दवाओं की अत्यधिक कीमत वसूली है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दवाओं की अत्यधिक कीमतों पर नाराजगी जताते हुए इसे दिनदहाड़े डकैती कहा। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि एक कैंसर दवा कंपनी रिटेलर को 2,700 रुपये में देती है, जबकि उस पर एमआरपी 27,000 रुपये छपी है। बेंच ने सभी दवाओं को मूल्य नियंत्रण में लाने और जन औषधि केंद्रों पर उपलब्ध कराने का सुझाव दिया। याचिकाकर्ता ने बताया कि एंटीबायोटिक टाइजबेक्स 50 एमजी की एमआरपी 5,635 रुपये है, पर खुले बाजार में यह 350 रुपये में मिलती है।

स्रोत

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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • A bench of Justices Vikram Nath and Sandeep Mehta called exorbitant drug pricing 'dacoity' and 'extortion'. — Directly attributed to the named bench with verbatim quotes in the source.
  • An unnamed cancer drug is supplied to retailers at about Rs 2,700 and carries an MRP of Rs 27,000. — Figure appears in source and in the bench's quote; source states Rs 2,770 in narration and Rs 2,700 in the quote, an internal inconsistency.
  • Antibiotic Tigebex 50 mg has an MRP of Rs 5,635, sold at that price in corporate hospitals but at Rs 350 in the open market. — Attributed to petitioner Sanjay Kulshresthra; not independently verified in source.
  • The Centre, through ASG K M Nataraj, said it was not adversarial and would endeavour to make medicines available to all. — Attributed to the named law officer in court.
  • Senior advocate Kapil Sibal, for pharma companies, said they were not making money from it and sought time to submit data. — Attributed statement made in court; underlying claim unverified.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

सुप्रीम कोर्ट की तीखी भाषा — "दिनदहाड़े डकैती" — इस चरण में कानूनी से अधिक राजनीतिक वजन रखती है। मूल्य नियंत्रण पर फैसला लेने वाले अधिकारियों की "पूरी चुप्पी" पर सवाल उठाकर और कारण बताने की जरूरत न होने की टिप्पणी जोड़कर पीठ ने नियामक-उद्योग रिश्ते को खुली बहस में ला दिया है। अदालत में केंद्र का गैर-विरोधी रुख और जन औषधि केंद्रों का उल्लेख सरकार को इस दबाव को अपनी सुधार-कथा में बदलने की गुंजाइश देता है।

  • दवा की कीमत हर परिवार को छूती है, इसलिए मूल्य नियंत्रण किसी भी दल के लिए कम जोखिम और अधिक लाभ वाला राजनीतिक मुद्दा है।
  • अधिकारियों की चुप्पी पर कोर्ट की टिप्पणी विपक्ष को नियामक विफलता पर तैयार हमला-रेखा देती है।
  • एएसजी का यह कहना कि सरकार विरोधी रुख नहीं अपना रही, बचाव से अधिक सहयोग की रणनीति है — जिससे न्यायिक दबाव को नीतिगत इच्छाशक्ति के रूप में दिखाया जा सके।
  • जन औषधि केंद्रों का जिक्र समाधान को मौजूदा सरकारी योजना के रास्ते मोड़ता है, जो राजनीतिक रूप से सुविधाजनक ढांचा है।
  • फार्मा कंपनियों का यह दावा कि मुनाफा उन्हें नहीं मिल रहा, रिटेलरों और कॉर्पोरेट अस्पतालों पर दोष डालने की लॉबिंग लड़ाई का संकेत है।

किस पर नज़र रखें — देखना यह है कि केंद्र अगले हलफनामे में मूल्य नियंत्रण का दायरा बढ़ाने का प्रस्ताव देता है या नहीं, और उद्योग का वादा किया गया डेटा जिम्मेदारी किस पर डालता है।

मौखिक टिप्पणियां फैसला नहीं होतीं; यह खबर किसी कंपनी का दोष सिद्ध नहीं करती, न ही सरकार द्वारा नीति बदलने की कोई प्रतिबद्धता दर्ज करती है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 3 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

सुप्रीम कोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता के सी जैन और आगरा के डॉक्टर संजय कुलश्रेष्ठ द्वारा दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है, जिनमें दवाओं की कीमत तय करने (प्राइस फिक्सेशन) में अदालत के हस्तक्षेप की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने बिल पेश कर दिखाया कि दवाओं पर वास्तविक खुदरा लागत से कई गुना ऊंची एमआरपी छापी जाती है, जिससे रिटेलर असली कीमत से 10 से 16 गुना तक वसूल पाते हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मंगलवार को इस पर तीखी नाराजगी जताई और सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाया। बेंच ने सुझाव दिया कि सभी दवाएं मूल्य नियंत्रण के दायरे में आएं और सरकार समर्थित जन औषधि केंद्रों पर उपलब्ध हों।

मुख्य तथ्य

  • सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने दवाओं की अत्यधिक कीमतों को "दिनदहाड़े डकैती" और "एक्सटॉर्शन" कहा।
  • बेंच ने बताया कि एक कैंसर दवा कंपनी रिटेलर को 2,700 रुपये (पीटीआर) में देती है, जबकि उस पर एमआरपी 27,000 रुपये छपी है — यानी दस गुना।
  • याचिकाकर्ता डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ ने कहा कि एंटीबायोटिक टाइजबेक्स 50 एमजी की एमआरपी 5,635 रुपये है और कॉरपोरेट अस्पतालों में इसी दाम पर बिकती है, जबकि खुले बाजार में यह 350 रुपये में मिलती है — यानी 16 गुना।
  • बेंच ने सभी दवाओं को मूल्य नियंत्रण नीति के दायरे में लाने और जन औषधि केंद्रों पर उपलब्ध कराने का सुझाव दिया।
  • अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज ने केंद्र की ओर से कहा कि सरकार इस मामले में विरोधात्मक रुख नहीं अपना रही और सभी को दवा उपलब्ध कराने का प्रयास रहेगा।
  • बेंच ने कहा कि मुद्दा उपलब्धता का नहीं, उचित कीमत पर उपलब्धता का है; लोग दवा खरीदने के लिए घर और गहने बेच रहे हैं।
  • बेंच ने कहा कि यह पहली नजर में साफ तौर पर धोखाधड़ी (fraud) का मामला है और निर्णय लेने वाले अधिकारी "पूरी तरह चुप" हैं।
  • फार्मा कंपनियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि कंपनियां इससे कमाई नहीं कर रही हैं और आंकड़े पेश करने के लिए समय मांगा, जो अदालत ने दे दिया।

समयरेखा

  1. तारीख स्रोत में नहीं दी गईएससी अधिवक्ता के सी जैन और आगरा के डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ ने दवाओं की कीमत तय करने के लिए जनहित याचिकाएं दायर कीं।
  2. मंगलवार (तारीख स्रोत में नहीं दी गई)जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सुनवाई में अत्यधिक कीमतों को दिनदहाड़े डकैती कहा और सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाया।
  3. उसी सुनवाई मेंयाचिकाकर्ताओं ने ओवरप्राइसिंग दिखाने वाले बिल पेश किए; कपिल सिब्बल को आंकड़े पेश करने के लिए समय दिया गया।

किसका दाँव

  • मरीज और उनके परिवार — दवा खरीदने के लिए घर और गहने बेचने को मजबूर; उचित कीमत पर आवश्यक दवाओं की पहुंच दांव पर।
  • सुप्रीम कोर्ट (जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता) — सभी दवाओं को मूल्य नियंत्रण में लाने की जरूरत पर न्यायिक हस्तक्षेप।
  • केंद्र सरकार (एएसजी के एम नटराज) — मूल्य नियंत्रण तंत्र पर निष्क्रियता के आरोप; सभी को दवा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी।
  • फार्मा कंपनियां (वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल) — ऊंची एमआरपी छापने के आरोप; कंपनियों का दावा है कि मुनाफा वे नहीं कमा रहीं।
  • रिटेलर और कॉरपोरेट अस्पताल — वास्तविक लागत से 10 से 16 गुना दाम पर दवा बेचने का आरोप।
  • याचिकाकर्ता के सी जैन और डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ — दवाओं की कीमत तय करने की नीति में अदालत के हस्तक्षेप की मांग।

क्यों अहम है

दवा खर्च भारत में स्वास्थ्य पर होने वाले जेब-खर्च का बड़ा हिस्सा है और अदालत के सामने रखे उदाहरण दिखाते हैं कि एमआरपी और रिटेलर को दी जाने वाली कीमत के बीच दस से सोलह गुना का अंतर मरीज पर पड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना कि यह "फ्रॉड" और "एक्सटॉर्शन" है, मूल्य नियंत्रण तंत्र के दायरे और नियामकीय निष्क्रियता पर सीधा सवाल खड़ा करता है। इसका असर यह हो सकता है कि आवश्यक दवाओं के अलावा अन्य दवाएं भी कीमत नियंत्रण के दायरे में लाई जाएं।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • जनहित याचिकाओं की सुनवाई कर रही बेंच: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता।
  • पीटीआर (Price to Retailer) = निर्माता द्वारा रिटेलर को दी जाने वाली कीमत; उदाहरण में कैंसर दवा का पीटीआर 2,700 रुपये, एमआरपी 27,000 रुपये।
  • टाइजबेक्स 50 एमजी (एंटीबायोटिक): एमआरपी 5,635 रुपये, खुले बाजार में 350 रुपये।
  • जन औषधि केंद्र सरकार समर्थित दवा दुकानें हैं; बेंच ने सभी दवाएं इन पर उपलब्ध कराने का सुझाव दिया।
  • याचिकाकर्ता: सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता के सी जैन और आगरा के डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ।
  • केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज; फार्मा कंपनियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल।

मेन्स दृष्टिकोण

दवाओं की कीमत निर्धारण का प्रश्न स्वास्थ्य के अधिकार और बाजार नियमन के टकराव को उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे तथ्य — कैंसर की एक आवश्यक दवा का पीटीआर 2,700 रुपये और एमआरपी 27,000 रुपये, तथा टाइजबेक्स 50 एमजी की एमआरपी 5,635 रुपये बनाम खुले बाजार में 350 रुपये — बताते हैं कि ऊंची एमआरपी छापने की प्रथा रिटेलरों और कॉरपोरेट अस्पतालों को वास्तविक लागत से 10 से 16 गुना वसूली की छूट देती है। कारणों में मूल्य नियंत्रण का सीमित दायरा (कुछ दवाएं बाहर रखी जाना) और बेंच के शब्दों में निर्णय लेने वाले प्राधिकरणों की "पूरी चुप्पी" शामिल है; परिणाम यह कि मरीज घर और गहने बेचकर दवा खरीदते हैं, जिससे जेब-खर्च से गरीबी बढ़ती है। आगे का रास्ता, जैसा बेंच ने सुझाया, सभी दवाओं को मूल्य नियंत्रण नीति के दायरे में लाना और उन्हें जन औषधि केंद्रों के जरिए सुलभ बनाना है; साथ ही एमआरपी-पीटीआर अंतर पर पारदर्शिता जरूरी है, जिसके लिए फार्मा कंपनियों को अदालत में आंकड़े रखने की अनुमति दी गई है। उत्तर में यह भी ध्यान रहे कि सरकार का रुख उपलब्धता पर था, जबकि अदालत ने जोर "उचित कीमत पर उपलब्धता" पर दिया।

मुख्य शब्द

एमआरपी (MRP)
दवा के पैकेट पर छपा अधिकतम खुदरा मूल्य, जिस पर रिटेलर मरीज को बेचता है।
पीटीआर (Price to Retailer)
निर्माता द्वारा रिटेलर को दवा बेचने की कीमत; उदाहरण में यह एमआरपी का दसवां हिस्सा थी।
जन औषधि केंद्र
सरकार समर्थित दवा दुकानें, जहां बेंच ने सभी दवाएं उपलब्ध कराने का सुझाव दिया।
मूल्य नियंत्रण तंत्र (Price Control Mechanism)
वह व्यवस्था जिसके तहत दवाओं की कीमत तय की जाती है; बेंच ने इसमें सभी दवाओं को शामिल करने को कहा।
जनहित याचिका (PIL)
सार्वजनिक हित के मुद्दे पर अदालत में दायर याचिका; यहां दवा मूल्य निर्धारण के लिए दो याचिकाएं दायर हुईं।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल
केंद्र सरकार की ओर से अदालत में पेश होने वाला विधि अधिकारी; इस मामले में के एम नटराज।

अभ्यास प्रश्न

  1. दवाओं की एमआरपी और रिटेलर को दी जाने वाली कीमत के बीच भारी अंतर मरीजों के जेब-खर्च को कैसे प्रभावित करता है? सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे उदाहरणों से समझाइए।
  2. क्या सभी दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाना उचित है? अदालत में रखे गए पक्षों के आधार पर चर्चा कीजिए।
  3. जन औषधि केंद्रों के जरिए सस्ती दवा उपलब्ध कराने की व्यवस्था की संभावनाएं और सीमाएं क्या हैं?

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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