एल नीनो तेज, 200 से अधिक भारतीय वैज्ञानिकों की चेतावनी

तेज होते एल नीनो को लेकर देशभर के 200 से अधिक वैज्ञानिकों और पारिस्थितिकी विशेषज्ञों ने 'कॉल टु एक्शन' जारी कर नीति-निर्माताओं से तैयारी करने को कहा है। आईआईएससी बेंगलुरु, डब्ल्यूआईआई, एनसीबीएस और एनसीएफ के हस्ताक्षरकर्ताओं ने मृदा नमी और जल भंडारण में बाधा, फसलों व आजीविका पर दबाव, समुद्री लू और मूंगा विरंजन की चेतावनी दी। 36 मौसम उपसंभागों में से 18 में कम बारिश दर्ज हुई है। एनओएए के अनुसार 1950 के बाद सबसे मजबूत एल नीनो की 75% आशंका है।

स्रोत

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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Over 200 Indian scientists and ecologists issued a 'Call to Action' on El Niño impacts — Attributed in source to signatories from IISc Bengaluru, WII, NCBS and NCF; source alternates between 'over 200' and 'nearly 200'.
  • 18 of 36 meteorological subdivisions are recording deficient rainfall as of Saturday — Figure appears in source; no agency named for the rainfall data.
  • NOAA puts a 75% chance of a historic El Niño exceeding events since 1950 — Attributed to the US National Oceanic and Atmospheric Administration.
  • Pacific temperature anomaly reached +2.6°C in August 2026, with projections up to +4°C — Attributed to the scientists citing coral core reconstructions; figures appear in source and cannot be independently checked.
  • The last major El Niño was in 2024, barely two years before the current event — Quoted from marine biologist Rohan Arthur; timeline sits oddly with the source's own dates and warrants editorial review.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

ऊपरी तौर पर यह वैज्ञानिक चेतावनी है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह सरकारों पर पहले से जवाबदेही तय करने वाला दस्तावेज़ है। आईआईएससी, डब्ल्यूआईआई, एनसीबीएस और एनसीएफ जैसे संस्थानों के 200 से अधिक हस्ताक्षरकर्ताओं के बाद, फसल नुकसान या जल संकट आने पर नीति-निर्माताओं के पास 'हमें पता नहीं था' का बचाव नहीं बचेगा। 36 मौसम उपसंभागों में से 18 में कम बारिश का मतलब है कि यह किसी एक राज्य की समस्या नहीं — केंद्र-राज्य आरोप-प्रत्यारोप और राहत-पैकेज की मांगों के लिए बड़ा राजनीतिक मैदान तैयार हो रहा है।

  • इस अपील की राजनीतिक ताक़त उसकी संख्या और संस्थागत प्रतिष्ठा में है — एक विशेषज्ञ की राय ख़ारिज करना आसान है, सामूहिक वैज्ञानिक चेतावनी को नज़रअंदाज़ करना महंगा पड़ता है।
  • 18 उपसंभागों में वर्षा की कमी का असर कई राज्यों तक फैलेगा, जिससे सिंचाई, पेयजल बंटवारा, फसल बीमा और मुआवज़ा केंद्र-राज्य टकराव के मुद्दे बन सकते हैं।
  • किसान संगठन और विपक्ष इस दर्ज चेतावनी का इस्तेमाल कर बाद के संकट को 'प्राकृतिक आपदा' नहीं, बल्कि तैयारी की विफलता बता सकते हैं।
  • सत्तापक्ष के लिए इसमें अवसर भी है — जल भंडारण, चारा और ग्रामीण रोज़गार की अग्रिम योजना घोषित करना बाद में संकट-प्रबंधन की उपलब्धि बन सकता है।
  • समुद्री हीटवेव और मूंगा क्षरण जैसे मुद्दों का चुनावी वज़न कम है, इसलिए राजनीतिक प्रतिक्रिया पानी और फसलों की ओर झुकने की संभावना ज़्यादा है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि आने वाले हफ़्तों में केंद्र और राज्य सरकारें सूखा-तैयारी समीक्षा और जल-फसल परामर्श जारी करती हैं, या सर्दियों में अल नीनो के और मज़बूत होने का इंतज़ार करती हैं।

यह ख़बर केवल वैज्ञानिकों की अपील दर्ज करती है — यह स्थापित नहीं करती कि सरकार की प्रतिक्रिया क्या रही, कोई नीतिगत निर्णय हुआ, या किसी दल ने इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से उठाया।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 7 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

एल नीनो एक आवर्ती वैश्विक मौसमी परिघटना है जो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्री परिसंचरण में बदलाव और तापन से हर 2-7 वर्ष में उत्पन्न होती है; भारत में यह दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर कर अत्यधिक गर्म और शुष्क स्थितियाँ लाती है। इस वर्ष जून-जुलाई के अंत में बना एल नीनो पहले ही मजबूत हो चुका है और आगामी सर्दियों में और तीव्र होने का पूर्वानुमान है। इसी पृष्ठभूमि में देशभर के 200 से अधिक वैज्ञानिकों और पारिस्थितिकीविदों ने एक संयुक्त 'कॉल टु एक्शन' जारी कर नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं और क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं से तत्काल तैयारी की अपील की है।

मुख्य तथ्य

  • भारत के 200 से अधिक वैज्ञानिकों व पारिस्थितिकी विशेषज्ञों ने संयुक्त 'कॉल टु एक्शन' जारी किया।
  • हस्ताक्षरकर्ता संस्थान: आईआईएससी बेंगलुरु, भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), एनसीबीएस, नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन (एनसीएफ)।
  • शनिवार तक कुल 36 मौसम उपसंभागों में से 18 में कम बारिश की स्थिति दर्ज।
  • एनओएए के अनुसार 1950 के बाद के सभी एल नीनो से अधिक मजबूत, ऐतिहासिक घटना की 75% आशंका।
  • चार महीने का दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन इस सितंबर सामान्य से कम बारिश के साथ समाप्त होने की ओर।
  • प्रशांत महासागर में तापमान 0.5°C की सीमा से ऊपर बढ़ते हुए अगस्त 2026 में +2.6°C तक पहुंचा।
  • अनुमान +4°C तक विचलन का संकेत देते हैं, जो मूंगा कोर पुनर्निर्माण के आधार पर पिछले 1,000 वर्षों में सर्वाधिक होगा।
  • एनसीएफ के रोहन आर्थर के अनुसार मूंगा भित्तियों को हर बड़े विनाश के बाद उल्लेखनीय सुधार के लिए कम से कम एक दशक लगता है; पिछला बड़ा एल नीनो 2024 में था।

समयरेखा

  1. 1950 के बादएनओएए के अनुसार इस अवधि की सभी एल नीनो घटनाओं से अधिक मजबूत घटना की 75% आशंका।
  2. 2024पिछला बड़ा एल नीनो, जिसके बाद मूंगा भित्तियों को उबरने का पर्याप्त समय नहीं मिला।
  3. जून-जुलाई 2026 के अंतइस वर्ष एल नीनो का निर्माण; यह पहले ही मजबूत श्रेणी में पहुंच गया।
  4. अगस्त 2026प्रशांत महासागर में तापमान विचलन +2.6°C तक पहुंचा।
  5. सितंबर 202636 में से 18 मौसम उपसंभागों में कम बारिश; मानसून सीजन सामान्य से कम वर्षा के साथ समाप्ति की ओर।
  6. 20 सितंबर 2026वैज्ञानिकों की चेतावनी और 'कॉल टु एक्शन' पर समाचार प्रकाशित।
  7. आगामी सर्दीनवीनतम पूर्वानुमान के अनुसार एल नीनो के और तीव्र होने की संभावना।

किसका दाँव

  • नीति-निर्माता — जल भंडारण, फसल और आजीविका पर संभावित विनाशकारी प्रभावों के लिए तत्काल तैयारी की जिम्मेदारी।
  • किसान और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था — कम मानसूनी वर्षा, मृदा नमी में बाधा और फसलों पर दबाव से आजीविका जोखिम।
  • आईआईएससी, डब्ल्यूआईआई, एनसीबीएस, एनसीएफ के वैज्ञानिक — दीर्घकालिक अध्ययन, सहयोग और पारिस्थितिक प्रभावों के मापन की अपील; बदलावों का दस्तावेजीकरण।
  • मूंगा भित्तियाँ और समुद्री जीवन — समुद्री लू और मूंगा विरंजन; अतीत की ईएनएसओ घटनाओं में मोरे ईल जैसी मछलियों की सामूहिक मृत्यु।
  • उष्णकटिबंधीय वन और बड़े वृक्ष — एनसीबीएस की जयश्री रत्नम के अनुसार कई पेड़ सहनीय गर्मी की सीमा के निकट; बड़े वृक्ष लंबे सूखे के प्रति अधिक संवेदनशील।
  • एनओएए और आईआईटीएम पुणे — पूर्वानुमान और वैज्ञानिक चेतावनी जारी करने वाली संस्थाएँ।

क्यों अहम है

दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए निर्णायक है और एल नीनो इसे कमजोर करता है, जिससे जल भंडारण, मृदा नमी, फसल और आजीविका सीधे प्रभावित होते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रभाव मानसून सीजन से आगे भी बढ़ेंगे और समुद्री लू, मूंगा विरंजन तथा कम दिखने वाले पारिस्थितिक बदलाव लाएंगे। यह अवधि कार्रवाई की छोटी लेकिन महत्वपूर्ण खिड़की है, जो भारत को गर्म और अस्थिर भविष्य के लिए तैयार कर सकती है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • एल नीनो: भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के तापन व परिसंचरण परिवर्तन से हर 2-7 वर्ष में उत्पन्न परिघटना; भारत में मानसून कमजोर करती है।
  • एनओएए (अमेरिका) का आकलन: 1950 के बाद की सबसे मजबूत एल नीनो की 75% आशंका।
  • भारत में कुल 36 मौसम उपसंभाग; इनमें 18 में कम बारिश दर्ज (स्रोत के अनुसार)।
  • 'कॉल टु एक्शन' के हस्ताक्षरकर्ता संस्थान: आईआईएससी बेंगलुरु, डब्ल्यूआईआई, एनसीबीएस, एनसीएफ।
  • प्रशांत महासागर में विचलन सीमा 0.5°C; अगस्त 2026 में +2.6°C, अनुमान +4°C तक।
  • आईआईटीएम पुणे के जलवायु वैज्ञानिक रॉक्सी मैथ्यू कोल ने समुद्री लू व मूंगा विरंजन की चेतावनी दी।

मेन्स दृष्टिकोण

तीव्र होते एल नीनो ने भारत के सामने एक बहुआयामी जोखिम खड़ा किया है: भूमध्यरेखीय प्रशांत के तापन से दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़ता है, जिसका परिणाम 36 में से 18 मौसम उपसंभागों में कम वर्षा और सामान्य से कम मानसून समाप्ति के रूप में दिख रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार प्रभाव केवल वर्षा-कमी तक सीमित नहीं रहेंगे—मृदा नमी और जल भंडारण में बाधा, फसलों पर दबाव, समुद्री लू, मूंगा विरंजन, तथा फलन में देरी या पशु व्यवहार में बदलाव जैसे कम दिखने वाले पारिस्थितिक परिवर्तन भी आगामी मौसमों में फैल सकते हैं। संवेदनशीलता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि 2024 के पिछले बड़े एल नीनो के बाद मूंगा भित्तियों को उबरने के लिए आवश्यक एक दशक नहीं मिला, और उष्णकटिबंधीय वनों के कई वृक्ष अपनी ताप-सहनशीलता की सीमा के निकट हैं; प्रशांत में विचलन अगस्त 2026 में +2.6°C और अनुमानित +4°C तक, जो मूंगा कोर आधारित पुनर्निर्माण के अनुसार 1,000 वर्षों में सर्वाधिक होगा। आगे का रास्ता वैज्ञानिकों के सुझाव में निहित है—नीति-निर्माताओं की तत्काल तैयारी, बदलावों का समय-समय पर दस्तावेजीकरण, दीर्घकालिक अध्ययन, विशेषज्ञों के साथ सहयोग, विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों पर प्रभावों का मापन और शेष पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण, क्योंकि "समय कम है"।

मुख्य शब्द

एल नीनो
भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के तापन व परिसंचरण बदलाव से हर 2-7 वर्ष में आने वाली वैश्विक मौसमी परिघटना।
ईएनएसओ
स्रोत में उल्लिखित परिघटना-चक्र, जिसकी अतीत की घटनाओं में मोरे ईल जैसी मछलियों की सामूहिक मृत्यु देखी गई।
मूंगा विरंजन (कोरल ब्लीचिंग)
अत्यधिक समुद्री तापन से मूंगा भित्तियों का क्षरण; बड़े विनाश के बाद सुधार में कम से कम एक दशक लगता है।
समुद्री लू (मरीन हीटवेव)
समुद्री तापमान की असामान्य वृद्धि की अवधि, जिसकी चेतावनी वैज्ञानिकों ने एल नीनो के प्रभाव के रूप में दी।
एनओएए
अमेरिका स्थित राष्ट्रीय समुद्री एवं वायुमंडलीय प्रशासन, जिसने 75% आशंका का पूर्वानुमान दिया।
मौसम उपसंभाग
वर्षा आकलन के लिए भारत के 36 मौसम-विज्ञान क्षेत्र; इनमें 18 कम बारिश से प्रभावित।

अभ्यास प्रश्न

  1. एल नीनो भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून और कृषि अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करता है? स्रोत में उल्लिखित तथ्यों के आधार पर परीक्षण करें।
  2. "एल नीनो के प्रभाव केवल वर्षा-कमी तक सीमित नहीं हैं"—समुद्री तथा वन पारिस्थितिक तंत्रों पर पड़ने वाले प्रभावों के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए।
  3. 200 से अधिक वैज्ञानिकों के 'कॉल टु एक्शन' में सुझाई गई तैयारियों और शोध प्राथमिकताओं का मूल्यांकन कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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