कृषि

अध्ययन: जीएम फसलों से कीटनाशकों पर निर्भरता बढ़ी

रसायनों का उपयोग घटाने के वादे के साथ आई जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) फसलों ने पिछले तीन दशकों में खेती की कीटनाशकों पर निर्भरता और बढ़ा दी है, यह बात जर्नल ऑफ एग्रेरियन चेंज में 14 अप्रैल, 2025 को प्रकाशित अध्ययन में कही गई। बीटी कपास से शुरू में कीटनाशक उपयोग घटा, लेकिन 2010 के आसपास कीट प्रतिरोध बढ़ने से यह लाभ पलट गया। अध्ययन के अनुसार, 2018 तक भारतीय कपास किसान बीटी-पूर्व उच्चतम स्तर से 37 प्रतिशत अधिक खर्च कर रहे थे। यह अध्ययन पर्ड्यू विश्वविद्यालय, वाशिंगटन एंड ली विश्वविद्यालय और अंतरराष्ट्रीय कपास सलाहकार समिति के शोधकर्ताओं ने किया।

स्रोत

Hanamkonda — agriculture · मूल ख़बर पढ़ें ↗

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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Indian cotton farmers use more insecticides with Bt cotton than on conventional cotton in the 1990s. — Attributed to the study 'GM Crops and the Jevons Paradox', published 14 April 2025 in the Journal of Agrarian Change.
  • By 2018, Indian cotton farmers were spending 37 per cent more than the pre-Bt high. — Direct quote from the study; figure appears in source.
  • US soybean acreage treated with glyphosate rose from 9.2 million acres in 1994 to 113 million by 2018. — Figure appears in source, attributed to the study; source also cites area treated rising from 15% to 87%.
  • Monsanto (now part of Bayer) claimed glyphosate resistance was unlikely, but resistance evolved in dozens of weed species since 1998. — Attributed to the study; no primary Monsanto document cited in the source.
  • Study conducted by researchers from Purdue University, Washington and Lee University and the International Cotton Advisory Committee. — Named institutions appear in source; no individual authors named except the theory's originator.

विश्लेषकों की राय राय

AI आर्थिक विश्लेषक

यह किसी तकनीक की विफलता की कहानी से ज़्यादा इस बात की कहानी है कि निजी फ़ायदा कैसे सामूहिक लागत में बदल जाता है। बीटी कपास ने शुरू में कीटनाशक खर्च घटाया और किसानों का मुनाफ़ा बढ़ाया, लेकिन 2010 के आसपास कीट प्रतिरोध बढ़ने से वह बचत खत्म हो गई और अध्ययन के मुताबिक 2018 तक भारतीय कपास किसान बीटी-पूर्व के उच्चतम स्तर से 37 प्रतिशत ज़्यादा खर्च कर रहे थे। कृषि इनपुट बाज़ार यहाँ जेवन्स पैराडॉक्स का उदाहरण बन जाते हैं — क्षमता बढ़ने पर कुल खपत घटने के बजाय बढ़ सकती है।

  • बोझ अंततः किसान पर पड़ता है — बीज की लागत के ऊपर बढ़ा हुआ रसायन बिल जुड़ता है, जो पहले से कर्ज़ में दबे छोटे और बटाईदार किसानों के लिए सबसे भारी है।
  • लगातार फ़ायदे में इनपुट सप्लाई चेन है — बीज, रसायन और उर्वरक बेचने वालों की मांग टिकी रहती है; अध्ययन कहता है कि नीतियाँ और बड़ी एग्रोकेमिकल कंपनियाँ इस इनपुट-गहन मॉडल को बनाए रखती हैं।
  • प्रतिरोध एक साझा-संसाधन समस्या है — एक किसान के लिए तर्कसंगत फ़ैसला सबके करने पर सबके लिए नुकसान बन जाता है, यह क्लासिक बाज़ार विफलता है।
  • यही पैटर्न शाकनाशियों में दिखता है — अमेरिका में सोयाबीन के जिस रकबे पर ग्लाइफ़ोसेट छिड़का गया, उसका हिस्सा 15 से 87 प्रतिशत हो गया, यानी सस्ता इनपुट ज़्यादा इस्तेमाल को न्योता देता है।
  • श्रम की बचत के दो पहलू हैं — निराई का समय बचना किसान के लिए लाभ है, पर ग्रामीण मज़दूरों के लिए काम में कमी भी।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि कपास की इनपुट लागत इसी दिशा में बढ़ती रहती है या नहीं, और उससे किसानों के मुनाफ़े, ग्रामीण कर्ज़ तथा समर्थन मूल्य व आयात नीति पर कितना दबाव पड़ता है।

यह एक ही अध्ययन का निष्कर्ष है; यह खबर उपज, कपास की कीमतों या किसानों की कुल शुद्ध आय पर प्रभाव स्थापित नहीं करती, और इसमें उद्योग या सरकार की प्रतिक्रिया भी शामिल नहीं है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 8 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) फसलें, जैसे भारत में बीटी कपास, इस वादे के साथ पेश की गई थीं कि वे कीटनाशकों का उपयोग घटाएंगी। जर्नल ऑफ एग्रेरियन चेंज में 14 अप्रैल, 2025 को प्रकाशित एक नए अध्ययन का निष्कर्ष है कि पिछले तीन दशकों में इन फसलों ने खेती की रासायनिक इनपुट पर निर्भरता और गहरी कर दी। अध्ययन इस विरोधाभास को 1865 में विलियम स्टेनली जेवन्स द्वारा प्रस्तावित "जेवन्स पैराडॉक्स" से समझाता है, जिसके अनुसार संसाधन उपयोग में दक्षता बढ़ने पर कुल खपत घट नहीं, बल्कि बढ़ सकती है। शोध चार जीएम फसलों — बीटी कपास, एचटी सोयाबीन, एचटी/बीटी मक्का और एचटी सरसों (कनोला) — के आंकड़ों पर आधारित है।

मुख्य तथ्य

  • अध्ययन 'GM Crops and the Jevons Paradox' 14 अप्रैल, 2025 को जर्नल ऑफ एग्रेरियन चेंज में प्रकाशित हुआ।
  • शोध पर्ड्यू विश्वविद्यालय, वाशिंगटन एंड ली विश्वविद्यालय और अमेरिका स्थित अंतरराष्ट्रीय कपास सलाहकार समिति के शोधकर्ताओं ने किया।
  • भारत में कपास किसान अब 1990 के दशक की पारंपरिक, गैर-जीएम कपास की तुलना में अधिक कीटनाशक उपयोग कर रहे हैं।
  • 2010 के आसपास कीटों में प्रतिरोध और नए कीटों के उभरने से बीटी कपास के शुरुआती लाभ पलट गए।
  • अध्ययन के अनुसार, 2018 तक भारतीय कपास किसान बीटी-पूर्व उच्चतम स्तर से 37 प्रतिशत अधिक खर्च कर रहे थे।
  • अमेरिका में ग्लाइफोसेट से उपचारित सोयाबीन क्षेत्र 1994 में 9.2 मिलियन एकड़ से बढ़कर 2018 में 113 मिलियन एकड़ हो गया।
  • इसी अवधि में अमेरिकी सोयाबीन क्षेत्र 24.9 मिलियन से 36.1 मिलियन हेक्टेयर हुआ और ग्लाइफोसेट-उपचारित हिस्सा 15% से 87% पहुंचा।
  • मॉनसेंटो (अब बायर का हिस्सा) के दावे के विपरीत, 1998 से दर्जनों खरपतवार प्रजातियों में ग्लाइफोसेट प्रतिरोध विकसित हो चुका है।

समयरेखा

  1. 1865विलियम स्टेनली जेवन्स ने जेवन्स पैराडॉक्स का आर्थिक सिद्धांत प्रस्तावित किया।
  2. 1994एचटी फसलों से पहले अमेरिका में ग्लाइफोसेट-उपचारित सोयाबीन क्षेत्र 9.2 मिलियन एकड़ था (कुल क्षेत्र का 15%)।
  3. 1998 के बाददर्जनों खरपतवार प्रजातियों में ग्लाइफोसेट के प्रति प्रतिरोध विकसित होने लगा।
  4. 2002भारत में बॉलवर्म छिड़काव में तेज गिरावट, जो सूखे के कारण थी; बीटी बीज कपास क्षेत्र के 2% से कम पर।
  5. लगभग 2010कीट प्रतिरोध और नए कीटों के उभरने से बीटी कपास के कीटनाशक-घटाने वाले लाभ पलट गए; छिड़काव उल्लेखनीय रूप से बढ़ा।
  6. 2018भारतीय कपास किसानों का खर्च बीटी-पूर्व उच्चतम स्तर से 37% अधिक; अमेरिका में ग्लाइफोसेट-उपचारित सोयाबीन 113 मिलियन एकड़ (87%)।
  7. 14 अप्रैल, 2025जर्नल ऑफ एग्रेरियन चेंज में अध्ययन प्रकाशित।
  8. 21 अप्रैल, 2025रिपोर्ट प्रकाशित।

किसका दाँव

  • भारतीय कपास किसान — कीटनाशक पर बढ़ता खर्च — 2018 तक बीटी-पूर्व उच्चतम स्तर से 37% अधिक — और कीट प्रतिरोध से घटता लाभ।
  • अमेरिकी व दक्षिण अमेरिकी सोयाबीन उत्पादक — एचटी फसलों के विस्तार के साथ ग्लाइफोसेट व अन्य शाकनाशियों के उपयोग में नाटकीय वृद्धि और खरपतवार प्रतिरोध।
  • कृषि-रसायन व बीज कंपनियां (मॉनसेंटो/बायर) — इनपुट-सघन एकल-फसल मॉडल पर आधारित बाजार; प्रतिरोध न बनने के दावे अध्ययन में प्रश्नांकित।
  • शोध संस्थान (पर्ड्यू, वाशिंगटन एंड ली, अंतरराष्ट्रीय कपास सलाहकार समिति) — जीएम फसलों के दीर्घकालिक प्रभाव पर प्रमाण-आधारित मूल्यांकन प्रस्तुत करना।
  • सरकारें व नीति-निर्माता — अध्ययन के अनुसार राष्ट्रीय नीतियों और सरकारी समर्थन ने इनपुट-सघन एकल-फसल मॉडल व जीएम अपनाने को गति दी।
  • कनाडा के एचटी मक्का, चुकंदर व कनोला उत्पादक — इसी प्रकार शाकनाशी उपयोग में वृद्धि दर्ज।

क्यों अहम है

भारत में कपास मुख्यतः बीटी किस्मों पर आधारित है, इसलिए कीटनाशक खर्च में 37 प्रतिशत की वृद्धि सीधे किसानों की लागत, कर्ज और आय को प्रभावित करती है। अध्ययन बताता है कि तकनीकी दक्षता अकेले रासायनिक निर्भरता कम नहीं करती, क्योंकि जीएम बीज इनपुट-सघन एकल-फसल प्रणाली में जुड़े होते हैं जो उर्वरक और जीवाश्म ईंधन का उपयोग भी बढ़ाती है। यह जीएम फसलों की नई मंजूरी और कीट-प्रतिरोध प्रबंधन पर भारत की नीतिगत बहस के लिए महत्वपूर्ण है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • जेवन्स पैराडॉक्स: 1865 में विलियम स्टेनली जेवन्स द्वारा प्रस्तावित — संसाधन उपयोग में दक्षता बढ़ने से कुल खपत बढ़ सकती है।
  • अध्ययन में शामिल चार जीएम फसलें: बीटी कपास, एचटी सोयाबीन, एचटी/बीटी मक्का और एचटी सरसों (कनोला)।
  • अध्ययन 14 अप्रैल, 2025 को जर्नल ऑफ एग्रेरियन चेंज में प्रकाशित; शोधकर्ता पर्ड्यू, वाशिंगटन एंड ली व अंतरराष्ट्रीय कपास सलाहकार समिति से।
  • 2018 तक भारतीय कपास किसानों का कीटनाशक खर्च बीटी-पूर्व उच्चतम स्तर से 37% अधिक।
  • ग्लाइफोसेट एक व्यापक-स्पेक्ट्रम शाकनाशी है, जिसका उपयोग एचटी (शाकनाशी-सहिष्णु) फसलों के साथ होता है; 1998 से दर्जनों खरपतवारों में प्रतिरोध।
  • 2002 में बीटी बीज भारत के कपास क्षेत्र के 2% से कम पर थे; उस वर्ष छिड़काव में गिरावट सूखे के कारण।

मेन्स दृष्टिकोण

जीएम फसलों को रासायनिक इनपुट घटाने वाली तकनीक के रूप में प्रस्तुत किया गया था, परंतु 14 अप्रैल, 2025 के अध्ययन के अनुसार तीन दशकों में परिणाम उलटा रहा। कारण बहुस्तरीय हैं: बीटी कपास से शुरुआती लागत-लाभ ने अपनाने की गति बढ़ाई (सरकारी समर्थन सहित), पर 2010 के आसपास कीट प्रतिरोध और नए कीटों के उभरने से लाभ समाप्त हो गया और 2018 तक भारतीय किसानों का खर्च बीटी-पूर्व उच्चतम स्तर से 37% ऊपर पहुंच गया; एचटी फसलों में ग्लाइफोसेट सस्ता होने से उपयोग का पैमाना बढ़ा (अमेरिका में सोयाबीन का उपचारित क्षेत्र 15% से 87%), और प्रतिरोधी खरपतवार पनपे। अध्ययन इसे जेवन्स पैराडॉक्स कहता है — दक्षता से खपत बढ़ना — जिसे इनपुट-सघन एकल-फसल प्रणाली, कृषि-रसायन कंपनियों की ताकत और राष्ट्रीय नीतियों ने बनाए रखा। निहितार्थ: व्यक्तिगत लाभ सामूहिक बोझ में बदलता है, किसानों की लागत व कर्ज बढ़ते हैं और उर्वरक तथा जीवाश्म ईंधन का उपयोग भी तेज होता है। आगे का रास्ता, स्रोत के तर्क के अनुरूप, बीज-केंद्रित तकनीकी समाधान से आगे बढ़कर उस खेती-प्रणाली पर ध्यान देना है जिसमें ये फसलें अंतर्निहित हैं — प्रतिरोध प्रबंधन, फसल विविधता और इनपुट-निर्भरता घटाना।

मुख्य शब्द

जीएम फसल
जेनेटिकली मॉडिफाइड फसल — आनुवंशिक रूप से संशोधित किस्म, जैसे बीटी कपास, एचटी सोयाबीन।
बीटी कपास
कीट-प्रतिरोधी जीएम कपास, भारत में कीटनाशक उपयोग घटाने के वादे के साथ पेश की गई।
एचटी फसल
हर्बिसाइड-टॉलरेंट (शाकनाशी-सहिष्णु) फसल, जिस पर ग्लाइफोसेट जैसे व्यापक-स्पेक्ट्रम शाकनाशी छिड़के जा सकते हैं।
जेवन्स पैराडॉक्स
1865 का आर्थिक सिद्धांत: संसाधन उपयोग में दक्षता बढ़ने से कुल खपत घटने के बजाय बढ़ सकती है।
ग्लाइफोसेट
सस्ता व्यापक-स्पेक्ट्रम शाकनाशी; अध्ययन के अनुसार इसके उपयोग में नाटकीय वृद्धि और खरपतवार प्रतिरोध हुआ।
इनपुट-सघन एकल-फसल (मोनोकल्चर)
एक ही फसल की बड़े पैमाने पर खेती, जो रसायन, उर्वरक व जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भर होती है।

अभ्यास प्रश्न

  1. जेवन्स पैराडॉक्स के आलोक में समझाइए कि भारत में बीटी कपास से कीटनाशक उपयोग घटने के बजाय क्यों बढ़ा।
  2. क्या बीज-आधारित तकनीकी समाधान कृषि की रासायनिक निर्भरता कम कर सकते हैं? अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर परीक्षण करें।
  3. जीएम फसलों के दीर्घकालिक अनुभव भारत की भावी जीएम-मंजूरी नीति और कीट-प्रतिरोध प्रबंधन के लिए क्या सबक देते हैं?

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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