पर्यावरण न्याय का 'बरगद' है सुप्रीम कोर्ट: सीजेआई सूर्यकांत

पर्यावरण और पारिस्थितिकी की रक्षा में भूमिका के लिए सुप्रीम कोर्ट को पर्यावरण न्याय का 'बरगद' बताते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि संरक्षण और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं और दोनों में संतुलन जरूरी है। एनजीटी द्वारा आयोजित 'द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनामिक्स' के उद्घाटन सत्र में उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 21 में शामिल कर अदालत ने प्रदूषण मुक्त पर्यावरण के अधिकार को मूल अधिकार बनाया और हाल ही में 'इको-सेंट्रिक प्रोपोर्शनैलिटी' की अवधारणा रखी।

स्रोत

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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • CJI Surya Kant described the Supreme Court as the 'banyan tree' of environmental justice — Directly attributed to the CJI in the source, with quoted remarks.
  • The remarks were made at the inaugural session of 'The Future of Environment and Climate Dynamics' organised by NGT — Event and organiser named in source; no date beyond 'Saturday' given.
  • The Supreme Court made the right to a pollution-free environment a fundamental right by reading it into Article 21 — Stated by the CJI as reported; no specific judgment cited in the source.
  • The Supreme Court recently articulated the idea of 'eco-centric proportionality' — Attributed to the CJI; the source names no specific case or date.
  • Recent Indian climate jurisprudence recognises climate change can affect fundamental rights of equality, livelihood and health — Quoted from the CJI's speech; no ruling cited in source.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

सीजेआई सूर्य कांत की टिप्पणी केवल न्यायपालिका का आत्म-वर्णन नहीं है, बल्कि यह संकेत भी है कि पर्यावरण नीति के क्षेत्र में अदालत अपनी भूमिका छोड़ने के मूड में नहीं है। 'संरक्षण और विकास परस्पर विरोधी नहीं हैं' — यह सूत्र राजनीतिक रूप से सधा हुआ है, क्योंकि यह पर्यावरण याचिकाकर्ताओं को भरोसा देता है और साथ ही परियोजनाओं की रफ्तार चाहने वाली सरकारों व उद्योग के लिए भी स्वीकार्य रहता है। 'इको-सेंट्रिक प्रोपोर्शनैलिटी' के जरिए अदालत खुद को विकास में रोड़ा नहीं, बल्कि शर्तों को लागू कराने वाली संस्था के रूप में पेश कर रही है।

  • अनुच्छेद 21 में प्रदूषण-मुक्त पर्यावरण के अधिकार को शामिल करने से पर्यावरण विवाद सामान्य राजनीतिक मोलभाव से हटकर संवैधानिक अधिकारों के मजबूत दायरे में आ जाते हैं, जिससे याचिकाकर्ताओं और जनांदोलनों को बल मिलता है।
  • विकास बनाम पर्यावरण के द्वंद्व को खारिज करके सीजेआई उस आम आलोचना का पहले ही जवाब दे देते हैं कि परियोजनाओं पर न्यायिक निगरानी विकास-विरोधी है।
  • लागू करने योग्य शर्तें, विशेषज्ञ निगरानी, बहाली, प्रतिपूरक वनीकरण और जवाबदेही पर जोर कार्यपालिका पर सतत न्यायिक निगरानी की ओर इशारा करता है — यह संस्थागत संतुलन का मामला है।
  • यह भाषण एनजीटी के आयोजन में दिया गया, जो पर्यावरण ट्रिब्यूनल ढांचे को शीर्ष अदालत का नैतिक समर्थन माना जाएगा।
  • जलवायु परिवर्तन के समानता, आजीविका और स्वास्थ्य के अधिकारों पर असर को मान्यता देना भविष्य में सरकारी नीतियों को अदालत में चुनौती देने की गुंजाइश बढ़ाता है।

किस पर नज़र रखें — आगे आने वाले बुनियादी ढांचे, खनन और वन-मंजूरी से जुड़े मामलों में अदालतें 'इको-सेंट्रिक प्रोपोर्शनैलिटी' को कैसे लागू करती हैं और सरकारों व उद्योग की प्रतिक्रिया क्या रहती है, इस पर नजर रखें।

यह एक सम्मेलन में दिया गया भाषण है, किसी विशेष परियोजना या नीति पर फैसला नहीं, और खबर में सरकार या किसी राजनीतिक दल की प्रतिक्रिया दर्ज नहीं है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 3 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा आयोजित 'द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनामिक्स' कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट की पर्यावरण न्याय में भूमिका पर विचार रखे। उन्होंने कोर्ट को पर्यावरण न्याय का 'बरगद' बताया और कहा कि संरक्षण व विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। भारत में संविधान में पर्यावरण संरक्षण के प्रावधान हैं, पर सीजेआई के अनुसार ये शब्द केवल बीज हैं जिन्हें न्यायिक विवेक के जल से सींचने की आवश्यकता होती है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण मुक्त पर्यावरण के अधिकार को अनुच्छेद 21 में पढ़कर मूल अधिकार का दर्जा दिया है।

मुख्य तथ्य

  • सीजेआई सूर्यकांत ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट को पर्यावरण न्याय का 'बरगद' (banyan tree) कहा।
  • कार्यक्रम 'द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनामिक्स' का आयोजन एनजीटी ने किया; सीजेआई ने उद्घाटन सत्र को संबोधित किया।
  • सीजेआई के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण मुक्त पर्यावरण के अधिकार को सीधे अनुच्छेद 21 में पढ़कर मूल अधिकार बनाया।
  • सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 'इको-सेंट्रिक प्रोपोर्शनैलिटी' (पारिस्थितिकी-केंद्रित समानुपातिकता) की अवधारणा प्रस्तुत की।
  • इस अवधारणा के तहत विकास की अनुमति केवल प्रवर्तनीय शर्तों, विशेषज्ञ निगरानी, पुनर्स्थापन, प्रतिपूरक वनरोपण और जवाबदेही के साथ दी जाती है।
  • सीजेआई ने कहा कि पर्यावरणीय मुद्दों की कोई भौगोलिक सीमाएं नहीं होतीं।
  • उन्होंने कहा कि संरक्षण के बिना प्रगति मृगतृष्णा है जो पारिस्थितिक विनाश के रेगिस्तान में विलीन हो जाती है।
  • जलवायु पर हाल की भारतीय न्यायिक व्याख्या मानती है कि जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभाव समानता, आजीविका और स्वास्थ्य के मूल अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं।

समयरेखा

  1. दशकों से (स्रोत में विशेष तिथि नहीं)सुप्रीम कोर्ट ने संरक्षण के बिना प्रगति को मृगतृष्णा बताते हुए पर्यावरण न्याय विकसित किया; प्रदूषण मुक्त पर्यावरण का अधिकार अनुच्छेद 21 में शामिल किया।
  2. हाल ही में (तिथि स्रोत में नहीं)सुप्रीम कोर्ट ने 'इको-सेंट्रिक प्रोपोर्शनैलिटी' की अवधारणा स्पष्ट की; जलवायु परिवर्तन के मूल अधिकारों पर प्रभाव को मान्यता दी।
  3. शनिवार (स्रोत में तारीख नहीं)एनजीटी के कार्यक्रम 'द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनामिक्स' के उद्घाटन सत्र में सीजेआई सूर्यकांत का संबोधन।

किसका दाँव

  • सुप्रीम कोर्ट — संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या कर पर्यावरण अधिकारों को जीवंत बनाने वाली संस्था; सीजेआई के शब्दों में पर्यावरण न्याय का 'बरगद'।
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) — पर्यावरण व जलवायु पर विमर्श का आयोजक; पर्यावरणीय विवादों के निपटारे का विशिष्ट मंच।
  • सीजेआई सूर्यकांत — संरक्षण और विकास के संतुलन तथा इको-सेंट्रिक प्रोपोर्शनैलिटी के दृष्टिकोण को रेखांकित किया।
  • भावी पीढ़ियां — सीजेआई के अनुसार अदालत की शाखाएं 'अदृश्य पीढ़ियों' के अधिकारों को आश्रय देती हैं।
  • विकास परियोजनाएं व नियामक/विशेषज्ञ निकाय — परियोजनाओं की अनुमति प्रवर्तनीय शर्तों, विशेषज्ञ निगरानी, पुनर्स्थापन, प्रतिपूरक वनरोपण और जवाबदेही से जुड़ी।
  • जलवायु प्रभावित नागरिक — जलवायु परिवर्तन से समानता, आजीविका, स्वास्थ्य जैसे मूल अधिकार प्रभावित होने की न्यायिक मान्यता।

क्यों अहम है

पर्यावरण अधिकारों को अनुच्छेद 21 से जोड़ने की न्यायिक परंपरा भारत में विकास परियोजनाओं की मंजूरी, निगरानी और जवाबदेही के ढांचे को सीधे प्रभावित करती है। 'इको-सेंट्रिक प्रोपोर्शनैलिटी' यह संकेत देती है कि अदालतें विकास पर पूर्ण रोक की जगह शर्तों, विशेषज्ञ निगरानी और पुनर्स्थापन आधारित संतुलन की ओर बढ़ रही हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को मूल अधिकारों से जोड़ने से जलवायु मुकदमेबाजी का संवैधानिक आधार मजबूत होता है।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • सीजेआई सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट को पर्यावरण न्याय का 'बरगद' कहा।
  • प्रदूषण मुक्त पर्यावरण का अधिकार अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) में पढ़कर मूल अधिकार बनाया गया।
  • 'इको-सेंट्रिक प्रोपोर्शनैलिटी' सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल में प्रस्तुत अवधारणा है।
  • कार्यक्रम 'द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनामिक्स' का आयोजक: एनजीटी।
  • इको-सेंट्रिक प्रोपोर्शनैलिटी के तत्व: प्रवर्तनीय शर्तें, विशेषज्ञ निगरानी, पुनर्स्थापन, प्रतिपूरक वनरोपण, जवाबदेही।
  • हाल की भारतीय जलवायु न्यायिक व्याख्या: जलवायु परिवर्तन समानता, आजीविका व स्वास्थ्य के अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।

मेन्स दृष्टिकोण

भारतीय संविधान में पर्यावरण संरक्षण के प्रावधान मौजूद हैं, परंतु सीजेआई सूर्यकांत के अनुसार संविधान के शब्द केवल बीज हैं जिन्हें न्यायिक विवेक के जल से सींचकर जीवन मिलता है — इसी भूमिका में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण मुक्त पर्यावरण के अधिकार को अनुच्छेद 21 में समाहित किया। विकास बनाम संरक्षण का द्वंद्व भारत की नीतिगत बहस का केंद्र रहा है; सीजेआई का तर्क है कि दोनों परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि संतुलन की मांग करते हैं, क्योंकि संरक्षण के बिना प्रगति मृगतृष्णा है और प्रकृति की रक्षा परोपकार नहीं, आत्म-संरक्षण है। हाल में प्रस्तुत 'इको-सेंट्रिक प्रोपोर्शनैलिटी' इसी व्यावहारिक मार्ग को दर्शाती है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण कठोर तो हो पर इतना विवेकशील भी हो कि वास्तविक दुनिया से संवाद कर सके — अर्थात विकास की अनुमति प्रवर्तनीय शर्तों, विशेषज्ञ निगरानी, पुनर्स्थापन, प्रतिपूरक वनरोपण और जवाबदेही के साथ। आगे की राह के रूप में स्रोत यही संकेत देता है: शर्तों के प्रवर्तन व जवाबदेही को सुदृढ़ करना, तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समानता, आजीविका और स्वास्थ्य के मूल अधिकारों के संवैधानिक दायरे में रखकर देखना; पर्यावरणीय मुद्दे भौगोलिक सीमाओं से परे हैं, अतः दृष्टिकोण व्यापक होना चाहिए।

मुख्य शब्द

एनजीटी (राष्ट्रीय हरित अधिकरण)
पर्यावरण संबंधी मामलों से जुड़ा अधिकरण, जिसने 'द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनामिक्स' कार्यक्रम आयोजित किया।
अनुच्छेद 21
जीवन का अधिकार; सुप्रीम कोर्ट ने इसमें प्रदूषण मुक्त पर्यावरण के अधिकार को पढ़कर मूल अधिकार बनाया।
इको-सेंट्रिक प्रोपोर्शनैलिटी
सुप्रीम कोर्ट की हाल की अवधारणा: पर्यावरण संरक्षण कठोर हो, पर वास्तविक दुनिया से जुड़ने योग्य विवेकशील भी।
प्रतिपूरक वनरोपण
विकास की अनुमति से जुड़ी शर्तों में शामिल उपाय, जिसमें हुई क्षति की पूर्ति के लिए वनरोपण किया जाता है।
पर्यावरण न्याय का 'बरगद'
सीजेआई का रूपक — जड़ें सभ्यतागत मूल्यों में गहरी और शाखाएं भावी 'अदृश्य पीढ़ियों' के अधिकारों को आश्रय देने वाली।

अभ्यास प्रश्न

  1. सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 की व्याख्या के जरिए पर्यावरण अधिकारों को कैसे विस्तार दिया है? चर्चा कीजिए।
  2. 'इको-सेंट्रिक प्रोपोर्शनैलिटी' की अवधारणा विकास और संरक्षण के बीच संतुलन साधने में कितनी प्रभावी हो सकती है? परीक्षण कीजिए।
  3. जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समानता, आजीविका और स्वास्थ्य के मूल अधिकारों से जोड़ने के संवैधानिक निहितार्थ क्या हैं?

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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