रॉ का 58वां वर्ष, पहले प्रमुख आर एन काव ने शून्य से खड़ी की एजेंसी

1968 में स्थापित भारत की विदेशी खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) 21 सितंबर को अस्तित्व के 58वें वर्ष में पहुंच रही है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश पर पूर्व आईबी अधिकारी रामेश्वर नाथ काव ने इसे शून्य से खड़ा किया। 1971 में एजेंसी की सूचना पर पाकिस्तान के पूर्व-नियोजित हवाई हमलों को लेकर भारतीय वायुसेना सतर्क हुई। बी रामन की पुस्तक के अनुसार काव के लोगों ने याह्या खान का संचार तंत्र भेद लिया था। काव ने 1977 में समय-पूर्व सेवानिवृत्ति ली।

स्रोत

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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
  • R&AW was established in 1968 and completes its 58th year on September 21. — Figure and date appear in the source; the arithmetic of 1968 to a 58th year is not explained, an editor may wish to check.
  • A source of K Sankaran Nair warned of Pakistan's planned pre-emptive air strikes; the IAF was alerted and Pakistan struck on December 3, 1971. — Attributed to the source article and to former R&AW officer V Balachandran.
  • Kao's men compromised General Yahya Khan's communications, giving Indira Gandhi daily extracts of his conversations. — Attributed to B Raman's book "Kaoboys of RAW".
  • Kao went incognito to Bangladesh in 1975 to warn Sheikh Mujibur Rahman of a conspiracy, but was not taken seriously. — Attributed to Balachandran in an interview with The Indian Express; single-source recollection.
  • Kao retired prematurely in 1977 and became Senior Adviser in the Cabinet Secretariat in 1981. — Dates appear in the source, drawn largely from Nitin A Gokhale's biography and Balachandran.

विश्लेषकों की राय राय

AI राजनीतिक विश्लेषक

रॉ की कहानी केवल खुफिया इतिहास नहीं, दिल्ली में सत्ता के ढांचे की कहानी भी है। 1968 में इंदिरा गांधी और उनके सलाहकार पी एन हक्सर की पहल पर पुलिस-केंद्रित आईबी से अलग एक समर्पित विदेशी खुफिया एजेंसी बनाना एक राजनीतिक कदम था, जिसने सुरक्षा से जुड़े फैसलों को प्रधानमंत्री कार्यालय के करीब खींच लिया। 1971 के बांग्लादेश युद्ध के नतीजे ने इस फैसले को राजनीतिक वैधता दी, जबकि आपातकाल और 1977 में जनता सरकार का संदेह इसकी कीमत दिखा गया।

  • आईबी से अलग विदेशी एजेंसी का गठन खुफिया अधिकार को प्रधानमंत्री के दायरे में लाने जैसा था — यह एक स्थायी संस्थागत बदलाव साबित हुआ।
  • 1971 की खुफिया सफलता ने इंदिरा गांधी की निर्णायक नेता की छवि मजबूत की और तीन साल पुरानी एजेंसी को राजनीतिक संरक्षण व संसाधन दिलाए; खुफिया कामयाबी राजनीतिक पूंजी बन जाती है।
  • आपातकाल में एजेंसी को सरकार का हथियार बताने वाले विपक्षी आरोप दिखाते हैं कि सत्ताधारी दल से जुड़ी मानी जाने वाली एजेंसियों को बाद में कीमत चुकानी पड़ती है।
  • 1977 में सरकार बदलते ही बजट और अधिकारों में कटौती तथा काव का समय से पहले सेवानिवृत्त होना बताता है कि भारत में संस्थाओं की किस्मत सत्ता परिवर्तन के साथ बदलती है।
  • इंदिरा गांधी की वापसी के बाद 1981 में काव को कैबिनेट सचिवालय में वरिष्ठ सलाहकार बनाना दिखाता है कि भारत का सुरक्षा तंत्र औपचारिक ढांचे से अधिक व्यक्तिगत भरोसे पर चला है।

किस पर नज़र रखें — देखने वाली बात यह है कि वर्षगांठ के मौके पर राजनीतिक खेमे इस विरासत को कैसे पेश करते हैं — एजेंसी खड़ी करने का श्रेय, या आपातकाल के दौर के आरोप।

आपातकाल से जुड़े आरोपों पर यह रिपोर्ट केवल एक पूर्व अधिकारी का पक्ष देती है और उनकी सत्यता तय नहीं करती, न ही एजेंसी की आज की कार्यप्रणाली पर कोई निष्कर्ष देती है।

गहराई से

शोध सारांश · 8 तथ्य · 10 तारीख़ें · परीक्षा के लिए

सार

पृष्ठभूमि

भारत की विदेशी खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) की स्थापना 1968 में हुई थी और 21 सितंबर को यह अस्तित्व के 58वें वर्ष को पूरा कर रही है। 1965 के भारत-पाक युद्ध के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके प्रमुख सलाहकार पी एन हक्सर ने पूर्व आईबी अधिकारी रामेश्वर नाथ काव को आईबी से अलग, विदेश केंद्रित खुफिया संगठन की रचना का काम सौंपा। काव ने इसे शून्य से खड़ा किया और मात्र तीन वर्ष के भीतर 1971 के बांग्लादेश युद्ध में एजेंसी ने सूचना संग्रह, गुप्त कार्रवाई और विश्लेषण—तीनों क्षमताओं का प्रदर्शन किया। काव ने 1977 में समय-पूर्व सेवानिवृत्ति ली, पर सलाहकार के रूप में उनका प्रभाव 1984 तक बना रहा।

मुख्य तथ्य

  • रॉ की स्थापना 1968 में हुई; 21 सितंबर को यह अस्तित्व के 58वें वर्ष को पूरा कर रही है। इसे नाम कैबिनेट सचिवालय ने दिया।
  • नवंबर 1971 के अंतिम सप्ताह में के शंकरन नायर के एक सूत्र से पता चला कि पाकिस्तान पश्चिमी क्षेत्र के भारतीय वायु अड्डों पर पूर्व-नियोजित हवाई हमले की तैयारी कर रहा है; भारतीय वायुसेना सतर्क कर दी गई।
  • पाकिस्तान ने 3 दिसंबर 1971 को हवाई हमले किए; तेरह दिन बाद ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया और बांग्लादेश बना।
  • बी रामन की पुस्तक 'काओबॉयज ऑफ रॉ' के अनुसार काव ने शुरुआती महीनों में दो प्राथमिकताएँ दीं—पाकिस्तान व चीन पर सूचना संग्रह, और पूर्वी पाकिस्तान में गुप्त कार्रवाई।
  • रामन के अनुसार काव के लोगों ने जनरल याह्या खान का संचार तंत्र पूरी तरह भेद लिया था; इंदिरा गांधी को लगभग रोज़ उनकी फोन वार्ताओं के अंश मिलते थे।
  • 1962 के चीन युद्ध के बाद एविएशन रिसर्च सेंटर (एआरसी) बना, जिसका नेतृत्व काव ने 1963 से 1966 तक किया; इसने अमेरिकी सहायता से हवाई खुफिया क्षमता विकसित की।
  • रॉ ने 1975 में सिक्किम के विलय से जुड़ी घटनाओं में बड़ी भूमिका निभाई; अगस्त 1975 में ढाका में शेख मुजीबुर रहमान और उनके परिवार के अधिकांश सदस्यों की हत्या हुई।
  • 1981 में काव कैबिनेट सचिवालय में वरिष्ठ सलाहकार बने; वी बालचंद्रन के अनुसार वे दो-तीन लोगों के दफ्तर के साथ आज के एनएसए जैसी भूमिका निभा रहे थे।

समयरेखा

  1. 1940आर एन काव भारतीय पुलिस में शामिल हुए; स्वतंत्रता के बाद इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) में गए और प्रधानमंत्री नेहरू की सुरक्षा के प्रभारी बने।
  2. 1962चीन के साथ युद्ध के बाद एविएशन रिसर्च सेंटर की स्थापना हुई।
  3. 1963-1966काव ने एआरसी का नेतृत्व किया; उन्होंने स्पेशल फ्रंटियर फोर्स की स्थापना में भी मदद की।
  4. 1965 के बादपाकिस्तान से युद्ध के बाद इंदिरा गांधी और पी एन हक्सर ने काव को अलग विदेशी खुफिया संगठन की रूपरेखा बनाने का काम सौंपा।
  5. 1968रॉ की स्थापना; कैबिनेट सचिवालय ने इसे 'रिसर्च एंड एनालिसिस विंग' नाम दिया।
  6. नवंबर 1971 का अंतिम सप्ताहशंकरन नायर के सूत्र से पाकिस्तानी पूर्व-नियोजित हवाई हमले की चेतावनी मिली; वायुसेना अलर्ट पर।
  7. 3 दिसंबर 1971पाकिस्तान ने हवाई हमले किए; 13 दिन बाद ढाका में आत्मसमर्पण और बांग्लादेश का जन्म।
  8. 1975सिक्किम के विलय में रॉ की बड़ी भूमिका; अगस्त 1975 में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या, जिससे पहले काव गुप्त रूप से बांग्लादेश जाकर चेतावनी दे आए थे।
  9. 1977जनता सरकार के आने पर काव ने समय-पूर्व सेवानिवृत्ति ली; उसी वर्ष रॉ प्रमुख एन एफ सुनटूक ने एनपीटी पर हस्ताक्षर न करने के लिए होमी सेठना को समझाने में काव की मदद ली।
  10. 1981पाकिस्तान के गुप्त परमाणु कार्यक्रम को उजागर करने के लिए काव ने अंतरराष्ट्रीय प्रेस के रास्ते का सुझाव दिया; इसी वर्ष वे कैबिनेट सचिवालय में वरिष्ठ सलाहकार बने।

किसका दाँव

  • आर एन काव — रॉ के पहले प्रमुख; शून्य से एजेंसी की जनशक्ति, कौशल और संस्थागत संस्कृति खड़ी की, पर सार्वजनिक श्रेय से दूर रहे।
  • प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पी एन हक्सर — आईबी से अलग विदेशी खुफिया एजेंसी बनवाने का राजनीतिक निर्णय; 1971 युद्ध संचालन में खुफिया इनपुट पर निर्भरता।
  • के शंकरन नायर — पाकिस्तान और इस्लामी जगत के जानकार अधिकारी; संगठन की संरचना को अपनी 'मैग्नम ओपस' मानते थे और 1971 की चेतावनी पहुँचाई।
  • भारतीय वायुसेना व सेना — 3 दिसंबर 1971 के हमले से पहले पूर्व-सूचना मिलने से तैयारी; ढाका आत्मसमर्पण तक की कार्रवाई।
  • रॉ (संस्था) व उसके अधिकारी — आपातकाल में सरकार का हथियार होने के आरोप, और जनता सरकार के दौर में बजट व शक्तियों में कटौती का सामना।
  • बांग्लादेशी (बंगाली) राजनीतिक नेतृत्व व प्रतिरोध समूह — रॉ ने संपर्क बनाए और प्रतिरोध के तत्वों का समन्वय किया, जिससे मुक्ति संग्राम की ज़मीन तैयार हुई।

क्यों अहम है

रॉ की कहानी दिखाती है कि युद्ध और कूटनीति के नतीजे सिर्फ सैन्य ताकत से नहीं, बल्कि समय पर मिली खुफिया सूचना और संस्थागत क्षमता से भी तय होते हैं—1971 में पूर्व-चेतावनी ने भारत को तैयार रखा। साथ ही आपातकाल के आरोप, 1977 में बजट व शक्तियों की कटौती और मुजीब हत्या जैसे प्रकरण खुफिया एजेंसियों की जवाबदेही, राजनीतिक दुरुपयोग और सीमाओं के स्थायी सवाल उठाते हैं।

UPSC नज़रिया

प्रीलिम्स संकेत

  • रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग): स्थापना 1968; नाम कैबिनेट सचिवालय ने दिया; पहले प्रमुख रामेश्वर नाथ काव।
  • एविएशन रिसर्च सेंटर (एआरसी) 1962 के चीन युद्ध के बाद बना; काव ने 1963-66 तक नेतृत्व किया।
  • स्पेशल फ्रंटियर फोर्स—उत्तरी सीमाओं के कठिन भूभाग में कार्य के लिए; इसकी स्थापना में काव की भूमिका।
  • 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी हवाई हमले; 13 दिन बाद ढाका में पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण और बांग्लादेश का उदय।
  • 1975: सिक्किम के विलय से जुड़ी घटनाओं में रॉ की भूमिका; अगस्त 1975 में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या।
  • 1977: रॉ प्रमुख एन एफ सुनटूक ने परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होमी सेठना के जरिये पीएम मोरारजी देसाई को एनपीटी पर हस्ताक्षर न करने की सलाह दिलाने का प्रयास किया।

मेन्स दृष्टिकोण

रॉ की स्थापना 1962 और 1965 के युद्धों के सबक से निकली—आईबी का पुलिस-केंद्रित ढांचा विदेश में गुप्त संचालन के लिए अपर्याप्त था, इसलिए इंदिरा गांधी और पी एन हक्सर ने काव को विविध विशेषज्ञता वाले, बिना ध्यान खींचे विदेश में काम कर सकने वाले संगठन की रचना का दायित्व दिया। मात्र दो-तीन वर्षों में पाकिस्तान-चीन पर सूचना संग्रह और पूर्वी पाकिस्तान में गुप्त कार्रवाई की क्षमता विकसित करना—याह्या खान के संचार तंत्र में प्रवेश, बंगाली प्रतिरोध समूहों का समन्वय और 3 दिसंबर 1971 के हवाई हमले की पूर्व-चेतावनी—संस्थागत निर्माण, प्रतिभा-चयन (सामान्य नौकरशाही मार्गों से बाहर भर्ती) और रिपोर्टिंग में कठोर मानकों का उदाहरण है। दूसरी ओर आपातकाल के दौरान एजेंसी पर सरकार की 'हथियार' होने के आरोप, 1977 में बजट-शक्तियों में कटौती, और मुजीब हत्या पर उठे प्रश्न बताते हैं कि खुफिया एजेंसियाँ राजनीतिक भरोसे और वैधता के संकट के प्रति संवेदनशील हैं तथा चेतावनी मिलने के बाद भी नीति-निर्णय अपने हाथ में नहीं होता। आगे का रास्ता स्रोत में नीतिगत रूप से नहीं बताया गया; पर कहानी जो संकेत देती है वह है—पेशेवर स्वायत्तता, कम प्रचार व अधिक विश्वसनीयता, विशेषज्ञ भर्ती, और खुफिया इनपुट को कूटनीतिक व रणनीतिक चैनलों (1981 में अंतरराष्ट्रीय प्रेस के उपयोग जैसे नवाचारों सहित) से जोड़ने की क्षमता।

मुख्य शब्द

रॉ (Research and Analysis Wing)
1968 में स्थापित भारत की विदेशी खुफिया एजेंसी, जिसे कैबिनेट सचिवालय ने यह नाम दिया।
इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी)
भारत की आंतरिक खुफिया संस्था; पुलिस-केंद्रित ढांचे वाली, जहाँ से काव रॉ बनाने आए।
एविएशन रिसर्च सेंटर (एआरसी)
1962 के चीन युद्ध के बाद बनी इकाई, जिसने अमेरिकी सहायता से हवाई खुफिया क्षमता विकसित की।
स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ)
भारत की उत्तरी सीमाओं के कठिन भूभाग में संचालन के लिए बनाया गया बल, जिसकी स्थापना में काव की भूमिका रही।
कवर्ट एक्शन (गुप्त कार्रवाई)
छिपाकर की जाने वाली कार्रवाई; रॉ की शुरुआती प्राथमिकता पूर्वी पाकिस्तान में यह क्षमता बनाना था।
एनपीटी (परमाणु अप्रसार संधि)
वह संधि जिस पर हस्ताक्षर न करने की सलाह 1977 में पीएम मोरारजी देसाई को दिलाने का प्रयास किया गया।

अभ्यास प्रश्न

  1. 1971 के बांग्लादेश युद्ध में खुफिया सूचना और गुप्त कार्रवाई की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। रॉ के अनुभव से संस्थागत क्षमता निर्माण के क्या सबक मिलते हैं?
  2. "खुफिया एजेंसियों की सफलता उनकी अदृश्यता में है, पर लोकतंत्र में उनकी जवाबदेही आवश्यक है।" आपातकाल के दौरान रॉ पर लगे आरोपों के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
  3. 1962 और 1965 के युद्धों ने भारत की खुफिया संरचना को कैसे बदला? एआरसी, एसएफएफ और रॉ के गठन के संदर्भ में समझाइए।

सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।

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