जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सुगठित नीतियां जरूरी: राष्ट्रपति मुर्मू

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने रविवार को कहा कि जलवायु परिवर्तन एक जटिल चुनौती है, जिससे जैव विविधता की हानि, जल संकट और भूमि क्षरण हो रहा है, और इससे निपटने के लिए नीतियों व कार्रवाई का सुगठित ढांचा आवश्यक है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र में उन्होंने सरकारों, कानूनी विशेषज्ञों और प्रभावित समुदायों की भागीदारी, पारंपरिक ज्ञान आधारित अनुकूलन और सतत वनरोपण पर बल दिया। सम्मेलन में 17 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए।

स्रोत

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डेस्क ने क्या जाँचा (4)
  • Climate change causes biodiversity loss, water stress and land degradation and needs a well-structured framework of policies and actions. — Attributed to President Droupadi Murmu at the conference valedictory session.
  • The two-day international conference on 'The Future of Environment and Climate Dynamics' was organised by the National Green Tribunal. — Stated in source; organiser named.
  • India's per-capita emissions are less than half the global average and those of developed countries are six times higher. — Attributed to PM Narendra Modi on the conference's first day; figures not independently verifiable here.
  • Experts, judges, jurists and stakeholders from 17 countries attended, with Khattar, justice Nagarathna, justice Shrivastava and SG Tushar Mehta present on Sunday. — Figure and names appear in source; no separate sourcing given.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

ऊपर से यह पर्यावरण पर दिया गया भाषण था, लेकिन इसका राजनीतिक संदेश साफ है — जलवायु संबंधी प्रतिबद्धताएँ भारत की विकास ज़रूरतों के अनुरूप और "तकनीकी रूप से व्यवहार्य" होनी चाहिए। पहले दिन प्रधानमंत्री मोदी की यह टिप्पणी कि विकासशील देशों को उत्सर्जन के लिए "अन्यायपूर्ण ढंग से दोषी" ठहराया जाता है, और राष्ट्रपति का यह ज़ोर — दोनों में एक ही रणनीतिक धागा दिखता है। इस मंच ने भारत के वार्ता-रुख को देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद का वज़न दिया।

  • एक ही सम्मेलन में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति, दोनों द्वारा विकासशील देशों का पक्ष रखना जलवायु कूटनीति में भारत की एकजुट आवाज़ गढ़ने की कोशिश के रूप में पढ़ा जा सकता है।
  • वन-आश्रित समुदायों, छोटे किसानों और महिलाओं का स्पष्ट उल्लेख राजनीतिक रूप से असरदार भाषा है, और आदिवासी पृष्ठभूमि वाली राष्ट्रपति के मुँह से इसकी विश्वसनीयता बढ़ती है।
  • न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, एनजीटी अध्यक्ष) और कार्यपालिका (केंद्रीय मंत्री, सॉलिसिटर जनरल) की एक मंच पर उपस्थिति पर्यावरण नीति पर संस्थागत सहमति की तस्वीर पेश करती है।
  • वनीकरण का अर्थ केवल पेड़ लगाना नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली है — इस ज़ोर को लक्ष्यों के बजाय परिणाम मापने की परोक्ष नीतिगत नसीहत के रूप में देखा जा सकता है।
  • 17 देशों के प्रतिनिधियों की भागीदारी वैश्विक दक्षिण की आवाज़ के रूप में भारत की दीर्घकालिक स्थिति-निर्माण से मेल खाती है।

किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि सम्मेलन के विषय — समुदाय की भागीदारी और पारंपरिक ज्ञान आधारित अनुकूलन — वास्तविक कानूनी बदलाव या एनजीटी के संस्थागत सुधार में बदलते हैं या केवल भाषणों तक सीमित रहते हैं।

यह खबर किसी नई नीति, कानून या वित्तीय प्रतिबद्धता की पुष्टि नहीं करती, और आगे की सरकारी कार्रवाई या विपक्ष की प्रतिक्रिया पर कुछ नहीं बताती।

गहराई से

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सार

पृष्ठभूमि

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने "पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता का भविष्य" विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें 17 देशों के विशेषज्ञ, न्यायाधीश, विधिवेत्ता और हितधारक शामिल हुए। रविवार को समापन सत्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि जलवायु परिवर्तन एक जटिल चुनौती है जो जैव विविधता की हानि, जल संकट और भूमि क्षरण का कारण बन रही है। सम्मेलन के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाग लिया था और विकासशील देशों पर कार्बन उत्सर्जन के लिए "अन्यायपूर्ण दोषारोपण" का मुद्दा उठाया था।

मुख्य तथ्य

  • राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने रविवार को NGT के दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित किया।
  • सम्मेलन का विषय था "The Future of Environment and Climate Dynamics" (पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता का भविष्य)।
  • सम्मेलन में 17 देशों के विशेषज्ञ, न्यायाधीश, विधिवेत्ता और प्रमुख हितधारक शामिल हुए।
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले दिन कहा कि भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत के "आधे से भी कम" है।
  • प्रधानमंत्री के अनुसार विकसित देशों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन छह गुना अधिक है, फिर भी विकासशील देशों को "अन्यायपूर्ण ढंग से दोषी" ठहराया जाता है।
  • रविवार के सत्र में केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल खट्टर, सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, NGT अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता शामिल हुए।
  • राष्ट्रपति ने कहा कि सतत वनरोपण का वास्तविक उद्देश्य केवल पेड़ लगाना नहीं, बल्कि स्वस्थ और आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्स्थापना है।
  • राष्ट्रपति ने कहा कि जिम्मेदार जलवायु कार्रवाई की प्रतिबद्धताएं देश की विकास आवश्यकताओं, आर्थिक आकांक्षाओं के अनुरूप और तकनीकी रूप से व्यावहारिक होनी चाहिए।

समयरेखा

  1. सम्मेलन का पहला दिनप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाग लिया; विकासशील देशों पर कार्बन उत्सर्जन के अन्यायपूर्ण दोषारोपण और भारत के कम प्रति व्यक्ति उत्सर्जन का उल्लेख किया।
  2. रविवार (सम्मेलन का दूसरा/समापन दिन)राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने समापन सत्र को संबोधित किया; न्यायमूर्ति नागरत्ना और NGT अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्रीवास्तव ने भी संबोधन दिया।

किसका दाँव

  • राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू — जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए नीतियों व कार्रवाई के सुगठित ढांचे और जन-केंद्रित अनुकूलन की पैरवी।
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) — सम्मेलन का आयोजक; पर्यावरणीय न्याय-निर्णयन और अंतरराष्ट्रीय संवाद का मंच तैयार करना।
  • ग्रामीण एवं वनवासी समुदाय, छोटे किसान, महिलाएं — प्राकृतिक आपदाओं की सर्वाधिक मार इन पर पड़ती है; इनकी आवश्यकताओं के प्रति विशेष संवेदनशीलता आवश्यक बताई गई।
  • विकासशील देश — कार्बन उत्सर्जन के लिए दोषारोपण का सामना; विकास की गति बनाए रखते हुए जलवायु सहनशीलता बढ़ाने की चुनौती।
  • न्यायपालिका (न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव) — पर्यावरणीय शासन में विकास और संरक्षण का संतुलन; उत्तरदायी व भविष्योन्मुखी पर्यावरण कानून गढ़ना।
  • सरकारें और विधि विशेषज्ञ — प्रभावित समुदायों के साथ मिलकर नीतिगत ढांचे में सक्रिय भागीदारी।

क्यों अहम है

जलवायु परिवर्तन पर भारत का रुख दो स्तरों पर टिका है — जलवायु न्याय (कम प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के बावजूद दोषारोपण) और विकास की गति बनाए रखते हुए सहनशीलता बढ़ाना। राष्ट्रपति और न्यायपालिका दोनों का जोर संकेत देता है कि पर्यावरणीय शासन अब केवल चुनौतियों की पहचान से आगे बढ़कर कानून, संस्थाओं और साझेदारियों के निर्माण की ओर जा रहा है, जिसमें कमजोर समुदायों और भावी पीढ़ियों का हित केंद्र में हो।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के अध्यक्ष: न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव (स्रोत के अनुसार)।
  • NGT द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का विषय: "The Future of Environment and Climate Dynamics"; 17 देशों की भागीदारी।
  • प्रधानमंत्री मोदी: भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत के आधे से कम; विकसित देशों का छह गुना अधिक।
  • राष्ट्रपति मुर्मू ने जलवायु परिवर्तन के तीन प्रभाव गिनाए: जैव विविधता हानि, जल संकट और भूमि क्षरण।
  • सम्मेलन में उपस्थित: केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल खट्टर, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना।
  • न्यायमूर्ति श्रीवास्तव ने प्रौद्योगिकी, नवाचार, सतत वित्त और न्यायसंगत परिवर्तन (just transition) को पर्यावरण कानून का हिस्सा बताया।

मेन्स दृष्टिकोण

राष्ट्रपति मुर्मू का संबोधन जलवायु परिवर्तन को एक बहुआयामी चुनौती के रूप में प्रस्तुत करता है — जैव विविधता की हानि, जल संकट और भूमि क्षरण इसके ठोस लक्षण हैं, और इनका बोझ असमान रूप से ग्रामीण व वनवासी समाजों, छोटे किसानों, महिलाओं और अन्य संवेदनशील समुदायों पर पड़ता है। इसलिए प्रभावी प्रतिक्रिया के लिए नीतियों और कार्रवाई का सुगठित ढांचा चाहिए जिसमें सरकारों और विधि विशेषज्ञों के साथ-साथ सर्वाधिक प्रभावित समुदाय भी सक्रिय भागीदार हों। राष्ट्रपति ने पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों तथा स्थानीय समुदायों के अनुभवों पर आधारित जन-केंद्रित व समुदाय-आधारित अनुकूलन को जलवायु सहनशीलता का आधार बताया, और सतत वनरोपण का उद्देश्य केवल वृक्षारोपण नहीं बल्कि स्वस्थ, आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्स्थापना रेखांकित किया। समानता का आयाम भी स्पष्ट है: विकासशील देशों को विकास की गति बनाए रखते हुए सहनशीलता बढ़ाने का मार्ग चुनना होगा, और जलवायु प्रतिबद्धताएं विकास आवश्यकताओं, आर्थिक आकांक्षाओं तथा तकनीकी व्यावहारिकता के अनुरूप हों — प्रधानमंत्री के इस तर्क के साथ कि भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत के आधे से भी कम है। आगे का रास्ता न्यायपालिका के सुझावों में दिखता है: विकास व संरक्षण, वर्तमान आवश्यकताओं व भावी हितों के बीच संतुलन, तथा प्रौद्योगिकी, नवाचार, सतत वित्त और न्यायसंगत परिवर्तन को समाहित करने वाला उत्तरदायी व भविष्योन्मुखी पर्यावरण कानून।

मुख्य शब्द

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT)
पर्यावरण संबंधी मामलों के निपटारे वाली संस्था, जिसने यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया; स्रोत के अनुसार अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव।
जलवायु सहनशीलता (Climate Resilience)
जलवायु प्रभावों को सहने और उनसे उबरने की क्षमता, जिसे राष्ट्रपति ने जन-केंद्रित व समुदाय-आधारित अनुकूलन से मजबूत करने पर बल दिया।
पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां
स्थानीय समुदायों की प्रथाएं और जीवनानुभव, जिन्हें राष्ट्रपति ने जलवायु अनुकूलन क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण बताया।
सतत वनरोपण
स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप और जैव विविधता को पोषित करने वाला वनरोपण, जिसका लक्ष्य आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्स्थापना है।
प्रति व्यक्ति उत्सर्जन
किसी देश में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन; प्रधानमंत्री के अनुसार भारत का यह आंकड़ा वैश्विक औसत के आधे से भी कम है।
न्यायसंगत परिवर्तन (Just Transition)
स्वच्छ अर्थव्यवस्था की ओर ऐसा बदलाव जो प्रभावित लोगों के हितों का ध्यान रखे; न्यायमूर्ति श्रीवास्तव ने इसे पर्यावरण कानून का अंग बताया।

अभ्यास प्रश्न

  1. जलवायु परिवर्तन से निपटने में "जन-केंद्रित और समुदाय-आधारित अनुकूलन" तथा पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों की भूमिका का परीक्षण कीजिए।
  2. "सतत वनरोपण का वास्तविक उद्देश्य केवल पेड़ लगाना नहीं है" — इस कथन के आलोक में भारत की वनरोपण रणनीति पर चर्चा कीजिए।
  3. विकासशील देशों के लिए जलवायु प्रतिबद्धताओं और विकास आवश्यकताओं के बीच संतुलन की चुनौती का विश्लेषण कीजिए। क्या पर्यावरण कानून इस संतुलन को साध सकता है?

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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