पैक्स चुनाव तुरंत कराने की मांग, फोरम ने सरकार को लिखा पत्र
पैक्स राज्य फोरम ने शनिवार को तेलंगाणा सरकार से प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों (पैक्स) के चुनाव तुरंत कराने और प्रक्रिया पूरी होने तक मौजूदा प्रबंध समितियों को जारी रखने का आग्रह किया। सहकारिता विभाग के विशेष आयुक्त राहुल राज को लिखे पत्र में फोरम ने याद दिलाया कि तेलंगाणा सहकारी समिति अधिनियम-1964 के तहत हर पांच साल में चुनाव अनिवार्य हैं। राज्य की 908 पैक्स में फरवरी 2020 में चुनाव हुए थे और कार्यकाल समाप्त होने के एक साल बाद भी प्रस्ताव नहीं भेजे गए।
स्रोत
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डेस्क जाँच · स्रोत से तुलना की
डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- PACS State Forum asked the government on Saturday to hold elections immediately and let existing managing committees continue until the process ends — Attributed in source to the forum's letter to Special Commissioner Rahul Raj; no government response given
- Telangana Cooperative Societies Act, 1964 requires elections every five years — Cited in the forum's letter as per source; statutory text not independently shown
- Telangana has 908 PACS, which last held elections in February 2020, and their term ended over a year ago — Figures appear in source as stated by the forum
- High Court stayed GO-597 dissolving managing committees and restored GO-386, after which committees resumed charge on May 4, 2026 — Attributed to forum leaders; court order not directly quoted in source
- Welfare schemes and subsidies from NABARD and the Centre and state are not reaching farmers due to delayed elections — Forum's assertion; no supporting data or official source given
विश्लेषकों की राय राय
पीएसीएस चुनावों में देरी केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं है — यह ग्रामीण ऋण की लागत और किसानों के नकदी प्रवाह से जुड़ा आर्थिक मुद्दा है। फोरम के मुताबिक राज्य की 908 समितियों के चुनाव फरवरी 2020 में हुए थे और कार्यकाल समाप्त होने के एक साल बाद भी चुनाव प्राधिकरण को प्रस्ताव नहीं भेजे गए; उसका आरोप है कि स्पष्ट अधिकारों के बिना कार्यकारिणियों के चलते नाबार्ड सहित केंद्र और राज्य की योजनाओं व सब्सिडी का लाभ किसानों तक नहीं पहुंच रहा। यदि यह सही है, तो संस्थागत ऋण से वंचित किसान महंगे विकल्पों की ओर जा सकते हैं — और ब्याज का बोझ उन्हीं पर पड़ेगा।
- पीएसीएस फसल ऋण, उर्वरक और सब्सिडी वितरण की अंतिम कड़ी हैं; वहां निर्णय लेने का अधिकार अस्पष्ट रहने पर ऋण वितरण धीमा पड़ सकता है।
- देरी की कीमत सबसे ज्यादा छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ती है, जिनके लिए बैंक या निजी उधारी के विकल्प महंगे और कठिन हैं।
- योजनाएं और सब्सिडी किसानों तक न पहुंचने की बात फोरम का दावा है; खबर में यह आंकड़ा नहीं है कि कितना ऋण या धन वास्तव में रुका है।
- जीओ-597 पर हाईकोर्ट का हस्तक्षेप, जीओ-386 की बहाली और 4 मई 2026 को कार्यकारिणियों के फिर कार्यभार संभालने से लंबी अनिश्चितता दिखती है, जो समितियों की ऋण व खरीद योजना को उलझाती है।
- दूसरी ओर, सरकार का पक्ष इस खबर में दर्ज नहीं है; चुनाव तैयारी, मतदाता सूची या ऑडिट जैसे प्रशासनिक कारण भी संभव हो सकते हैं।
किस पर नज़र रखें — देखना होगा कि सरकार चुनाव प्राधिकरण को प्रस्ताव भेजती है या नहीं, और अगले खरीफ/रबी ऋण चक्र से पहले चुनाव कार्यक्रम आता है या नहीं।
यह खबर स्वतंत्र आंकड़ों या सरकारी जवाब से यह स्थापित नहीं करती कि ऋण या सब्सिडी प्रवाह वास्तव में कितना रुका है — यह विश्लेषण मुख्यतः फोरम के दावों पर आधारित है।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 5 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
तेलंगाणा में प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों (पैक्स) के प्रबंध समितियों (पालकवर्ग) का कार्यकाल समाप्त होने के एक साल से अधिक समय बाद भी नए चुनाव नहीं हुए हैं। तेलंगाणा सहकारी समिति अधिनियम-1964 के अनुसार सहकारी समितियों के चुनाव हर पांच साल में अनिवार्य हैं। राज्य की 908 पैक्स में पिछले चुनाव फरवरी 2020 में हुए थे। पैक्स राज्य फोरम ने शनिवार (19 सितंबर) को सहकारिता विभाग के विशेष आयुक्त राहुल राज को पत्र लिखकर तुरंत चुनाव कराने और प्रक्रिया पूरी होने तक मौजूदा प्रबंध समितियों को जारी रखने की मांग की।
मुख्य तथ्य
- पैक्स राज्य फोरम ने शनिवार, 19 सितंबर को तेलंगाणा सरकार से पैक्स के चुनाव तुरंत कराने का आग्रह किया।
- फोरम प्रतिनिधियों ने सहकारिता विभाग के विशेष आयुक्त राहुल राज को पत्र के जरिए यह मांग रखी।
- तेलंगाणा सहकारी समिति अधिनियम-1964 के प्रावधानों के तहत सहकारी समितियों के चुनाव हर पांच साल में कराना अनिवार्य है।
- राज्यभर में 908 पैक्स समितियां हैं और इनके चुनाव फरवरी 2020 में हुए थे।
- कार्यकाल समाप्त होने के एक साल से अधिक बीत जाने पर भी चुनाव प्राधिकरण को प्रस्ताव नहीं भेजे गए, जिसे फोरम ने गंभीर बताया।
- अधिकारियों ने बिना कारण, अवैध रूप से प्रबंध समितियों को भंग करते हुए जीओ-597 जारी किया, जिसके खिलाफ फोरम हाईकोर्ट गया।
- हाईकोर्ट ने जीओ-597 पर रोक (स्टे) लगाकर जीओ-386 को पुनर्बहाल करने के आदेश दिए।
- 4 मई 2026 को 908 समितियों के प्रबंध समितियों ने फिर से कार्यभार संभाला, फिर भी चुनाव कराने में देरी जारी है।
समयरेखा
- फरवरी 2020राज्य की 908 पैक्स समितियों के चुनाव हुए।
- तिथि स्रोत में नहींअधिकारियों ने प्रबंध समितियों को भंग करते हुए जीओ-597 जारी किया; फोरम ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
- तिथि स्रोत में नहींहाईकोर्ट ने जीओ-597 पर रोक लगाई और जीओ-386 को पुनर्बहाल किया।
- 4 मई 2026908 समितियों के प्रबंध समितियों ने दोबारा कार्यभार संभाला।
- 19 सितंबर (शनिवार)पैक्स राज्य फोरम ने विशेष आयुक्त राहुल राज को पत्र लिखकर तुरंत चुनाव की मांग की।
किसका दाँव
- पैक्स राज्य फोरम — समितियों में लोकतांत्रिक चुनाव और प्रबंध समितियों की निरंतरता सुनिश्चित कराना।
- तेलंगाणा सरकार / सहकारिता विभाग के विशेष आयुक्त राहुल राज — अधिनियम-1964 के तहत चुनाव प्रस्ताव भेजने और प्रक्रिया शुरू करने की जिम्मेदारी।
- 908 पैक्स की प्रबंध समितियां — जीओ-597 से भंग किए जाने के बाद हाईकोर्ट आदेश पर 4 मई 2026 को पुनः कार्यभार, पर अधिकारों का अभाव।
- किसान — चुनाव न होने और समितियों के अधिकारहीन होने से नाबार्ड, केंद्र व राज्य की कल्याण योजनाएं और रियायतें नहीं मिल रहीं।
- तेलंगाणा हाईकोर्ट — जीओ-597 पर स्टे और जीओ-386 की पुनर्बहाली का आदेश देकर मामले में हस्तक्षेप।
- चुनाव प्राधिकरण संस्था — विभाग से प्रस्ताव मिलने पर ही पैक्स चुनाव करा सकती है।
क्यों अहम है
पैक्स ग्रामीण ऋण, कृषि इनपुट और सरकारी योजनाओं की जमीनी कड़ी हैं; निर्वाचित प्रबंध समितियों के बिना ये संस्थाएं अधिकारहीन हो जाती हैं। फोरम का कहना है कि समय पर चुनाव न होने से नाबार्ड सहित केंद्र और राज्य की कल्याण योजनाएं व रियायतें किसानों तक नहीं पहुंच रही हैं। यह मामला सहकारी लोकतंत्र, वैधानिक समयसीमा के पालन और कार्यपालिका की जवाबदेही का प्रश्न उठाता है।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- तेलंगाणा सहकारी समिति अधिनियम-1964: सहकारी समितियों के चुनाव हर पांच साल में अनिवार्य।
- तेलंगाणा में 908 प्राथमिक कृषि सहकारी समितियां (पैक्स); पिछले चुनाव फरवरी 2020 में।
- जीओ-597 से प्रबंध समितियां भंग; हाईकोर्ट ने स्टे देकर जीओ-386 पुनर्बहाल किया।
- 4 मई 2026 को 908 समितियों के प्रबंध समितियों ने दोबारा कार्यभार संभाला।
- पत्र सहकारिता विभाग के विशेष आयुक्त राहुल राज को संबोधित किया गया।
- फोरम के अनुसार चुनाव में देरी से नाबार्ड व केंद्र-राज्य की योजनाओं का लाभ किसानों तक नहीं पहुंच रहा।
मेन्स दृष्टिकोण
तेलंगाणा की 908 पैक्स में फरवरी 2020 के बाद चुनाव न होना सहकारी क्षेत्र में वैधानिक दायित्व और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अंतर को उजागर करता है। अधिनियम-1964 पांच वर्ष में चुनाव अनिवार्य करता है, फिर भी कार्यकाल समाप्ति के एक वर्ष बाद भी चुनाव प्राधिकरण को प्रस्ताव नहीं भेजे गए; बीच में जीओ-597 से प्रबंध समितियां भंग की गईं, जिसे हाईकोर्ट ने स्टे कर जीओ-386 पुनर्बहाल किया और 4 मई 2026 को समितियां लौटीं। परिणाम दोहरा है—सहकारी लोकतंत्र का क्षरण, और अधिकारहीन प्रबंध समितियों के कारण नाबार्ड तथा केंद्र-राज्य की योजनाओं व रियायतों का किसानों तक न पहुंचना। आगे की राह में तत्काल चुनाव प्रस्ताव भेजना, प्रक्रिया पूरी होने तक मौजूदा समितियों की निरंतरता, न्यायालय के आदेशों का अनुपालन और चुनाव के बाद समितियों को सशक्त करना शामिल है, जैसा फोरम ने सुझाया है। शेष नीतिगत विवरण स्रोत में नहीं दिए गए हैं।
मुख्य शब्द
- पैक्स (PACS)
- प्राथमिक कृषि सहकारी समितियां—गांव स्तर पर किसानों को ऋण व सेवाएं देने वाली सहकारी इकाइयां।
- तेलंगाणा सहकारी समिति अधिनियम-1964
- राज्य का कानून, जिसके तहत सहकारी समितियों के चुनाव हर पांच साल में कराना अनिवार्य है।
- पालकवर्ग (प्रबंध समिति)
- पैक्स का निर्वाचित संचालन मंडल, जो समिति के कामकाज और निर्णय के लिए जिम्मेदार होता है।
- जीओ-597 और जीओ-386
- सरकारी आदेश; जीओ-597 से प्रबंध समितियां भंग की गईं, हाईकोर्ट ने उस पर रोक लगाकर जीओ-386 पुनर्बहाल किया।
- नाबार्ड
- स्रोत में उल्लिखित संस्था, जिसकी तथा केंद्र-राज्य की योजनाओं का लाभ किसानों तक न पहुंचने की शिकायत है।
- पैक्स राज्य फोरम
- पैक्स प्रतिनिधियों का राज्यस्तरीय मंच, जिसने चुनाव कराने की मांग का पत्र सौंपा।
अभ्यास प्रश्न
- सहकारी समितियों में समय पर चुनाव न होना सहकारी लोकतंत्र और ग्रामीण ऋण व्यवस्था को कैसे प्रभावित करता है? तेलंगाणा की पैक्स स्थिति के संदर्भ में चर्चा करें।
- प्राथमिक कृषि सहकारी समितियां (पैक्स) किसानों तक सरकारी योजनाओं और रियायतों की पहुंच में क्या भूमिका निभाती हैं? विश्लेषण करें।
- सहकारी समितियों के प्रबंध मंडलों को भंग करने वाले प्रशासनिक आदेशों में न्यायपालिका के हस्तक्षेप का महत्व स्पष्ट करें।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
