सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्ष लाएगा प्रस्ताव
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्ष जल्द ही संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव लाएगा, कांग्रेस सूत्रों ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया। एक्सप्रेस की जांच के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में एसआईआर से जुड़े सवाल कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर उठाए। आयोग ने इन नोट्स को निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताया। 12 मार्च को 130 और 63 सांसदों के हस्ताक्षर वाले नोटिस अप्रैल में खारिज हुए थे।
स्रोत
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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- Opposition will soon move a motion in both Houses to remove CEC Gyanesh Kumar. — Attributed only to unnamed Congress sources speaking to The Indian Express; no official confirmation in source.
- Questions on SIR-related issues were raised on record at least 14 times in 10 months within the three-member EC by Commissioners Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi. — Attributed to an investigation by The Indian Express; figure appears in source, not independently verifiable here.
- The Election Commission acknowledged the notes but called them part of its decision-making process and standard practice. — Attributed to an ECI press note signed by Deputy Director P Pawan; quoted directly in source.
- The March 12 notices carried 130 Lok Sabha and 63 Rajya Sabha signatures, against thresholds of 100 and 50. — Figures appear in source; thresholds stated without citation of specific rule text.
- Rajya Sabha Chairman C P Radhakrishnan rejected the earlier notice on April 6, citing no prima facie case of misbehaviour under Articles 324(5) and 124(4). — Attributed to a dated order quoted in the source.
विश्लेषकों की राय राय
संख्या के गणित में इस प्रस्ताव के पारित होने की संभावना लगभग शून्य है — हटाने की प्रक्रिया के लिए जरूरी बहुमत विपक्ष के पास नहीं है। लेकिन मकसद जीतना नहीं है: मकसद एसआईआर पर बहस को संसद के रिकॉर्ड पर लाना और मतदाता सूची के सवाल को चुनावी मुद्दा बनाना है। इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में सामने आया कि कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्तियां उठीं — इससे विपक्ष यह तर्क दे सकता है कि यह सिर्फ राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि आयोग के भीतर से उठे सवाल हैं।
- अप्रैल में खारिज हुए नोटिसों पर 130 और 63 सांसदों के हस्ताक्षर थे, यानी न्यूनतम सीमा से ऊपर — असली अड़चन संख्या नहीं, पीठासीन अधिकारियों की स्वीकृति है।
- राज्यसभा सभापति का यह तर्क कि "प्रशासनिक मतभेद" हटाने का आधार नहीं बन सकते, अब विपक्ष की सबसे बड़ी बाधा है; इसीलिए कांग्रेस सूत्र कानूनी विशेषज्ञों के साथ मसौदा तैयार करने पर जोर दे रहे हैं।
- पहले तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई में चली पहल अब कांग्रेस सूत्रों के जरिये "संयुक्त विपक्ष" के नाम पर आना इंडिया गठबंधन की एकता दिखाने की कोशिश लगती है।
- सत्ता पक्ष इसे चुनाव संस्था को राजनीति में घसीटने की कोशिश बता सकता है, और सभापति की आयोग की स्वतंत्रता संबंधी चेतावनी उसका सबसे मजबूत आधार है।
- आयोग ने नोट्स को नकारा नहीं, बल्कि "निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा" बताया — संस्थागत रूप से यह सामान्य है, पर आपत्तियों का समाधान कैसे हुआ, यह न बताना राजनीतिक सवाल को जिंदा रखता है।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि नोटिस वाकई दाखिल होता है या नहीं, इस बार पीठासीन अधिकारी किस आधार पर प्रतिक्रिया देते हैं, और इंडिया गठबंधन के सभी दल हस्ताक्षर करते हैं या नहीं।
यह खबर यह साबित नहीं करती कि प्रस्ताव अंतिम रूप ले चुका है या स्वीकार होगा, और न ही यह स्वतंत्र रूप से तय करती है कि आयुक्तों की आपत्तियां किसी गड़बड़ी की ओर इशारा करती हैं या सामान्य आंतरिक विचार-विमर्श थीं।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 5 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए विपक्ष संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। यह कदम द इंडियन एक्सप्रेस की उस जांच के बाद आया है जिसके मुताबिक तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर एसआईआर (मतदाता सूची पुनरीक्षण) से जुड़े मुद्दों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने बीते 10 महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर सवाल उठाए। इससे पहले मार्च 2025 में तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई में दिए गए हटाने के नोटिस अप्रैल में राज्यसभा सभापति और लोकसभा अध्यक्ष द्वारा खारिज कर दिए गए थे। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत सीईसी को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया जैसी ही है।
मुख्य तथ्य
- कांग्रेस सूत्रों के अनुसार विपक्ष संयुक्त रूप से दोनों सदनों में सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव लाएगा; प्रस्ताव कानूनी विशेषज्ञों के साथ तैयार किया जा रहा है।
- द इंडियन एक्सप्रेस की जांच: तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर एसआईआर से जुड़े मुद्दों पर पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर सवाल उठाए गए।
- आपत्तियां चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने उठाईं, जिनमें चुनावी फॉर्मों में बदलाव और मतदाता सूची पुनरीक्षण से जुड़े दस्तावेज़ों व डेटा के प्रबंधन के मुद्दे शामिल थे।
- चुनाव आयोग ने बुधवार को उपनिदेशक पी पवन द्वारा हस्ताक्षरित प्रेस नोट में इन नोट्स को स्वीकारा, पर उन्हें 'निर्णय लेने की प्रक्रिया' का हिस्सा बताया।
- आयोग ने कहा कि लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक चेक-एंड-बैलेंस 'मानक, सतत प्रथाएं' हैं; पर उसने आयुक्तों की चिंताओं का जवाब नहीं दिया।
- 12 मार्च को तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई में दिए गए नोटिस पर लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सांसदों के हस्ताक्षर थे।
- महाभियोग प्रस्ताव के लिए लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक हैं।
- 6 अप्रैल के आदेश में राज्यसभा सभापति सी पी राधाकृष्णन ने नोटिस खारिज करते हुए कहा कि अनुच्छेद 324(5) और 124(4) के तहत 'दुर्व्यवहार' का प्रथम दृष्टया मामला स्थापित नहीं होता।
समयरेखा
- पिछले 10 महीने (जांच की अवधि)चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने एसआईआर से जुड़े मुद्दों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर सवाल उठाए।
- 12 मार्चतृणमूल कांग्रेस की अगुवाई में विपक्षी दलों ने दोनों सदनों में सीईसी को हटाने के नोटिस सौंपे—लोकसभा में 130, राज्यसभा में 63 हस्ताक्षर।
- 6 अप्रैलराज्यसभा सभापति सी पी राधाकृष्णन ने आदेश जारी कर नोटिस खारिज किया; अप्रैल में लोकसभा अध्यक्ष ने भी प्रस्ताव अस्वीकार किया।
- बुधवार (एक्सप्रेस जांच के बाद)चुनाव आयोग ने प्रेस नोट जारी कर आंतरिक नोट्स की पुष्टि की, उन्हें निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताया।
- आगामी (तारीख स्रोत में नहीं)विपक्ष संयुक्त रूप से दोनों सदनों में नया हटाने का प्रस्ताव/नोटिस देने की तैयारी में।
किसका दाँव
- मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार — उनके विरुद्ध हटाने का प्रस्ताव लाया जा रहा है; उनकी नियुक्ति के बाद आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल उठाए गए।
- चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — उन्होंने एसआईआर, चुनावी फॉर्मों और मतदाता सूची डेटा पर रिकॉर्ड पर आपत्तियां दर्ज कीं।
- भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) — संस्थागत विश्वसनीयता और आंतरिक मतभेदों को लेकर पारदर्शिता का सवाल; आयोग ने इन्हें सामान्य विचार-विमर्श बताया।
- कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस सहित विपक्षी दल — संयुक्त प्रस्ताव के जरिये एसआईआर और आयोग की निष्पक्षता पर राजनीतिक व संवैधानिक जवाबदेही मांग रहे हैं।
- राज्यसभा सभापति सी पी राधाकृष्णन और लोकसभा अध्यक्ष — हटाने के नोटिस स्वीकार या खारिज करने का अधिकार; पहले नोटिस अप्रैल में खारिज किए गए।
- मतदाता — मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) और मशीन-पठनीय मतदाता सूचियों के प्रबंधन का सीधा असर मताधिकार पर।
क्यों अहम है
चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के भीतर रिकॉर्ड पर दर्ज मतभेद और उसके बाद सीईसी को हटाने की कोशिश, चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और संस्थागत जवाबदेही से जुड़ा गंभीर सवाल खड़ा करती है। एसआईआर के तहत मतदाता सूची पुनरीक्षण का सीधा असर करोड़ों मतदाताओं के नाम सूची में बने रहने पर पड़ता है। साथ ही यह मामला दिखाता है कि सीईसी को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया कितनी कठिन है और उसमें पीठासीन अधिकारियों की भूमिका निर्णायक है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- सीईसी को हटाने की प्रक्रिया अनुच्छेद 324(5) में, और उसमें संदर्भित न्यायाधीश हटाने की प्रक्रिया अनुच्छेद 124(4) में है।
- महाभियोग/हटाने के प्रस्ताव के नोटिस के लिए लोकसभा में न्यूनतम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक।
- 12 मार्च के नोटिस: लोकसभा में 130 सांसद, राज्यसभा में 63 सांसद; तृणमूल कांग्रेस ने नेतृत्व किया।
- राज्यसभा सभापति सी पी राधाकृष्णन ने 6 अप्रैल के आदेश से नोटिस खारिज किया—'दुर्व्यवहार' का प्रथम दृष्टया मामला नहीं।
- भारत निर्वाचन आयोग तीन सदस्यीय निकाय: सीईसी ज्ञानेश कुमार तथा आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी।
- एक्सप्रेस जांच: 10 महीनों में एसआईआर से जुड़े मुद्दों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर सवाल।
मेन्स दृष्टिकोण
यह प्रकरण भारत में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, आंतरिक बहुलता और जवाबदेही के बीच संतुलन का प्रश्न उठाता है। एक ओर द इंडियन एक्सप्रेस की जांच बताती है कि तीन सदस्यीय आयोग में दोनों चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने एसआईआर, चुनावी फॉर्मों में बदलाव और मतदाता सूची के दस्तावेज़ों व डेटा के प्रबंधन पर 10 महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्तियां दर्ज कीं; दूसरी ओर आयोग इन्हें 'निर्णय लेने की प्रक्रिया' और 'मानक, सतत प्रथाओं' का हिस्सा बताते हुए उठाई गई चिंताओं पर मौन है कि उनका समाधान कैसे हुआ। विपक्ष इसे संस्थागत निष्पक्षता के क्षरण के रूप में पेश कर अनुच्छेद 324(5)/124(4) के तहत हटाने का प्रस्ताव लाने की तैयारी में है, जबकि राज्यसभा सभापति का 6 अप्रैल का आदेश यह चेतावनी देता है कि 'प्रशासनिक असहमति या राजनीतिक धारणा' के आधार पर ऐसे प्रस्ताव स्वीकारना स्वयं आयोग की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है। आगे का रास्ता आयोग द्वारा आंतरिक असहमतियों और उनके निपटारे पर पारदर्शी स्पष्टीकरण, एसआईआर प्रक्रिया की तकनीकी शुद्धता पर सार्वजनिक भरोसा बनाने और संसदीय-न्यायिक मंचों पर तथ्य-आधारित बहस में निहित दिखता है।
मुख्य शब्द
- एसआईआर
- मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़ी प्रक्रिया, जिसके राष्ट्रव्यापी विस्तार और दस्तावेज़/डेटा प्रबंधन पर आयोग के भीतर सवाल उठे।
- अनुच्छेद 324(5)
- संविधान का वह प्रावधान जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया तय है।
- अनुच्छेद 124(4)
- सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को 'सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता' पर हटाने की प्रक्रिया; सीईसी के मामले में भी संदर्भित।
- प्रथम दृष्टया मामला
- आरोपों में पहली नज़र में पर्याप्त आधार होना; सभापति ने कहा कि 'दुर्व्यवहार' का ऐसा मामला नहीं बना।
- मशीन-पठनीय मतदाता सूची
- डिजिटल रूप में पढ़ी जा सकने वाली मतदाता सूची, जिसके प्रबंधन का मुद्दा पहले के नोटिस में उठाया गया था।
- भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई)
- चुनाव कराने वाला संवैधानिक निकाय; वर्तमान में सीईसी और दो चुनाव आयुक्तों वाला तीन सदस्यीय निकाय।
अभ्यास प्रश्न
- मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है और यह चुनाव आयोग की स्वतंत्रता की रक्षा किस प्रकार करती है? हाल के प्रकरण के आलोक में परीक्षण करें।
- चुनाव आयोग जैसे बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय में आंतरिक असहमति को 'निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा' मानना कहाँ तक उचित है? पारदर्शिता और संस्थागत विश्वसनीयता के दृष्टिकोण से चर्चा करें।
- मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़ी प्रक्रियात्मक आपत्तियां मतदाताओं के अधिकारों और चुनावी विश्वसनीयता पर क्या प्रभाव डाल सकती हैं?
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
