वंदे मातरम के छह छंद न गाने पर अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि उसे अपेक्षा है कि धार्मिक कारणों से वंदे मातरम के सभी छह छंद न गाने वाले व्यक्ति पर आपराधिक मुकदमा न चले। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत तथा न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और वी मोहना की पीठ कर्नाटक गायक टीएम कृष्णा की याचिका सुन रही थी, जिसमें राष्ट्रगीत के अपमान को अपराध बनाने वाले 2026 राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण संशोधन अधिनियम को चुनौती दी गई है। केंद्र को दो सप्ताह में जवाब देना है। 6 अगस्त को स्वीकृत कानून में तीन वर्ष तक कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- The Supreme Court said it expects that a person not singing all six stanzas of Vande Mataram for religious reasons should not face criminal prosecution. — Attributed in source to Live Law; an oral observation by the bench, not a judgment.
- The bench comprised Chief Justice Surya Kant and Justices Joymalya Bagchi and V Mohana, hearing TM Krishna's petition. — Names and composition appear in the source as reported; no order copy cited.
- The 2026 Prevention of Insults to National Honour Amendment Act received presidential assent on August 6 and prescribes up to three years' imprisonment, fine or both. — Date and penalty figures appear in source; no gazette reference given.
- MHA directions issued in February require all six stanzas to be sung at government, ceremonial and cultural occasions. — Stated in source as part of the challenged directions; no circular number cited.
- The 1986 Bijoe Emmanuel judgement held that expelling students for refusing to sing the national anthem violates fundamental rights. — Consistent with the source's description of the precedent cited by the court.
विश्लेषकों की राय राय
वंदे मातरम् के छह छंदों पर सुप्रीम कोर्ट की प्रारंभिक टिप्पणी फैसला नहीं है, फिर भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है — बिजोय इमैनुएल को 'देश का कानून' बताकर पीठ ने संकेत दिया है कि नए दंडात्मक प्रावधान की पहुंच सीमित हो सकती है। इससे केंद्र सरकार असहज स्थिति में है: उसे कानून का बचाव करना है और साथ ही यह भरोसा भी देना है कि धार्मिक कारणों से न गाने वालों पर मुकदमा नहीं चलेगा। यह मामला राष्ट्रीय सम्मान बनाम धार्मिक स्वतंत्रता की बहस को फिर जिंदा करता है, जो दोनों राजनीतिक खेमों के लिए गोलबंदी का औजार बन सकती है।
- अदालत ने कानून पर रोक नहीं लगाई; केंद्र को दो हफ्ते देकर उसने एक राजनीतिक विवाद को न्यायिक प्रक्रिया में बदल दिया है।
- 'धार्मिक कारणों से न गाना अपराध नहीं होना चाहिए' वाली टिप्पणी आलोचकों को नैतिक बल देती है, पर अभी इसका कोई बाध्यकारी रूप नहीं है।
- अतिरिक्त छंदों में देवियों का आह्वान होने से यह विवाद तकनीकी कानूनी बहस से आगे बढ़कर धर्मनिरपेक्षता और प्रतीकों की लड़ाई बन सकता है।
- याचिकाकर्ता एक प्रतिष्ठित संगीतकार होने से यह सांस्कृतिक क्षेत्र से उठी असहमति के रूप में देखा जाएगा, जिसे सरकार के समर्थक और विरोधी अलग-अलग पढ़ेंगे।
- केंद्र का जवाब — फरवरी के निर्देशों और सजा का पूरा बचाव या छूट स्वीकार करना — उसकी राजनीतिक रणनीति उजागर करेगा।
किस पर नज़र रखें — दो हफ्ते में आने वाले केंद्र के हलफनामे पर नजर रखें और देखें कि वह फरवरी के निर्देश तथा तीन साल की सजा का कितना मजबूती से बचाव करता है — इससे तय होगा कि मामला अदालत तक सीमित रहेगा या व्यापक राजनीतिक बहस बनेगा।
यह खबर यह स्पष्ट नहीं करती कि अदालत कानून की वैधता पर अंतिम फैसला क्या देगी, केंद्र का औपचारिक रुख क्या है, या इस संशोधन के तहत किसी पर वास्तव में मुकदमा चला है या नहीं।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 6 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
वंदे मातरम को अब तक परंपरागत रूप से "राष्ट्रगीत" माना जाता रहा है, पर सरकारी आयोजनों में आम तौर पर इसके पहले दो छंद ही गाए जाते थे। 2026 के राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम ने वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन गण मन जैसी वैधानिक सुरक्षा दी और इसके अपमान को दंडनीय बनाया। फरवरी में गृह मंत्रालय ने सभी छह छंद गाए जाने के निर्देश जारी किए। कर्नाटक गायक टीएम कृष्णा ने संशोधन तथा इन निर्देशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
मुख्य तथ्य
- सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि धार्मिक कारणों से वंदे मातरम के सभी छह छंद न गाने वाले व्यक्ति पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलना चाहिए।
- पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत तथा न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और वी मोहना शामिल थे।
- याचिका कर्नाटक गायक टीएम कृष्णा ने दायर की, जिसमें 2026 राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण संशोधन अधिनियम की संवैधानिक वैधता चुनौती दी गई है।
- कोर्ट ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह में जवाब देने को कहा (बार एंड बेंच की रिपोर्ट)।
- कानून को 6 अगस्त को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली; जानबूझकर राष्ट्रगीत गाने से रोकने या गाने वाले समूह को बाधित करने पर तीन वर्ष तक कैद, जुर्माना या दोनों।
- 1971 का राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज या संविधान के अपमान पर तीन वर्ष तक कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान करता है।
- गृह मंत्रालय ने फरवरी में निर्देश दिए कि सरकारी, औपचारिक और सांस्कृतिक अवसरों पर वंदे मातरम के सभी छह छंद गाए जाएँ।
- पहले सरकारी कार्यक्रमों में केवल पहले दो छंद बजाए जाते थे; शेष छंदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती का आह्वान है।
समयरेखा
- 24 जनवरी 1950संविधान सभा ने राष्ट्रगान अपनाया; कृष्णा के अनुसार वंदे मातरम को औपचारिक रूप से राष्ट्रगीत घोषित नहीं किया गया।
- 1971राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम लागू, जो राष्ट्रगान, ध्वज और संविधान के अपमान को दंडनीय बनाता है।
- 1986बिजो इमैनुएल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रगान न गाने पर छात्रों को निष्कासित करना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
- फरवरीगृह मंत्रालय ने सरकारी, औपचारिक व सांस्कृतिक अवसरों पर सभी छह छंद गाने के निर्देश जारी किए।
- 6 अगस्त2026 संशोधन अधिनियम को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली।
- मंगलवार (सुनवाई का दिन)सुप्रीम कोर्ट ने कृष्णा की याचिका पर सुनवाई की और केंद्र को दो सप्ताह में जवाब देने को कहा।
क्यों अहम है
मामला यह तय करेगा कि राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को दंडात्मक कानून से लागू करना अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतंत्रता के साथ कैसे संतुलित हो। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी संकेत देती है कि 1986 के बिजो इमैनुएल निर्णय का सिद्धांत नए कानून पर भी लागू होगा। परिणाम स्कूलों, सरकारी और सांस्कृतिक आयोजनों में अनिवार्य गायन की सीमाएँ तय करेगा।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- 2026 राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम को 6 अगस्त को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली; वंदे मातरम को जन गण मन जैसी वैधानिक सुरक्षा।
- दंड: जानबूझकर राष्ट्रगीत गाने से रोकने/बाधित करने पर तीन वर्ष तक कैद, जुर्माना या दोनों।
- 1971 का मूल अधिनियम राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज और संविधान के अपमान को दंडनीय बनाता है।
- बिजो इमैनुएल (1986): राष्ट्रगान न गाने पर, सम्मानपूर्वक मौन रहते हुए, छात्रों का निष्कासन मौलिक अधिकारों का उल्लंघन।
- राष्ट्रगान संविधान सभा द्वारा 24 जनवरी 1950 को अपनाया गया।
- वंदे मातरम के शेष चार छंदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती का आह्वान है; पहले केवल दो छंद बजते थे।
मेन्स दृष्टिकोण
वंदे मातरम के सभी छह छंदों के अनिवार्य गायन और उसके उल्लंघन को अपराध बनाने का प्रश्न राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान तथा अनुच्छेद-आधारित अभिव्यक्ति व धर्म की स्वतंत्रता के बीच तनाव को उजागर करता है। कारण-पक्ष में सरकार का तर्क वैधानिक समानता है—वंदे मातरम को राष्ट्रगान जैसी सुरक्षा; चुनौती-पक्ष का तर्क है कि शेष छंद देवता-आह्वान करने वाले और गैर-धर्मनिरपेक्ष हैं, और दंडात्मक प्रावधान एक "विवादित ऐतिहासिक प्रतीक" को "अनिवार्य रूढ़ि" में बदल देते हैं; साथ ही वंदे मातरम को औपचारिक रूप से राष्ट्रगीत घोषित न किए जाने का प्रश्न भी उठाया गया है, जबकि पीठ ने कहा कि इसे प्रथानुसार (दो छंदों के साथ) राष्ट्रगीत माना गया है। निहितार्थ यह है कि स्कूलों, सरकारी और सांस्कृतिक आयोजनों में असहमति रखने वालों पर आपराधिक अभियोजन का खतरा बन सकता है। आगे की राह वही है जो कोर्ट ने संकेतित की—बिजो इमैनुएल (1986) में घोषित विधि के अनुरूप कानून की व्याख्या, अर्थात सम्मानपूर्वक मौन को अपराध न माना जाए, और केंद्र द्वारा दो सप्ताह में दाखिल जवाब के आधार पर संवैधानिक वैधता की न्यायिक परीक्षा।
मुख्य शब्द
- राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971
- कानून जो राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज और संविधान के अपमान पर तीन वर्ष तक कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान करता है।
- 2026 संशोधन अधिनियम
- 6 अगस्त को स्वीकृत संशोधन, जो वंदे मातरम को राष्ट्रगान जैसी वैधानिक सुरक्षा देकर उसके अपमान को अपराध बनाता है।
- बिजो इमैनुएल मामला (1986)
- सुप्रीम कोर्ट का निर्णय कि सम्मानपूर्वक मौन रहते हुए राष्ट्रगान न गाने पर छात्रों का निष्कासन मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
- राष्ट्रगीत (वंदे मातरम)
- परंपरागत रूप से राष्ट्रगीत माना जाने वाला गीत; याचिका के अनुसार इसे औपचारिक रूप से इस श्रेणी में कभी नहीं रखा गया।
- गृह मंत्रालय के फरवरी निर्देश
- सरकारी, औपचारिक और सांस्कृतिक अवसरों पर वंदे मातरम के सभी छह छंद गाए जाने का आदेश, जिसे याचिका में चुनौती दी गई है।
अभ्यास प्रश्न
- क्या राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को दंडात्मक कानून से लागू करना अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतंत्रता के अनुरूप है? बिजो इमैनुएल (1986) के आलोक में परीक्षण करें।
- 2026 राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण संशोधन अधिनियम और गृह मंत्रालय के फरवरी निर्देशों के मुख्य प्रावधानों तथा उनके विरुद्ध उठाई गई आपत्तियों की चर्चा करें।
- "अनिवार्य गायन बनाम सम्मानपूर्वक मौन" — भारत में राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े कानूनी ढाँचे के संदर्भ में इस द्वंद्व का विश्लेषण कीजिए।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
