राष्ट्रीय गीत तय करना अदालतों का काम नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को धार्मिक आस्था या अंतरात्मा की आवाज के कारण राष्ट्रीय गीत न गाने पर दंडात्मक परिणामों की वैधता जांचने पर सहमति दी, लेकिन 'वंदे मातरम्' में दो या छह छंद हों, यह तय करने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि राष्ट्रीय गीत क्या होगा, यह अदालतें तय नहीं कर सकतीं। सीजेआई सूर्यकांत तथा जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी मोहना की पीठ ने कर्नाटक गायक टी एम कृष्णा की याचिका पर केंद्र से दो हफ्ते में जवाब मांगा। संशोधित कानून में गीत के गायन में बाधा डालने पर तीन साल तक की जेल का प्रावधान है।

स्रोत

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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • SC agreed to examine penal consequences for not singing the national song on grounds of religious belief or conscientious objection. — Attributed in source to a bench of CJI Surya Kant and Justices Joymalya Bagchi and V Mohana; figure appears in source.
  • The court declined to decide whether 'Vande Mataram' should have two or six stanzas, leaving it to Parliament. — Supported by direct quotes from the bench in the source.
  • The amended law prescribes up to three years in jail for disrupting or preventing rendition of the song. — Figure appears in source; no statute section cited.
  • The 1986 Bijoe Emmanuel vs Kerala judgment remains the law of the land and was never challenged. — Stated by the bench as per the source; internally consistent.
  • Solicitor General Tushar Mehta said the petition sought sensationalism and referred to 'diktat of Naxalite ideas'. — Attributed to Mehta during the hearing as reported in the source.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को राजनीतिक रूप से बहुत सधे हुए ढंग से दो हिस्सों में बाँट दिया — राष्ट्रीय गीत क्या हो और उसमें दो या छह चरण हों, यह प्रतीकात्मक सवाल संसद के विवेक पर छोड़ दिया, और सिर्फ न गाने पर दंडात्मक परिणामों की वैधता जाँचने पर सहमति दी। इससे प्रतीक के मोर्चे पर सरकार को झटका नहीं लगा, लेकिन दंड के प्रावधान पर न्यायिक दबाव बना हुआ है। नतीजतन दोनों पक्ष आदेश के अपने-अपने अनुकूल हिस्से का दावा कर सकते हैं।

  • राष्ट्रीय गीत के चयन में हस्तक्षेप से इनकार करके पीठ ने इस तर्क को मजबूती दी कि यह फैसला लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार का है — केंद्र के लिए राजनीतिक रूप से अनुकूल संकेत।
  • दूसरी ओर, 1986 के बिजो इमैनुएल फैसले को आज भी देश का कानून बताना अनुच्छेद 25 और अंतरात्मा की आवाज़ के आधार पर लड़ने वालों को आधार देता है।
  • बहस अब तीन साल तक की जेल वाले संशोधन पर सिमट रही है, और इसी वजह से सॉलिसिटर जनरल ने आपत्ति जताई कि संसद में हारी बात अदालत में लाई जा रही है।
  • सुनवाई में तीखी नोकझोंक, जिसमें कानून बनाने को 'नक्सली विचारों के आदेश' के अधीन न करने की बात कही गई, दिखाती है कि यह केवल कानूनी विवाद नहीं बल्कि राष्ट्रवाद और अल्पसंख्यक अधिकारों की बड़ी राजनीतिक बहस का हिस्सा है।
  • प्रतीक से बचकर केवल दंड के सवाल को उठाकर अदालत ने राष्ट्रीय भावना से टकराए बिना व्यक्तिगत अंतरात्मा को सीमित सुरक्षा देने का रास्ता चुना प्रतीत होता है।

किस पर नज़र रखें — दो हफ्तों में आने वाला केंद्र का जवाब — वह दंडात्मक प्रावधान पर नरमी दिखाता है या उसका डटकर बचाव करता है, यही अगली राजनीतिक दिशा तय करेगा।

यह खबर मामले के अंतिम नतीजे, दंडात्मक प्रावधान के टिकने या न टिकने, और राजनीतिक दलों की औपचारिक प्रतिक्रिया के बारे में कुछ तय नहीं करती।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 4 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

कर्नाटक संगीत गायक टी एम कृष्णा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर 'वंदे मातरम्' के पूरे (छह छंद वाले) संस्करण के अनिवार्य गायन पर आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि गीत के अंतिम चार छंदों में हिंदू देवियों का आह्वान है, जो कुछ समुदायों की धार्मिक आस्था के विरुद्ध हो सकता है। राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम में संशोधन के बाद गीत के गायन में बाधा डालने पर तीन साल तक की जेल का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट ने दंडात्मक परिणामों की वैधता जांचने पर सहमति दी, लेकिन यह तय करने से इनकार कर दिया कि राष्ट्रीय गीत में दो छंद हों या छह।

मुख्य तथ्य

  • सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को धार्मिक आस्था या अंतरात्मा की आवाज (conscientious objection) के आधार पर राष्ट्रीय गीत न गाने पर दंडात्मक परिणामों की वैधता जांचने पर सहमति दी।
  • पीठ में सीजेआई सूर्यकांत तथा जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना शामिल थे; केंद्र से दो हफ्ते में जवाब मांगा गया।
  • संशोधित कानून के तहत राष्ट्रीय गीत के गायन में बाधा डालने या रोकने पर तीन साल तक की जेल का प्रावधान है।
  • अदालत ने कहा कि यह क्षेत्र अगस्त 1986 के बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल फैसले से आच्छादित है, जिसमें कहा गया था कि मौन खड़े रहकर सम्मान दिखाने वाले को राष्ट्रगान न गाने पर दंडित नहीं किया जा सकता।
  • याचिकाकर्ता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता एस मुरलीधर ने कहा कि 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने मुस्लिमों के विरोध के कारण 'वंदे मातरम्' को दो छंदों तक सीमित किया था।
  • पीठ ने कहा, "अदालतें यह तय नहीं कर सकतीं कि राष्ट्रीय गीत क्या होना चाहिए" — यह लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित राज्य का काम है।
  • सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका को सनसनी फैलाने वाली बताया और नोटिस जारी न करने का आग्रह किया, साथ ही केंद्र की ओर से जवाब दाखिल करने का भरोसा दिया।
  • जस्टिस बागची ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रगान में 'God' शब्द का प्रयोग होता है, फिर भी अमेरिकी संविधान से मजबूत धर्मनिरपेक्षता कुछ नहीं; ईश्वर के किसी रूप को श्रद्धांजलि देना धर्मनिरपेक्षता को प्रभावित नहीं करेगा।

समयरेखा

  1. 1937कांग्रेस कार्यसमिति ने मुस्लिम समुदाय के कड़े विरोध के कारण 'वंदे मातरम्' को दो छंदों तक सीमित किया।
  2. अगस्त 1986सुप्रीम कोर्ट का बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल फैसला — राष्ट्रगान न गाने पर दंड नहीं, यदि मौन खड़े रहकर सम्मान दिखाया जाए।
  3. संशोधन की तिथि स्रोत में नहीं दी गईसंसद ने राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम में संशोधन कर छह छंदों का गायन अनिवार्य किया; बाधा डालने पर तीन साल तक की जेल।
  4. मंगलवार (तिथि स्रोत में नहीं दी गई)सुप्रीम कोर्ट ने टी एम कृष्णा की याचिका पर सुनवाई की, दंडात्मक प्रावधान जांचने पर सहमति दी, केंद्र से दो हफ्ते में जवाब मांगा।

किसका दाँव

  • टी एम कृष्णा (कर्नाटक संगीत गायक, याचिकाकर्ता) — छह छंदों वाले पूरे 'वंदे मातरम्' के अनिवार्य गायन पर आपत्ति; तर्क कि अंतिम चार छंद हिंदू देवियों का आह्वान करते हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट की पीठ (सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची, जस्टिस वी मोहना) — अनुच्छेद 25 के अधिकारों और अंतरात्मा की आवाज के आधार पर आपत्ति करने वालों पर दंड की वैधता की जांच।
  • केंद्र सरकार / सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता — संशोधित कानून का बचाव; दो हफ्ते में जवाब दाखिल करना; याचिका को सनसनीखेज बताया।
  • संसद — अदालत के अनुसार राष्ट्रीय गीत का स्वरूप तय करना संसद के विवेक का विषय है।
  • धार्मिक समुदाय व अंतरात्मा के आधार पर आपत्ति करने वाले नागरिक — मूर्तिपूजा से जुड़े छंद न गाने पर आपराधिक अभियोजन का जोखिम और धार्मिक स्वतंत्रता।
  • वरिष्ठ अधिवक्ता एस मुरलीधर — याचिकाकर्ता की पैरवी; तर्क कि 80 साल बाद छह छंद लोगों पर थोपे गए।

क्यों अहम है

यह मामला राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान और अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता तथा अंतरात्मा की स्वतंत्रता के बीच संतुलन के प्रश्न को फिर सामने लाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय गीत का स्वरूप तय करना निर्वाचित सरकार व संसद का काम है, पर किसी की अंतरात्मा के आधार पर आपत्ति पर दंड नहीं थोपा जा सकता। इससे 1986 के बिजॉय इमैनुएल सिद्धांत की प्रासंगिकता और दंडात्मक कानूनों की सीमा दोनों की पुनर्परीक्षा होगी।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल राज्य (अगस्त 1986): मौन खड़े रहकर सम्मान दिखाने पर राष्ट्रगान न गाने पर दंड नहीं — अदालत के अनुसार यह आज भी देश का कानून है।
  • अनुच्छेद 25: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार — पीठ ने कहा कि किसी का अनुच्छेद 25 अधिकार या अंतरात्मा की आपत्ति का अधिकार उल्लंघित नहीं होना चाहिए।
  • राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम में संशोधन: राष्ट्रीय गीत के गायन में बाधा डालने पर तीन साल तक की कैद।
  • 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने 'वंदे मातरम्' को दो छंदों तक सीमित किया था।
  • सुनवाई करने वाली पीठ: सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची, जस्टिस वी मोहना; केंद्र को दो हफ्ते का समय।
  • अदालत का रुख: राष्ट्रीय गीत घोषित करना राज्य/संसद का विषय; अदालत राष्ट्रीय भावना का पुनर्मूल्यांकन नहीं करेगी।

मेन्स दृष्टिकोण

'वंदे मातरम्' के छह छंदों के अनिवार्य गायन को चुनौती देने वाली याचिका राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े कानूनों और मूल अधिकारों के टकराव का उदाहरण है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि अंतिम चार छंदों में देवी-आह्वान कुछ समुदायों की आस्था के विपरीत है और 80 साल बाद इन्हें थोपकर न गाने पर तीन साल की जेल का प्रावधान करना चिंताजनक है; साथ ही यह कि विधायी प्रक्रिया समावेशी नहीं थी। इसके विपरीत सॉलिसिटर जनरल का तर्क है कि संसद में संशोधन रोक न पाने वाले अब अदालत का सहारा ले रहे हैं और कानून-निर्माण को किसी विचारधारा के 'फरमान' के अधीन नहीं किया जा सकता। सुप्र���म कोर्ट ने संतुलित रुख अपनाया: राष्ट्रीय गीत का स्वरूप तय करना निर्वाचित राज्य और संसद के विवेक का विषय है तथा ईश्वर के किसी रूप का उल्लेख स्वतः धर्मनिरपेक्षता को क्षति नहीं पहुंचाता (जस्टिस बागची द्वारा अमेरिकी राष्ट्रगान का उदाहरण), लेकिन अंतरात्मा के आधार पर आपत्ति करने वाले पर आपराधिक अभियोजन नहीं हो सकता। आगे का रास्ता बिजॉय इमैनुएल (1986) के सिद्धांत के अनुरूप है — सम्मानपूर्वक मौन रहने की स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए दंडात्मक प्रावधानों की संकुचित व्याख्या, जिससे राष्ट्रीय एकता की अभिव्यक्ति और अनुच्छेद 25 के अधिकार दोनों सुरक्षित रहें।

मुख्य शब्द

वंदे मातरम्
भारत का राष्ट्रीय गीत, जिसके दो या छह छंदों के गायन को लेकर विवाद है; अंतिम चार छंदों में देवी-आह्वान का उल्लेख याचिका में किया गया।
बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल (1986)
सुप्रीम कोर्ट का फैसला कि मौन खड़े रहकर सम्मान दिखाने वाले व्यक्ति को राष्ट्रगान न गाने पर दंडित नहीं किया जा सकता।
अंतरात्मा के आधार पर आपत्ति करने वाला (conscientious objector)
वह व्यक्ति जो अपनी अंतरात्मा या आस्था के कारण किसी अनिवार्य कार्य को करने से इनकार करता है।
राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम
राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान को रोकने वाला कानून; संशोधन के बाद राष्ट्रीय गीत के गायन में बाधा पर तीन साल तक की जेल।
अनुच्छेद 25
संविधान का प्रावधान जो अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को मानने, आचरण करने व प्रचार करने का अधिकार देता है।

अभ्यास प्रश्न

  1. राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान की वैधानिक अपेक्षा और अनुच्छेद 25 के तहत अंतःकरण की स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर चर्चा कीजिए। बिजॉय इमैनुएल (1986) के आलोक में उत्तर दीजिए।
  2. "अदालतें यह तय नहीं कर सकतीं कि राष्ट्रीय गीत क्या होना चाहिए" — न्यायिक संयम और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिए।
  3. क्या राष्ट्रीय गीत में ईश्वर या देवी के किसी रूप का उल्लेख भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा के विरुद्ध है? पक्ष-विपक्ष के तर्क प्रस्तुत कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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