कृषि श्रीकाकुलम

श्रीकाकुलम में केवड़ा की खेती, तेल 2.5 लाख रुपये प्रति लीटर

श्रीकाकुलम जिले के कई मंडलों में किसान करीब 6,000 हेक्टेयर में केवड़ा (मोगली) की खेती कर रहे हैं। एक पौधे से साल में चार महीने तक 1,000 तक फूल मिलते हैं और प्रति फूल करीब 14 से 16 रुपये मिलते हैं, जुलाई से अक्टूबर तक मांग रहती है। स्थानीय इकाइयां इन फूलों से तेल निकालती हैं, जो मौसम के अनुसार 2.50 लाख से 4 लाख रुपये प्रति लीटर बिकता है; एक लीटर के लिए 20,000 फूल चाहिए। यह चीन, रूस और अमेरिका को निर्यात होता है। किसान सब्सिडी मांग रहे हैं।

स्रोत

Srikakulam — వార్తలు · मूल ख़बर पढ़ें ↗

#kewda#srikakulam#farmers#exports#horticulture#oil

डेस्क जाँच · कुछ दावे ध्यान से पढ़ें

डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • Kewda (mogali) is cultivated across about 6,000 hectares in several mandals of Srikakulam district. — Figure appears in source; no department or official attributed.
  • Farmers sell each kewda flower for about Rs 14-16, with higher rates in season (July-October). — Figures appear in source; no trader or market source named.
  • Kewda oil fetches Rs 2.50 lakh to Rs 4 lakh per litre depending on season and about 20,000 flowers are needed per litre. — Both figures appear in source; unattributed.
  • The oil is exported to China, Russia and the US, and bought by traders from Kanpur, Bhubaneswar, Jaipur and Kolkata. — Stated in source without documentation or official export data.
  • The extract is said to relieve joint and rheumatic pain. — Reported in source as a general claim ('it is said'); medical claim unverified, attribute cautiously.

विश्लेषकों की राय राय

AI आर्थिक विश्लेषक

केवड़ा (मोगली) की खेती एक क्लासिक 'कम लागत, ऊँचा मूल्य' कहानी है। जिस फसल को लगभग सिंचाई नहीं चाहिए, जिसमें कीट नहीं लगते और जो खेत की बाड़ का काम भी करती है, वह किसान के लिए अतिरिक्त आय का रास्ता बनती है — लेकिन तेल प्रति लीटर 2.5 से 4 लाख रुपये बिकने के बावजूद उस मूल्य का बड़ा हिस्सा आसवन इकाइयों और निर्यात व्यापारियों के पास रहता है, 14-16 रुपये में फूल बेचने वाले किसान के पास नहीं। खबर के ही आंकड़ों से देखें — एक लीटर के लिए 20 हज़ार फूल — तो कच्चे माल की हिस्सेदारी अंतिम कीमत का एक हिस्सा भर है।

  • प्रति पेड़ साल में करीब एक हज़ार फूल, 14-16 रुपये प्रति फूल और पानी-कीटनाशक पर लगभग शून्य खर्च — यह मार्जिन छोटे किसानों के लिहाज़ से आकर्षक दिखता है।
  • मूल्य शृंखला का अंतर खबर के गणित में ही दिखता है: 20 हज़ार फूलों की लागत दी गई दरों पर 3 लाख रुपये से कम बैठती है, जबकि तेल 2.5-4 लाख रुपये लीटर बिकता है — यानी मुनाफ़ा कहाँ टिकेगा, यह मौसम और कीमतों के उतार-चढ़ाव पर निर्भर है।
  • चीन, रूस और अमेरिका को निर्यात तथा कानपुर, कोलकाता, जयपुर, भुवनेश्वर के खरीदार मांग का आधार चौड़ा करते हैं, पर कॉस्मेटिक्स, दवा और अगरबत्ती उद्योग पर निर्भरता बाहरी बाज़ार का जोखिम भी लाती है।
  • जुलाई से अक्टूबर तक की चार महीने की खिड़की का अर्थ है कि आय मौसमी है, इसलिए यह मुख्य फसल का विकल्प नहीं, सहायक आय के रूप में ही बेहतर है।
  • घाटे वाले नारियल बागों से किसानों के इस फसल की ओर मुड़ने की बात कीमत-संकेतों का असर दिखाती है, लेकिन एक ही विशिष्ट फसल पर भीड़ का अपना जोखिम भी है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि अगले जुलाई-अक्टूबर सीज़न में फूल की कीमत और रकबा किस दिशा में जाता है, और सरकार सब्सिडी या प्रोसेसिंग सहयोग पर कोई कदम उठाती है या नहीं।

यह खबर प्रति हेक्टेयर लागत, किसान की शुद्ध आय, निर्यात की मात्रा, उद्योग के मार्जिन या दावे किए गए औषधीय लाभों की पुष्टि स्थापित नहीं करती — इसलिए प्रति लीटर कीमत को किसान की आय समझना भूल होगी।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 3 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में किसान परंपरागत रूप से खेत की मेड़ों, नहर के किनारों और समुद्र तटीय भूमि पर बाड़ (कंचे) के रूप में उगाए जाने वाले केवड़ा (तेलुगु में 'मोगली') के पौधों को अब आय का स्रोत बना रहे हैं। जिले के कई मंडलों में करीब 6,000 हेक्टेयर में इसकी खेती हो रही है और स्थानीय इकाइयां इसके फूलों से इत्र/तेल निकालती हैं। यह तेल चीन, रूस और अमेरिका जैसे देशों तथा कानपुर, भुवनेश्वर, जयपुर और कोलकाता के व्यापारियों को बेचा जाता है। किसान इस खेती को कृषि-सहायक गतिविधि मानते हुए सरकार से सब्सिडी की मांग कर रहे हैं।

मुख्य तथ्य

  • श्रीकाकुलम जिले के कई मंडलों में करीब 6,000 हेक्टेयर क्षेत्र में केवड़ा (मोगली) की खेती हो रही है।
  • एक केवड़ा पौधे से साल में चार महीने तक करीब 1,000 फूल तक मिलते हैं।
  • किसान प्रति फूल करीब 14 से 16 रुपये में बेचते हैं; सीजन में यह दाम और बढ़ जाता है।
  • जुलाई, अगस्त, सितंबर और अक्टूबर महीनों में इन फूलों की मांग रहती है।
  • फूलों से निकला तेल/द्रव सीजन के अनुसार 2.50 लाख से 4 लाख रुपये प्रति लीटर तक बिकता है।
  • एक लीटर द्रव इकट्ठा करने के लिए करीब 20,000 केवड़ा फूल चाहिए।
  • तेल चीन, रूस, अमेरिका को निर्यात होता है; कानपुर, भुवनेश्वर, जयपुर, कोलकाता के व्यापारी भी खरीदते हैं।
  • ओडिशा में अगरबत्ती बनाने के लिए भी यह द्रव भेजा जाता है; इसका उपयोग कॉस्मेटिक्स और औषधियों में होता है।

समयरेखा

  1. एक शाखा लगाने के बाद एक वर्ष के भीतरपौधा पिलक (कल्ले) निकालकर बाड़ के रूप में फैल जाता है।
  2. जुलाई से अक्टूबर (चार महीने)फूलों का उत्पादन और मांग का चरम; एक पौधे से 1,000 फूल तक मिलते हैं।
  3. वर्तमाननारियल बागानों में घाटे के बाद कुछ किसान उन्हें हटाकर केवड़ा लगा रहे हैं; अन्य जगहों पर भी किसान तैयारी कर रहे हैं।

किसका दाँव

  • श्रीकाकुलम के केवड़ा किसान — कम लागत, बिना सिंचाई और बिना कीट-रोग वाली फसल से आय; सरकार से सब्सिडी की मांग।
  • स्थानीय इत्र/तेल निकालने वाली इकाइयां — पीतल के बर्तनों में फूल गर्म कर भाप से तेल निकालना और ऊंचे दाम पर बिक्री।
  • निर्यात बाजार (चीन, रूस, अमेरिका) — कॉस्मेटिक्स और औषधि उद्योग के लिए केवड़ा तेल की आपूर्ति।
  • कानपुर, भुवनेश्वर, जयपुर, कोलकाता के व्यापारी — द्रव की खरीद; ओडिशा की अगरबत्ती इकाइयों को आपूर्ति।
  • राज्य सरकार — किसानों की सब्सिडी मांग पर निर्णय; कृषि-सहायक गतिविधि को बढ़ावा।
  • नारियल व काजू बागान मालिक — बागानों के चारों ओर बाड़ के रूप में केवड़ा से अतिरिक्त आय; घाटे वाले बागानों का विकल्प।

क्यों अहम है

यह दिखाता है कि तटीय भूमि पर बाड़ के रूप में उगने वाला एक उपेक्षित पौधा उच्च मूल्य वाले सुगंध-उद्योग की कच्ची सामग्री बनकर किसानों की आय बढ़ा सकता है। बिना सिंचाई, बिना कीटनाशक और प्राकृतिक सुरक्षा दीवार के रूप में उगने वाली यह फसल तटीय क्षेत्रों में जलवायु-अनुकूल तथा विविधीकरण का मॉडल है। घाटे वाले नारियल बागानों के विकल्प के रूप में यह ग्रामीण आय और निर्यात दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • केवड़ा को तेलुगु में 'मोगली' कहा जाता है; प्रमुख खेती क्षेत्र: श्रीकाकुलम जिला, आंध्र प्रदेश।
  • श्रीकाकुलम में केवड़ा खेती का रकबा: करीब 6,000 हेक्टेयर।
  • केवड़ा तेल का दाम: 2.50 लाख से 4 लाख रुपये प्रति लीटर; एक लीटर के लिए 20,000 फूल।
  • फूलों का सीजन/मांग: जुलाई से अक्टूबर; प्रति फूल दाम 14-16 रुपये।
  • निष्कर्षण विधि: पीतल के बर्तनों में फूल गर्म कर भाप को ठंडा करके तेल एकत्र करना।
  • निर्यात गंतव्य: चीन, रूस, अमेरिका; घरेलू खरीदार - कानपुर, भुवनेश्वर, जयपुर, कोलकाता।

मेन्स दृष्टिकोण

श्रीकाकुलम का केवड़ा (मोगली) प्रकरण कृषि विविधीकरण और उच्च मूल्य वाली गैर-खाद्य फसलों की संभावना का उदाहरण है। कारण स्पष्ट हैं: तटीय मृदा में यह पौधा बिना सिंचाई और बिना कीट-रोग प्रबंधन के पनपता है, एक शाखा लगाने पर वर्ष भर में बाड़ बन जाता है और समुद्री हवा-कटाव के विरुद्ध प्राकृतिक रक्षा दीवार का काम करता है; साथ ही प्रति फूल 14-16 रुपये और प्रति लीटर तेल 2.50-4 लाख रुपये का मूल्य इसे आर्थिक रूप से आकर्षक बनाता है। निहितार्थ यह है कि नारियल बागानों में घाटे से जूझते किसान इसे विकल्प के रूप में अपना रहे हैं और स्थानीय इत्र इकाइयों के जरिये मूल्य-संवर्धन व निर्यात (चीन, रूस, अमेरिका) की शृंखला गांव स्तर पर बन रही है। चुनौतियां मौसमी मांग (जुलाई-अक्टूबर), दाम में उतार-चढ़ाव, एक लीटर के लिए 20,000 फूलों की श्रम-गहन आवश्यकता और संस्थागत सहयोग का अभाव हैं - इसीलिए किसान इसे कृषि-सहायक गतिविधि मानकर सरकारी रियायत मांग रहे हैं। आगे का रास्ता किसानों की मांग के अनुरूप सब्सिडी/सहायता, निष्कर्षण इकाइयों के आधुनिकीकरण, समूह-आधारित विपणन और निर्यात संपर्क मजबूत करने में निहित हो सकता है; स्रोत इससे आगे कोई नीतिगत घोषणा नहीं बताता।

मुख्य शब्द

मोगली / केवड़ा
तटीय क्षेत्रों में ऊंचा व घना उगने वाला सुगंधित फूलों वाला पौधा, जिसे खेत-नहर की मेड़ों पर बाड़ के रूप में लगाया जाता है।
केवड़ा तेल (द्रावणम्)
फूलों से भाप विधि द्वारा निकाला गया सुगंधित तेल, कॉस्मेटिक्स व औषधियों में प्रयुक्त; 2.50-4 लाख रुपये प्रति लीटर।
भाप आसवन (पीतल पात्र विधि)
पीतल के बर्तन में फूल गर्म कर उठने वाली भाप को दूसरे पात्र में ठंडा कर तेल एकत्र करने की स्थानीय प्रक्रिया।
कंचे (जीवित बाड़)
नारियल व काजू बागानों और खेतों की सीमा पर सुरक्षा दीवार के रूप में उगाए गए केवड़ा पौधे।
कृषि-सहायक गतिविधि
मुख्य फसल के साथ चलने वाली अतिरिक्त आय गतिविधि; किसान इसी आधार पर केवड़ा के लिए सरकारी रियायत चाहते हैं।
श्रीकाकुलम
आंध्र प्रदेश का तटीय जिला, जहां करीब 6,000 हेक्टेयर में केवड़ा की खेती और इत्र इकाइयां हैं।

अभ्यास प्रश्न

  1. तटीय क्षेत्रों में केवड़ा जैसी सुगंधित फसलें किस प्रकार कृषि विविधीकरण और किसान आय वृद्धि का साधन बन सकती हैं? श्रीकाकुलम के उदाहरण से समझाइए।
  2. उच्च मूल्य वाली सुगंध फसलों के मामले में मूल्य-संवर्धन और निर्यात शृंखला किसानों तक लाभ पहुंचाने में क्यों निर्णायक है? चर्चा करें।
  3. क्या जीवित बाड़ के रूप में उगाई जाने वाली फसलें तटीय कृषि की जलवायु-अनुकूलन रणनीति का हिस्सा हो सकती हैं? परीक्षण कीजिए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

अगली ख़बर'दृश्यम 3' ने चार दिनों में ₹197.50 करोड़ कमाए →
← सभी ख़बरें