ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में नई दिल्ली घोषणापत्र सर्वसम्मति से स्वीकृत
18वें ब्रिक्स नेताओं के शिखर सम्मेलन में नई दिल्ली घोषणापत्र सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया, जबकि आशंका थी कि ईरान-यूएई तनाव सहमति रोक देगा। सभी 11 सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व रहा; शी जिनपिंग, व्लादिमीर पुतिन और सिरिल रामाफोसा शामिल हुए, ब्राज़ील व सऊदी अरब ने विदेश मंत्री भेजे। 140 सूत्री दस्तावेज़ में सुधारित बहुपक्षवाद, परमाणु निरस्त्रीकरण, गाज़ा में मानवीय पहुंच और अक्टूबर 2025 संघर्षविराम बनाए रखने की बात कही गई; पश्चिम एशिया संबंधी भाषा में किसी पक्ष का नाम नहीं।
स्रोत
Observer Research Foundation (ORF) · मूल ख़बर पढ़ें ↗
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- The 18th BRICS Leaders' Summit adopted the New Delhi Declaration unanimously. — Stated repeatedly in the source article; no external document cited.
- All 11 BRICS members were represented, though not all by heads of state or government. — Figure appears in source, with member-wise representation listed.
- Xi Jinping's visit was his first to India in seven years, since the 2019 Mamallapuram informal summit. — Asserted by the authors; no source given.
- Iranian President Pezeshkian met Abu Dhabi Crown Prince Sheikh Khaled bin Mohamed bin Zayed Al Nahyan, the highest-level Iran-UAE engagement since the conflict began in early 2026. — Attributed to the authors' assessment; unverified externally.
- The 140-point declaration covers peace and security, reformed multilateralism, nuclear disarmament and the Palestinian cause without naming any warring party. — Described in detail in the source; wording of the declaration not independently quoted.
विश्लेषकों की राय राय
नई दिल्ली घोषणापत्र की सर्वसम्मत स्वीकृति की असली कहानी दस्तावेज़ में नहीं, शिखर सम्मेलन के हाशिये पर हुई द्विपक्षीय कूटनीति में है। मई की विदेश मंत्रियों की बैठक संयुक्त बयान तक न पहुँच पाने के बाद, ईरान-यूएई तनाव के बीच 11 सदस्यों को 140 बिंदुओं के दस्तावेज़ पर सहमत कराना समूह और भारत की अध्यक्षता — दोनों के लिए कूटनीतिक उपलब्धि है। लेकिन यह सहमति एक कीमत पर आई: पश्चिम एशिया पर भाषा किसी पक्ष का नाम नहीं लेती और व्यापक सिद्धांतों तक सीमित रही।
- पश्चिम एशिया पर किसी का नाम न लेना ब्रिक्स की पुरानी परंपरा के अनुरूप है — यह कमज़ोरी से अधिक एक ढाँचागत समझौता है जो विस्तारित और वैचारिक रूप से भिन्न समूह को जोड़े रखता है।
- सात साल बाद शी जिनपिंग का भारतीय ज़मीन पर आना और यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पुतिन का रूस से बाहर पहला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन — ये संकेत दस्तावेज़ के किसी भी पैराग्राफ से अधिक सामरिक अर्थ रखते हैं।
- राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान और अबू धाबी के युवराज ख़ालिद बिन मोहम्मद की भेंट, जो 2026 की शुरुआत में संघर्ष छिड़ने के बाद उच्चतम स्तरीय ईरान-यूएई संपर्क बताई गई, दिखाती है कि ब्रिक्स तनाव घटाने के लिए एक तटस्थ मंच बन सकता है।
- यूएनएससी की मंज़ूरी के बिना लगे एकपक्षीय प्रतिबंधों की निंदा और वैश्विक व्यापार व ऊर्जा प्रवाह की निर्बाधता पर ज़ोर, पश्चिमी आर्थिक दबाव के औज़ारों को लेकर समूह की साझा असहजता दर्शाता है।
- 2027 में चीन की अध्यक्षता के साथ असली परीक्षा यह होगी कि भारत द्वारा गढ़ा गया 'सिद्धांत-आधारित सहमति' का यह ढाँचा किस हद तक टिकता है।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि दिल्ली में खुला ईरान-यूएई संवाद शिखर सम्मेलन के बाद जारी रहता है या नहीं, और अक्टूबर 2025 के युद्धविराम व ग़ाज़ा में मानवीय पहुँच पर ब्रिक्स की अपील ज़मीनी स्तर पर कोई असर दिखाती है या नहीं।
यह रिपोर्ट यह स्थापित नहीं करती कि सहमति किन समझौतों की कीमत पर बनी, किस सदस्य ने कहाँ पीछे हटा, या घोषणापत्र की सुरक्षा प्रतिबद्धताएँ व्यवहार में लागू होंगी या नहीं।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 7 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
18वां ब्रिक्स नेताओं का शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में सम्पन्न हुआ, जिसमें "नई दिल्ली घोषणापत्र" सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। 2026 की शुरुआत से ब्रिक्स के दो नए सदस्यों — ईरान और यूएई — के बीच तनाव के कारण आशंका थी कि घोषणापत्र के कई अनुच्छेदों पर सहमति नहीं बन पाएगी। मई में विदेश मंत्रियों की बैठक संयुक्त बयान जारी करने में विफल रही थी, जिससे ब्रिक्स की सदस्यों के बीच तनाव संभालने की क्षमता पर सवाल उठे थे। भारत की अध्यक्षता में हुए इस सम्मेलन में सभी 11 सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व रहा और 140 सूत्री दस्तावेज़ स्वीकृत हुआ।
मुख्य तथ्य
- 18वें ब्रिक्स नेताओं के शिखर सम्मेलन में 140 सूत्री नई दिल्ली घोषणापत्र सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया।
- सम्मेलन में सभी 11 ब्रिक्स सदस्यों तथा अन्य भागीदार देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए, हालांकि सभी राष्ट्राध्यक्ष/शासनाध्यक्ष स्तर पर नहीं थे।
- चीन, रूस और दक्षिण अफ्रीका का प्रतिनिधित्व राष्ट्रपति शी जिनपिंग, व्लादिमीर पुतिन और सिरिल रामाफोसा ने किया; ब्राज़ील व सऊदी अरब ने विदेश मंत्री भेजे।
- यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यह पुतिन का रूस के बाहर पहला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन था।
- शी जिनपिंग की यह सात वर्षों में पहली भारत यात्रा थी — 2019 के ममल्लापुरम अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के बाद पहली।
- यूएई का प्रतिनिधित्व अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालेद बिन मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान ने किया; मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया और ईरान राष्ट्राध्यक्ष/शासनाध्यक्ष स्तर पर उपस्थित रहे।
- घोषणापत्र ने गाज़ा में मानवीय पहुंच तथा अक्टूबर 2025 के संघर्षविराम को बनाए रखने का आह्वान किया और इज़रायल से लेबनानी क्षेत्र से कब्ज़ा हटाने को कहा।
- घोषणापत्र में गैर-संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद-अधिकृत प्रतिबंधों सहित एकपक्षीय दबावकारी उपायों की निंदा की गई; ब्रिक्स की 20वीं वर्षगांठ भी चिह्नित हुई।
समयरेखा
- 2019ममल्लापुरम में मोदी-शी अनौपचारिक शिखर सम्मेलन; शी की भारत की अंतिम यात्रा।
- 2020गलवान झड़प, जिससे भारत-चीन संबंध जम गए।
- अक्टूबर 2025गाज़ा संबंधी संघर्षविराम, जिसे बनाए रखने का आह्वान नई दिल्ली घोषणापत्र में किया गया।
- 2026 की शुरुआतईरान-यूएई संघर्ष शुरू; ब्रिक्स में सहमति पर संकट की आशंका।
- मईब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक संयुक्त बयान जारी करने में विफल।
- हाल ही में18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन; नई दिल्ली घोषणापत्र सर्वसम्मति से स्वीकृत; ईरानी राष्ट्रपति और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस की इतर बैठक।
- 2027चीन अगले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता करेगा।
किसका दाँव
- भारत (अध्यक्ष एवं मेज़बान) — सर्वसम्मति जुटाना कूटनीतिक सफलता; लचीलापन, नवाचार, सहयोग व सततता उसकी अध्यक्षता के विषय-स्तंभ रहे।
- ईरान और यूएई — 2026 की शुरुआत के संघर्ष के बाद सर्वोच्च स्तरीय संपर्क; तनाव कम करने, स्थिरता और क्षेत्रीय शांति पर बात।
- चीन — शी की सात वर्ष बाद भारत यात्रा; 2027 में अगले शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता।
- रूस — यूक्रेन युद्ध के बाद पुतिन की रूस के बाहर पहली ब्रिक्स उपस्थिति; भारत के साथ रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष पर द्विपक्षीय वार्ता।
- ब्रिक्स समूह (11 सदस्य) — विस्तार के बाद विरोधी रुख वाले सदस्यों के बीच भू-राजनीतिक जटिलता संभालने की क्षमता की परीक्षा।
- संयुक्त राष्ट्र / महासचिव एंटोनियो गुटेरेस — घोषणापत्र में यूएन की केंद्रीयता की पुष्टि; गुटेरेस के साथ मोदी की बैठक।
- फ़िलिस्तीन, गाज़ा व लेबनान — संघर्षविराम बनाए रखने, मानवीय पहुंच और लेबनानी क्षेत्र से कब्ज़ा हटाने की मांग।
क्यों अहम है
खंडित और संघर्षग्रस्त वैश्विक माहौल में 11 सदस्यों वाले विस्तारित ब्रिक्स का सर्वसम्मत घोषणापत्र दिखाता है कि विस्तार से समूह की भू-राजनीतिक जटिलता संभालने की क्षमता कम नहीं हुई। मेज़बान भारत के लिए यह कूटनीतिक सफलता है, विशेषकर मई में विदेश मंत्रियों की बैठक के विफल रहने के बाद। साथ ही भाषा के पतले पड़ने पर सवाल बने हुए हैं, क्योंकि पाठ में किसी युद्धरत पक्ष या संघर्ष का नाम नहीं लिया गया।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- 18वां ब्रिक्स नेताओं का शिखर सम्मेलन: नई दिल्ली घोषणापत्र, 140 सूत्र, सर्वसम्मति से स्वीकृत।
- ब्रिक्स के अब 11 सदस्य; नए सदस्यों में मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई का उल्लेख।
- भारत की अध्यक्षता के विषय-स्तंभ: लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सततता।
- 2027 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता चीन करेगा; सम्मेलन ने ब्रिक्स की 20वीं वर्षगांठ चिह्नित की।
- घोषणापत्र: सुधारित बहुपक्षवाद, बहुध्रुवीयता, यूएन की केंद्रीयता, परमाणु निरस्त्रीकरण व अप्रसार।
- 2019 ममल्लापुरम अनौपचारिक शिखर सम्मेलन और 2020 गलवान झड़प — भारत-चीन संबंधों के संदर्भ बिंदु।
मेन्स दृष्टिकोण
विस्तार के बाद ब्रिक्स की मुख्य चुनौती यह है कि सामान्यत: भिन्न मानक-मूल्यों वाले और कभी-कभी परस्पर विरोधी सदस्य — जैसे 2026 की शुरुआत से संघर्षरत ईरान और यूएई — अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर एक साझा रुख कैसे बनाएं। मई में विदेश मंत्रियों की बैठक का संयुक्त बयान के बिना समाप्त होना इस सीमा का संकेत था, पर नई दिल्ली में 140 सूत्री घोषणापत्र सर्वसम्मति से स्वीकृत हुआ, जिसे समांतर द्विपक्षीय और बैकचैनल कूटनीति ने संभव बनाया — मोदी-पुतिन, मोदी-पेज़ेश्कियान, मोदी-क्राउन प्रिंस वार्ताएं और इतर बैठक में ईरान-यूएई नेतृत्व का संपर्क। समूह ने हर भू-राजनीतिक प्रश्न पर एकरूपता की मांग के बजाय व्यापक सिद्धांतों — एकपक्षीय दबावकारी उपायों का विरोध, निवारक कूटनीति और मध्यस्थता, क्षेत्रीय संगठनों की भूमिका, परमाणु निरस्त्रीकरण, गाज़ा में मानवीय पहुंच और अक्टूबर 2025 संघर्षविराम — पर अपनी स्थिति टिकाई। इसका प्रतिफल पतली भाषा है: पश्चिम एशिया संबंधी अनुच्छेदों में किसी पक्ष का नाम नहीं, जो पिछले ब्रिक्स घोषणापत्रों की परंपरा के अनुरूप है। आगे का रास्ता, स्रोत के अनुसार, साझा हित के क्षेत्रों में साझा ढांचों के ज़रिये मुद्दा-आधारित सहयोग गहरा करना है।
मुख्य शब्द
- नई दिल्ली घोषणापत्र
- 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सर्वसम्मति से स्वीकृत 140 सूत्री दस्तावेज़।
- सुधारित बहुपक्षवाद
- वैश्विक शासन में सुधार, बहुध्रुवीयता और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में यूएन की केंद्रीयता बनाए रखने की ब्रिक्स मांग।
- एकपक्षीय दबावकारी उपाय
- अंतरराष्ट्रीय कानून के विपरीत, यूएन सुरक्षा परिषद से अनधिकृत प्रतिबंध, जिनकी घोषणापत्र में निंदा की गई।
- निवारक कूटनीति व मध्यस्थता
- संबंधित पक्षों की सहमति से विवादों के बढ़ने से पहले उन्हें रोकने के कूटनीतिक प्रयास।
- अक्टूबर 2025 संघर्षविराम
- गाज़ा से जुड़ा संघर्षविराम, जिसे बनाए रखने और मानवीय पहुंच देने का आह्वान घोषणापत्र में है।
- ओआरएफ (ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन)
- थिंक टैंक, जिसके शोधकर्ता हीना मखीजा और सांद्रा थाचिरिक्कल प्रताप इस विश्लेषण के लेखक हैं।
अभ्यास प्रश्न
- ब्रिक्स के विस्तार ने अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा पर सर्वसम्मति बनाने की उसकी क्षमता को कैसे प्रभावित किया है? नई दिल्ली घोषणापत्र के आलोक में परीक्षण करें।
- "ब्रिक्स जैसे शिथिल संस्थाबद्ध, सर्वसम्मति-आधारित समूहों में द्विपक्षीय कूटनीति ही बहुपक्षीय परिणामों का इंजन होती है।" 18वें शिखर सम्मेलन के उदाहरणों से इस कथन का मूल्यांकन करें।
- पश्चिम एशिया पर किसी पक्ष का नाम न लेने वाली घोषणापत्र की भाषा — कूटनीतिक व्यावहारिकता या प्रभावहीन पतलापन? चर्चा करें।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।