फॉर्म 6 घोषणापत्र पर सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के ईसीआई दावे पर सवाल
भारत निर्वाचन आयोग ने एक प्रेस बयान में कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए फॉर्म 6 के साथ लगे घोषणापत्र को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है। हालांकि एक रिपोर्ट के अनुसार, बिहार एसआईआर पर मई के फैसले में अदालत ने 24 जून 2025 के आदेश के अनुलग्नक-डी वाले घोषणापत्र की ही जांच की थी, जो जुलाई में लाए गए नए प्रारूप से भिन्न है। नए घोषणापत्र में रिश्तेदार के पिछले एसआईआर नामांकन का विवरण मांगा गया है। निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आपत्ति दर्ज की।
स्रोत
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डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- ECI stated in a press release that the Declaration attached to Form 6 for SIR has been upheld by the Supreme Court. — Quoted directly from the ECI press statement in the source.
- The Supreme Court's May judgment on Bihar SIR upheld ECI's power to conduct SIR and its residual authority to tailor documentation, subject to a rational nexus test. — Supported by verbatim extracts of the judgment quoted in the source.
- The Declaration examined by the Court was Annexure D of the 24 June 2025 Bihar SIR order, not the version introduced in July. — Author's assessment based on the source's reading of the judgment; not externally verified.
- Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi recorded objections, with Sandhu calling the change 'unauthorized and illegal' on August 13. — Attributed to an Indian Express report cited in the source.
- False statements in the Declaration are punishable under Section 31 of the RP Act 1950 with up to one year imprisonment, fine, or both. — Figure and provision appear in ECI guidelines quoted in the source.
विश्लेषकों की राय राय
यह सिर्फ़ फ़ॉर्म का तकनीकी विवाद नहीं, चुनाव आयोग की राजनीतिक विश्वसनीयता की परीक्षा है। रिपोर्ट के मुताबिक़ सुप्रीम कोर्ट ने जून 2025 के बिहार एसआईआर आदेश के अनुलग्नक-डी वाले घोषणापत्र को देखा था, जुलाई में लाए गए नए घोषणापत्र को नहीं — इसलिए आयोग का "कोर्ट ने मंज़ूरी दी" वाला दावा सवालों के घेरे में है। दो चुनाव आयुक्तों की दर्ज आपत्तियों ने आयोग के भीतर का मतभेद सार्वजनिक कर दिया है, जो विपक्ष के लिए तैयार हथियार है।
- आयोग के भीतर की असहमति रिकॉर्ड पर आने के बाद बहस "एसआईआर सही है या नहीं" से हटकर "आयोग अपनी ही प्रक्रिया का पालन कर रहा है या नहीं" पर आ गई है।
- विपक्ष के लिए यह कथानक आसान है, क्योंकि आपत्ति किसी राजनीतिक आलोचक की नहीं बल्कि आयोग के भीतर से आई बताई जा रही है।
- आयोग का सबसे मज़बूत राजनीतिक तर्क मतदाता सूची की शुद्धता और फ़र्ज़ी नामों की रोकथाम है, पर रिश्तेदारों का लगभग 25 साल पुराना नामांकन ब्यौरा मांगना आम आवेदक पर बोझ जैसा दिखता है।
- घोषणापत्र में ग़लत जानकारी पर दंडात्मक प्रावधान होने से यह आरोप राजनीतिक रूप से तेज़ फैल सकता है कि छोटी चूक भी जोखिम बन जाएगी।
- 13 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में यह शर्त लागू किए बिना एसआईआर पूरा होना इस शिकायत को हवा देगा कि सख़्ती चुनिंदा जगहों पर लागू हो रही है।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि आयोग रिश्तेदार के पिछले एसआईआर से जोड़ने का "तर्कसंगत संबंध" सार्वजनिक रूप से कैसे समझाता है, शर्त वापस लेता है, या केंद्र नियमों में संशोधन का रास्ता चुनता है।
यह विश्लेषण रिपोर्टों पर आधारित है; इससे यह तय नहीं होता कि किस दल को लाभ होगा या वास्तव में कितने नामांकन प्रभावित हुए हैं।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 6 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान नए मतदाताओं के नामांकन वाले फॉर्म 6 में किए गए बदलावों पर विवाद खड़ा हुआ है। भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने प्रेस बयान जारी कर कहा कि फॉर्म 6 के साथ लगे घोषणापत्र को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार एसआईआर से जुड़े मई के फैसले में सही ठहराया है। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने केवल 24 जून 2025 के ईसीआई आदेश के अनुलग्नक-डी में शामिल घोषणापत्र की जांच की थी, जबकि जुलाई में लाया गया नया घोषणापत्र उससे भिन्न है और उसमें रिश्तेदार के पिछले एसआईआर नामांकन का विवरण मांगा गया है। दो निर्वाचन आयुक्तों ने इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज कराई है।
मुख्य तथ्य
- निर्वाचक नामावली से जुड़े तीन मुख्य फॉर्म: फॉर्म 6 (नए मतदाता का समावेशन), फॉर्म 7 (समावेशन/विलोपन पर आपत्ति), फॉर्म 8 (प्रविष्टि में सुधार)।
- 24 जून 2025 को ईसीआई ने बिहार में एसआईआर अधिसूचित करने वाला आदेश जारी किया, जिसके अनुलग्नक-डी में फॉर्म 6/फॉर्म 8 के साथ देने वाला घोषणापत्र था।
- अनुलग्नक-डी के घोषणापत्र में आयु, साधारण निवास और नागरिकता की घोषणा मांगी गई थी।
- जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत झूठी घोषणा पर एक वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान।
- मई में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर ईसीआई के एसआईआर कराने के अधिकार को बरकरार रखा; याचिकाओं में पात्रता के लिए निर्धारित 11 दस्तावेज़ों को चुनौती दी गई थी।
- द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार जुलाई में ईसीआई ने घोषणापत्र बदला, जिसमें आवेदक या उनके माता-पिता/रिश्तेदारों के पिछले एसआईआर में शामिल होने का विवरण मांगा गया।
- निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आपत्ति दर्ज की; रिपोर्ट के अनुसार संधू ने 13 अगस्त को इस बदलाव को "अनधिकृत और अवैध" कहा।
- 13 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के मतदाताओं ने रिश्तेदार के पिछले एसआईआर विवरण देने की शर्त के बिना एसआईआर प्रक्रिया पूरी की।
समयरेखा
- 24 जून 2025ईसीआई ने बिहार एसआईआर अधिसूचित करने वाला आदेश जारी किया, जिसमें अनुलग्नक-डी के रूप में घोषणापत्र संलग्न था।
- मई (फैसला)सुप्रीम कोर्ट ने बिहार एसआईआर पर याचिकाओं की सुनवाई के बाद ईसीआई की एसआईआर शक्ति और अनुलग्नक-डी के दस्तावेज़ ढांचे को बरकरार रखा।
- जुलाईरिपोर्ट के अनुसार ईसीआई ने फॉर्म 6 के घोषणापत्र में बदलाव कर रिश्तेदार के पिछले एसआईआर विवरण की मांग जोड़ी।
- 13 अगस्तरिपोर्ट के अनुसार निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने फॉर्म 6 बदलाव को "अनधिकृत और अवैध" बताया।
- पिछले सप्ताहद इंडियन एक्सप्रेस ने बताया कि दो निर्वाचन आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज की कि नियमों में केंद्र सरकार द्वारा संशोधन के बिना बदलाव नहीं किए जा सकते।
- बीता दिन (कल)ईसीआई ने प्रेस बयान जारी कर कहा कि फॉर्म 6 से जुड़े घोषणापत्र को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है।
किसका दाँव
- भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) — अपने घोषणापत्र में बदलाव को वैध ठहराना; यह दिखाना कि बदलाव का उद्देश्य से तर्कसंगत संबंध (rational nexus) है।
- निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — आपत्ति दर्ज कराई कि केंद्र सरकार द्वारा नियमों में संशोधन के बिना फॉर्म में बदलाव नहीं किया जा सकता।
- सुप्रीम कोर्ट — मई के फैसले में एसआईआर और अवशिष्ट अधिकार को बरकरार रखा, लेकिन यह भी कहा कि यह अधिकार असीमित नहीं है।
- नए मतदाता/आवेदक — रिश्तेदार के पुराने एसआईआर विवरण (ईपीआईसी, भाग संख्या, क्रम संख्या) न दे पाने पर नामांकन में बाधा और धारा 31 के तहत दंड का जोखिम।
- याचिकाकर्ता (एसआईआर को चुनौती देने वाले) — तर्क कि आम मतदाताओं को 'भाग संख्या' जैसे तकनीकी विवरण की जानकारी नहीं होती।
- बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) और ईआरओ — बीएलओ को पिछले एसआईआर नामावली से विवरण सत्यापित कर हस्ताक्षर करना; ईआरओ को बेमेल विवरण पर नोटिस जारी करना।
- केंद्र सरकार — निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 में संशोधन की शक्ति उसके पास होने का मुद्दा।
क्यों अहम है
मतदाता सूची में नाम जुड़ना मताधिकार की पहली शर्त है; यदि नामांकन के लिए 25 वर्ष पुरानी नामावली से रिश्तेदार का विवरण खोजना अनिवार्य हो जाए तो पात्र नागरिक सूची से बाहर रह सकते हैं। मामला यह भी उठाता है कि क्या ईसीआई वैधानिक नियमों में संशोधन के बिना फॉर्म बदल सकता है, और क्या वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दायरा बढ़ाकर प्रस्तुत कर रहा है। आयोग के भीतर दो निर्वाचन आयुक्तों की दर्ज आपत्ति संस्थागत निर्णय-प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़ा करती है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- फॉर्म 6 – नए मतदाता का समावेशन; फॉर्म 7 – समावेशन/विलोपन पर आपत्ति; फॉर्म 8 – प्रविष्टि में सुधार।
- निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत फॉर्म निर्धारित; संशोधन की शक्ति केंद्र सरकार के पास।
- जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31: झूठी घोषणा पर एक वर्ष तक कैद/जुर्माना/दोनों।
- आरपी एक्ट की धारा 21(2) के तहत पुनरीक्षण की प्रक्रिया के अनुरूप फॉर्म 6 का ढांचा बनाया गया है।
- बिहार एसआईआर 24 जून 2025 के ईसीआई आदेश से अधिसूचित; अनुलग्नक-डी में घोषणापत्र।
- सुप्रीम कोर्ट के मई फैसले में ईसीआई को 'अवशिष्ट अधिकार' मान्य, बशर्ते बदलाव में 'तर्कसंगत संबंध' हो।
मेन्स दृष्टिकोण
यह विवाद निर्वाचन आयोग की उप-विधायी शक्ति की सीमाओं और मताधिकार की सुलभता के बीच तनाव को उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार एसआईआर पर मई के फैसले में स्वीकार किया कि फॉर्म 6 का दस्तावेज़ ढांचा एसआईआर में शब्दशः लागू नहीं हो सकता और ईसीआई के पास अवशिष्ट अधिकार है, परंतु स्पष्ट किया कि यह अधिकार असीमित नहीं है और वैधानिक योजना से कोई भी विचलन उद्देश्य के साथ 'तर्कसंगत संबंध' रखता हो। मूल समस्या यह है कि अदालत ने 24 जून 2025 के आदेश के अनुलग्नक-डी वाले घोषणापत्र (आयु, निवास, नागरिकता) की जांच की थी, न कि जुलाई में लाए गए उस प्रारूप की जिसमें आवेदक से रिश्तेदार का नाम, ईपीआईसी, जिला, विधानसभा क्षेत्र, भाग संख्या और क्रम संख्या तक मांगी जाती है—और झूठी घोषणा पर धारा 31 का दंड लागू होता है। इससे तीन प्रश्न बनते हैं: क्या पुराने नामांकन से जोड़ने की शर्त तर्कसंगत संबंध और आनुपातिकता की कसौटी पर टिकती है; क्या 13 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में इस शर्त के बिना प्रक्रिया पूरी होने के बाद जुलाई से इसे लागू करना उचित विभेद (reasonable differentia) है; और क्या नियमों में संशोधन के बिना ऐसा बदलाव वैध है, जैसा दो निर्वाचन आयुक्तों ने आपत्ति में कहा। आगे का रास्ता यह हो सकता है कि आयोग बदलाव का कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करे, रिश्तेदार-विवरण को वैकल्पिक रखे, दंडात्मक प्रावधान का दायरा सीमित करे, और आवश्यक हो तो विधिवत नियम-संशोधन का मार्ग अपनाए।
मुख्य शब्द
- विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर)
- निर्वाचक नामावली के गहन पुनरीक्षण की ईसीआई प्रक्रिया, जिसमें आयोग विशेष दस्तावेज़ ढांचा निर्धारित कर सकता है।
- फॉर्म 6
- निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत नए मतदाता को नामावली में जोड़ने का आवेदन प्रपत्र।
- अनुलग्नक-डी
- 24 जून 2025 के बिहार एसआईआर आदेश के साथ लगा घोषणापत्र, जिसमें आयु, साधारण निवास और नागरिकता की घोषणा मांगी गई थी।
- तर्कसंगत संबंध (rational nexus)
- सुप्रीम कोर्ट की कसौटी कि वैधानिक ढांचे से कोई विचलन प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्य से युक्तियुक्त रूप से जुड़ा होना चाहिए।
- धारा 31, आरपी एक्ट 1950
- घोषणा में झूठा कथन देने पर एक वर्ष तक कैद, जुर्माना या दोनों का दंड।
- बीएलओ और ईआरओ
- बूथ लेवल अधिकारी घोषणापत्र में दिए विवरण पिछले एसआईआर नामावली से सत्यापित करते हैं; ईआरओ बेमेल विवरण पर नोटिस जारी करते हैं।
अभ्यास प्रश्न
- सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान्य 'अवशिष्ट अधिकार' और 'तर्कसंगत संबंध' की कसौटी के आलोक में परीक्षण करें कि क्या फॉर्म 6 के नए घोषणापत्र में रिश्तेदार के पिछले एसआईआर विवरण की मांग वैध ठहरती है।
- क्या निर्वाचन आयोग निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 में संशोधन के बिना वैधानिक प्रपत्रों में परिवर्तन कर सकता है? चर्चा कीजिए।
- मतदाता सूची की शुद्धता और मताधिकार की सुलभता के बीच संतुलन कैसे साधा जाए? एसआईआर के अनुभव के आधार पर सुझाव दीजिए।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।