अध्ययन: ड्यूअल नर्व ब्लॉक से उपचार-प्रतिरोधी चिंता में राहत संभव
बेंगलुरु के पास चिक्कबल्लापुर स्थित श्री मधुसूदन साई इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च में हुए एक क्लिनिकल ट्रायल में पाया गया कि ड्यूअल स्टेलेट गैंग्लियन ब्लॉक (एसजीबी) उपचार-प्रतिरोधी चिंता के रोगियों के लक्षण कम कर सकता है। 63 रोगियों में 42 को एसजीबी और 21 को शैम प्रक्रिया दी गई तथा 12 सप्ताह तक निगरानी की गई। जी. निराज के नेतृत्व वाली टीम ने कहा कि एसजीबी समूह में लक्षणों में उल्लेखनीय कमी दिखी। शोधकर्ताओं ने बड़े अध्ययनों की जरूरत बताई।
स्रोत
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डेस्क ने क्या जाँचा (5)
- Dual stellate ganglion block reduced anxiety symptoms significantly more than a sham procedure in 63 treatment-resistant patients. — Figures and outcome appear in the source, attributed to a trial published in Pain Physician (July-August 2026 issue).
- The trial is the world's first randomised controlled trial of dual SGB for treatment-resistant anxiety. — Source explicitly presents this as a claim by the researchers, not independently verified.
- 42 patients received dual SGB and 21 a sham procedure, followed for 12 weeks. — Numbers appear in the source; consistent with the stated total of 63.
- 14 patients had temporary hoarseness lasting one to three hours; one had upper-limb numbness resolving within six hours; no serious adverse events. — Safety figures stated in the source, attributed to the study.
- Findings need confirmation through larger studies as the trial was single-centre with 12-week follow-up. — Caveat attributed to the researchers in the source.
विश्लेषकों की राय राय
चिकित्सकीय नतीजे के तौर पर यह एक छोटा लेकिन दिलचस्प संकेत है: 63 मरीज़ों पर एक ही केंद्र में हुए रैंडमाइज़्ड परीक्षण से लगता है कि गर्दन की नसों का ब्लॉक उस चिंता (एंग्ज़ायटी) में राहत दे सकता है जो दवा और मनोचिकित्सा से काबू में नहीं आई। नीति की नज़र से यह भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवा की असली खाई की याद दिलाता है — शोधकर्ता खुद इसका आकर्षण यही बताते हैं कि जहाँ लंबी मनोचिकित्सा उपलब्ध नहीं, वहाँ यह क्लिनिक में होने वाली छोटी प्रक्रिया है। यही इसकी संभावना है और जोखिम भी: प्रक्रियाएँ काउंसलिंग क्षमता से ज़्यादा आसानी से फैलती हैं, इसलिए व्यापक अपनाने से पहले साक्ष्य का स्तर और रेफरल के नियम तय होना ज़रूरी है।
- परीक्षण की डिज़ाइन — रैंडमाइज़ेशन और शाम (नकली) प्रक्रिया से तुलना — नीति के लिहाज़ से नतीजे से भी अहम है, क्योंकि लक्षण-आधारित बीमारियों में असली असर और अपेक्षा के फ़र्क को शाम-नियंत्रित परीक्षण ही पकड़ता है।
- किसी भी नीतिगत इस्तेमाल के लिए आकार और अवधि सबसे बड़ी सीमा हैं: 42 मरीज़ों को प्रक्रिया, 21 को शाम उपचार, एक ही केंद्र और सिर्फ़ 12 हफ़्ते की निगरानी — शोधकर्ता खुद बड़े अध्ययनों की ज़रूरत बताते हैं।
- पात्रता की शर्तें एक विशिष्ट हस्तक्षेप के लिहाज़ से स्पष्ट हैं — कम से कम एक फ़र्स्ट-लाइन दवा और एक मनोचिकित्सा, दोनों आठ-आठ हफ़्ते तक असर न करना — और आगे किसी भी प्रोटोकॉल को यह छँटाई कायम रखनी होगी, ताकि यह प्रक्रिया पहली पसंद न बन जाए।
- मुख्य शोधकर्ता की यह सावधानी कि यह दवा या थेरेपी का विकल्प नहीं है, असल शासन-बिंदु है; मनोचिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों की कमी के कारण प्रक्रिया को विकल्प बना देने का दबाव बना रहेगा, जिसे इरादे नहीं, दिशानिर्देश ही रोक सकते हैं।
- इस परीक्षण में सुरक्षा संभालने योग्य दिखी — कोई गंभीर प्रतिकूल घटना नहीं, 14 मरीज़ों में कुछ घंटों की आवाज़ भारी होना, एक में अस्थायी सुन्नपन — पर अल्ट्रासाउंड-निर्देशित गर्दन का इंजेक्शन प्रशिक्षित विशेषज्ञ माँगता है, जो ग्रामीण पहुँच के तर्क के साथ पूरी तरह मेल नहीं खाता।
किस पर नज़र रखें — देखने वाली बात यह है कि क्या इस नतीजे को लंबी निगरानी वाले बहु-केंद्रीय अध्ययनों में दोहराया जाता है, और क्या कोई पेशेवर संस्था या सार्वजनिक कार्यक्रम रेफरल मानदंड व प्रशिक्षण नियम बनाता है, या निजी प्रैक्टिस में यह बेतरतीब ढंग से फैलता है।
यह खबर यह स्थापित नहीं करती कि लाभ कितने समय तक रहता है, यह कैसे काम करता है, इस एक निजी अस्पताल के बाहर भी नतीजे टिकेंगे या नहीं, और न ही यह कि किसी नियामक, बीमा कंपनी या सरकारी कार्यक्रम ने इस प्रक्रिया पर कोई रुख़ लिया है।
गहराई से
शोध सारांश · 8 तथ्य · 2 तारीख़ें · परीक्षा के लिएसार
पृष्ठभूमि
बेंगलुरु के निकट चिक्कबल्लापुर स्थित निजी मेडिकल कॉलेज अस्पताल श्री मधुसूदन साई इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च (SMSIMSR) के चिकित्सकों ने उपचार-प्रतिरोधी चिंता (treatment-resistant anxiety) पर एक क्लिनिकल ट्रायल किया। इसमें गर्दन की नसों के समूह में स्थानीय एनेस्थेटिक और स्टेरॉयड का इंजेक्शन देने वाली प्रक्रिया — ड्यूअल स्टेलेट गैंग्लियन ब्लॉक (एसजीबी) — का परीक्षण किया गया। शोधकर्ताओं का दावा है कि यह उपचार-प्रतिरोधी चिंता के लिए ड्यूअल एसजीबी का मूल्यांकन करने वाला विश्व का पहला रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल है। अध्ययन ओपन-एक्सेस जर्नल Pain Physician के जुलाई-अगस्त 2026 अंक में प्रकाशित हुआ।
मुख्य तथ्य
- अध्ययन में मध्यम से गंभीर उपचार-प्रतिरोधी चिंता वाले 63 रोगी शामिल थे; 42 को ड्यूअल एसजीबी और 21 को शैम (छद्म) प्रक्रिया दी गई।
- रोगियों की 12 सप्ताह तक निगरानी की गई; एसजीबी समूह में चिंता के लक्षणों में शैम समूह से उल्लेखनीय रूप से अधिक कमी पाई गई।
- अध्ययन ओपन-एक्सेस जर्नल Pain Physician के जुलाई-अगस्त 2026 अंक में प्रकाशित हुआ।
- नेतृत्व: डॉ. जी. निराज, वरिष्ठ सलाहकार, एनेस्थीसियोलॉजी, SMSIMSR, चिक्कबल्लापुर; टीम में पेन मेडिसिन चिकित्सक, मनोचिकित्सक और क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक शामिल।
- प्रक्रिया अल्ट्रासाउंड निर्देशन में गर्दन के दोनों तरफ की गई; दूसरा ब्लॉक पहले के 24 घंटे से 7 दिन के बीच दिया गया।
- एसजीबी समूह में कोई गंभीर प्रतिकूल घटना नहीं; 14 रोगियों में 1-3 घंटे तक अस्थायी आवाज़ बैठना, 1 रोगी में ऊपरी अंग में सुन्नपन जो 6 घंटे में ठीक हो गया।
- उपचार-प्रतिरोधी चिंता की परिभाषा: कम से कम एक फर्स्ट-लाइन दवा और एक फर्स्ट-लाइन मनोचिकित्सा, प्रत्येक कम से कम 8 सप्ताह तक, के बाद भी लाभ न होना।
- 63 प्रतिभागियों में से 46 ने पहले कम से कम दो दवाएँ आज़मा चुके थे।
समयरेखा
- जुलाई-अगस्त 2026अध्ययन ओपन-एक्सेस जर्नल Pain Physician के अंक में प्रकाशित।
- 15 सितंबर 2026समाचार रिपोर्ट प्रकाशित (रात 11:15 बजे IST)।
किसका दाँव
- उपचार-प्रतिरोधी चिंता के रोगी — मानक दवा और मनोचिकित्सा से लाभ न मिलने पर एक अतिरिक्त क्लिनिक-आधारित विकल्प की संभावना।
- श्री मधुसूदन साई इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च (SMSIMSR), चिक्कबल्लापुर — एकल-केंद्र ट्रायल का संचालन; विश्व का पहला ऐसा रैंडमाइज्ड ट्रायल होने का दावा।
- डॉ. जी. निराज और बहु-विषयक टीम — निष्कर्षों की वैज्ञानिक विश्वसनीयता; उनका कहना है कि एसजीबी मनोचिकित्सा या दवा का विकल्प नहीं है।
- ग्रामीण व शहरी मानसिक स्वास्थ्य सेवा तंत्र — जहाँ दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक चिकित्सा तक पहुँच सीमित है, वहाँ क्लिनिक-आधारित हस्तक्षेप की प्रासंगिकता।
- शोध व नियामक समुदाय — बड़े, बहु-केंद्रीय अध्ययनों से पुष्टि तथा लाभ की अवधि व क्रियाविधि समझने की आवश्यकता।
क्यों अहम है
चिंता विकार के कई रोगी मानक दवाओं और मनोचिकित्सा से पर्याप्त राहत नहीं पाते, और भारत के अनेक क्षेत्रों में दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक चिकित्सा तक पहुँच सीमित है। यदि बड़े अध्ययनों में पुष्टि हो, तो एक अल्ट्रासाउंड-निर्देशित, क्लिनिक-आधारित प्रक्रिया मौजूदा उपचार के साथ पूरक विकल्प बन सकती है। साथ ही यह अध्ययन एकल केंद्र और केवल 12 सप्ताह की निगरानी तक सीमित है, इसलिए निष्कर्षों को सतर्कता से देखा जाना चाहिए।
UPSC नज़रिया
प्रीलिम्स संकेत
- स्टेलेट गैंग्लियन ब्लॉक (एसजीबी): गर्दन की नसों के समूह में स्थानीय एनेस्थेटिक व स्टेरॉयड का अल्ट्रासाउंड-निर्देशित इंजेक्शन।
- स्टेलेट गैंग्लियन सहानुभूति तंत्रिका तंत्र (sympathetic nervous system) का भाग है, जो 'फाइट-ऑर-फ्लाइट' प्रतिक्रिया नियंत्रित करता है।
- अध्ययन: 63 रोगी — 42 एसजीबी, 21 शैम; 12 सप्ताह फॉलो-अप; SMSIMSR, चिक्कबल्लापुर (कर्नाटक)।
- प्रकाशन: Pain Physician (ओपन-एक्सेस जर्नल), जुलाई-अगस्त 2026 अंक।
- उपचार-प्रतिरोधी चिंता: कम से कम एक फर्स्ट-लाइन दवा व एक फर्स्ट-लाइन मनोचिकित्सा (प्रत्येक ≥8 सप्ताह) पर प्रतिक्रिया न देना।
- शैम प्रक्रिया (sham) का प्रयोग रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल में तुलनात्मक नियंत्रण के लिए किया जाता है।
मेन्स दृष्टिकोण
उपचार-प्रतिरोधी चिंता मानसिक स्वास्थ्य सेवा की एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि रोगी मानक दवा और मनोचिकित्सा दोनों पर पर्याप्त प्रतिक्रिया नहीं देते; अध्ययन में शामिल 63 रोगियों में से 46 पहले कम से कम दो दवाएँ आज़मा चुके थे। SMSIMSR, चिक्कबल्लापुर के ट्रायल का तर्क यह है कि लगातार चिंता में शरीर का 'स्ट्रेस अलार्म' सक्रिय बना रहता है और सहानुभूति तंत्रिका तंत्र की अत्यधिक सक्रियता को कम करने से लक्षणों में राहत मिल सकती है — इसीलिए दोनों तरफ ड्यूअल स्टेलेट गैंग्लियन ब्लॉक दिया गया, जिसमें एसजीबी समूह में शैम समूह की तुलना में लक्षणों में उल्लेखनीय अधिक कमी और कोई गंभीर दुष्प्रभाव नहीं देखा गया (14 रोगियों में 1-3 घंटे की अस्थायी आवाज़ बैठना, एक में 6 घंटे में ठीक होने वाला सुन्नपन)। इसके नीतिगत प्रभाव यह हैं कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में, जहाँ दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक चिकित्सा तक पहुँच सीमित है, एक क्लिनिक-आधारित हस्तक्षेप मौजूदा उपचार के पूरक के रूप में काम कर सकता है। आगे का रास्ता संयम का है: शोधकर्ताओं ने स्वयं स्पष्ट किया कि एसजीबी मनोचिकित्सा या दवा का प्रतिस्थापन नहीं है, ट्रायल एकल केंद्र पर हुआ और फॉलो-अप केवल 12 सप्ताह का था; लाभ की अवधि और क्रियाविधि समझने के लिए बड़े अध्ययन आवश्यक हैं।
मुख्य शब्द
- स्टेलेट गैंग्लियन ब्लॉक (SGB)
- गर्दन की तंत्रिका-गुच्छिका में अल्ट्रासाउंड निर्देशन में स्थानीय एनेस्थेटिक व स्टेरॉयड मिश्रण का इंजेक्शन।
- ड्यूअल एसजीबी
- गर्दन के दोनों तरफ ब्लॉक; दूसरा ब्लॉक पहले के 24 घंटे से 7 दिन के भीतर दिया जाता है।
- उपचार-प्रतिरोधी चिंता
- कम से कम एक फर्स्ट-लाइन दवा और एक फर्स्ट-लाइन मनोचिकित्सा (प्रत्येक ≥8 सप्ताह) के बाद भी लक्षण बने रहना।
- सहानुभूति तंत्रिका तंत्र
- शरीर की 'फाइट-ऑर-फ्लाइट' तनाव प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने वाला तंत्रिका तंत्र का भाग।
- शैम प्रक्रिया
- छद्म/नकली हस्तक्षेप जो नियंत्रण समूह को दिया जाता है ताकि वास्तविक उपचार के प्रभाव की तुलना हो सके।
- रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल (RCT)
- रोगियों को यादृच्छिक रूप से उपचार व नियंत्रण समूहों में बाँटकर किया गया अध्ययन; यहाँ 42 बनाम 21 रोगी।
अभ्यास प्रश्न
- उपचार-प्रतिरोधी चिंता क्या है, और ड्यूअल स्टेलेट गैंग्लियन ब्लॉक इसके लक्षणों को कम करने में किस तंत्र से सहायक हो सकता है? चिक्कबल्लापुर ट्रायल के निष्कर्षों के आधार पर चर्चा करें।
- एकल-केंद्र और 12 सप्ताह के फॉलो-अप वाले क्लिनिकल ट्रायल के निष्कर्षों को नीति में शामिल करने से पहले किन वैज्ञानिक सावधानियों की आवश्यकता होती है?
- भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवा तक सीमित पहुँच के संदर्भ में क्लिनिक-आधारित हस्तक्षेप मौजूदा दवा और मनोचिकित्सा के पूरक कैसे बन सकते हैं? समीक्षा करें।
सिर्फ़ मूल ख़बर के आधार पर — आँकड़े और तारीख़ें स्रोत की हैं, अनुमान नहीं।
