हिमालयी ग्लेशियर 65% तेज़ी से पिघल रहे, ब्लैक कार्बन जिम्मेदार: अध्ययन
एक नए अध्ययन के अनुसार हिमालयी ग्लेशियर एक दशक पहले की तुलना में 65% अधिक तेज़ी से द्रव्यमान खो रहे हैं और इस पिघलन का एक-तिहाई हिस्सा मुख्य रूप से ब्लैक कार्बन के कारण है, जो बड़े पैमाने पर मैदानी क्षेत्रों के ईंट भट्ठों से आता है। परामर्श संस्था सिस्टेमिक ने इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव, आईसीआईएमओडी और जीबी पंत संस्थान के सहयोग से किया अध्ययन कहता है कि 2100 तक हिंदूकुश हिमालय अपने वर्तमान ग्लेशियर आयतन का 80% तक खो सकता है। क्षेत्र के करीब 40,000 ग्लेशियरों में सिर्फ 21 की निगरानी हो रही है।
स्रोत
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- Himalayan glaciers are losing mass 65% faster than a decade ago — Attributed in the source to the new study; no underlying dataset cited.
- About one-third of Himalayan glacier melt is driven by black carbon, largely from brick kilns in the plains — Quoted directly from the report text in the source.
- Hindu Kush Himalayas could lose up to 80% of present glacier volume by 2100 — Figure appears in the source, attributed to the study's projections.
- Only about 21 of nearly 40,000 glaciers in the region are monitored, including 16-17 in India — Appears in source as report finding; source also expresses this as roughly 0.1%.
- A glacial collapse caused flash floods in Nepal killing at least 1,350 people with hundreds missing — Stated in the source without an attributed authority for the toll.
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
वैश्विक परामर्श संस्था सिस्टेमिक ने इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव के सहयोग से, और ICIMOD तथा जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के योगदान के साथ, हिमालयी क्षेत्र पर एक अध्ययन जारी किया है। रिपोर्ट कहती है कि हिमालयी ग्लेशियर एक दशक पहले की तुलना में 65% अधिक तेज़ी से द्रव्यमान खो रहे हैं और इसका एक-तिहाई हिस्सा ब्लैक कार्बन से जुड़ा है, जो मुख्यतः मैदानी इलाकों के ईंट भट्ठों से आता है। रिपोर्ट नेपाल में ग्लेशियर ढहने से आई जानलेवा फ्लैश फ्लड के कुछ सप्ताह बाद आई है, जिसमें कम से कम 1,350 लोगों की जान गई। यह क्षेत्र में निगरानी, पूर्व-चेतावनी और जोखिम-मानचित्रण की भारी कमी को भी रेखांकित करती है।
मुख्य तथ्य
- हिमालयी ग्लेशियर एक दशक पहले की तुलना में 65% अधिक तेज़ी से द्रव्यमान खो रहे हैं।
- कुल ग्लेशियर पिघलन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा ब्लैक कार्बन से प्रेरित है, जो बड़े पैमाने पर मैदानों के ईंट भट्ठों से आता है।
- मौजूदा प्रवृत्ति पर हिंदूकुश हिमालय 2100 तक अपने वर्तमान ग्लेशियर आयतन का 80% तक खो सकता है।
- हिंदूकुश हिमालयी क्षेत्र के अनुमानित करीब 40,000 ग्लेशियरों में से केवल लगभग 21 की निगरानी हो रही है — यानी लगभग 0.1%; इनमें भारत में 16-17 हैं।
- भारत की 18% भूमि हिमालयी है, लेकिन यह क्षेत्र देश की लगभग 35% आपदाओं का हिस्सा है और भारत के GDP में 20% से अधिक योगदान देता है।
- नेपाल में ग्लेशियर ढहने से आई फ्लैश फ्लड में कम से कम 1,350 लोगों की मौत हुई और कई सौ लोग अब भी लापता हैं।
- अधिकांश हिमालयी नदी घाटियाँ सदी के मध्य तक 'पीक वॉटर' पर पहुँचने की अपेक्षा है।
- रिपोर्ट में दस-गुना कार्य दृष्टिकोण सुझाया गया: सूट में कटौती, करीब 30 लाख हेक्टेयर आग-प्रवण वन का साल भर प्रबंधन, 30 लाख सूखते हिमालयी जलस्रोतों में से लगभग आधे की बहाली, और पर्यटकों की वहन क्षमता का प्रबंधन।
समयरेखा
- रिपोर्ट से कुछ सप्ताह पहलेनेपाल में ग्लेशियर ढहने से जानलेवा फ्लैश फ्लड; कम से कम 1,350 मौतें, सैकड़ों लापता।
- रिपोर्ट जारी होने पर (तारीख स्रोत में नहीं दी गई)सिस्टेमिक, इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव, ICIMOD और जीबी पंत संस्थान का अध्ययन प्रकाशित।
- सदी का मध्यअधिकांश हिमालयी नदी घाटियों में 'पीक वॉटर' तक पहुँचने का अनुमान।
- 2100हिंदूकुश हिमालय के वर्तमान ग्लेशियर आयतन का 80% तक खोने का जोखिम।
किसका दाँव
- हिमालयी क्षेत्र के समुदाय और डाउनस्ट्रीम आबादी — जटिल और श्रृंखलाबद्ध आपदाओं से जान, आजीविका और बुनियादी ढाँचे पर बढ़ता खतरा।
- भारत सरकार व हिमालयी राज्य — 18% भूभाग, 35% आपदाएँ और GDP में 20% से अधिक योगदान — विकास स्वीकृतियों से पहले जोखिम विज्ञान रखने की चुनौती।
- मैदानी क्षेत्रों के ईंट भट्ठे व उद्योग — ब्लैक कार्बन उत्सर्जन में कटौती की माँग, जो क्षेत्र के हाथ में उपलब्ध कुछ प्रत्यक्ष उपायों में से एक है।
- ICIMOD (महानिदेशक पेमा ग्यामत्शो) — सीमा-पार निगरानी, साझा जोखिम सूचना और पूर्व-चेतावनी प्रणालियों की पैरवी।
- सिस्टेमिक, इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव, जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान — अध्ययन के लेखक/सहयोगी; नीति-निर्माण के लिए साक्ष्य उपलब्ध कराना।
- नेपाल — ग्लेशियर ढहने से आई बाढ़ में 1,350 से अधिक मौतें; पुनर्निर्माण और पूर्व-चेतावनी की तत्काल आवश्यकता।
क्यों अहम है
हिमालय के ग्लेशियर एशिया की प्रमुख नदियों का स्रोत हैं; 'पीक वॉटर' के बाद मीठे पानी की उपलब्धता घटने लगेगी, जिससे कृषि, पेयजल और जलविद्युत प्रभावित होंगे। ब्लैक कार्बन एक ऐसा कारक है जिस पर भारत और क्षेत्र सीधे कार्रवाई कर सकते हैं, यानी वैश्विक तापन के इंतज़ार के बिना पिघलन धीमी करने का अवसर है। साथ ही 40,000 ग्लेशियरों में केवल 0.1% की निगरानी दर्शाती है कि आपदाओं का पूर्वानुमान लगाने की क्षमता अभी बहुत कमजोर है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- ब्लैक कार्बन हिमालयी ग्लेशियर पिघलन का लगभग एक-तिहाई कारण; मुख्य स्रोत मैदानों के ईंट भट्ठे।
- हिंदूकुश हिमालय 2100 तक वर्तमान ग्लेशियर आयतन का 80% तक खो सकता है (सिस्टेमिक अध्ययन)।
- ICIMOD = International Centre for Integrated Mountain Development; महानिदेशक पेमा ग्यामत्शो।
- जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान अध्ययन में योगदानकर्ता।
- करीब 40,000 हिमालयी ग्लेशियरों में केवल ~21 (0.1%) की निगरानी; भारत में 16-17।
- भारत का 18% भूभाग हिमालयी; 35% आपदाएँ; GDP में 20% से अधिक योगदान।
मेन्स दृष्टिकोण
हिमालयी क्रायोस्फीयर का संकट तीन स्तरों पर एक विकास-मॉडल के दबाव से उत्पन्न है: वैश्विक स्तर पर अन्यत्र पैदा हुआ तापन, क्षेत्रीय स्तर पर मैदानों से उठकर ग्लेशियरों पर जमने वाला ब्लैक कार्बन, और स्थानीय स्तर पर जोखिम-विज्ञान की अनदेखी करते हुए दी जाने वाली विकास स्वीकृतियाँ। परिणाम स्पष्ट हैं — ग्लेशियर 65% तेज़ पिघल रहे हैं, नेपाल जैसी फ्लैश फ्लड में 1,350 से अधिक मौतें, और सदी के मध्य तक 'पीक वॉटर' के बाद जल-सुरक्षा में गिरावट। नीतिगत चुनौती दोहरी है: पहला, शमन — ग्लेशियर से जुड़े एयरशेड में सूट/ब्लैक कार्बन में कटौती, जो क्षेत्र के प्रत्यक्ष नियंत्रण में है; दूसरा, अनुकूलन — निगरानी, पूर्व-चेतावनी और जोखिम-मानचित्रण प्रणालियों का निर्माण, क्योंकि 40,000 में से केवल 0.1% ग्लेशियरों की निगरानी और पर्माफ्रॉस्ट की अत्यल्प समझ आपदा-पूर्वानुमान को असंभव बनाती है। रिपोर्ट का दस-सूत्रीय मार्ग — 30 लाख हेक्टेयर आग-प्रवण वनों का प्रबंधन, सूखते जलस्रोतों की बहाली, पर्यटन वहन क्षमता, विकास स्वीकृति से पहले हजार्ड साइंस, और अवलोकन से सक्रिय जोखिम प्रबंधन की ओर बढ़ना — के साथ ICIMOD द्वारा सुझाया गया सीमा-पार समन्वय, साझा जोखिम सूचना और निजी क्षेत्र की भागीदारी आगे का व्यावहारिक रास्ता है।
मुख्य शब्द
- ब्लैक कार्बन
- अपूर्ण दहन से निकलने वाला कालिख कण, जो बर्फ पर जमकर सूर्य-ताप सोखता है और पिघलन तेज़ करता है।
- पीक वॉटर
- वह बिंदु जहाँ ग्लेशियर से मिलने वाला पिघला पानी अधिकतम हो जाता है, और फिर बर्फ-भंडार घटने के साथ कम होने लगता है।
- हिंदूकुश हिमालय (HKH)
- हिंदूकुश से हिमालय तक फैला पर्वतीय क्षेत्र जिसमें अनुमानित 40,000 ग्लेशियर हैं।
- ICIMOD
- इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट; हिंदूकुश हिमालय पर कार्यरत क्षेत्रीय संस्था।
- पर्माफ्रॉस्ट
- स्थायी रूप से जमी ज़मीन; रिपोर्ट के अनुसार अस्थिरता का एक अहम पर स्रोत जिसे अभी बहुत कम समझा गया है।
- एयरशेड
- वायु प्रदूषण के साझा संचरण वाला भौगोलिक क्षेत्र, जिसके स्तर पर सूट कटौती की सिफ़ारिश की गई है।
अभ्यास प्रश्न
- हिमालयी ग्लेशियरों के त्वरित पिघलन में ब्लैक कार्बन की भूमिका स्पष्ट करें। इसे नियंत्रित करना भारत के लिए वैश्विक तापन की तुलना में अधिक व्यावहारिक उपाय क्यों माना जा रहा है?
- 'पीक वॉटर' की अवधारणा समझाइए और हिमालयी नदी घाटियों में सदी के मध्य तक इसके पहुँचने के जल-सुरक्षा एवं कृषि संबंधी प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।
- हिंदूकुश हिमालय के 40,000 ग्लेशियरों में केवल 0.1% की निगरानी हो रही है। आपदा पूर्वानुमान और सीमा-पार सहयोग की दृष्टि से इस अंतर को कैसे भरा जा सकता है?
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
