बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका, महाराष्ट्र में एसआईआर पर रोक की मांग
बॉम्बे हाईकोर्ट की कोल्हापुर पीठ में दाखिल याचिका में निर्वाचन आयोग के 14 आदेश रद्द करने, महाराष्ट्र में एसआईआर प्रक्रिया रोकने और मतदाता सूची से हटाए गए नाम बहाल करने की मांग की गई है। महाराष्ट्र के चार निवासियों ने ईसीआई, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को प्रतिवादी बनाया है। याचिका के अनुसार दोनों आयुक्तों ने 10 महीनों में 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। आयोग ने जवाब दाखिल नहीं किया है।
स्रोत
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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- A petition before the Bombay High Court's Kolhapur Bench seeks quashing of 14 ECI orders, a stay on SIR in Maharashtra and restoration of deleted voter names. — Attributed to the petition as described in the source; court has not ruled.
- Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi recorded objections on 14 occasions in 10 months. — Petition relies on an Indian Express report dated September 23, 2026; not independently sourced in the text.
- Joshi warned of an error rate of over 4.2% in software-driven deletions and an audit flagged anomalies in over 13 crore names. — Figures appear in the source as petition claims; underlying documents not placed on record.
- The ECI press note of September 23, 2026 said the Commissioners' observations were part of deliberations and decisions were taken by the Commission. — Attributed to an official ECI press note cited in the source.
- The Election Commission has not filed a response to the petition. — Stated in the source; status may change.
विश्लेषकों की राय राय
यह याचिका कानूनी रूप में सामने आई है, लेकिन इसका असली वजन राजनीतिक है — चुनाव आयोग के भीतर से ही आपत्तियां दर्ज होने का दावा करते रिकॉर्ड, एसआईआर पर विपक्ष के पुराने आरोपों को एक संस्थागत आधार दे सकते हैं। याचिका चार आम निवासियों ने दाखिल की है, और कोल्हापुर बेंच में, जो इसे दलगत लड़ाई की जगह नागरिक अधिकारों की लड़ाई के रूप में पेश करने का रणनीतिक लाभ देता है। आयोग ने अदालत में अभी जवाब दाखिल नहीं किया है, इसलिए फिलहाल रिकॉर्ड पर एक ही पक्ष है।
- मतदाता नाम हटाए जाने का मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति में पहले से गरम है, और यह याचिका बहस को बयानबाजी से अदालत और सरकारी दस्तावेजों की तरफ ले जाने की कोशिश है।
- आयुक्तों के असहमति नोट रिकॉर्ड पर रखवाने की मांग सबसे निर्णायक है, क्योंकि खुलासा होने पर बहस आरोप से दस्तावेज़ के स्तर पर पहुंच जाएगी।
- याचिकाकर्ताओं का यह स्पष्ट कहना कि वे किसी चुनाव या किसी मतदाता सूची की सत्यता को चुनौती नहीं दे रहे, कानूनी और राजनीतिक दोनों रूप से सोचा-समझा रुख है।
- विधानसभा चुनाव रोकने की मांग अधिकतमवादी है, जिस पर अदालतें सामान्यतः संयम बरतती हैं — इसका महत्व राहत से ज़्यादा राजनीतिक संकेत में हो सकता है।
- आयोग ने 23 सितंबर की प्रेस नोट में भिन्न राय को निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताया, इसलिए राजनीतिक लड़ाई इसी पर होगी कि यह सामान्य आंतरिक चर्चा है या प्रक्रिया की अनदेखी।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि अदालत 14 आदेश और असहमति नोट रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश देती है या नहीं और आयोग कैसे जवाब देता है — इससे तय होगा कि यह कानूनी मामला रहेगा या राज्य का चुनावी मुद्दा बनेगा।
यह खबर केवल याचिका के दावे बताती है; इनमें से कुछ भी अदालत में परखा नहीं गया, आयोग का जवाब दाखिल नहीं हुआ, और किसी दल की भूमिका यहां स्थापित नहीं होती।
गहराई से
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पृष्ठभूमि
बॉम्बे हाईकोर्ट की कोल्हापुर पीठ में महाराष्ट्र के चार निवासियों ने याचिका दाखिल कर निर्वाचन आयोग के 14 आदेशों और बदलावों को रद्द करने की मांग की है। याचिका का आधार 23 सितंबर 2026 की एक इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट है, जिसके अनुसार निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में 14 बार मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने-बहाल करने, डेटाबेस और सॉफ्टवेयर प्रक्रियाओं पर आपत्तियां दर्ज कीं। याचिकाकर्ता कहते हैं कि वे किसी चुनाव या मतदाता सूची की शुद्धता को चुनौती नहीं दे रहे, बल्कि यह पूछ रहे हैं कि आयोग ने जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 18 की प्रक्रिया और पारदर्शिता की शर्तें पूरी कीं या नहीं। आयोग ने अभी जवाब दाखिल नहीं किया है।
मुख्य तथ्य
- याचिका में निर्वाचन आयोग के 14 आदेश/बदलाव रद्द करने, महाराष्ट्र में एसआईआर रोकने, हटाए गए नाम बहाल करने और उन राज्यों में विधानसभा चुनाव टालने की मांग है जहां इस प्रक्रिया से सूचियां बनीं।
- प्रतिवादी: ईसीआई, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, तथा राज्य निर्वाचन आयोग, महाराष्ट्र।
- चार याचिकाकर्ता: प्रथमेश गोपाल गवांकर, गौरव सूर्यकांत नखरेकर, आदेश शशिकांत भाटकर और स्मिताली निलेश नार्वेकर; अधिवक्ता असीम सरोदे व सहयोगी पैरवी कर रहे हैं।
- याचिका के अनुसार जुलाई 2026 में फॉर्म 6 में एक घोषणा-फील्ड जोड़ी गई, जबकि एक निर्वाचन आयुक्त ने लिखा था कि नियमों में संशोधन के बिना फॉर्म 6 नहीं बदला जा सकता; फाइल बैठक के बिना 'Approved by ECI' अंकित कर प्रेस भेजी गई।
- याचिका में विवेक जोशी की चेतावनी का हवाला—सॉफ्टवेयर-आधारित विलोपन में त्रुटि दर 4.2% से अधिक।
- एक ऑडिट में 13 करोड़ से अधिक नामों में विसंगतियां चिह्नित की गईं और रिपोर्ट सील करने का आदेश दिया गया, याचिका के अनुसार।
- जून 2026 के एक बदलाव से कोल्हापुर और सांगली सहित महाराष्ट्र के जिलों में इंटरनेट के जरिये मतदाता पहचान पत्र–आधार लिंकिंग रोक दी गई।
- याचिका में गोवा में 97 मतदाताओं को बहाल करने से इनकार, पश्चिम बंगाल के जिलों में संधू-जोशी को फाइल भेजे बिना विलोपन आदेश, और पैनल मंजूरी बिना एसआईआर सॉफ्टवेयर विक्रेता नामित करने का उल्लेख है।
समयरेखा
- जून 2026कोल्हापुर और सांगली सहित महाराष्ट्र के जिलों में इंटरनेट से मतदाता पहचान पत्र–आधार लिंकिंग रोकने वाला बदलाव।
- जुलाई 2026फॉर्म 6 में घोषणा-फील्ड जोड़ी गई; पैनल बैठक की मांग के बावजूद फाइल 'Approved by ECI' लिखकर प्रेस भेजी गई।
- 23 सितंबर 2026इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट प्रकाशित; याचिकाकर्ताओं ने आयोग व सीईसी को नोटिस भेजा; आयोग ने प्रेस नोट जारी किया।
- 24 सितंबर 2026इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में स्पष्टीकरण—भिन्न मत निर्णय-प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
- 25 सितंबर 2026याचिका से जुड़ी खबर प्रकाशित; आयोग ने अब तक जवाब दाखिल नहीं किया।
किसका दाँव
- भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) — एसआईआर और मतदाता सूची पुनरीक्षण के निर्णयों की वैधता व पारदर्शिता पर सवाल; अदालत में 14 आदेश और असहमति नोट रिकॉर्ड पर रखने की मांग।
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार — याचिका का आरोप कि उन्होंने आधिकारिक कर्तव्य निभाने में विफलता दिखाई; धारा 16 का संरक्षण लागू न होने की दलील।
- निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — 10 महीनों में 14 बार आपत्तियां दर्ज; मीडिया से बात करने पर रोक वाला परिपत्र और उनके हस्ताक्षर बिना अधिसूचना प्रकाशन याचिका के मुद्दे।
- महाराष्ट्र के मतदाता (चार याचिकाकर्ता सहित) — एसआईआर के दौरान सूची से हटाए गए नामों की बहाली और मतदान अधिकार।
- बॉम्बे हाईकोर्ट, कोल्हापुर पीठ — परमादेश जैसे रिट पर, एसआईआर सूचियों पर रोक और सेवानिवृत्त हाईकोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में जांच समिति की मांग पर निर्णय।
- राज्य निर्वाचन आयोग, महाराष्ट्र — याचिका में प्रतिवादी; राज्य स्तर पर सूची और प्रक्रिया से जुड़ी भूमिका।
क्यों अहम है
मतदाता सूची की शुद्धता और उसे बनाने की प्रक्रिया लोकतंत्र की बुनियाद है; याचिका का दावा है कि बहुमत की सहमति और पैनल बैठकों के बिना आदेश जारी हुए। यदि अदालत आदेश और असहमति नोट रिकॉर्ड पर लाती है, तो आयोग के भीतर निर्णय-प्रक्रिया और पारदर्शिता की परख होगी। मामला एसआईआर से बनी सूचियों के उपयोग और आगामी विधानसभा चुनावों के समय-निर्धारण को भी प्रभावित कर सकता है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट की कोल्हापुर पीठ में; प्रतिवादी—ईसीआई, सीईसी ज्ञानेश कुमार, ईसी सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी, राज्य निर्वाचन आयोग महाराष्ट्र।
- याचिका में परमादेश (writ of mandamus) या अन्य रिट के जरिये 14 आदेश रद्द करने की मांग।
- मुद्दा—क्या आयोग ने धारा 18 की प्रक्रिया का पालन किया; याचिका के अनुसार धारा 16 का संरक्षण धारा 18 को दरकिनार करने वाले कृत्यों पर लागू नहीं।
- फॉर्म 6 मतदाता पंजीकरण से जुड़ा फॉर्म; याचिका के अनुसार जुलाई 2026 में इसमें घोषणा-फील्ड जोड़ी गई।
- याचिकाकर्ता सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत रिकॉर्ड मांग रहे हैं।
- जोशी के अनुसार सॉफ्टवेयर-आधारित विलोपन में त्रुटि दर 4.2% से अधिक; ऑडिट में 13 करोड़ से अधिक नामों में विसंगतियां।
मेन्स दृष्टिकोण
महाराष्ट्र में एसआईआर के विरुद्ध कोल्हापुर पीठ की याचिका मतदाता सूची पुनरीक्षण की विषयवस्तु से अधिक उसकी प्रक्रिया पर केंद्रित है: याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे न किसी चुनाव को, न किसी सूची की शुद्धता को चुनौती दे रहे हैं, बल्कि यह पूछ रहे हैं कि क्या आयोग ने धारा 18 की प्रक्रिया और पारदर्शिता की अपेक्षाएं पूरी कीं। याचिका में गिनाए गए उदाहरण—पैनल बैठक के बिना फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाता डेटाबेस का नियंत्रण राज्य सर्वरों से नई दिल्ली की आईटी इकाई को हस्तांतरण, विलोपन को पलटने से अधिकारियों को रोकने वाला सॉफ्टवेयर, गोवा में 97 मतदाताओं की बहाली से इनकार, पश्चिम बंगाल में फाइल साझा किए बिना विलोपन आदेश, पैनल मंजूरी बिना विक्रेता नामांकन, मीडिया से बात रोकने वाला परिपत्र और दो आयुक्तों के हस्ताक्षर बिना 'By Order of the Commission' अधिसूचना—बहु-सदस्यीय संस्था में सामूहिक निर्णय के प्रश्न उठाते हैं। दूसरी ओर, आयोग के 23 सितंबर 2026 के प्रेस नोट का रुख है कि आयुक्तों की टिप्पणियां विचार-विमर्श का हिस्सा थीं और एसआireR सहित सूची पुनरीक्षण के निर्णय आयोग ने लिए; 24 सितंबर की रिपोर्ट में भी भिन्न मत को निर्णय-प्रक्रिया का अंग बताया गया। आगे की राह के रूप में याचिका ही सुझाव देती है—14 आदेश और असहमति नोट अदालत के रिकॉर्ड पर रखना, हटाए गए मतदाताओं की बहाली, बहुमत द्वारा सूचियों की स्वीकृति तक चुनाव रोकना और सेवानिवृत्त हाईकोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में जांच समिति; आयोग का जवाब अभी दाखिल नहीं हुआ है, इसलिए निष्कर्ष अदालत पर निर्भर है।
मुख्य शब्द
- एसआईआर
- मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण; याचिका में इससे बनी सूचियों के उपयोग व प्रकाशन पर रोक मांगी गई है।
- धारा 18
- याचिका के अनुसार वह प्रावधान जिसकी प्रक्रिया आयोग को मतदाता सूची संबंधी निर्णयों में पालन करनी थी।
- धारा 16
- अधिनियम का वह प्रावधान जिसके संरक्षण का दावा किया जा सकता है; याचिका कहती है यह धारा 18 को दरकिनार करने वाले कृत्यों पर लागू नहीं।
- परमादेश (Writ of Mandamus)
- वह रिट जिससे अदालत किसी प्राधिकारी को कर्तव्य निभाने का निर्देश देती है; याचिका में 14 आदेश रद्द करने के लिए मांगी गई।
- फॉर्म 6
- मतदाता पंजीकरण से जुड़ा फॉर्म; याचिका के अनुसार जुलाई 2026 में इसमें नियम-संशोधन बिना घोषणा-फील्ड जोड़ी गई।
- असहमति नोट (Dissent Notes)
- संधू और जोशी द्वारा दर्ज आपत्तियां, जिन्हें अदालत के रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश याचिका में मांगा गया है।
अभ्यास प्रश्न
- बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग में सामूहिक निर्णय और असहमति के दस्तावेजीकरण का क्या महत्व है? महाराष्ट्र एसआईआर याचिका के संदर्भ में परीक्षण करें।
- मतदाता सूची पुनरीक्षण में सॉफ्टवेयर और केंद्रीकृत डेटाबेस के उपयोग से उठने वाले पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रश्नों पर चर्चा करें।
- क्या न्यायालय चुनाव-पूर्व प्रक्रियागत मुद्दों में हस्तक्षेप कर सकते हैं? याचिका के इस दावे के आलोक में विश्लेषण करें कि वह किसी चुनाव या सूची की शुद्धता को चुनौती नहीं दे रही।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
