कारण नई क्षमता में निवेश टल रहा है।
- सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) — बैंक ऋण वृद्धि में अग्रणी, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह कार्यशील पूंजी के लिए, नए निवेश के लिए नहीं।
- श्रमिक/रोजगार चाहने वाले — विनिर्माण रोजगार 5.1 करोड़ से 5.3 करोड़ हुआ, कुल रोजगार में हिस्सेदारी लगभग स्थिर।
- भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) — क्षमता उपयोग और उद्योग को बैंक ऋण के आंकड़े जारी करता है, जो निवेश चक्र का संकेत देते हैं।
- पीएलआई लाभार्थी क्षेत्र (सौर मॉड्यूल, फार्मा, ऑटो, विशेष इस्पात, इलेक्ट्रॉनिक्स) — कुल पीएलआई निवेश के लगभग 83% हिस्से के साथ प्रोत्साहन का सबसे बड़ा लाभ।
क्यों अहम है
विनिर्माण को रोजगार-सघन वृद्धि का इंजन माना जाता है, लेकिन 12 साल में जीवीए, रोजगार और वैश्विक निर्यात (1.7%) में इसकी हिस्सेदारी लगभग स्थिर रहना दिखाता है कि नीतिगत जोर अब तक संरचनात्मक बदलाव में नहीं बदला। निजी जीएफसीएफ में गिरावट, 80% से नीचे क्षमता उपयोग और कार्यशील पूंजी की ओर झुका बैंक ऋण बताते हैं कि निवेश चक्र कमजोर है। पीएलआई की सफलता कुछ क्षेत्रों में केंद्रित होने से व्यापक रोजगार सृजन पर सवाल उठते हैं।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- 'मेक इन इंडिया' अभियान की शुरुआत: 25 सितंबर 2014।
- 14 पीएलआई योजनाएं 2020-2021 में शुरू; मार्च 2026 तक संचयी निवेश 2.4 लाख करोड़ रुपये।
- UNCTAD के अनुसार वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 1.7% (2013 और 2025-26 दोनों में)।
- आरबीआई का क्षमता उपयोग मानक: 80% से ऊपर जाने पर कंपनियां नई क्षमता में निवेश करती हैं।
- जीएफसीएफ = सकल स्थिर पूंजी निर्माण; नई श्रृंखला में 2022-23 से जीडीपी के अनुपात में गिरावट।
- 2025-26 में कुल एफडीआई में विनिर्माण की हिस्सेदारी 55% (2014-15 में लगभग 48%)।
मेन्स दृष्टिकोण
'मेक इन इंडिया' के 12 वर्षों का मूल्यांकन बताता है कि नीतिगत मंशा और परिणाम के बीच अंतर बना हुआ है: पुरानी जीवीए श्रृंखला में विनिर्माण की हिस्सेदारी 2014 से घटी है, आईआईपी में विनिर्माण 12 में से केवल 3 वर्षों में समग्र सूचकांक से तेज बढ़ा, और वैश्विक वस्तु निर्यात हिस्सेदारी 1.7% पर जमी है, भले गैर-पेट्रोलियम निर्यात 53% बढ़कर 388.3 अरब डॉलर हुआ। कारणों में निजी क्षेत्र की कमजोर पूंजी निर्माण प्रवृत्ति (जीएफसीएफ/जीडीपी में गिरावट), 80% से नीचे क्षमता उपयोग, और उद्योग को बढ़े बैंक ऋण का मुख्यत: कार्यशील पूंजी में जाना शामिल है—यानी मांग और उत्पादन वृद्धि का अभाव। प्रोत्साहन-आधारित दृष्टिकोण (14 पीएलआई योजनाएं, 2.4 लाख करोड़ रुपये निवेश, 8.5 लाख रोजगार) ने कुछ परिणाम दिए, पर 83% निवेश और 86% रोजगार पांच क्षेत्रों में केंद्रित होने से लाभ संकुचित रहा; विनिर्माण रोजगार 5.1 करोड़ से 5.3 करोड़ ही बढ़ा। आगे का रास्ता स्वयं प्रधानमंत्री की उस बात से जुड़ता है कि केवल आकर्षक प्रोत्साहन के बजाय "विकास और वृद्धि-उन्मुख माहौल" चाहिए—अर्थात क्षमता उपयोग व मांग बढ़ाना, एमएसएमई को कार्यशील पूंजी से आगे निवेश की ओर ले जाना, और प्रोत्साहनों का लाभ व्यापक, श्रम-सघन क्षेत्रों तक फैलाना।
मुख्य शब्द
- मेक इन इंडिया
- 25 सितंबर 2014 को शुरू अभियान, जिसका लक्ष्य भारत में विनिर्माण को बढ़ावा देना है।
- पीएलआई (उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन) योजना
- 2020-21 में शुरू 14 क्षेत्रीय योजनाएं, जिनमें उत्पादन/बिक्री बढ़ाने पर कंपनियों को प्रोत्साहन मिलता है।
- जीवीए (सकल मूल्य वर्धन)
- अर्थव्यवस्था में उत्पादित मूल्य का माप; इससे क्षेत्रों की हिस्सेदारी आंकी जाती है।
- जीएफसीएफ (सकल स्थिर पूंजी निर्माण)
- वास्तविक परिसंपत्ति निर्माण पर खर्च का माप; निजी निवेश की सेहत दर्शाता है।
- आईआईपी (औद्योगिक उत्पादन सूचकांक)
- मासिक जारी होने वाला सूचकांक, जो औद्योगिक व विनिर्माण उत्पादन की वृद्धि मापता है।
- क्षमता उपयोग
- कारखानों के कितने गहन उपयोग का आरबीआई माप; 80% से ऊपर जाने पर नई क्षमता में निवेश होता है।
अभ्यास प्रश्न
- 'मेक इन इंडिया' के 12 वर्षों के आंकड़ों के आलोक में परखें कि प्रोत्साहन-आधारित औद्योगिक नीति विनिर्माण की जीडीपी व रोजगार हिस्सेदारी बढ़ाने में कितनी कारगर रही है।
- निजी जीएफसीएफ में गिरावट, 80% से नीचे क्षमता उपयोग और कार्यशील पूंजी की ओर झुके बैंक ऋण—इन संकेतकों से भारत के निवेश चक्र की स्थिति का विश्लेषण कीजिए।
- वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 1.7% पर स्थिर क्यों है, जबकि गैर-पेट्रोलियम निर्यात मूल्य 53% बढ़ा? चर्चा कीजिए।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
